पश्चिम बंगाल में नई सरकार द्वारा प्रस्तुत पहले बजट ने राज्य की मदरसा शिक्षा व्यवस्था को लेकर राष्ट्रीय स्तर पर बहस छेड़ दी है। सरकार ने अल्पसंख्यक मामलों एवं मदरसा शिक्षा के लिए आवंटित बजट में भारी कटौती करते हुए इसे पूर्ववर्ती सरकार की तुलना में आधे से भी कम कर दिया है। जहां वित्तीय वर्ष 2025-26 में पूर्व सरकार ने इस मद में 5,713 करोड़ रुपये आवंटित किए थे, वहीं नई सरकार ने इसे घटाकर 2,165 करोड़ रुपये कर दिया है।
इसके साथ ही राज्य सरकार ने सभी जिलाधिकारियों को 5 जुलाई तक मदरसों की फंडिंग, पाठ्यक्रम, शिक्षकों की योग्यता, छात्र संख्या और गतिविधियों की विस्तृत रिपोर्ट प्रस्तुत करने के निर्देश दिए हैं। सरकार ने संकेत दिया है कि यदि किसी संस्थान में विदेशी फंडिंग, वित्तीय अनियमितता, कट्टरपंथी गतिविधियों या नियमों के उल्लंघन के प्रमाण मिलते हैं तो उसके विरुद्ध कठोर कार्रवाई की जा सकती है।
सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न: शिक्षा या केवल धार्मिक प्रशिक्षण?
मदरसों को लेकर वर्षों से यह बहस चलती रही है कि क्या वे बच्चों को आधुनिक शिक्षा और रोजगारपरक ज्ञान प्रदान कर रहे हैं अथवा उनका अधिकांश ध्यान धार्मिक शिक्षा तक सीमित है। आलोचकों का तर्क है कि यदि किसी संस्थान में गणित, विज्ञान, कंप्यूटर, सामाजिक विज्ञान और भाषा शिक्षा का पर्याप्त समावेश नहीं है तो वहां पढ़ने वाले बच्चे मुख्यधारा की प्रतिस्पर्धा में पीछे रह सकते हैं।
राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग (NCPCR) ने भी राज्यों को पत्र लिखकर कहा था कि ऐसे संस्थानों की समीक्षा की जानी चाहिए जो शिक्षा के अधिकार (RTE) अधिनियम की भावना के अनुरूप नहीं चलते। आयोग का मानना रहा है कि प्रत्येक बच्चे को गुणवत्तापूर्ण और आधुनिक शिक्षा उपलब्ध कराना राज्य की जिम्मेदारी है।
फंडिंग की पारदर्शिता पर बढ़ते सवाल
देश के विभिन्न हिस्सों में समय-समय पर कुछ मदरसों पर सरकारी अनुदान के दुरुपयोग, छात्र संख्या में कथित हेरफेर तथा संदिग्ध स्रोतों से वित्तीय सहायता प्राप्त करने के आरोप लगे हैं। हालांकि सभी मदरसों को एक ही दृष्टि से देखना उचित नहीं होगा, लेकिन पारदर्शिता सुनिश्चित करने के लिए नियमित ऑडिट, वित्तीय जांच और प्रशासनिक निगरानी की मांग लगातार उठती रही है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि किसी भी शैक्षणिक संस्थान को सरकारी सहायता प्राप्त होती है तो उसके लिए वित्तीय जवाबदेही और शैक्षणिक गुणवत्ता दोनों अनिवार्य होनी चाहिए।
मान्यता प्राप्त और गैर-मान्यता प्राप्त मदरसों की चुनौती
पश्चिम बंगाल में लगभग 614 सरकारी सहायता प्राप्त मदरसे हैं, जबकि गैर-पंजीकृत या तथाकथित “खारीजी” मदरसों की संख्या हजारों में बताई जाती है। सबसे बड़ी चुनौती इन्हीं गैर-पंजीकृत संस्थानों की है, क्योंकि इनके संचालन, पाठ्यक्रम, शिक्षक नियुक्ति और वित्तीय स्रोतों पर सरकारी निगरानी सीमित रहती है।
किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था में समान शिक्षा मानकों का पालन सुनिश्चित करना सरकार की जिम्मेदारी होती है। इसलिए गैर-पंजीकृत संस्थानों की पहचान और सत्यापन प्रशासन के लिए महत्वपूर्ण विषय बन चुका है।
देशभर में बदलती सरकारी नीति
पिछले कुछ वर्षों में विभिन्न राज्यों ने मदरसों की समीक्षा और नियमन को लेकर अलग-अलग कदम उठाए हैं:
उत्तर प्रदेश में सैकड़ों अवैध या बिना मान्यता वाले मदरसों के खिलाफ कार्रवाई की गई।
असम में 1,281 सरकारी सहायता प्राप्त मदरसों को सामान्य विद्यालयों में परिवर्तित किया गया।
उत्तराखंड में 200 से अधिक अवैध मदरसों को सील किया गया।
मध्य प्रदेश में नियमों का पालन न करने वाले कई मदरसों की मान्यता समाप्त की गई।
इन कार्रवाइयों का घोषित उद्देश्य शिक्षा व्यवस्था में पारदर्शिता, गुणवत्ता और कानूनी अनुपालन सुनिश्चित करना बताया गया।
घटती छात्र संख्या भी चिंता का विषय
कुछ राज्यों में मदरसों में छात्रों के नामांकन में लगातार गिरावट देखी जा रही है। उदाहरण के तौर पर उत्तर प्रदेश मदरसा बोर्ड परीक्षाओं में जहां एक दशक पहले चार लाख से अधिक छात्र शामिल होते थे, वहीं हाल के वर्षों में यह संख्या काफी कम हो गई है। इससे यह प्रश्न भी उठता है कि क्या अभिभावक अब अपने बच्चों को अधिक आधुनिक और रोजगारोन्मुखी शिक्षा संस्थानों की ओर भेजना पसंद कर रहे हैं।
मूल मुद्दा: धर्म नहीं, शिक्षा की गुणवत्ता
इस पूरे विवाद का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह है कि बहस किसी धर्म विशेष के खिलाफ नहीं, बल्कि शिक्षा की गुणवत्ता, बच्चों के भविष्य और संस्थागत पारदर्शिता पर केंद्रित होनी चाहिए। यदि कोई मदरसा आधुनिक शिक्षा, संवैधानिक मूल्यों, विज्ञान, तकनीक और रोजगारपरक कौशल के साथ धार्मिक शिक्षा भी प्रदान करता है तो वह समाज के लिए सकारात्मक भूमिका निभा सकता है।
लेकिन यदि किसी संस्थान में बच्चों को मुख्यधारा की शिक्षा से दूर रखा जाता है, वित्तीय पारदर्शिता नहीं होती या कानूनों का पालन नहीं किया जाता, तो उसकी समीक्षा और नियमन आवश्यक हो जाता है।
पश्चिम बंगाल सरकार का बजट निर्णय केवल वित्तीय कटौती का मामला नहीं है, बल्कि यह देश में मदरसा शिक्षा की दिशा, गुणवत्ता, जवाबदेही और आधुनिकीकरण पर चल रही व्यापक बहस का हिस्सा बन चुका है। आने वाले महीनों में जिलाधिकारियों की रिपोर्ट, संभावित जांच और सरकार की आगे की कार्रवाई यह तय करेगी कि यह कदम केवल प्रशासनिक सुधार साबित होता है या देश की शिक्षा नीति में एक बड़े परिवर्तन का संकेत बनता है।














