“पैकेट पर लिखे चंद शब्दों के भरोसे व्रती खरीद रहे हैं खाद्य पदार्थ—स्पष्ट जानकारी नहीं तो आस्था से जुड़े उपभोक्ताओं के साथ हो सकता है बड़ा अन्याय”
पर्दाफाश ब्यूरो, नई दिल्ली/लखनऊ: भारत में व्रत केवल खान-पान की आदत नहीं, बल्कि करोड़ों लोगों की आस्था और धार्मिक विश्वास से जुड़ा विषय है। ऐसे में जब कोई खाद्य कंपनी अपने उत्पाद के पैकेट पर बड़े-बड़े अक्षरों में ‘Fasting Special’, ‘व्रत स्पेशल’ या ‘उपवास के लिए उपयुक्त’ जैसे दावे करती है, तो उपभोक्ता उस दावे को महज विज्ञापन नहीं मानता। वह उसे विश्वास के साथ स्वीकार करता है।
लेकिन अब सबसे बड़ा सवाल यही है—क्या ऐसे दावों के साथ उपभोक्ता को पूरी और स्पष्ट जानकारी दी जा रही है?
अगर पैकेट पर व्रत के लिए उपयुक्त होने का दावा प्रमुखता से किया जाए और उत्पाद की वास्तविक सामग्री अथवा उसकी सीमाओं की जानकारी अस्पष्ट, बेहद छोटे अक्षरों में या भ्रम पैदा करने वाली हो, तो मामला केवल पैकेजिंग का नहीं रह जाता। यह सीधे उपभोक्ता के विश्वास और धार्मिक आस्था से जुड़ जाता है।
योगी सरकार से संज्ञान लेने की मांग
उत्तर प्रदेश में बड़ी संख्या में लोग विभिन्न पर्वों और धार्मिक अवसरों पर व्रत रखते हैं। ऐसे में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व वाली प्रदेश सरकार से यह अपेक्षा स्वाभाविक है कि वह ऐसे मामलों में उपभोक्ताओं के हितों की रक्षा के लिए आवश्यक कदम उठाए।
पर्दाफाश समाचार के माध्यम से सरकार और संबंधित विभागों का ध्यान इस गंभीर विषय की ओर आकर्षित किया जा रहा है कि बाजार में ‘Fasting Special’ या इसी तरह के धार्मिक उपयोग संबंधी दावों वाले खाद्य उत्पादों की पैकेजिंग, सामग्री और विज्ञापन दावों की जांच की जाए।
जरूरत इस बात की है कि कंपनियों से पूछा जाए—जब आप किसी उत्पाद को व्रत के लिए विशेष बताते हैं, तो क्या उपभोक्ता को यह स्पष्ट रूप से बताया जाता है कि वह उत्पाद किन व्रतों और किन आहार संबंधी नियमों के अनुरूप है?
कंपनियां याद रखें—आस्था कोई मार्केटिंग टूल नहीं
खाद्य कंपनियों को यह स्पष्ट संदेश समझना होगा कि धार्मिक आस्था को केवल बिक्री बढ़ाने का माध्यम नहीं बनाया जा सकता।
‘Fasting Special’ जैसे शब्द किसी ग्राहक के लिए सामान्य विज्ञापन की पंक्ति नहीं हैं। व्रत रखने वाला व्यक्ति इन्हें एक भरोसे के रूप में देखता है। वह यह मानकर उत्पाद खरीद सकता है कि कंपनी ने उसके धार्मिक और आहार संबंधी नियमों को ध्यान में रखकर उत्पाद तैयार किया है।
इसलिए यदि किसी कंपनी को अपने उत्पाद पर ऐसा दावा करना है, तो उसे पूरी पारदर्शिता के साथ बताना चाहिए कि उत्पाद में क्या है, किस उद्देश्य के लिए है और उसकी क्या सीमाएं हैं।
अस्पष्ट शब्दों, आकर्षक पैकेजिंग और छोटे अक्षरों के पीछे महत्वपूर्ण जानकारी छिपाकर उपभोक्ता को निर्णय लेने के लिए मजबूर करना किसी भी जिम्मेदार कारोबारी व्यवस्था की पहचान नहीं हो सकती।
एक छोटा-सा शब्द, करोड़ों लोगों का विश्वास
कल्पना कीजिए—व्रत रखने वाला कोई व्यक्ति दुकान पर जाता है। उसके सामने कई पैकेट हैं। एक पैकेट पर साफ लिखा है—‘Fasting Special’।
वह व्यक्ति कंपनी के इस दावे पर भरोसा करता है और उत्पाद खरीद लेता है।
उसने पैकेट पर लिखे हर घटक की वैज्ञानिक जांच नहीं की। उसने कंपनी के दावे को विश्वास के रूप में स्वीकार किया।
यहीं कंपनी की जिम्मेदारी शुरू होती है।
यदि बाद में उसे पता चलता है कि उत्पाद के संबंध में ऐसी जानकारी थी जिसे पैकेजिंग पर और अधिक स्पष्ट तरीके से बताया जाना चाहिए था, तो उसके सामने केवल आर्थिक नुकसान का सवाल नहीं होता। उसके लिए यह आस्था और विश्वास का प्रश्न बन सकता है।
कंपनियों के लिए कड़ी चेतावनी
यह समय खाद्य कंपनियों के लिए चेतावनी का है।
व्रत के नाम पर अस्पष्ट दावे करके उपभोक्ता के विश्वास के साथ खिलवाड़ किसी भी कीमत पर स्वीकार नहीं किया जाना चाहिए।
यदि कोई कंपनी अपने उत्पाद को ‘Fasting Special’ बताती है तो उसे अपने दावे के पीछे पूरी जिम्मेदारी के साथ खड़ा होना चाहिए। पैकेट पर ऐसी जानकारी नहीं होनी चाहिए जिससे आम उपभोक्ता भ्रमित हो।
कंपनियों को यह नहीं भूलना चाहिए कि ग्राहक केवल उत्पाद नहीं खरीदता। वह ब्रांड की विश्वसनीयता खरीदता है।
और जब उत्पाद धार्मिक आस्था से जुड़ा हो, तब यह जिम्मेदारी कई गुना बढ़ जाती है।
@letsblinkit @blinkitcares says chhedas Banana Chips a fasting special is misleading when the ingredients clearly mention “Salt” without specifying rock salt (sendha namak). Pls clarify or correct this claim, as people rely on such labels while fasting@fssaiindia @jagograhakjago pic.twitter.com/zZavtBLDAx
— RashmiPandey (@rashmip1) September 4, 2026
सरकार करे निगरानी, कंपनियां दें स्पष्ट जवाब
सरकार और संबंधित खाद्य नियामक संस्थाओं से अपेक्षा है कि वे ऐसे उत्पादों के संबंध में शिकायतों और पैकेजिंग दावों की गंभीरता से जांच करें।
जरूरत पड़ने पर यह भी देखा जाना चाहिए कि—
- ‘Fasting Special’ जैसे दावे किन आधारों पर किए जा रहे हैं।
- पैकेट पर सामग्री की जानकारी कितनी स्पष्ट है।
- क्या महत्वपूर्ण जानकारी उपभोक्ता को आसानी से दिखाई देती है।
- क्या विज्ञापन और पैकेजिंग उपभोक्ता को किसी गलत धारणा की ओर ले जा रहे हैं।
- अलग-अलग प्रकार के व्रतों के संदर्भ में ‘Fasting Special’ शब्द का इस्तेमाल कहीं अत्यधिक व्यापक दावा तो नहीं कर रहा।
- शिकायत मिलने पर संबंधित कंपनियां उपभोक्ताओं को क्या स्पष्टीकरण देती हैं।
सिर्फ कानूनी औपचारिकता नहीं, नैतिक जिम्मेदारी भी
कंपनियां अक्सर यह कह सकती हैं कि पैकेट पर आवश्यक जानकारी पहले से दी गई है। लेकिन सवाल यह है कि क्या वह जानकारी वास्तव में उपभोक्ता के लिए स्पष्ट और समझने योग्य है?
कानून की न्यूनतम आवश्यकताओं को पूरा करना और उपभोक्ता के साथ पूरी ईमानदारी बरतना—दोनों हमेशा एक ही बात नहीं होते।
एक जिम्मेदार कंपनी को यह सोचना चाहिए कि उसका उत्पाद खरीदने वाला व्यक्ति उसके दावे को किस तरह समझेगा।
विशेषकर तब, जब सामने लिखा हो—‘Fasting Special’।
भरोसा टूटा तो नुकसान सिर्फ ग्राहक का नहीं होगा
ब्रांड बनाने में वर्षों लगते हैं, लेकिन भरोसा टूटने में केवल एक घटना काफी हो सकती है।
आज सोशल मीडिया और डिजिटल माध्यमों के दौर में उपभोक्ता किसी भी अनुभव को सार्वजनिक कर सकता है। इसलिए कंपनियों को अपनी पैकेजिंग और विज्ञापन में असाधारण सावधानी बरतनी चाहिए।
धार्मिक भावनाओं से जुड़े बाजार में पारदर्शिता ही सबसे बड़ी सुरक्षा है।
कंपनियों के लिए बेहतर यही होगा कि वे किसी विवाद की प्रतीक्षा न करें और स्वयं आगे बढ़कर अपने उत्पादों की पैकेजिंग, दावों और उपभोक्ता संचार की समीक्षा करें।
मुख्यमंत्री तक पहुंचाना होगा उपभोक्ता की आवाज
पर्दाफाश समाचार इस मुद्दे को इसलिए प्रमुखता दे रहा है क्योंकि यह किसी एक उत्पाद या एक कंपनी तक सीमित विषय नहीं है। यह उस व्यापक सवाल से जुड़ा है कि क्या बाजार में धार्मिक आस्था से जुड़े उपभोक्ताओं को उतनी ही स्पष्ट और विश्वसनीय जानकारी मिल रही है, जितनी उन्हें मिलनी चाहिए?
उत्तर प्रदेश सरकार, मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और संबंधित विभागों से अपेक्षा है कि इस विषय को गंभीरता से लेते हुए आवश्यक दिशा-निर्देश और जांच की व्यवस्था सुनिश्चित की जाए।
यदि किसी कंपनी के दावे सही हैं, तो जांच के बाद उसे अपनी पारदर्शिता के साथ सामने आने में कोई परेशानी नहीं होनी चाहिए।
और यदि कहीं उपभोक्ता को भ्रमित करने वाला दावा पाया जाता है, तो जवाबदेही तय होना भी उतना ही जरूरी है।
पर्दाफाश की सीधी चेतावनी
कंपनियां इसे केवल कारोबार न समझें।
व्रत रखने वाला ग्राहक आपके पैकेट पर लिखे शब्दों को विश्वास के साथ पढ़ता है। इसलिए ‘Fasting Special’ जैसे शब्दों का इस्तेमाल जिम्मेदारी, स्पष्टता और पूरी पारदर्शिता के साथ होना चाहिए।
आस्था के नाम पर भ्रम की गुंजाइश नहीं होनी चाहिए।
किसी भी कंपनी को यह अधिकार नहीं कि वह अस्पष्ट दावों के सहारे उपभोक्ता के विश्वास को बाजार की रणनीति बना दे।
कंपनियों के लिए संदेश साफ है—उत्पाद बेचिए, मुनाफा कमाइए, लेकिन उपभोक्ता की आस्था और भरोसे की कीमत पर नहीं।
क्योंकि आखिरकार—
**ग्राहक सिर्फ चिप्स नहीं खरीदता, वह भरोसा खरीदता है।
और उस भरोसे से खिलवाड़ हुआ तो सवाल सिर्फ कंपनी से नहीं, जिम्मेदार नियामक व्यवस्था से भी पूछा जाएगा।**














