“फरवरी में जारी अंतिम मतदाता सूची में नाम नहीं होने से उठा विवाद; SIR के दौरान 649 मामलों की हुई थी जांच, कांग्रेस ने प्रक्रिया पर उठाए गंभीर सवाल”
पणजी: देशभर में विशेष गहन पुनरीक्षण यानी SIR (Special Intensive Revision) को लेकर चल रही बहस के बीच गोवा की मतदाता सूची का मामला भी राजनीतिक और प्रशासनिक चर्चा का केंद्र बन गया है। फरवरी 2026 में प्रकाशित अंतिम मतदाता सूची में 97 ऐसे मतदाताओं के नाम शामिल नहीं होने की खबर सामने आने के बाद सवाल उठे कि जांच में पात्र पाए गए लोगों के नाम आखिर अंतिम सूची का हिस्सा क्यों नहीं बन सके। विवाद बढ़ने के बाद अब गोवा के मुख्य निर्वाचन अधिकारी (CEO) के कार्यालय ने स्थिति स्पष्ट करते हुए कहा है कि इन मामलों पर कार्रवाई की जा रही है और कई पात्र मतदाताओं के नाम अब सूची में शामिल किए जा चुके हैं।
CEO कार्यालय के मुताबिक, फरवरी में प्रकाशित अंतिम मतदाता सूची से छूटे 97 मामलों को बाद में बूथ स्तर के अधिकारियों यानी BLO के माध्यम से अलग से प्रोसेस किया गया। अधिकारियों ने घर-घर जाकर संबंधित मतदाताओं से फॉर्म-6 भरवाने की प्रक्रिया शुरू की। कार्यालय का कहना है कि इनमें से कई लोगों का नामांकन हो चुका है, जबकि बाकी मामलों में प्रक्रिया जारी है। निर्वाचन कार्यालय ने यह भी स्पष्ट किया कि उसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि कोई भी पात्र मतदाता मतदान के अधिकार से वंचित न रहे।
SIR में सामने आईं तार्किक विसंगतियां, 649 मामलों की हुई जांच
गोवा में SIR की प्रक्रिया के दौरान कुछ मतदाताओं के रिकॉर्ड और उपलब्ध दस्तावेजों में तार्किक विसंगतियां सामने आई थीं। ऐसे मतदाताओं को अपनी पात्रता साबित करने के लिए दस्तावेज जमा करने और आपत्ति दर्ज कराने का अवसर दिया गया।
इस प्रक्रिया के बाद कुल 649 मतदाता ऐसे सामने आए, जिनके मामलों की जांच की जरूरत महसूस हुई। चुनाव पंजीकरण अधिकारियों यानी ERO और सहायक चुनाव पंजीकरण अधिकारियों यानी AERO ने इन मामलों की जांच की। जांच का उद्देश्य यह पता लगाना था कि संबंधित मतदाता मतदाता सूची में बने रहने के लिए निर्धारित शर्तों को पूरा करते हैं या नहीं।
जांच पूरी होने के बाद अधिकारियों ने 97 लोगों को मतदाता सूची में शामिल किए जाने योग्य पाया। यानी जांच के स्तर पर इन मतदाताओं की पात्रता को स्वीकार किया गया था। इसके बावजूद फरवरी में प्रकाशित अंतिम सूची में इनके नाम दिखाई नहीं दिए। यही स्थिति बाद में विवाद की बड़ी वजह बनी।
CEO ने नाम जोड़ने की अनुमति के लिए भेजे थे आठ पत्र
मामले में एक और महत्वपूर्ण तथ्य सामने आया है। रिपोर्ट के मुताबिक, गोवा के मुख्य निर्वाचन अधिकारी ने 11 से 17 फरवरी के बीच आठ पत्र भेजकर इन 97 पात्र मतदाताओं के नामों को शामिल करने की अनुमति देने का अनुरोध किया था।
हालांकि, 21 फरवरी को प्रकाशित अंतिम मतदाता सूची में इन नामों को जगह नहीं मिल सकी। इससे यह सवाल उठा कि जब स्थानीय स्तर पर जांच के बाद मतदाताओं को पात्र माना गया था, तो अंतिम सूची तैयार होने तक उनके नाम क्यों नहीं जुड़ पाए।
यही सवाल अब SIR की प्रक्रिया, मतदाता सूची के केंद्रीकरण और स्थानीय निर्वाचन अधिकारियों की भूमिका को लेकर बहस का हिस्सा बन गया है।
CEO कार्यालय: कई नाम जुड़ चुके, बाकी पर प्रक्रिया जारी
विवाद के बीच गुरुवार को मुख्य निर्वाचन अधिकारी के कार्यालय की ओर से स्पष्टीकरण जारी किया गया। कार्यालय ने कहा कि फरवरी 2026 में प्रकाशित अंतिम मतदाता सूची में शामिल नहीं किए गए 97 मामलों को BLO के जरिए अलग से प्रोसेस किया गया।
इसके लिए बूथ स्तर के अधिकारियों ने संबंधित मतदाताओं के घर जाकर फॉर्म-6 भरवाने की प्रक्रिया अपनाई। कार्यालय के अनुसार, कई मतदाताओं का नामांकन हो चुका है, जबकि शेष मामलों पर आवश्यक कार्रवाई जारी है।
निर्वाचन कार्यालय ने यह भी दोहराया कि पात्र मतदाताओं को मतदाता सूची से बाहर रखना उसका उद्देश्य नहीं है। कार्यालय की ओर से कहा गया कि यह सुनिश्चित किया जाएगा कि कोई भी पात्र मतदाता पीछे न छूटे।
यह स्पष्टीकरण इसलिए भी अहम है क्योंकि मतदाता सूची में नाम होना मतदान के अधिकार के इस्तेमाल की बुनियादी शर्त है और SIR जैसी व्यापक प्रक्रिया में किसी नाम के छूटने का सीधा असर मतदाता की चुनावी भागीदारी पर पड़ सकता है।
मतदाता सूची के केंद्रीकरण पर भी उठे सवाल
गोवा का यह मामला केवल 97 मतदाताओं तक सीमित नहीं रहा। इसने मतदाता सूचियों के केंद्रीकरण और पुनरीक्षण की प्रक्रिया को लेकर भी सवाल खड़े किए हैं।
रिपोर्ट के अनुसार, चुनाव आयुक्त विवेक जोशी और सुखबीर सिंह संधू ने भी मतदाता सूचियों के केंद्रीकरण को लेकर सवाल उठाए हैं। विवाद का एक प्रमुख बिंदु यह है कि स्थानीय स्तर पर जांच में पात्र पाए गए मतदाताओं के नाम अंतिम सूची में शामिल क्यों नहीं हो सके।
हालांकि, निर्वाचन अधिकारियों की ओर से अब यह कहा जा रहा है कि छूटे हुए पात्र मतदाताओं को बाद की प्रक्रिया के जरिए सूची में शामिल किया जा रहा है।
कांग्रेस ने लगाए गंभीर आरोप
मामले ने गोवा में राजनीतिक रंग भी ले लिया है। गोवा कांग्रेस के कार्यकारी अध्यक्ष सुनील कावथंकर ने SIR को लेकर बीजेपी पर निशाना साधा है। उन्होंने आरोप लगाया कि SIR के जरिए बीजेपी चुनावी लाभ हासिल करने की कोशिश कर रही है और राज्य में दोबारा सत्ता हासिल करने को लेकर चिंतित है।
कावथंकर ने वैध मतदाताओं के नाम हटाए जाने को गंभीर मामला बताते हुए SIR प्रक्रिया को वापस लेने की मांग की। उन्होंने निर्वाचन आयोग पर भी आरोप लगाए और दावा किया कि मतदाता सूची से पात्र लोगों के नाम हटाना एक बड़ी समस्या है।
हालांकि, ये कांग्रेस के राजनीतिक आरोप हैं। इनके जवाब में बीजेपी ने विपक्ष के दावों को बदनामी अभियान करार देते हुए खारिज किया है।
बीजेपी ने विपक्ष के आरोपों को बताया बदनामी अभियान
बीजेपी ने कांग्रेस के आरोपों को खारिज करते हुए कहा है कि विपक्ष राजनीतिक कारणों से SIR को लेकर भ्रम पैदा कर रहा है। पार्टी का कहना है कि कांग्रेस अपनी राजनीतिक स्थिति को लेकर निराश है और इसलिए निर्वाचन प्रक्रिया पर सवाल उठा रही है।
इस तरह गोवा में SIR को लेकर विवाद अब दो स्तरों पर दिखाई दे रहा है—एक तरफ पात्र मतदाताओं के नामों को सूची में शामिल करने की प्रशासनिक प्रक्रिया है, तो दूसरी तरफ इस पूरी कवायद को लेकर राजनीतिक दलों के बीच आरोप-प्रत्यारोप जारी हैं।
देशभर में 13 करोड़ से अधिक नाम हटाए जाने का दावा
गोवा का विवाद ऐसे समय सामने आया है जब देश के अलग-अलग राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में SIR के दौरान बड़ी संख्या में मतदाताओं के नाम मसौदा मतदाता सूची से हटाए जाने को लेकर विपक्ष सवाल उठा रहा है।
विपक्ष द्वारा सामने रखे गए आंकड़ों के मुताबिक, अब तक 13 करोड़ से अधिक मतदाताओं के नाम SIR प्रक्रिया के तहत सूची से हटाए गए हैं। यह संख्या देश के कुल मतदाताओं की संख्या का लगभग 14 प्रतिशत बताई जा रही है।
हालांकि, इन नामों का सूची से हटना अपने आप में यह साबित नहीं करता कि सभी संबंधित लोग स्थायी रूप से मतदान के अधिकार से बाहर हो गए हैं। पुनरीक्षण प्रक्रिया में नाम हटाए जाने के कारणों की जांच और पात्र लोगों के नाम फिर शामिल किए जाने की प्रक्रिया भी महत्वपूर्ण होती है। गोवा में 97 मामलों का बाद में अलग से प्रोसेस किया जाना इसी प्रक्रिया का एक उदाहरण है।
दिल्ली में सबसे ज्यादा 32.8 प्रतिशत नाम मसौदा सूची से बाहर
उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, दिल्ली में SIR से पहले मौजूद मतदाताओं में से 32.8 प्रतिशत नाम मसौदा सूची से बाहर किए गए। इसके बाद दादरा और नगर हवेली तथा दमन और दीव में 29.6 प्रतिशत, तेलंगाना में 21.7 प्रतिशत, महाराष्ट्र में 21.1 प्रतिशत, अंडमान और निकोबार द्वीप समूह में 20.6 प्रतिशत और कर्नाटक में 19.5 प्रतिशत नाम हटाए जाने की बात सामने आई है।
इन आंकड़ों को लेकर राजनीतिक बहस तेज है। विपक्ष इनका इस्तेमाल SIR की प्रक्रिया पर सवाल उठाने के लिए कर रहा है, जबकि निर्वाचन प्रक्रिया के संदर्भ में यह देखना जरूरी है कि हटाए गए नामों में कितने मामले मृत्यु, स्थान परिवर्तन, डुप्लीकेट प्रविष्टि, दस्तावेजी कमी या अन्य निर्धारित कारणों से जुड़े हैं और कितने पात्र मतदाताओं के नाम बाद की प्रक्रिया में वापस जोड़े जाते हैं।
97 नामों का मामला बना SIR की प्रक्रिया की बड़ी परीक्षा
गोवा में 97 पात्र मतदाताओं के नाम अंतिम सूची में शामिल नहीं होने का मामला अब यह सवाल सामने ला रहा है कि मतदाता सूची के पुनरीक्षण में पात्रता तय होने और अंतिम सूची प्रकाशित होने के बीच समन्वय कितना प्रभावी रहा।
निर्वाचन कार्यालय का कहना है कि कई नाम अब जोड़े जा चुके हैं और बाकी मामलों पर कार्रवाई जारी है। दूसरी ओर, कांग्रेस इस मामले को व्यापक SIR प्रक्रिया से जोड़कर सवाल उठा रही है और बीजेपी पर राजनीतिक लाभ के लिए प्रक्रिया के इस्तेमाल का आरोप लगा रही है, जिसे बीजेपी खारिज करती है।
अब निगाह इस बात पर रहेगी कि शेष पात्र मामलों का निपटारा कितनी जल्दी होता है और अंतिम रूप से कितने मतदाताओं के नाम मतदाता सूची में शामिल किए जाते हैं। गोवा का यह प्रकरण यह भी दिखाता है कि किसी भी व्यापक मतदाता पुनरीक्षण प्रक्रिया में केवल नाम हटाने के आंकड़े ही नहीं, बल्कि आपत्तियों, दस्तावेजों की जांच और पात्र मतदाताओं के नाम दोबारा जोड़ने की पूरी प्रक्रिया को साथ देखना जरूरी है।















