Saturday, May 2, 2026
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“फलता में TMC पर चुनाव आयोग का डंडा: जहांगीर खान के करीबियों पर FIR, BJP समर्थकों को धमकाने पर पुलिस को भी अल्टीमेटम”

पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के नतीजों से पहले दक्षिण 24 परगना का फलता विधानसभा क्षेत्र राज्य की सबसे विस्फोटक चुनावी सीट बनकर उभरा है। मतदान के बाद से लगातार हिंसा, धमकी, EVM गड़बड़ी और वोटरों को डराने-धमकाने की शिकायतों के बीच अब चुनाव आयोग ने तृणमूल कांग्रेस उम्मीदवार जहांगीर खान के करीबी नेताओं पर सीधा शिकंजा कस दिया है। आयोग ने डायमंड हार्बर जिला पुलिस को निर्देश दिया है कि BJP समर्थक माने जा रहे ग्रामीणों को धमकाने, मारपीट करने और घर छोड़ने की चेतावनी देने के आरोप में तत्काल FIR दर्ज की जाए। इतना ही नहीं, आयोग ने साफ कह दिया है कि यदि पुलिस ने कार्रवाई में ढिलाई दिखाई तो संबंधित थाने के अधिकारियों पर भी अनुशासनात्मक कार्रवाई होगी।


जहांगीर खान के ‘करीबियों’ पर EC का सीधा वार

चुनाव आयोग के निर्देश के बाद पंचायत प्रधान इसराफुल चकदर, जहांगीर खान के करीबी सुजाउद्दीन शेख और उनके अन्य सहयोगियों के खिलाफ मामला दर्ज किया गया है। हाशिमनगर इलाके में लोगों को वोट के बाद निशाना बनाने, BJP को वोट देने के शक में धमकी देने और गांव में दहशत फैलाने के आरोप में तीन तृणमूल कार्यकर्ताओं—अतीबुर शेख, हबीब मोल्ला और हबीब शेख—को गिरफ्तार भी किया गया है। आयोग की यह कार्रवाई बताती है कि फलता की घटनाओं को अब केवल स्थानीय राजनीतिक झड़प नहीं, बल्कि पोस्ट-पोल वोटर इंटिमिडेशन के गंभीर मामले के रूप में देखा जा रहा है।


मतदान के बाद घर-घर धमकी, BJP समर्थकों में दहशत

शनिवार सुबह से ही फलता के कई गांवों में नया तनाव फैल गया जब आरोप लगे कि तृणमूल से जुड़े स्थानीय दबंग BJP समर्थक माने जाने वाले परिवारों के घर-घर जाकर उन्हें धमका रहे हैं। ग्रामीणों का आरोप है कि “तुमने कमल को वोट दिया, अब गांव छोड़ो” जैसे संदेश खुलेआम दिए जा रहे हैं। कुछ परिवारों ने मारपीट, महिलाओं को डराने और घर जलाने तक की धमकी की शिकायत की। स्थानीय लोगों के विरोध के बाद यह मामला तेजी से उछला और चुनाव आयोग को हस्तक्षेप करना पड़ा। सोशल मीडिया और स्थानीय मंचों पर भी फलता को लेकर भारी आक्रोश दिखा, जहां लोग लगातार पोस्ट-पोल हिंसा रोकने के लिए कड़ी कार्रवाई की मांग कर रहे हैं।


पहले EVM टेप कांड, अब वोटरों पर दबाव—फलता क्यों बना सबसे बड़ा फ्लैशपॉइंट?

दरअसल फलता पहले ही मतदान के दिन से विवादों के केंद्र में था। BJP ने आरोप लगाया था कि कई बूथों पर EVM में BJP और CPM के बटन के पास टेप चिपकाकर वोटिंग प्रभावित की गई। इस मामले में जांच के बाद आयोग ने कई गंभीर अनियमितताओं को स्वीकार किया था और दक्षिण 24 परगना के 15 बूथों पर पुनर्मतदान का आदेश दिया। हालांकि फलता के कई संवेदनशील बूथों पर भी जांच जारी रही और यहां लगभग 30 बूथों तक पुनर्मतदान की चर्चा चली। चुनावी पर्यवेक्षकों की रिपोर्ट में CCTV मॉनिटरिंग बाधित होने, असामान्य मतदान प्रतिशत और बूथ कब्जे जैसी शिकायतें भी सामने आईं। ऐसे में अब पोस्ट-पोल धमकी के आरोपों ने फलता को पूरे बंगाल चुनाव का सबसे संवेदनशील केंद्र बना दिया है।


ग्रामीणों का हाईवे जाम, ‘इसराफुल की गिरफ्तारी और री-पोल’ की मांग

फलता के हाशिमनगर और आसपास के इलाकों में ग्रामीणों ने शुक्रवार को भी नेशनल हाईवे जाम कर विरोध प्रदर्शन किया था और शनिवार को फिर बड़ी संख्या में लोग सड़क पर उतर आए। प्रदर्शनकारियों का आरोप है कि उन्हें वोट डालने नहीं दिया गया, विरोध करने पर पंचायत प्रधान के नेतृत्व में हमला हुआ और अब नतीजों से पहले डराकर चुप कराने की कोशिश हो रही है। ग्रामीणों ने मांग की है कि इसराफुल चकदर की तुरंत गिरफ्तारी हो, केंद्रीय बलों की स्थायी तैनाती की जाए और फलता के दो नहीं बल्कि कई बूथों पर दोबारा चुनाव कराया जाए। कुछ प्रदर्शनकारियों ने राज्य पुलिस पर लाठीचार्ज और पक्षपात का आरोप भी लगाया है।


पुलिस को EC का अल्टीमेटम—“हालात संभालो, नहीं तो अफसर नपेंगे”

चुनाव आयोग ने डायमंड हार्बर पुलिस जिला प्रशासन को स्पष्ट संदेश दिया है कि इलाके में शांति बहाल करना उनकी जिम्मेदारी है। आयोग ने कहा है कि यदि वोटरों को धमकाने वालों पर तत्काल कानूनी कार्रवाई नहीं हुई तो संबंधित थाना प्रभारी और पुलिस अधिकारियों के खिलाफ भी कड़ी कार्रवाई की जाएगी। यह चेतावनी असामान्य मानी जा रही है, क्योंकि आमतौर पर आयोग सीधे पुलिस अफसरों की जवाबदेही तय करने से बचता है। लेकिन फलता में लगातार बढ़ते तनाव ने आयोग को सख्त रुख अपनाने पर मजबूर कर दिया है।


बंगाल में नतीजों से पहले सबसे बड़ा सवाल—क्या फलता बनेगा पोस्ट-पोल हिंसा का प्रतीक?

मतदान खत्म हो चुका है, काउंटिंग से पहले राजनीतिक दल अपने-अपने दावे कर रहे हैं, लेकिन फलता की तस्वीर बंगाल के लोकतंत्र पर कई असहज सवाल खड़े कर रही है। यदि वोट देने के बाद भी ग्रामीणों को राजनीतिक पहचान के आधार पर धमकाया जाता है, अगर पंचायत स्तर के नेता घर-घर जाकर डर का माहौल बनाते हैं, और अगर पुलिस पर निष्क्रियता के आरोप लगते हैं—तो यह सिर्फ एक सीट का मामला नहीं, बल्कि चुनावी स्वतंत्रता की विश्वसनीयता का सवाल बन जाता है।

फलता में चुनाव आयोग का यह डंडा साफ संकेत है कि मामला सामान्य नहीं है। अब नजर इस बात पर है कि क्या FIR के बाद असली गिरफ्तारी और सख्त कार्रवाई होती है, या यह इलाका मतगणना से पहले और बड़ा राजनीतिक विस्फोट बन जाएगा।

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VIKAS TRIPATHI
VIKAS TRIPATHIhttp://www.pardaphaas.com
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