Saturday, May 2, 2026
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“बिहार कैबिनेट विस्तार की घड़ी नजदीक! नीतीश से मुलाकात के बाद CM सम्राट दिल्ली रवाना, अमित शाह-राजनाथ संग मंथन से तय होंगे नए मंत्री”

बिहार की नई एनडीए सरकार में मंत्रिमंडल विस्तार को लेकर सियासी हलचल अब निर्णायक मोड़ पर पहुंचती दिखाई दे रही है। पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव की मतदान प्रक्रिया खत्म होते ही पटना से दिल्ली तक सत्ता के गलियारों में बैठकों का दौर तेज हो गया है। इसी कड़ी में बिहार के मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी शनिवार को जदयू के वरिष्ठ नेता और पूर्व मुख्यमंत्री नीतीश कुमार से मुलाकात करने के बाद दिल्ली रवाना हो गए। राजनीतिक सूत्रों के मुताबिक राजधानी दिल्ली में उनकी मुलाकात केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाहर, रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह और भाजपा के शीर्ष नेतृत्व से हो सकती है, जहां बिहार मंत्रिमंडल विस्तार पर अंतिम खाका तैयार किया जाएगा.


नीतीश-सम्राट मुलाकात ने बढ़ाया सस्पेंस

दिल्ली रवाना होने से पहले सम्राट चौधरी ने नीतीश कुमार से उनके नए सात सर्कुलर रोड स्थित आवास पर मुलाकात की। यह मुलाकात ऐसे समय हुई है जब पिछले कई दिनों से बिहार कैबिनेट विस्तार को लेकर अटकलें जोरों पर हैं। हालांकि दोनों नेताओं की बातचीत को लेकर आधिकारिक जानकारी सामने नहीं आई, लेकिन राजनीतिक हलकों में माना जा रहा है कि एनडीए के भीतर सीट शेयरिंग, विभागों का बंटवारा और सहयोगी दलों के प्रतिनिधित्व को लेकर प्रारंभिक सहमति बनाने की कोशिश की गई है.


15 अप्रैल को शपथ, अब बारी पूरी टीम बनाने की

गौरतलब है कि 15 अप्रैल को सम्राट चौधरी ने बिहार के मुख्यमंत्री पद की शपथ ली थी, जबकि जदयू के विजय कुमार चौधरी और विजेंद्र यादव ने उपमुख्यमंत्री के रूप में जिम्मेदारी संभाली। तब से ही यह स्पष्ट था कि सरकार का यह केवल शुरुआती ढांचा है और जल्द ही पूर्ण मंत्रिमंडल का गठन होगा। अब जब चुनावी व्यस्तता खत्म हो चुकी है, भाजपा नेतृत्व बिहार पर फोकस करते हुए सरकार को स्थायी और संतुलित स्वरूप देना चाहता है.


किन चेहरों को मिलेगा मौका? भाजपा में नए नामों की चर्चा

सूत्रों की मानें तो भाजपा इस बार मंत्रिमंडल विस्तार में कई नए चेहरों को मौका दे सकती है। पार्टी की रणनीति सामाजिक और क्षेत्रीय समीकरणों को साधने की है, ताकि सवर्ण, ओबीसी, अति पिछड़ा, दलित और महादलित वर्गों के साथ-साथ सीमांचल, मिथिलांचल, मगध, शाहाबाद और तिरहुत क्षेत्र को प्रतिनिधित्व मिल सके। यही वजह है कि संगठन में सक्रिय लेकिन अब तक सरकार से बाहर रहे कई विधायकों और विधान पार्षदों के नाम चर्चा में हैं। भाजपा केंद्रीय नेतृत्व इस बार परफॉर्मेंस और राजनीतिक उपयोगिता दोनों को आधार बना सकता है.


JDU पुराने भरोसेमंद चेहरों पर खेल सकती है दांव

दूसरी तरफ जदयू की रणनीति भाजपा से अलग दिखाई दे रही है। पार्टी अपने अनुभवी और प्रशासनिक पकड़ रखने वाले पुराने नेताओं को मंत्रिमंडल में शामिल करना चाहती है, ताकि सरकार में संतुलन और प्रशासनिक नियंत्रण बना रहे। नीतीश कुमार भले सक्रिय मुख्यमंत्री न हों, लेकिन जदयू के भीतर उनका प्रभाव अब भी निर्णायक है और माना जा रहा है कि उनके सुझाव के बिना जदयू कोटे की सूची फाइनल नहीं होगी।


सहयोगी दलों की भी निगाहें मंत्री पद पर

एनडीए के अन्य घटक दल भी इस विस्तार को लेकर सक्रिय हो गए हैं। Chirag Paswan की पार्टी लोजपा (रामविलास) अपने कोटे से पुराने भरोसेमंद चेहरे को आगे बढ़ा सकती है, वहीं Jitan Ram Manjhi की हम पार्टी भी अपने प्रतिनिधित्व को लेकर दबाव बनाए हुए है। सबसे ज्यादा नजर राष्ट्रीय लोक मोर्चा पर है, जहां उपेंद्र कुशवाहा खेमे से किसे जगह मिलती है, यह सामाजिक समीकरण के लिहाज से अहम माना जा रहा है। ऐसे में कैबिनेट विस्तार सिर्फ मंत्री बनाने की कवायद नहीं, बल्कि 2029 लोकसभा और 2030 बिहार विधानसभा की रणनीतिक बिसात भी है.


36 मंत्रियों की सीमा, लेकिन सभी पद अभी नहीं भरेंगे?

संवैधानिक प्रावधान के अनुसार बिहार में मुख्यमंत्री समेत कुल 36 मंत्री बनाए जा सकते हैं। फिलहाल सरकार में शीर्ष पदों के अलावा अधिकांश सीटें खाली हैं। सूत्रों का कहना है कि भाजपा और जदयू सभी पद एक साथ भरने के मूड में नहीं हैं। कुछ मंत्री पद जानबूझकर खाली रखे जा सकते हैं ताकि भविष्य में राजनीतिक परिस्थितियों, दल-बदल, सहयोगी दलों की जरूरत या जातीय समीकरणों के हिसाब से उन्हें इस्तेमाल किया जा सके। यह मॉडल पहले भी बिहार की राजनीति में अपनाया जाता रहा है.


दिल्ली बैठक से तय होगा अंतिम ब्लूप्रिंट

अब सारी निगाहें दिल्ली में होने वाली सम्राट चौधरी की बैठकों पर टिक गई हैं। अमित शाह, राजनाथ सिंह और भाजपा संगठन के वरिष्ठ नेताओं के साथ होने वाली चर्चा में न सिर्फ नामों पर बल्कि विभागों के वितरण, सहयोगियों की हिस्सेदारी और सरकार के संदेश पर भी निर्णय होगा। भाजपा यह सुनिश्चित करना चाहती है कि बिहार की नई सरकार एक मजबूत, स्थिर और चुनावी दृष्टि से लाभकारी संदेश दे।

यानी बिहार में अब सिर्फ मंत्रिमंडल विस्तार नहीं होने जा रहा, बल्कि यह तय होगा कि सम्राट चौधरी की सरकार का असली राजनीतिक चेहरा क्या होगा—नए युवा चेहरों वाला आक्रामक मॉडल, या नीतीश शैली के अनुभवी संतुलन वाला गठबंधन फार्मूला।

 

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VIKAS TRIPATHI
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