“कंक्रीट में लगाए गए पौधों पर उठे सवाल, पर्यावरणविदों ने बताया ‘अस्थायी हरियाली’ का प्रयास”
प्रस्तावित 1 जुलाई के जापान-भारत शिखर सम्मेलन से पहले असम की राजधानी गुवाहाटी को सजाने-संवारने के लिए बड़े पैमाने पर सौंदर्यीकरण अभियान चलाया जा रहा है। शहर के प्रमुख मार्गों—गुवाहाटी-शिलांग रोड, एमजी रोड और अन्य वीआईपी कॉरिडोर—पर हरियाली बढ़ाने और शहर को आकर्षक स्वरूप देने के लिए पौधारोपण किया गया है।
लेकिन यह पहल अब विवादों के केंद्र में आ गई है। सोशल मीडिया पर सामने आई तस्वीरों और वीडियो में देखा गया कि कई स्थानों पर कंक्रीट से ढके फुटपाथों में छोटे-छोटे छेद करके पौधे लगाए गए हैं। इन तस्वीरों ने स्थानीय नागरिकों, पर्यावरणविदों और शहरी नियोजन विशेषज्ञों के बीच नई बहस छेड़ दी है।
‘हरियाली’ या केवल दिखावा?
आलोचकों का कहना है कि पेड़ों और पौधों को केवल लगाने भर से हरित विकास नहीं होता। उनके स्वस्थ विकास के लिए पर्याप्त मिट्टी, जल निकासी की व्यवस्था और जड़ों के फैलाव हेतु खुला स्थान आवश्यक होता है।
विशेषज्ञों के अनुसार, कंक्रीट के बीच सीमित जगह में लगाए गए पौधे कुछ समय के लिए तो हरियाली का दृश्य प्रस्तुत कर सकते हैं, लेकिन लंबे समय तक उनका जीवित रहना चुनौतीपूर्ण होगा। उनका मानना है कि यदि पौधों को प्राकृतिक रूप से बढ़ने का अवसर नहीं मिलेगा तो यह प्रयास केवल एक “सौंदर्यात्मक प्रदर्शन” बनकर रह जाएगा।
पर्यावरणविदों की चिंता: जड़ों को नहीं मिलेगा विकास का अवसर
पर्यावरण विशेषज्ञों का कहना है कि पेड़ों की जड़ें मिट्टी के भीतर फैलकर पानी और पोषक तत्व प्राप्त करती हैं। जब पौधों को अत्यंत सीमित स्थान में लगाया जाता है, तो उनकी जड़ों का विकास बाधित हो जाता है।
इसके परिणामस्वरूप पेड़ों की वृद्धि धीमी पड़ सकती है, उनकी आयु कम हो सकती है और भविष्य में तेज हवाओं या भारी बारिश के दौरान उनके गिरने का जोखिम भी बढ़ सकता है। विशेषज्ञों का मानना है कि शहरी हरियाली के नाम पर ऐसे उपाय पर्यावरणीय दृष्टि से टिकाऊ नहीं माने जा सकते।
शहरी नियोजन विशेषज्ञों ने भी उठाए सवाल
शहरी नियोजन और लैंडस्केप डिजाइन से जुड़े विशेषज्ञों का कहना है कि आधुनिक शहरों में हरितीकरण के लिए वैज्ञानिक दृष्टिकोण अपनाया जाता है। इसमें पारगम्य सतहों (Permeable Surfaces), पर्याप्त मिट्टी, वर्षा जल संरक्षण और दीर्घकालिक रखरखाव जैसी व्यवस्थाओं को प्राथमिकता दी जाती है।
उनका तर्क है कि यदि पौधारोपण केवल किसी बड़े आयोजन से पहले शहर को आकर्षक दिखाने के उद्देश्य से किया जाता है, तो यह शहरी विकास की मूल भावना के विपरीत है। वास्तविक हरितीकरण वह है जो आने वाले वर्षों तक पर्यावरण और नागरिकों दोनों को लाभ पहुंचाए।
प्रशासन का पक्ष: शहर की छवि सुधारने की कोशिश
प्रशासन और परियोजना से जुड़े अधिकारियों का कहना है कि यह अभियान शहर की सुंदरता बढ़ाने, आगंतुकों के स्वागत और शहरी हरित आवरण में वृद्धि के उद्देश्य से चलाया जा रहा है। जापान-भारत शिखर सम्मेलन जैसे अंतरराष्ट्रीय आयोजन के मद्देनज़र शहर के प्रमुख मार्गों को बेहतर स्वरूप देने की योजना बनाई गई है।
अधिकारियों का मानना है कि सौंदर्यीकरण परियोजनाएं शहर की पहचान को मजबूत करने और निवेश तथा पर्यटन को बढ़ावा देने में भी सहायक होती हैं।
सोशल मीडिया पर तेज हुई बहस
कंक्रीट में लगाए गए पौधों की तस्वीरें सामने आने के बाद सोशल मीडिया पर भी तीखी प्रतिक्रियाएं देखने को मिलीं। कई लोगों ने इसे “इवेंट-आधारित विकास” का उदाहरण बताया, जहां दीर्घकालिक पर्यावरणीय लाभों के बजाय तात्कालिक दृश्य प्रभाव को प्राथमिकता दी जाती है।
वहीं कुछ लोगों ने यह तर्क भी दिया कि शहरों में सीमित स्थान के बावजूद हरियाली बढ़ाने के प्रयासों को पूरी तरह खारिज नहीं किया जाना चाहिए। हालांकि अधिकांश विशेषज्ञ इस बात पर सहमत हैं कि पौधारोपण तभी सफल माना जाएगा जब उसके लिए वैज्ञानिक और टिकाऊ व्यवस्था सुनिश्चित की जाए।
व्यापक सवाल: क्या बड़े आयोजनों से पहले होने वाला सौंदर्यीकरण टिकाऊ है?
गुवाहाटी में उठे इस विवाद ने एक बार फिर देशभर में बड़े आयोजनों से पहले चलाए जाने वाले सौंदर्यीकरण अभियानों की उपयोगिता पर प्रश्नचिह्न लगा दिया है। क्या ऐसे प्रयास वास्तव में शहरों को बेहतर बनाते हैं, या वे केवल कुछ दिनों के लिए आकर्षक तस्वीरें प्रस्तुत करने तक सीमित रह जाते हैं?
इस बहस का केंद्र केवल गुवाहाटी नहीं, बल्कि भारत के उन सभी शहरों से जुड़ा है जहां बड़े आयोजनों से पहले तेजी से सौंदर्यीकरण कार्य किए जाते हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि भविष्य के शहरों को अल्पकालिक सजावट नहीं, बल्कि पर्यावरणीय संतुलन, टिकाऊ बुनियादी ढांचे और वैज्ञानिक शहरी नियोजन की आवश्यकता है।
गुवाहाटी का यह विवाद केवल कुछ पौधों तक सीमित नहीं है। यह उस बड़े प्रश्न को सामने लाता है कि क्या शहरी विकास का उद्देश्य केवल शहर को सुंदर दिखाना होना चाहिए, या उसे पर्यावरणीय रूप से भी मजबूत और टिकाऊ बनाना चाहिए। जापान-भारत शिखर सम्मेलन से पहले शुरू हुई यह बहस आने वाले समय में देश की शहरी विकास नीतियों के लिए भी महत्वपूर्ण संकेत दे सकती है।














