नई दिल्ली: आम आदमी पार्टी के भीतर लंबे समय से सुलग रही असंतोष की चिंगारी अब खुली बगावत में बदल चुकी है। पार्टी के राज्यसभा सांसदों में हुए अभूतपूर्व विद्रोह ने न केवल दिल्ली की राजनीति को झकझोर दिया है, बल्कि अरविंद केजरीवाल की राजनीतिक पकड़, संगठनात्मक नियंत्रण और भरोसे की राजनीति पर भी गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। इस पूरे घटनाक्रम के केंद्र में हैं राघव चड्ढा जिनके नेतृत्व में आम आदमी पार्टी के 10 में से 7 राज्यसभा सांसदों ने पार्टी छोड़कर भाजपा में विलय का रास्ता चुन लिया।
सूत्रों की मानें तो यह बगावत अचानक नहीं हुई, बल्कि कई सप्ताह से इसकी बारीक पटकथा लिखी जा रही थी। बाहर से पार्टी के प्रति निष्ठा जताई जा रही थी, जबकि अंदरखाने सांसदों के बीच लगातार समन्वय चल रहा था। सबसे चौंकाने वाली बात यह रही कि जिन सांसदों ने अंतिम क्षणों तक अरविंद केजरीवाल को भरोसा दिलाया कि वे पार्टी नहीं छोड़ेंगे, वही कुछ घंटों बाद बगावत के दस्तावेज लेकर सभापति के दरवाजे पर पहुंच गए।
सूत्रों के मुताबिक सांसद संदीप पाठक ने 23 अप्रैल को, विक्रमजीत साहनी ने 22 अप्रैल को और अशोक मित्तल ने 19 अप्रैल को अरविंद केजरीवाल से मुलाकात की थी। इन मुलाकातों में पार्टी छोड़ने के दबाव की बात भी कही गई और केजरीवाल को आश्वस्त किया गया कि किसी भी परिस्थिति में वे साथ नहीं छोड़ेंगे। लेकिन यह भरोसा महज राजनीतिक धुंध साबित हुआ। शुक्रवार सुबह 11 बजे तक सातों सांसद अलग-अलग पत्र तैयार कर राज्यसभा सभापति को सौंप चुके थे।
इस पूरे घटनाक्रम में सबसे बड़ा नाम राघव चड्ढा का है। बताया जा रहा है कि वही इन सातों सांसदों के बीच मुख्य समन्वयक की भूमिका निभा रहे थे। हाल के दिनों में पार्टी नेतृत्व से उनकी दूरी लगातार बढ़ी थी। उन्हें राज्यसभा में AAP के डिप्टी लीडर पद से हटाया गया, संसद में बोलने के अवसर सीमित हुए और संगठन में उनकी भूमिका कम होती चली गई। यही नाराजगी धीरे-धीरे विद्रोह की जमीन बनती गई।
अब इस बगावत के पीछे एक और चर्चा राजनीतिक गलियारों में तेज है—क्या यह सिर्फ विचारधारा का संकट था या व्यक्तिगत हित भी दांव पर थे? सूत्रों के अनुसार, राघव चड्ढा को पंजाब से पहली बार राज्यसभा सांसद बनने के बाद दिल्ली के पंडारा रोड स्थित सरकारी बंगले का आवंटन मिला था। बाद में इस आवंटन को लेकर योग्यता से अधिक सुविधा मिलने के आरोप लगे, घर खाली करने के आदेश जारी हुए और मामला कानूनी दायरे तक पहुंचा। ऐसे में सवाल उठ रहे हैं कि क्या दिल्ली में अपनी राजनीतिक हैसियत, सरकारी सुविधाएं और राष्ट्रीय स्तर की प्रासंगिकता बचाए रखने के लिए चड्ढा ने यह बड़ा सियासी दांव खेला? हालांकि इसकी आधिकारिक पुष्टि किसी पक्ष ने नहीं की है, लेकिन सत्ता के गलियारों में यही चर्चा सबसे ज्यादा गर्म है।
बगावत में शामिल सात सांसदों में राघव चड्ढा, संदीप पाठक, अशोक मित्तल, स्वाति मालीवाल, विक्रमजीत साहनी और राजिंदर गुप्ता शामिल बताए जा रहे हैं। इनमें से सार्वजनिक रूप से केवल तीन चेहरे भाजपा मुख्यालय तक पहुंचे, जबकि बाकी चार सांसद अलग-अलग कारणों से सामने नहीं आए—कोई विदेश में था, कोई संसदीय दौरे पर, कोई स्वास्थ्य कारणों से अनुपस्थित रहा तो कोई पूर्व निर्धारित पेशेवर प्रतिबद्धताओं में व्यस्त था। लेकिन अंदरूनी जानकारी यही है कि सभी इस राजनीतिक फैसले में एकजुट थे।
राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि राघव चड्ढा ने यह संख्या सोच-समझकर जुटाई। सात सांसदों का एक साथ जाना इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यह कुल संख्या का दो-तिहाई से अधिक है, जिससे दल-बदल कानून के तहत इसे “विलय” का संरक्षण मिल सकता है। यानी यह केवल व्यक्तिगत इस्तीफा नहीं, बल्कि संवैधानिक सुरक्षा के साथ किया गया सुनियोजित राजनीतिक प्रहार है।
इस घटनाक्रम ने अरविंद केजरीवाल को गहरे राजनीतिक और भावनात्मक संकट में डाल दिया है। जिन नेताओं को उन्होंने पार्टी का भविष्य माना, जिन चेहरों को राष्ट्रीय राजनीति में आगे बढ़ाया, वही अब सबसे बड़ा झटका बनकर सामने आए हैं। AAP के लिए यह सिर्फ सात सांसदों का जाना नहीं, बल्कि भरोसे, संगठन और नेतृत्व के ताने-बाने में आई बड़ी दरार है।
दिल्ली की राजनीति अब एक नए मोड़ पर खड़ी है—जहां सवाल सिर्फ इतना नहीं कि सात सांसद क्यों गए, बल्कि यह भी कि क्या राघव चड्ढा ने अपना राजनीतिक कल सुरक्षित करने के लिए केजरीवाल की राजनीतिक जमीन खिसका दी?














