नोएडा। दिवाली पर बाजारों में रोशनी सजती है, घरों में दीये जलते हैं और दुकानों पर रौनक दिखाई देती है। लेकिन नोएडा के फर्स्टवन रिहैब फाउंडेशन में आयोजित दिवाली मेले की चमक कुछ अलग थी। यहां आकर्षण महंगे सजावटी सामान या बाजार की चकाचौंध नहीं, बल्कि उन बच्चों का हुनर था, जिनकी छोटी-छोटी कोशिशों में आत्मनिर्भर बनने का बड़ा सपना दिखाई दे रहा था। किसी के हाथों से तैयार हुआ दीया अपनी कहानी कह रहा था तो किसी की बनाई मोमबत्ती और दिवाली तोरण मेहनत, धैर्य और रचनात्मकता की मिसाल पेश कर रहे थे।
फर्स्टवन रिहैब फाउंडेशन में दिवाली मेले के साथ ऑक्यूपेशनल थेरेपी डे का आयोजन उत्साह और उल्लास के बीच किया गया। कार्यक्रम ने एक बार फिर यह सवाल समाज के सामने रखा कि दिव्यांग बच्चों की क्षमताओं को देखने के लिए हमारी नजर कितनी संवेदनशील है? क्या हम उनकी सीमाओं पर चर्चा करने में ज्यादा समय लगाते हैं और उनकी संभावनाओं को पहचानने में कम?
इस आयोजन का उद्देश्य केवल त्योहार मनाना नहीं था, बल्कि बच्चों की रचनात्मक प्रतिभा को सामने लाना, उनमें आत्मविश्वास बढ़ाना और उन्हें दैनिक जीवन में अधिक से अधिक आत्मनिर्भर बनने के लिए प्रेरित करना था।
जब बच्चों के हुनर ने संभाली मेले की कमान
कार्यक्रम में बच्चों ने अपने हाथों से सुंदर दीये, मोमबत्तियां और दिवाली के आकर्षक तोरण तैयार किए। इन कलाकृतियों में केवल त्योहार की सजावट नहीं, बल्कि बच्चों की मेहनत, सीखने की ललक और अपनी क्षमताओं को साबित करने का उत्साह भी नजर आया।
आमतौर पर दिवाली के बाजारों में तैयार सामान की खरीदारी होती है, लेकिन यहां बच्चों के हाथों से तैयार वस्तुएं आयोजन का मुख्य आकर्षण बनीं। इन रचनात्मक गतिविधियों ने यह संदेश दिया कि सही मार्गदर्शन, प्रशिक्षण और अवसर मिलें तो दिव्यांग बच्चे भी अपनी प्रतिभा को प्रभावशाली ढंग से सामने ला सकते हैं।
बच्चों और अभिभावकों के लिए रंगोली प्रतियोगिता भी आयोजित की गई। इसमें सहभागिता ने आयोजन को पारिवारिक उत्सव का रूप दिया। बच्चों के साथ अभिभावकों की भागीदारी ने यह भी दिखाया कि विशेष जरूरतों वाले बच्चों के विकास की यात्रा केवल किसी एक संस्थान या विशेषज्ञ की जिम्मेदारी नहीं, बल्कि परिवार और समाज की साझा भूमिका से आगे बढ़ती है।
मुख्य अतिथि ने बच्चों का बढ़ाया उत्साह
कार्यक्रम में उत्तराखंड हथकरघा एवं हस्तशिल्प विकास परिषद के उपाध्यक्ष वीरेंद्र दत्त सेमवाल मुख्य अतिथि के रूप में शामिल हुए। उन्होंने बच्चों के साथ समय बिताया और उनके द्वारा तैयार की गई कलाकृतियों को देखकर उनकी प्रतिभा तथा मेहनत की सराहना की।
उनकी उपस्थिति ने आयोजन को विशिष्टता दी। बच्चों के लिए ऐसे अवसर महत्वपूर्ण होते हैं, जब उनकी कोशिशों को केवल प्रशिक्षण की प्रक्रिया का हिस्सा न मानकर सार्वजनिक रूप से सराहा जाता है। प्रशंसा और प्रोत्साहन का यह माहौल उनके आत्मविश्वास को मजबूत करने में सहायक हो सकता है।
ऑक्यूपेशनल थेरेपी: इलाज से आगे आत्मनिर्भर जीवन की तैयारी
इस आयोजन का दूसरा महत्वपूर्ण पक्ष ऑक्यूपेशनल थेरेपी डे रहा। फाउंडेशन की प्रबंध निदेशक डॉ. दीक्षा श्रीवास्तव ने ऑक्यूपेशनल थेरेपी के महत्व पर प्रकाश डालते हुए बताया कि यह बच्चों में दैनिक जीवन से जुड़े कौशल, आत्मनिर्भरता और कार्यक्षमता विकसित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।
ऑक्यूपेशनल थेरेपी का उद्देश्य केवल किसी गतिविधि को सिखाना नहीं, बल्कि व्यक्ति को अपनी रोजमर्रा की जिंदगी में अधिक स्वतंत्र और सक्षम बनाना है। बच्चों के लिए हाथों से वस्तुएं बनाना, रंगों का इस्तेमाल करना, किसी काम को क्रमबद्ध तरीके से पूरा करना और अपनी क्षमता के अनुसार गतिविधियों में भाग लेना सीखने की प्रक्रिया का हिस्सा हो सकता है।
यही वजह है कि दिवाली मेले में दीये, मोमबत्तियां और तोरण बनाने जैसी गतिविधियां केवल उत्सवी कार्यक्रम तक सीमित नहीं थीं। इनके माध्यम से बच्चों को अपनी रचनात्मकता दिखाने और सीखे हुए कौशल का उपयोग करने का अवसर मिला।
अभिभावकों की भागीदारी ने बढ़ाई आयोजन की सार्थकता
रंगोली प्रतियोगिता में बच्चों के साथ अभिभावकों की सहभागिता भी आयोजन का उल्लेखनीय पहलू रही। किसी भी बच्चे के विकास में परिवार का सहयोग बेहद महत्वपूर्ण होता है। विशेष जरूरतों वाले बच्चों के मामले में यह भूमिका और भी अहम हो जाती है।
कई बार बच्चे अपनी क्षमताओं को उस समय बेहतर ढंग से सामने ला पाते हैं, जब उन्हें बिना किसी दबाव के अपनी गति से सीखने और प्रयोग करने का अवसर दिया जाता है। परिवार का विश्वास और संस्थान का सहयोग इस प्रक्रिया को मजबूत कर सकता है।
ऐसे आयोजनों से अभिभावकों को भी बच्चों की क्षमताओं को नए नजरिये से देखने का अवसर मिलता है। वे समझ पाते हैं कि छोटे दिखाई देने वाले प्रयास भी बच्चे के आत्मविश्वास और कौशल विकास की दिशा में महत्वपूर्ण कदम हो सकते हैं।
एमिटी विश्वविद्यालय के विद्यार्थियों की मौजूदगी भी रही खास
कार्यक्रम में एमिटी विश्वविद्यालय के ऑक्यूपेशनल थेरेपी विभाग के छात्र भी उपस्थित रहे। उनकी मौजूदगी ने आयोजन को शैक्षणिक दृष्टि से भी महत्वपूर्ण बनाया।
ऑक्यूपेशनल थेरेपी के विद्यार्थियों के लिए ऐसे आयोजन व्यवहारिक अनुभव और बच्चों की वास्तविक जरूरतों को समझने का अवसर प्रदान करते हैं। कक्षा में पढ़े गए सिद्धांतों को वास्तविक जीवन की परिस्थितियों से जोड़ने में इस तरह की सहभागिता उपयोगी हो सकती है।
असली जरूरत: तारीफ से आगे अवसर और सम्मान
इस आयोजन की सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि इसने दिव्यांग बच्चों को केवल सहानुभूति का पात्र बनाकर पेश नहीं किया, बल्कि उनकी रचनात्मकता और मेहनत को केंद्र में रखा। समाज में अक्सर विशेष जरूरतों वाले बच्चों की चर्चा उनकी चुनौतियों तक सीमित रह जाती है। जबकि उनके भीतर मौजूद संभावनाओं को पहचानना और उन्हें आगे बढ़ने के अवसर देना कहीं अधिक जरूरी है।
सिर्फ किसी आयोजन में बच्चों की तारीफ कर देना पर्याप्त नहीं है। असली बदलाव तब आएगा, जब उन्हें नियमित प्रशिक्षण, बेहतर संसाधन, शिक्षा, सामाजिक स्वीकार्यता और अपनी प्रतिभा को आगे बढ़ाने के वास्तविक अवसर मिलेंगे। आत्मनिर्भरता का रास्ता एक दिन के मेले से नहीं, बल्कि लगातार मिलते सहयोग और सम्मान से तैयार होता है।
फर्स्टवन रिहैब फाउंडेशन का दिवाली मेला इसी व्यापक सोच की ओर संकेत करता नजर आया। यहां त्योहार की खुशियों के बीच बच्चों के हुनर को पहचान मिली और ऑक्यूपेशनल थेरेपी के महत्व को भी सामने लाया गया।
आखिरकार, दिवाली के दीये तो हर साल जलते हैं, लेकिन किसी बच्चे के भीतर आत्मविश्वास और आत्मनिर्भरता की जो लौ जलती है, उसकी रोशनी कहीं अधिक दूर तक जाती है। इस आयोजन का सबसे बड़ा संदेश भी यही रहा कि बच्चों को उनकी चुनौतियों से नहीं, उनकी क्षमताओं और संभावनाओं से पहचाना जाना चाहिए।















