“चुनावी मंचों से इतर अब धार्मिक पंडालों में भी दिखने लगी राजनीतिक हलचल, धीरेंद्र शास्त्री से लेकर राजन जी महाराज और प्रदीप मिश्रा तक की कथाओं के लिए नेताओं में दिलचस्पी; सवाल यह कि आस्था का आयोजन है या जनसंपर्क का नया सियासी मंच?”
उत्तर प्रदेश की राजनीति में इन दिनों एक दिलचस्प बदलाव दिखाई दे रहा है। यहां सियासी गतिविधियों का दायरा अब केवल चुनावी रैलियों, जनसभाओं, शक्ति प्रदर्शनों और राजनीतिक यात्राओं तक सीमित नहीं रह गया है। नेताओं की सक्रियता अब धार्मिक पंडालों तक भी पहुंच रही है। कहीं भागवत कथा की तैयारियां हैं तो कहीं रामकथा का आयोजन प्रस्तावित है। किसी जिले में शिवपुराण की गूंज सुनाई देने वाली है तो किसी इलाके में चर्चित कथावाचक के आगमन को लेकर तैयारियां चल रही हैं।
राजनीति के पुराने जानकारों को इस बदलते नजारे में एक नया सियासी रंग दिखाई दे सकता है। मंच भले धार्मिक हो, आयोजन का स्वरूप भले आध्यात्मिक हो और माइक से भले भगवान की महिमा का गुणगान हो, लेकिन आयोजन के इर्द-गिर्द जुटने वाली भीड़, नेताओं की मौजूदगी और स्थानीय स्तर पर बनने वाली चर्चा भी अपने आप में राजनीतिक महत्व रखती है।
आखिर उत्तर प्रदेश जैसे बड़े राजनीतिक प्रदेश में हजारों लोगों की मौजूदगी वाला कोई आयोजन केवल एक धार्मिक कार्यक्रम भर नहीं रह जाता। वह सामाजिक मेलजोल, स्थानीय पहचान, जनसंपर्क और सार्वजनिक उपस्थिति का अवसर भी बन जाता है। यही वजह है कि इन दिनों कई राजनीतिक चेहरों की दिलचस्पी कथाओं और कथावाचकों में बढ़ती दिखाई दे रही है।
इस पूरे घटनाक्रम में सबसे अधिक चर्चा बागेश्वर धाम के पीठाधीश्वर धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री की है। कुंडा से लेकर गोंडा, झांसी, लखनऊ और आगरा तक उनके कार्यक्रम प्रस्तावित हैं। यानी प्रदेश के अलग-अलग हिस्सों में उनके धार्मिक आयोजनों की तैयारियां हैं। दूसरी ओर राजन जी महाराज और प्रदीप मिश्रा भी नेताओं के आयोजनों में प्रमुखता से शामिल दिखाई दे रहे हैं। जया किशोरी का नाम भी इस सूची में जुड़ गया है।
सवाल यह है कि क्या उत्तर प्रदेश की राजनीति में धार्मिक कथाएं जनसंपर्क का नया माध्यम बन रही हैं? क्या नेताओं ने समझ लिया है कि जहां चुनावी भाषण सुनने के लिए लोगों को बुलाना पड़ता है, वहां कथा के नाम पर लोग स्वयं पहुंच जाते हैं? हालांकि, इन सवालों के बीच यह समझना भी जरूरी है कि हर धार्मिक आयोजन को चुनावी रणनीति का हिस्सा मान लेना उचित नहीं होगा। आस्था, परंपरा और सामाजिक आयोजन भी इसके महत्वपूर्ण कारण हो सकते हैं।
धीरेंद्र शास्त्री की कथा के लिए पांच शहरों में तैयारियां
इस समय नेताओं और आयोजकों के बीच बागेश्वर धाम के धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री की कथाओं को लेकर खास दिलचस्पी दिखाई दे रही है। नवंबर और दिसंबर में उत्तर प्रदेश के पांच स्थानों पर उनके कार्यक्रम प्रस्तावित हैं। इन आयोजनों में कुछ के तार बीजेपी विधायकों से जुड़े हैं तो कुंडा के विधायक राजा भैया का नाम भी आयोजकों में सामने आया है।
कार्यक्रमों की प्रस्तावित सूची पर नजर डालें तो नवंबर में कुंडा से शुरुआत होती दिखाई देती है। इसके बाद दिसंबर में गोंडा, झांसी, लखनऊ और आगरा में धार्मिक आयोजनों की योजना है।
धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री के प्रस्तावित कार्यक्रम इस प्रकार हैं:
- 17 से 20 नवंबर: कुंडा में विधायक राजा भैया के आयोजन में कथा।
- 4 से 6 दिसंबर: गोंडा में बीजेपी विधायक बावन सिंह के आयोजन में कथा।
- 11 से 13 दिसंबर: झांसी में बीजेपी विधायक रवि शर्मा के आयोजन में कथा।
- 17 से 21 दिसंबर: लखनऊ में कार्यक्रम प्रस्तावित, आयोजक का नाम स्पष्ट नहीं।
- 23 से 25 दिसंबर: आगरा में कथा प्रस्तावित, आयोजन से जुड़े नामों की जानकारी सामने नहीं आई है।
इन कार्यक्रमों का भौगोलिक फैलाव भी ध्यान देने लायक है। अवध, बुंदेलखंड और पश्चिमी उत्तर प्रदेश तक धार्मिक आयोजनों की यह श्रृंखला पहुंचती दिखाई दे रही है। खास बात यह है कि दिसंबर में उनके लगातार तीन शहरों में कार्यक्रम प्रस्तावित हैं।
धार्मिक कथाओं के आयोजनों में किसी चर्चित कथावाचक की मौजूदगी आयोजन का आकर्षण बढ़ा सकती है। इसके साथ ही स्थानीय नेताओं को भी क्षेत्र के लोगों के बीच सक्रिय रहने का अवसर मिलता है। मंच पर कथावाचक होते हैं, आयोजन की जिम्मेदारी स्थानीय नेताओं के हाथ में होती है और पंडाल में उमड़ने वाली भीड़ पूरे कार्यक्रम को चर्चा का विषय बना देती है।
राजन जी महाराज के कार्यक्रमों से पूर्वांचल और अवध में हलचल
धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री के अलावा राजन जी महाराज की कथाओं को लेकर भी उत्तर प्रदेश में अच्छी-खासी गतिविधियां दिखाई दे रही हैं। गोंडा, सुल्तानपुर और अमेठी में उनके कार्यक्रमों की जानकारी सामने आई है। इसके अलावा वह चंदौली में सुशील सिंह के लिए भी कथा कर चुके हैं।
राजन जी महाराज के कार्यक्रमों की सूची में अलग-अलग जिलों के नाम शामिल होना बताता है कि धार्मिक आयोजनों के लिए कथावाचकों की मांग किसी एक क्षेत्र तक सीमित नहीं है।
उनसे जुड़े प्रमुख कार्यक्रमों की जानकारी इस प्रकार है:
- 17 से 25 तारीख: गोंडा में कार्यक्रम प्रस्तावित।
- 30 अक्टूबर से 7 नवंबर: सुल्तानपुर में बीजेपी नेता शिवकुमार सिंह के आयोजन में कथा।
- नवंबर: गोंडा में दो अन्य कार्यक्रमों की जानकारी।
- दिसंबर: गौरीगंज, अमेठी में एक कार्यक्रम प्रस्तावित।
यहां एक दिलचस्प पहलू यह भी है कि धार्मिक आयोजनों के जरिए स्थानीय स्तर पर नेताओं की सामाजिक सक्रियता को भी जगह मिलती है। कथा में शामिल होने वाले लोगों के लिए यह धार्मिक अवसर होता है, जबकि आयोजकों के लिए अपने क्षेत्र के लोगों से मिलने-जुलने और सार्वजनिक संवाद का एक बड़ा मंच भी बन सकता है।
प्रदीप मिश्रा की कथाओं में भी नेताओं की दिलचस्पी
मध्य प्रदेश के प्रसिद्ध कथावाचक प्रदीप मिश्रा भी उत्तर प्रदेश के राजनीतिक और सामाजिक आयोजनों में अपनी मौजूदगी दर्ज करा चुके हैं। रायबरेली के ऊंचाहार में वह मनोज पांडे के लिए कथा कर चुके हैं। उन्नाव में अरुण सिंह के आयोजन में भी उनका कार्यक्रम हुआ था।
अब दिसंबर में झांसी में उनके एक और बड़े धार्मिक आयोजन की तैयारी है। यहां बीजेपी विधायक रवि शर्मा के आयोजन में 4 से 10 दिसंबर तक कथा प्रस्तावित है।
ध्यान देने वाली बात यह है कि झांसी में धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री और प्रदीप मिश्रा दोनों के कार्यक्रम दिसंबर में प्रस्तावित हैं। इससे शहर में धार्मिक आयोजनों की गतिविधियां बढ़ने की संभावना है।
राजनीतिक नजरिए से देखें तो किसी बड़े कथावाचक को अपने क्षेत्र में बुलाना केवल आयोजन की व्यवस्था करने तक सीमित नहीं रहता। इसके लिए व्यापक तैयारियां, प्रचार, स्थानीय सहयोग और लोगों की भागीदारी की जरूरत होती है। ऐसे कार्यक्रमों के जरिए आयोजक नेता की सार्वजनिक सक्रियता भी सामने आती है।
जया किशोरी की कथा से जौनपुर भी चर्चा में
धार्मिक आयोजनों की इस फेहरिस्त में जया किशोरी का नाम भी शामिल है। जौनपुर में धनंजय सिंह के आयोजन में उनकी कथा प्रस्तावित बताई जा रही है। हालांकि, अभी कार्यक्रम की तारीख सामने नहीं आई है।
जया किशोरी की लोकप्रियता धार्मिक कथाओं और भजन कार्यक्रमों तक फैली हुई है। ऐसे में जौनपुर में उनके प्रस्तावित आयोजन को लेकर भी दिलचस्पी हो सकती है। तारीख और अन्य व्यवस्थाओं की आधिकारिक जानकारी सामने आने के बाद ही कार्यक्रम की पूरी तस्वीर स्पष्ट होगी।
आखिर नेताओं को कथाओं में क्या दिखाई देता है?
अब इस पूरी कहानी का सबसे दिलचस्प पहलू यही है कि नेताओं की धार्मिक आयोजनों में बढ़ती सक्रियता के पीछे कौन-कौन से सामाजिक और राजनीतिक पहलू काम कर रहे हैं?
पहला पहलू है भीड़। राजनीति में भीड़ हमेशा से चर्चा और सार्वजनिक प्रभाव का एक महत्वपूर्ण पैमाना रही है। चुनावी सभाओं में भीड़ जुटाने के लिए राजनीतिक दलों को संगठन, प्रचार और कार्यकर्ताओं की ताकत लगानी पड़ती है। दूसरी तरफ बड़े धार्मिक आयोजनों में श्रद्धालुओं की भागीदारी स्वाभाविक रूप से बड़ी हो सकती है। कथावाचक की लोकप्रियता और धार्मिक विषयों के प्रति लोगों की रुचि आयोजन को व्यापक बना सकती है।
दूसरा पहलू है जनसंपर्क। किसी धार्मिक आयोजन में नेता को अपने क्षेत्र के लोगों से मिलने, स्थानीय सामाजिक संगठनों से जुड़ने और सार्वजनिक रूप से सक्रिय दिखाई देने का अवसर मिलता है। इस दौरान पार्टी कार्यकर्ताओं से लेकर सामाजिक और व्यापारिक वर्ग तक की मौजूदगी हो सकती है।
तीसरा पहलू है सार्वजनिक छवि। राजनीति में नेताओं की पहचान केवल उनके भाषणों और चुनावी वादों से नहीं बनती। सामाजिक और धार्मिक कार्यक्रमों में उनकी भागीदारी भी सार्वजनिक जीवन का हिस्सा होती है। ऐसे आयोजन उन्हें अपने क्षेत्र की सामाजिक गतिविधियों से जुड़ने का अवसर देते हैं।
और चौथा पहलू है स्थानीय राजनीति। किसी बड़े कथावाचक का कार्यक्रम किस नेता के क्षेत्र में हो रहा है, आयोजन की जिम्मेदारी किसने उठाई है और उसमें किन लोगों की भागीदारी है, ये सभी बातें स्थानीय राजनीतिक चर्चा का विषय बन सकती हैं।
चुनावी मंच से धार्मिक पंडाल तक, बदला नहीं तो विस्तृत जरूर हुआ राजनीति का दायरा
उत्तर प्रदेश में धार्मिक आयोजनों और राजनीति का संबंध नया नहीं है। सामाजिक और धार्मिक कार्यक्रम लंबे समय से सार्वजनिक जीवन का हिस्सा रहे हैं। लेकिन अब जिस तरह बड़े कथावाचकों के कार्यक्रमों की सूची में विधायकों और राजनीतिक चेहरों के नाम सामने आ रहे हैं, उससे इस गतिविधि पर चर्चा बढ़ना स्वाभाविक है।
यह भी सच है कि किसी नेता द्वारा भागवत कथा या रामकथा आयोजित कराने का अर्थ अपने आप में चुनावी तैयारी नहीं होता। धार्मिक आस्था को केवल राजनीतिक चश्मे से देखना भी सही नहीं होगा। मगर जब ऐसे आयोजन अलग-अलग जिलों में लगातार हों, चर्चित कथावाचक बुलाए जाएं और आयोजकों में विभिन्न दलों के नेता शामिल हों, तो उनके सामाजिक और राजनीतिक प्रभाव पर सवाल उठना भी स्वाभाविक है।
राजनीति में मंच बदलते रहते हैं। कभी चौपाल पर संवाद होता है, कभी जनसभा में भाषण और कभी धार्मिक पंडाल में कथा। हर मंच की अपनी भाषा और अपना माहौल होता है। फर्क सिर्फ इतना है कि धार्मिक पंडाल में राजनीतिक भाषण की जगह भजन और कथा होती है, लेकिन आयोजक की सार्वजनिक मौजूदगी वहां भी दर्ज होती है।
फिलहाल उत्तर प्रदेश में धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री, राजन जी महाराज, प्रदीप मिश्रा और जया किशोरी के प्रस्तावित कार्यक्रम यही संकेत दे रहे हैं कि धार्मिक आयोजनों को लेकर नेताओं की सक्रियता बढ़ी हुई है।
अब देखने वाली बात यह होगी कि आने वाले दिनों में यह सिलसिला किन जिलों तक पहुंचता है और धार्मिक आयोजनों की यह श्रृंखला प्रदेश की सामाजिक और राजनीतिक चर्चा को किस तरह प्रभावित करती है।
क्योंकि उत्तर प्रदेश की राजनीति में अब केवल यह देखना काफी नहीं कि नेता किस मंच से भाषण दे रहा है, यह भी देखना दिलचस्प है कि वह किस पंडाल में आयोजन करा रहा है, किस कथावाचक को बुला रहा है और उस आयोजन के जरिए अपने क्षेत्र में किस तरह की सार्वजनिक मौजूदगी दर्ज करा रहा है।















