“किसी के पास चार विभागों की जिम्मेदारी, कोई बिना विभाग के भी खास; किसी को बैठने के लिए जगह नहीं, तो किसी के लिए चार ठिकानों पर इंतजाम। गोरखपुर से आए एक अधिकारी के आगमन पर जारी हुआ विशेष आदेश, अब प्राधिकरण की प्रशासनिक व्यवस्था पर उठ रहे सवाल”
नोएडा। नोएडा प्राधिकरण में इन दिनों विकास कार्यों से ज्यादा चर्चा अधिकारियों की कार्यशैली, उनके पदभार, बैठने की व्यवस्था और वीआईपी संस्कृति को लेकर हो रही है। प्राधिकरण में अधिकारियों की जिम्मेदारियों का बंटवारा भी अपने आप में एक दिलचस्प पहेली बनता जा रहा है। किसी अधिकारी के पास चार-चार विभागों का प्रभार है, तो किसी के पास विभागीय जिम्मेदारी का इंतजार खत्म होने का नाम नहीं ले रहा। किसी अधिकारी को बैठने के लिए उचित स्थान उपलब्ध नहीं है, तो किसी के लिए अलग-अलग चार स्थानों पर बैठने की व्यवस्था होने की चर्चाएं हैं। ऐसे में सवाल उठना लाजिमी है कि आखिर प्राधिकरण में काम की प्राथमिकता तय हो रही है या अधिकारियों की सुविधा और प्रतिष्ठा की?
इसी बीच नोएडा प्राधिकरण के स्वागत कक्ष से जारी एक कार्यालय आदेश ने इस चर्चा को और हवा दे दी है। 29 अक्टूबर 2026 को जारी आदेश संख्या 766 के अनुसार, संपत्तियों से संबंधित कार्यों के लिए प्राधिकरण के अधिकारियों से मिलने आने वाले आवंटियों को सामान्यतः दोपहर 1:30 बजे तक पास जारी किए जाते हैं। लेकिन अपर मुख्य कार्यपालक अधिकारी (P.R.S) महोदय से मिलने के लिए सुबह 10 बजे से शाम 6 बजे तक आगंतुकों को पास जारी किए जाने की व्यवस्था कर दी गई है।
यानी आम अधिकारियों से मुलाकात के लिए समय की एक सीमा और विशेष साहब से मुलाकात के लिए पूरे कार्यदिवस का दरवाजा! इसे प्रशासनिक सुविधा कहें, कार्यशैली का नया प्रयोग कहें या फिर अधिकारियों की श्रेणी के अनुसार जनता की पहुंच तय करने का एक अनूठा तरीका?
साहबों की श्रेणी, मुलाकात की अलग-अलग घड़ी!
प्राधिकरण के इस आदेश को पढ़कर ऐसा लगता है कि यहां अधिकारियों से मिलने के लिए भी अलग-अलग श्रेणियां निर्धारित हो गई हैं। आम अधिकारियों के लिए दोपहर 1:30 बजे तक पास जारी करने की व्यवस्था है, जबकि एक विशेष पदाधिकारी से मिलने के लिए शाम 6 बजे तक पास जारी किए जाएंगे।
अब आम आवंटी के मन में सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या उसकी समस्या दोपहर 1:30 बजे के बाद समाप्त हो जाती है? क्या संपत्ति से जुड़ी परेशानियां दोपहर के भोजन के बाद छुट्टी पर चली जाती हैं? क्या आवंटियों की फाइलें भी घड़ी देखकर काम करती हैं? और क्या किसी अधिकारी से मिलने की जरूरत उसके पदनाम के हिसाब से कम या ज्यादा हो जाती है?
बेशक, किसी वरिष्ठ अधिकारी की उपलब्धता और प्रशासनिक निर्देशों के आधार पर मुलाकात का समय निर्धारित किया जा सकता है। लेकिन जब एक ही प्राधिकरण में अलग-अलग अधिकारियों के लिए मुलाकात की व्यवस्था में इतना अंतर दिखाई देता है, तो पारदर्शिता और समानता को लेकर सवाल उठना भी स्वाभाविक है।
गोरखपुर से आए साहब और नोएडा का नया प्रशासनिक प्रयोग!
प्राधिकरण के गलियारों में चर्चा है कि गोरखपुर से स्थानांतरित होकर आए एक अधिकारी के लिए विशेष व्यवस्था का यह आदेश जारी हुआ है। हालांकि आदेश में अधिकारी के स्थानांतरण या उनके आगमन का उल्लेख नहीं है, लेकिन इस व्यवस्था को लेकर चर्चाओं का बाजार गर्म है।
व्यंग्य यह है कि नोएडा में अधिकारियों के आने-जाने के साथ प्रशासनिक व्यवस्थाओं के नए अध्याय भी खुलते दिखाई देते हैं। किसी अधिकारी के लिए नई जिम्मेदारी, किसी के लिए नया कार्यालय, किसी के लिए अतिरिक्त प्रभार और किसी के लिए विशेष मुलाकात व्यवस्था!
अब सवाल यह है कि क्या नोएडा प्राधिकरण में अधिकारियों के आने से व्यवस्थाएं जनता की सुविधा के लिए बदलती हैं या फिर अधिकारियों की सुविधा के अनुरूप नई व्यवस्थाओं का जन्म होता है?
गोरखपुर से आए अधिकारी के लिए जारी आदेश ने कम से कम इतना जरूर स्पष्ट कर दिया है कि प्राधिकरण में मुलाकात की घड़ी भी प्रशासनिक महत्व के हिसाब से अलग-अलग हो सकती है।
चार विभाग एक अधिकारी के पास, दूसरे को विभाग का इंतजार!
प्राधिकरण की प्रशासनिक व्यवस्था का एक और दिलचस्प पहलू विभागों का बंटवारा बताया जा रहा है। चर्चा है कि कुछ अधिकारियों के पास चार-चार विभागों की जिम्मेदारी है। ऐसे में यह समझना मुश्किल हो जाता है कि एक अधिकारी इतने विभागों की फाइलों, बैठकों, शिकायतों और निर्णयों को कितनी प्रभावी तरीके से संभाल पाता होगा।
दूसरी ओर कुछ अधिकारी ऐसे भी बताए जाते हैं जिनके पास अपेक्षित विभागीय जिम्मेदारी नहीं है। यानी एक तरफ जिम्मेदारियों का पहाड़ और दूसरी तरफ जिम्मेदारी का इंतजार!
ऐसे में सवाल उठता है कि क्या विभागों का वितरण कार्यक्षमता, अनुभव और प्रशासनिक आवश्यकता के आधार पर हो रहा है? क्या किसी अधिकारी के पास चार विभाग होने का अर्थ यह है कि वह चारों विभागों को पर्याप्त समय दे पा रहा है? और जिन अधिकारियों के पास विभागीय कार्यभार नहीं है, उनकी विशेषज्ञता का उपयोग किस तरह किया जा रहा है?
प्राधिकरण यदि विभागों का पारदर्शी और संतुलित बंटवारा सार्वजनिक करे, तो शायद इन सवालों के जवाब खुद-ब-खुद मिल जाएं।
किसी के पास कुर्सी नहीं, किसी के पास चार ठिकाने!
अधिकारियों की बैठने की व्यवस्था भी कम दिलचस्प नहीं बताई जा रही। चर्चा है कि एक विशेष अधिकारी के पास बैठने के लिए समुचित स्थान तक उपलब्ध नहीं है, जबकि कुछ अधिकारियों के लिए अलग-अलग चार स्थानों पर बैठने की व्यवस्था होने की बात सामने आती रही है।
अब यह प्राधिकरण की कार्यशैली का कमाल है या कार्यालय प्रबंधन का अनूठा नमूना, यह तो संबंधित अधिकारी ही बेहतर बता सकते हैं।
एक अधिकारी को अपनी फाइलें रखने और कर्मचारियों से संवाद करने के लिए उचित स्थान नहीं मिल पा रहा है, वहीं दूसरे अधिकारी के लिए एक से अधिक स्थानों की व्यवस्था होने की चर्चा है। ऐसे में कर्मचारी भी शायद यही सोचते होंगे कि आखिर कार्यालय में जगह की कमी है या फिर जगह आवंटित करने के पैमाने अलग-अलग हैं?
प्राधिकरण में कार्यालय की जगह का निर्धारण क्या पद, कार्यभार और आवश्यकता के अनुसार होता है या फिर प्रशासनिक रसूख के अनुसार? इस पर भी स्पष्टता की जरूरत है।
जनता के लिए नियम, अधिकारियों के लिए विशेष सुविधा?
नोएडा प्राधिकरण का गठन शहर के नियोजित विकास और नागरिकों की समस्याओं के समाधान के उद्देश्य से हुआ है। यहां रोजाना हजारों आवंटी अपनी संपत्ति, रजिस्ट्री, नामांतरण, लीज डीड, कब्जा, भुगतान और अन्य समस्याओं को लेकर प्राधिकरण के चक्कर लगाते हैं।
कई आवंटी ऐसे होते हैं जो दूर-दराज से आते हैं। किसी को एक दिन की छुट्टी लेकर आना पड़ता है, तो किसी को कई बार आने के बावजूद संबंधित अधिकारी से मुलाकात नहीं हो पाती। ऐसे में मुलाकात के समय को लेकर स्पष्ट और समान व्यवस्था होना बेहद जरूरी है।
लेकिन जब किसी एक अधिकारी के लिए सुबह 10 से शाम 6 बजे तक पास जारी करने का आदेश सामने आता है, तो आम आवंटी के मन में यह सवाल जरूर पैदा होता है कि क्या उसकी समस्या भी उतनी ही महत्वपूर्ण मानी जाएगी?
अगर किसी अधिकारी की उपलब्धता के कारण शाम तक मुलाकात संभव है, तो फिर अन्य अधिकारियों के लिए भी आवश्यकतानुसार ऐसी सुविधा क्यों नहीं हो सकती? और यदि सुरक्षा या प्रशासनिक कारणों से समय सीमित रखना जरूरी है, तो उसके पीछे स्पष्ट नीति क्यों नहीं बनाई जाती?

आदेशों की संख्या बढ़े या समस्याओं का समाधान?
नोएडा प्राधिकरण में अधिकारियों की प्रशासनिक सक्रियता का अंदाजा इस बात से भी लगाया जा सकता है कि समय-समय पर नई व्यवस्थाओं को लेकर आदेश जारी होते रहते हैं। आदेश जारी करना प्रशासन का सामान्य हिस्सा है, लेकिन किसी आदेश की वास्तविक सफलता इस बात से तय होती है कि उससे जनता को क्या लाभ मिला।
अगर किसी आदेश से जनता को अधिकारी तक पहुंचने में आसानी होती है, तो उसका स्वागत होना चाहिए। लेकिन यदि व्यवस्था ऐसी दिखाई दे कि किसी विशेष अधिकारी के लिए अलग समय और बाकी अधिकारियों के लिए अलग समय निर्धारित हो, तो उसके औचित्य पर सवाल उठेंगे ही।
प्राधिकरण में इस समय जरूरत ऐसे आदेशों की है, जिनसे आवंटियों की लंबित फाइलें निस्तारित हों, संपत्तियों से संबंधित विवाद कम हों, शिकायतों का समयबद्ध समाधान हो और अधिकारियों की जवाबदेही तय हो।
जनता को इस बात से कोई विशेष फर्क नहीं पड़ता कि किस अधिकारी के पास कितने विभाग हैं, कौन कितने कमरों में बैठता है और किसके लिए कितने घंटे का पास जारी होता है। जनता को तो बस अपनी समस्या का समाधान चाहिए।
क्या प्राधिकरण में बनेगी एक समान व्यवस्था?
प्राधिकरण के इस विशेष आदेश के बाद अब यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या भविष्य में अन्य अधिकारियों के लिए भी इसी प्रकार की मुलाकात व्यवस्था लागू होगी या फिर यह सुविधा केवल चुनिंदा पदों तक सीमित रहेगी।
क्या प्राधिकरण सभी अधिकारियों के लिए एक समान मुलाकात नीति बनाएगा? क्या विभागों का संतुलित बंटवारा होगा? क्या हर अधिकारी को उसके कार्यभार के अनुरूप कार्यालय और संसाधन मिलेंगे? क्या अधिकारियों की उपलब्धता और जनता से मुलाकात का समय सार्वजनिक किया जाएगा?
इन सवालों का जवाब प्राधिकरण के शीर्ष नेतृत्व को देना चाहिए, क्योंकि प्रशासनिक व्यवस्था किसी अधिकारी की व्यक्तिगत सुविधा के लिए नहीं, बल्कि जनता की सेवा के लिए होती है।
एक सवाल…
नोएडा प्राधिकरण में अब जनता शायद यह समझने की कोशिश कर रही है कि यहां विकास की प्राथमिकता क्या है—शहर का विकास, आवंटियों की समस्याओं का समाधान या अधिकारियों की सुविधाओं का विस्तार?
कहीं ऐसा न हो कि आने वाले समय में अधिकारियों की श्रेणी के अनुसार पास का रंग भी अलग-अलग कर दिया जाए। चार विभाग वाले अधिकारी के लिए चार रंग, चार जगह बैठने वाले अधिकारी के लिए विशेष पास और जिनके पास विभाग नहीं, उनके लिए प्रतीक्षा सूची!
वैसे प्राधिकरण के पास यदि जनता की समस्याओं के समाधान के लिए भी ऐसा ही कोई विशेष आदेश हो जाए, जिसमें सुबह 10 बजे से शाम 6 बजे तक हर आवंटी को संबंधित अधिकारी से मिलने की गारंटी मिले, तो शायद शहर के लाखों आवंटियों को भी लगेगा कि प्राधिकरण में उनके लिए भी कोई विशेष व्यवस्था है।
क्योंकि आखिरकार प्राधिकरण अधिकारियों की सुविधाओं से नहीं, बल्कि जनता की समस्याओं के समाधान और शहर के विकास से पहचाना जाना चाहिए।















