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शहर का अतिक्रमण हटाने निकला प्राधिकरण, पहले अपने दरवाजे पर नजर क्यों नहीं डालता?

सेक्टर-6 से सेक्टर-94 तक रिसेप्शन की कहानी नहीं बदली या सिर्फ कार्यालय का पता बदला? करोड़ों की इमारत में स्वागत कक्ष की जगह ग्रीन बेल्ट में व्यवस्था! ऊपर से बैंक को जगह देने का फैसला भी सवालों के घेरे में

पर्दे के पीछे की कहानी | विशेष पड़ताल

नोएडा। नोएडा में अतिक्रमण हटाने का अभियान जब निकलता है, तो सड़क किनारे बैठे दुकानदारों से लेकर अपनी दुकान के बाहर सामान रखने वाले कारोबारियों तक को नियम-कानून का पाठ पढ़ाया जाता है। कहीं नोटिस पहुंचता है, कहीं बुलडोजर पहुंचता है और कहीं सार्वजनिक जमीन खाली कराने के नाम पर कार्रवाई होती है। प्राधिकरण का तर्क साफ होता है—शहर को व्यवस्थित रखना है, ग्रीन बेल्ट बचानी है और सरकारी जमीन को कब्जे से मुक्त कराना है।

`लेकिन इस पूरी कवायद के बीच एक सवाल ऐसा भी है, जिसका जवाब शायद प्राधिकरण के अपने दफ्तर में ही तलाशना पड़ेगा।

जब शहर की ग्रीन बेल्ट पर आम आदमी का कब्जा बर्दाश्त नहीं, तो सरकारी कार्यालय की ग्रीन बेल्ट पर रिसेप्शन की व्यवस्था किस नियम के तहत स्वीकार्य है?

क्या नियमों की किताब में सरकारी संस्थानों के लिए कोई अलग अध्याय है? क्या अतिक्रमण की परिभाषा सरकारी परिसर की सीमा पर पहुंचते ही बदल जाती है? या फिर कानून का डंडा केवल उन्हीं लोगों के लिए है, जिनके पास अपनी बात रखने के लिए कोई बड़ा कार्यालय नहीं है?

नोएडा प्राधिकरण से जुड़े रिसेप्शन निर्माण और भूमि उपयोग के सवालों ने ऐसी ही बहस को जन्म दिया है। मामला केवल एक रिसेप्शन का नहीं है। इसके साथ सरकारी भवन की योजना, ग्रीन बेल्ट के संरक्षण, बैंक को स्थान आवंटित करने और प्रशासनिक फैसलों की पारदर्शिता जैसे कई सवाल जुड़े हैं।

पुराना कार्यालय बदला, लेकिन रिसेप्शन की कहानी क्यों नहीं बदली?

इस कहानी की शुरुआत सेक्टर-6 से होती है।

जब नोएडा प्राधिकरण का मुख्य कार्यालय सेक्टर-6 में हुआ करता था, तब भी नाले के ऊपर और ग्रीन बेल्ट की जमीन पर रिसेप्शन बनाए जाने को लेकर सवाल उठते रहे। इसी व्यवस्था के माध्यम से प्राधिकरण में आने वाले लोगों को प्रवेश पास जारी किए जाते थे।

अब सवाल यह है कि क्या उस समय इस निर्माण के लिए विधिवत स्वीकृति ली गई थी? क्या संबंधित जमीन का भू-उपयोग इसकी अनुमति देता था? क्या निर्माण स्वीकृत नक्शे का हिस्सा था?

इन सवालों का जवाब आज भी दस्तावेजों के माध्यम से सामने आना चाहिए।

समय बदला। प्राधिकरण का प्रशासनिक पता बदला। सेक्टर-6 से निकलकर सेक्टर-94 में करोड़ों रुपये की लागत से भव्य और अत्याधुनिक कार्यालय भवन तैयार हुआ। दावा किया गया कि आधुनिक सुविधाओं से युक्त इस भवन में प्राधिकरण के तमाम विभागों को एक छत के नीचे संचालित किया जाएगा।

अधिकारियों, इंजीनियरों, जूनियर इंजीनियरों, विद्युत विभाग, स्वास्थ्य विभाग और अन्य प्रशासनिक इकाइयों को एक ही परिसर में बैठाने की योजना से जनता को भी उम्मीद जगी कि अब कामकाज आसान होगा।

लेकिन आधुनिक भवन में प्रवेश करने से पहले ही एक पुराना सवाल फिर सामने आ गया।

करोड़ों रुपये खर्च करके जब इतना बड़ा कार्यालय बनाया गया, तो क्या उसमें आगंतुकों के स्वागत, पंजीकरण और प्रवेश पास जारी करने की जगह तय नहीं की गई थी?

यदि जगह निर्धारित थी तो उसका इस्तेमाल क्यों नहीं हो रहा? यदि जगह नहीं थी तो भवन का नक्शा तैयार करने वालों ने इस बुनियादी जरूरत को नजरअंदाज कैसे कर दिया?

और यदि वर्तमान रिसेप्शन के लिए ग्रीन बेल्ट की जमीन का उपयोग किया जा रहा है, तो उसकी अनुमति और स्वीकृति सार्वजनिक क्यों नहीं की जाती?

आखिर अत्याधुनिक भवन का मतलब केवल शानदार दीवारें, चमकदार फर्श और आधुनिक फर्नीचर तो नहीं होता। भवन की योजना में नियमों और जनसुविधाओं का पालन भी शामिल होना चाहिए।

जनता की ग्रीन बेल्ट पर बुलडोजर, अपने परिसर में कौन-सा नियम?

यह इस पूरे प्रकरण का सबसे महत्वपूर्ण सवाल है।

नोएडा प्राधिकरण ग्रीन बेल्ट को शहर की पर्यावरणीय और शहरी व्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा बताता है। सार्वजनिक भूमि पर अवैध कब्जे के खिलाफ कार्रवाई भी इसी आधार पर की जाती है।

इसमें कोई दो राय नहीं कि सार्वजनिक जमीन पर अनधिकृत कब्जा नहीं होना चाहिए। लेकिन इस सिद्धांत की विश्वसनीयता तभी कायम रहेगी, जब इसे लागू करने वाली संस्था भी उसी कसौटी पर स्वयं को परखने के लिए तैयार हो।

मान लीजिए किसी दुकानदार ने अपनी सुविधा के लिए ग्रीन बेल्ट में एक छोटा-सा ढांचा बना लिया। प्राधिकरण की टीम पहुंचती है, निर्माण की वैधता पूछती है और अनुमति नहीं मिलने पर कार्रवाई करती है।

अब यही सवाल प्राधिकरण के अपने परिसर में उठे तो क्या प्रक्रिया अपनाई जाएगी?

क्या संबंधित अधिकारी मौके पर जाकर भूमि का भू-उपयोग देखेंगे? क्या स्वीकृत नक्शे का मिलान करेंगे? क्या निर्माण की अनुमति मांगी जाएगी? क्या जरूरत पड़ने पर जांच कराई जाएगी?

या फिर सरकारी परिसर का बोर्ड लगते ही सारे सवाल स्वतः समाप्त हो जाएंगे?

कानून की निष्पक्षता का असली इम्तिहान तब होता है, जब सवाल किसी आम नागरिक से नहीं, बल्कि कानून लागू कराने वाली संस्था से पूछा जाता है।

प्राधिकरण को स्पष्ट करना चाहिए कि सेक्टर-94 में रिसेप्शन जिस स्थान पर संचालित हो रहा है, उस जमीन का स्वीकृत भू-उपयोग क्या है। क्या वह वास्तव में ग्रीन बेल्ट है? क्या निर्माण स्वीकृत भवन नक्शे में शामिल है? यदि जमीन ग्रीन बेल्ट है, तो वहां रिसेप्शन के निर्माण और संचालन के लिए किस सक्षम अधिकारी ने अनुमति दी?

यदि सारी प्रक्रिया नियमों के अनुसार हुई है तो दस्तावेज सामने रखे जाएं। और यदि कहीं नियमों से हटकर निर्णय हुआ है तो जिम्मेदारी तय की जाए।

आखिर सरकारी संस्था को पारदर्शिता दिखाने में परेशानी क्यों होनी चाहिए?

करोड़ों का कार्यालय और बगल में बैंक! आखिर यह किसकी प्राथमिकता थी?

इस कहानी का दूसरा दिलचस्प पहलू सेक्टर-94 के कार्यालय में मुख्य रिसेप्शन के बगल में बैंक को स्थान दिए जाने से जुड़ा है।

अब सवाल यह नहीं है कि किसी सरकारी भवन में बैंक होना चाहिए या नहीं। बैंकिंग सुविधा जनता के लिए उपयोगी हो सकती है। सवाल यह है कि जब भवन के निर्माण का घोषित उद्देश्य प्राधिकरण के विभिन्न विभागों को एक छत के नीचे लाना था, तो उसी भवन में बैंक को स्थान देने का निर्णय किस आधार पर लिया गया?

क्या भवन की मूल योजना में बैंक के लिए जगह निर्धारित थी?

क्या बैंक को स्थान देने से पहले सभी विभागों की जरूरतों का आकलन किया गया था?

क्या इस आवंटन के लिए कोई पारदर्शी नीति अपनाई गई?

क्या बैंक से किराया या अन्य शुल्क लिया जा रहा है?

और सबसे अहम सवाल—इस फैसले को मंजूरी देने वाला सक्षम अधिकारी कौन था?

यह भी स्पष्ट होना चाहिए कि बैंक को स्थान देने के लिए किस स्तर पर प्रशासनिक और वित्तीय स्वीकृति ली गई। आवंटन का समझौता क्या कहता है? जगह का उपयोग किस उद्देश्य के लिए स्वीकृत किया गया है?

यदि बैंक को स्थान देने का निर्णय जनसुविधा के उद्देश्य से लिया गया था, तो उसका आधार सार्वजनिक किया जाना चाहिए।

लेकिन यदि भवन में प्राधिकरण के अपने विभागों के लिए पर्याप्त जगह उपलब्ध नहीं थी, तो बाहरी संस्था को स्थान देने की प्राथमिकता किस सोच के तहत तय की गई?

एक ओर जनता को बताया जाता है कि प्राधिकरण के सभी विभाग एक ही छत के नीचे उपलब्ध होंगे, दूसरी ओर उसी भवन में उपलब्ध स्थान के आवंटन पर सवाल उठ रहे हैं।

क्या भवन जनता की प्रशासनिक सुविधा के लिए बनाया गया था या फिर उसकी जगहों के इस्तेमाल की प्राथमिकताएं बाद में सुविधानुसार तय की गईं?

इसका जवाब अनुमान से नहीं, बल्कि आवंटन फाइलों और स्वीकृत योजना से मिलना चाहिए।

रिसेप्शन बनाना जरूरी है, लेकिन ग्रीन बेल्ट ही क्यों?

यह बात सही है कि किसी भी बड़े प्रशासनिक भवन में सुरक्षा व्यवस्था जरूरी है। आगंतुकों का पंजीकरण, पहचान सत्यापन और प्रवेश पास जारी करने के लिए रिसेप्शन होना चाहिए।

लेकिन सवाल रिसेप्शन की जरूरत पर नहीं, उसके स्थान पर है।

यदि भवन के भीतर स्वागत कक्ष की पर्याप्त व्यवस्था मौजूद है, तो बाहर ग्रीन बेल्ट में अलग व्यवस्था करने की जरूरत क्यों पड़ी?

यदि भवन की मूल योजना में रिसेप्शन का प्रावधान था, तो उसका इस्तेमाल क्यों नहीं हो रहा?

यदि सुरक्षा कारणों से अलग प्रवेश व्यवस्था बनाई गई है, तो उसके लिए कौन-सी स्वीकृति ली गई?

और यदि इसे अस्थायी व्यवस्था बताया जाता है, तो क्या अस्थायी निर्माण के लिए भी संबंधित नियमों और अनुमतियों का पालन किया गया?

किसी सरकारी कार्यालय की सुविधा जनता के लिए होनी चाहिए, लेकिन सुविधा के नाम पर सार्वजनिक जमीन के उपयोग का सवाल भी उतना ही महत्वपूर्ण है।

योजना बनाने वाले अधिकारियों से यह पूछना जरूरी है कि करोड़ों रुपये के भवन में प्रवेश व्यवस्था जैसी बुनियादी आवश्यकता का समुचित समाधान क्यों नहीं किया गया।

कहीं ऐसा तो नहीं कि भवन तैयार करते समय कागजों पर सब कुछ व्यवस्थित था, लेकिन वास्तविक संचालन शुरू होने के बाद सुविधाओं की व्यवस्था अलग तरीके से करनी पड़ी?

यदि ऐसा है तो यह केवल निर्माण का नहीं, बल्कि योजना और प्रशासनिक प्रबंधन का भी विषय है।

प्राधिकरण के लिए अलग नियम तो नहीं बन गए?

नोएडा में अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई के दौरान आम नागरिकों को अक्सर अपनी संपत्ति, निर्माण और भूमि उपयोग से जुड़े दस्तावेज दिखाने पड़ते हैं।

यह व्यवस्था गलत नहीं है। बल्कि सार्वजनिक जमीन की सुरक्षा के लिए जरूरी है।

लेकिन सवाल यह है कि जब कोई नागरिक अपने निर्माण की वैधता साबित करने के लिए दस्तावेज देता है, तो क्या प्राधिकरण भी अपने परिसर के निर्माण और भूमि उपयोग से संबंधित दस्तावेज सार्वजनिक करने को तैयार है?

क्या प्राधिकरण अपने भवन का स्वीकृत नक्शा दिखाएगा?

क्या ग्रीन बेल्ट से संबंधित भूमि अभिलेख सार्वजनिक करेगा?

क्या रिसेप्शन के निर्माण की अनुमति उपलब्ध कराएगा?

क्या बैंक को स्थान आवंटित करने का पूरा रिकॉर्ड सामने रखेगा?

यही वह बिंदु है, जहां से प्रशासनिक जवाबदेही की शुरुआत होती है।

किसी संस्था की प्रतिष्ठा इस बात से नहीं बनती कि उसके पास कितनी बड़ी इमारत है, कितने विभाग हैं या कितने कर्मचारी काम करते हैं। प्रतिष्ठा इस बात से बनती है कि उसके फैसले कितने पारदर्शी हैं और वह खुद कितनी ईमानदारी से नियमों का पालन करती है।

सरकारी कार्यालय कोई निजी संपत्ति नहीं होता। वहां इस्तेमाल होने वाली जमीन और भवन जनता की सार्वजनिक व्यवस्था का हिस्सा होते हैं। इसलिए इनके उपयोग से जुड़े सवाल पूछना भी जनता का अधिकार है।

अधिकारियों से नौ सवाल, जवाब दस्तावेजों में चाहिए

इस पूरे मामले में नोएडा प्राधिकरण के उच्च अधिकारियों को निम्नलिखित सवालों पर स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए:

  1. सेक्टर-6 स्थित पुराने कार्यालय में नाले के ऊपर और ग्रीन बेल्ट पर संचालित रिसेप्शन के निर्माण की क्या स्वीकृति थी?
  2. सेक्टर-94 स्थित वर्तमान कार्यालय में रिसेप्शन जिस स्थान पर संचालित है, उस जमीन का स्वीकृत भू-उपयोग क्या है?
  3. क्या वर्तमान रिसेप्शन स्वीकृत भवन नक्शे का हिस्सा है? यदि हां, तो संबंधित नक्शा सार्वजनिक किया जाएगा?
  4. यदि रिसेप्शन ग्रीन बेल्ट की जमीन पर है, तो इसके निर्माण और संचालन के लिए किस सक्षम अधिकारी ने अनुमति दी?
  5. क्या इस संबंध में उद्यान, नियोजन, पर्यावरण अथवा अन्य संबंधित विभागों की आवश्यक स्वीकृतियां प्राप्त की गई हैं?
  6. बैंक को स्थान आवंटित करने का निर्णय किस अधिकारी या सक्षम समिति ने लिया और किस नीति के तहत लिया गया?
  7. क्या बैंक से किराया अथवा अन्य शुल्क वसूला जा रहा है? यदि हां, तो आवंटन समझौते और शुल्क का विवरण सार्वजनिक किया जाएगा?
  8. क्या सेक्टर-94 भवन में सभी विभागों को एक छत के नीचे संचालित करने की मूल योजना पूरी तरह लागू हो चुकी है?
  9. क्या प्राधिकरण अपने परिसर में रिसेप्शन के निर्माण और भूमि उपयोग की निष्पक्ष जांच कराकर उसकी रिपोर्ट सार्वजनिक करेगा?

पर्दे के पीछे की कहानी: शहर को उपदेश देने से पहले अपना हिसाब भी दीजिए!

दरअसल, इस पूरे मामले में सबसे बड़ा प्रश्न किसी एक निर्माण का नहीं, बल्कि प्रशासनिक मानसिकता का है।

शहर को अतिक्रमण मुक्त बनाने का अधिकार प्राधिकरण के पास है। लेकिन उसी अधिकार के साथ यह जिम्मेदारी भी जुड़ी है कि उसके अपने निर्माण और फैसले भी नियमों की कसौटी पर खरे उतरें।

आम आदमी से नियमों का पालन कराने वाली संस्था को यह समझना होगा कि सरकारी कार्यालय की चारदीवारी जवाबदेही की सीमा नहीं बन सकती।

सेक्टर-6 के पुराने कार्यालय से लेकर सेक्टर-94 के अत्याधुनिक भवन तक उठ रहे सवालों को केवल तकनीकी मामला बताकर टाला नहीं जा सकता। इनका जवाब स्वीकृत नक्शे, भूमि उपयोग के रिकॉर्ड, निर्माण अनुमति, बैंक आवंटन की फाइल और संबंधित विभागों की रिपोर्ट के माध्यम से दिया जाना चाहिए।

यदि रिसेप्शन का निर्माण पूरी तरह वैध है तो प्राधिकरण को दस्तावेज सामने रखकर तमाम आशंकाएं दूर करनी चाहिए। यदि बैंक को स्थान आवंटित करने की प्रक्रिया नियमों के अनुरूप है तो उसका विवरण सार्वजनिक होना चाहिए।

लेकिन यदि जांच में किसी स्तर पर नियमों का उल्लंघन सामने आता है, तो जिम्मेदार अधिकारियों की जवाबदेही भी तय होनी चाहिए।

क्योंकि ग्रीन बेल्ट किसी अधिकारी की सुविधा का विस्तार नहीं, शहर की सार्वजनिक और पर्यावरणीय संपत्ति है।

प्राधिकरण को यह भी समझना होगा कि जनता केवल अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई नहीं देखती, वह यह भी देखती है कि कार्रवाई का नियम सबके लिए समान है या नहीं।

आखिर सवाल फिर वही है—

जो प्राधिकरण दूसरों की जमीन पर अतिक्रमण देखकर तुरंत कार्रवाई के लिए पहुंच जाता है, क्या वह अपने परिसर में उठ रहे सवालों का सामना करने के लिए भी उतनी ही तत्परता दिखाएगा?

या फिर शहर में नियमों का पाठ पढ़ाने वाला संस्थान अपने कार्यालय के दरवाजे पर पहुंचते ही नियमों की किताब बंद कर देता है?

शहर को अतिक्रमण मुक्त बनाइए, जरूर बनाइए। लेकिन शुरुआत अपने परिसर के हिसाब-किताब से करने में आखिर हर्ज ही क्या है?

कानून का सम्मान तभी होगा, जब कानून लागू कराने वाला भी उसी के सामने जवाबदेह होगा।

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