“एक तरफ शरद पवार, दूसरी तरफ प्रफुल्ल पटेल और बीच में दो एनसीपी के विलय का सवाल… क्या महाराष्ट्र में फिर एक होने जा रही है पवार की राजनीतिक ताकत, या इस मुलाकात के पीछे छिपा है सत्ता के समीकरण बदलने का कोई बड़ा खेल?”
महाराष्ट्र की राजनीति में कुछ मुलाकातें सिर्फ हालचाल पूछने के लिए नहीं होतीं। कुछ मुलाकातें ऐसी होती हैं, जिनमें चेहरे पर मुस्कान होती है, बातचीत में शिष्टाचार होता है, लेकिन राजनीतिक गलियारों में उनके मायने तलाशने के लिए कई दिनों तक माथापच्ची चलती रहती है। शरद पवार और प्रफुल्ल पटेल की अस्पताल में हुई मुलाकात भी कुछ ऐसी ही दिखाई दे रही है। दोनों नेताओं की मुलाकात भले ही अस्पताल के कमरे में हुई हो, लेकिन इसके राजनीतिक संदेश महाराष्ट्र की सत्ता के गलियारों तक पहुंच चुके हैं।
सवाल सिर्फ इतना नहीं है कि प्रफुल्ल पटेल शरद पवार का हालचाल जानने पहुंचे थे। असली सवाल यह है कि इतने पुराने राजनीतिक रिश्ते के बीच हुई इस मुलाकात का समय इतना महत्वपूर्ण क्यों माना जा रहा है? दिवाली के बाद साथ बैठकर बातचीत करने की बात क्यों कही गई? और सबसे अहम, क्या महाराष्ट्र में बिखरी हुई एनसीपी को फिर से एक छत के नीचे लाने की पटकथा लिखी जा रही है?
फिलहाल इन सवालों के जवाब सामने नहीं हैं, लेकिन राजनीतिक घटनाक्रम की कड़ियां जिस तरह जुड़ रही हैं, उससे यह साफ है कि महाराष्ट्र की राजनीति में पर्दे के पीछे कुछ न कुछ जरूर चल रहा है।
अस्पताल में हालचाल या राजनीति का नया अध्याय?
शरद पवार और प्रफुल्ल पटेल का राजनीतिक परिचय किसी से छिपा नहीं है। दोनों करीब चार दशकों से महाराष्ट्र और राष्ट्रीय राजनीति में सक्रिय रहे हैं। कभी एक ही राजनीतिक परिवार के मजबूत स्तंभ रहे इन नेताओं ने साथ मिलकर कई राजनीतिक परिस्थितियां देखी हैं। सत्ता के उतार-चढ़ाव, गठबंधन की मजबूरियां और संगठन की अंदरूनी राजनीति, दोनों इससे अच्छी तरह परिचित हैं।
ऐसे में प्रफुल्ल पटेल का अस्पताल पहुंचना महज एक औपचारिक शिष्टाचार मुलाकात मानकर छोड़ देना राजनीतिक समझदारी नहीं होगी। खासकर तब, जब दोनों नेताओं के बीच दिवाली के बाद अलग से बैठकर बातचीत करने पर सहमति बनी हो।
मुलाकात के दौरान शरद पवार ने बताया कि उन्हें अगले दिन सुबह 10 बजे अस्पताल से छुट्टी मिल जाएगी और दिवाली के बाद दोनों बैठकर बात करेंगे। इस पर प्रफुल्ल पटेल ने कहा कि वह 10 नवंबर से मुंबई में रहेंगे और शरद पवार जब भी कहेंगे, दोनों साथ बैठकर चर्चा करेंगे।
यानी बातचीत का दरवाजा खुला है, समय भी लगभग तय है और अब राजनीतिक निगाहें उस बैठक पर टिक गई हैं। हालांकि, दोनों नेताओं के बीच किन मुद्दों पर बातचीत होगी, इसका आधिकारिक खुलासा नहीं हुआ है।
लेकिन महाराष्ट्र की राजनीति में हर कोई जानता है कि पवार परिवार और एनसीपी से जुड़ी कोई भी बैठक सिर्फ चाय की चुस्कियों तक सीमित नहीं रहती। यहां कभी एक वाक्य से राजनीतिक संदेश निकलता है तो कभी खामोशी भी कई नेताओं की नींद उड़ा देती है।
दो एनसीपी, एक पहचान या दो अलग-अलग राजनीतिक दुकानें?
इस पूरे घटनाक्रम का सबसे बड़ा और संवेदनशील मुद्दा दोनों एनसीपी का संभावित विलय है।
अजित पवार के निधन से पहले दोनों गुटों के नेताओं के बीच पार्टी को फिर एक करने को लेकर कई दौर की बातचीत हुई थी। बताया जाता है कि इस दिशा में करीब चार बैठकें भी हुई थीं। उस समय महाराष्ट्र की राजनीति में यह चर्चा जोर पकड़ रही थी कि क्या पवार परिवार और एनसीपी के दोनों खेमे फिर एक साथ आ सकते हैं।
लेकिन अजित पवार के निधन के बाद राजनीतिक परिस्थितियां अचानक बदल गईं। नेतृत्व का सवाल खड़ा हुआ, पार्टी के भीतर नए समीकरण बनने लगे और विलय का मुद्दा कुछ समय के लिए पीछे चला गया।
अब एक बार फिर इस मुद्दे की चर्चा तेज होती दिखाई दे रही है।
प्रफुल्ल पटेल की भूमिका यहां महत्वपूर्ण हो जाती है। बताया जा रहा है कि वह भी महाराष्ट्र में दोनों गुटों को एक साथ लाने के पक्ष में हैं। अगर ऐसा होता है तो यह सिर्फ दो राजनीतिक संगठनों का विलय नहीं होगा, बल्कि महाराष्ट्र की राजनीति में पवार की पुरानी राजनीतिक ताकत को फिर से संगठित करने की कोशिश भी होगी।
हालांकि, विलय की राह इतनी आसान नहीं है। पार्टी का नाम, चुनाव चिह्न, संगठन पर नियंत्रण, नेतृत्व की जिम्मेदारी और भविष्य में किसकी चलेगी, इन सवालों का जवाब ढूंढना होगा।
क्योंकि राजनीति में एक झंडे के नीचे आना आसान है, लेकिन उस झंडे का डंडा किसके हाथ में रहेगा, असली लड़ाई अक्सर वहीं से शुरू होती है।
अमित शाह की बैठक में भी उठा था विलय का सवाल?
इस राजनीतिक पहेली का एक और महत्वपूर्ण हिस्सा केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के साथ हुई बैठक से जुड़ा बताया जा रहा है।
सूत्रों के मुताबिक, इस बैठक में दोनों एनसीपी के संभावित विलय का मुद्दा प्रमुखता से उठा था। बैठक में पार्टी के कई वरिष्ठ नेता शामिल हुए थे, जबकि सुनेत्रा पवार और पार्थ पवार की मौजूदगी नहीं थी।
यही वजह है कि इस बैठक को लेकर कई तरह की राजनीतिक व्याख्याएं की जा रही हैं।
बताया जाता है कि शरद पवार ने प्रफुल्ल पटेल से इस बैठक के बारे में जानकारी ली। आखिर बैठक में क्या चर्चा हुई? विलय को लेकर किसकी क्या राय थी? बीजेपी की तरफ से क्या संकेत मिले? और क्या दोनों गुटों के एक होने की स्थिति में आगे की राजनीतिक दिशा भी तय करने की कोशिश हुई?
इन सवालों के जवाब फिलहाल सार्वजनिक नहीं हैं।
लेकिन अगर दोनों एनसीपी के विलय का मुद्दा वास्तव में केंद्रीय नेतृत्व की बैठक तक पहुंचा है तो इसका मतलब है कि यह मामला केवल महाराष्ट्र के दो गुटों की आपसी बातचीत तक सीमित नहीं रह गया है। इसके राष्ट्रीय राजनीति और गठबंधन की रणनीति से जुड़े पहलू भी हो सकते हैं।
पार्थ पवार की कार्यशैली से अपने ही खेमे में बेचैनी?
कहानी का एक दिलचस्प पहलू अजित पवार गुट के भीतर की राजनीति भी है।
अजित पवार के बाद पार्टी के नेतृत्व और संगठन को लेकर नए समीकरण बन रहे हैं। सुनेत्रा पवार और पार्थ पवार की राजनीतिक भूमिका को लेकर चर्चाएं हैं। दूसरी तरफ पार्टी के कुछ वरिष्ठ नेताओं की नाराजगी की खबरें भी सामने आ रही हैं।
बताया जा रहा है कि कुछ नेताओं को पार्थ पवार की कार्यशैली और संगठन में की जा रही नियुक्तियों को लेकर आपत्ति है। आरोप है कि कई महत्वपूर्ण फैसले वरिष्ठ नेताओं से पर्याप्त सलाह-मशविरा किए बिना लिए जा रहे हैं।
अगर इन चर्चाओं में सच्चाई है तो यह किसी भी राजनीतिक दल के लिए सामान्य संगठनात्मक असहमति से ज्यादा गंभीर स्थिति हो सकती है।
क्योंकि पार्टी में जब पुराने अनुभवी नेताओं को लगे कि उनकी राय की अहमियत कम हो रही है और नए नेतृत्व के आसपास फैसलों का दायरा सिमट रहा है, तब असंतोष धीरे-धीरे राजनीतिक चुनौती का रूप लेने लगता है।
यहां प्रफुल्ल पटेल की स्थिति भी समझना जरूरी है। जब एनसीपी एकजुट थी, तब शरद पवार के बाद पार्टी के सबसे प्रभावशाली नेताओं में उनका नाम लिया जाता था। संगठन से लेकर राष्ट्रीय राजनीति तक उनकी मजबूत पकड़ मानी जाती थी।
लेकिन पार्टी के विभाजन और बाद के घटनाक्रम ने उनकी राजनीतिक भूमिका के समीकरण बदल दिए।
अब सवाल यह है कि क्या प्रफुल्ल पटेल महाराष्ट्र में फिर से अपनी पुरानी राजनीतिक भूमिका हासिल करना चाहते हैं? क्या वह दोनों गुटों को एक साथ लाकर पार्टी में अपनी स्थिति मजबूत करना चाहते हैं? या फिर उनकी कोशिश किसी बड़े राजनीतिक समझौते का रास्ता तैयार करने की है?
इन सवालों के जवाब आने वाले दिनों में ही स्पष्ट होंगे।
सुनेत्रा पवार के सामने भी आसान नहीं है रास्ता
दूसरी तरफ सुनेत्रा पवार की राजनीतिक भूमिका को भी इस पूरे घटनाक्रम से अलग करके नहीं देखा जा सकता।
एक तरफ पार्टी को अलग पहचान और संगठनात्मक मजबूती के साथ आगे बढ़ाने की चुनौती है, दूसरी तरफ वरिष्ठ नेताओं की अपेक्षाएं और दोनों गुटों को एक करने की संभावित मांग।
अगर विलय होता है तो नेतृत्व का सवाल सबसे बड़ा होगा। क्या सुनेत्रा पवार को नई व्यवस्था में प्रमुख भूमिका मिलेगी? क्या शरद पवार का राजनीतिक अनुभव फिर से निर्णायक होगा? क्या प्रफुल्ल पटेल जैसे वरिष्ठ नेताओं को संगठन में पहले जैसा महत्व मिलेगा?
और अगर विलय नहीं होता तो क्या दोनों गुट अलग-अलग रहकर अपनी राजनीतिक जमीन बचा पाएंगे?
यही वह उलझन है, जिसका समाधान सिर्फ भावनात्मक रिश्तों से नहीं निकलने वाला। इसके लिए राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं, संगठनात्मक हितों और सत्ता की संभावनाओं के बीच संतुलन बनाना होगा।
मोदी का फोन और सुप्रिया सुले का जिक्र, क्या है राजनीतिक संकेत?
इस पूरी राजनीतिक कहानी में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का शरद पवार को किया गया फोन भी चर्चा का विषय बना हुआ है।
शरद पवार की तबीयत खराब होने के दौरान प्रधानमंत्री ने फोन करके उनका हालचाल जाना था। उन्होंने पवार से अपनी सेहत का ध्यान रखने को कहा। बातचीत के दौरान सुप्रिया सुले का जिक्र करते हुए प्रधानमंत्री ने कथित तौर पर कहा कि देश की राजनीति वह और सुप्रिया सुले संभाल लेंगे।
इस बातचीत को सामान्य राजनीतिक शिष्टाचार के रूप में भी देखा जा सकता है, लेकिन महाराष्ट्र की मौजूदा परिस्थितियों में इसके राजनीतिक अर्थ भी निकाले जा रहे हैं।
क्या बीजेपी और शरद पवार के बीच संवाद की कोई नई खिड़की खुल रही है? क्या भविष्य में एनसीपी-शरदचंद्र पवार की राजनीतिक दिशा बदल सकती है? क्या सुप्रिया सुले की भूमिका को लेकर भी कोई बड़ा राजनीतिक संदेश दिया गया?
फिलहाल इन सवालों पर अटकलें ही हैं। प्रधानमंत्री की बातचीत को किसी संभावित राजनीतिक समझौते का प्रमाण मानना जल्दबाजी होगी।
लेकिन महाराष्ट्र की राजनीति में जब एक तरफ प्रधानमंत्री शरद पवार से संपर्क करते हैं और दूसरी तरफ प्रफुल्ल पटेल अस्पताल पहुंचकर दिवाली के बाद बैठक की बात करते हैं, तब राजनीतिक विश्लेषण होना स्वाभाविक है।
बीजेपी की शर्त और एनसीपी के सामने सबसे बड़ी दुविधा
इस घटनाक्रम का एक और महत्वपूर्ण पहलू एनडीए के साथ संभावित राजनीतिक संबंधों से जुड़ा है।
राजनीतिक चर्चाओं के मुताबिक, बीजेपी की ओर से दोनों एनसीपी के एक साथ आने की स्थिति में एनडीए के साथ जुड़ने की शर्त रखे जाने की बात कही जा रही है।
अगर यह चर्चा सही है तो दोनों गुटों के सामने केवल संगठन को एक करने का सवाल नहीं होगा, बल्कि अपनी भविष्य की राजनीतिक विचारधारा और गठबंधन की दिशा तय करने की चुनौती भी होगी।
शरद पवार की राजनीति की एक खासियत रही है कि उन्होंने परिस्थितियों के हिसाब से राजनीतिक रास्ते बनाए हैं। कभी सत्ता पक्ष के साथ तो कभी विपक्ष के साथ, उन्होंने अपने लिए राजनीतिक गुंजाइश हमेशा बनाए रखी है।
ऐसे में क्या वह अपनी पार्टी को एनडीए के करीब ले जाएंगे? क्या विपक्षी राजनीति में अपनी भूमिका बनाए रखना पसंद करेंगे? या फिर दोनों संभावनाओं के बीच कोई तीसरा रास्ता निकालेंगे?
यह फैसला उनके लिए आसान नहीं होगा।
क्योंकि एनसीपी का विलय अगर एनडीए की शर्तों के साथ होता है तो पार्टी के भीतर विचारों और महत्वाकांक्षाओं का टकराव भी सामने आ सकता है। वहीं, अगर विलय के बाद पार्टी विपक्षी राजनीति का हिस्सा बनी रहती है तो बीजेपी के साथ भविष्य के समीकरणों पर सवाल खड़े हो सकते हैं।
असली खेल दिवाली के बाद शुरू होगा?
फिलहाल महाराष्ट्र की राजनीति में तीन घटनाक्रम एक साथ चर्चा में हैं। पहला, शरद पवार और प्रफुल्ल पटेल की अस्पताल में हुई मुलाकात। दूसरा, अजित पवार के बाद एनसीपी के भीतर नेतृत्व और संगठन को लेकर उभरती चर्चाएं। तीसरा, दोनों एनसीपी के विलय और एनडीए के साथ संभावित राजनीतिक समीकरण।
इन तीनों को अलग-अलग देखने के बजाय एक साथ रखकर समझने की जरूरत है।
क्या प्रफुल्ल पटेल शरद पवार के साथ मिलकर दोनों गुटों को एक करने की जमीन तैयार कर रहे हैं? क्या पार्टी के भीतर नेतृत्व को लेकर असंतोष इस प्रक्रिया को गति दे रहा है? क्या बीजेपी भी महाराष्ट्र में एक मजबूत और एकजुट एनसीपी को अपने राजनीतिक समीकरणों में शामिल करना चाहती है?
या फिर यह सब महज राजनीतिक संभावनाओं के बीच चल रही मुलाकातों और चर्चाओं का सिलसिला है?
इन सवालों का जवाब दिवाली के बाद होने वाली बैठक से कुछ हद तक मिल सकता है।
फिलहाल इतना तय है कि अस्पताल के उस कमरे में हुई मुलाकात ने महाराष्ट्र की राजनीति में नई बहस छेड़ दी है। शरद पवार के अगले कदम पर सबकी निगाहें हैं और प्रफुल्ल पटेल की भूमिका भी पहले से ज्यादा महत्वपूर्ण हो गई है।
महाराष्ट्र की राजनीति में पवार की ताकत को कम करके आंकना कभी आसान नहीं रहा। अब देखना यह है कि शरद पवार पुराने राजनीतिक परिवार को फिर एक मंच पर लाने की कोशिश करते हैं या बदले हुए हालात में अपनी अलग राजनीतिक बिसात बिछाते हैं।
क्योंकि महाराष्ट्र की राजनीति में असली सवाल यह नहीं है कि कौन किससे मिला, बल्कि यह है कि मुलाकात के बाद किसकी कुर्सी मजबूत होगी, किसका राजनीतिक कद बढ़ेगा और किसकी सत्ता की उम्मीदों पर पानी फिरेगा।
दिवाली के बाद बैठक होगी, बातचीत होगी और शायद कुछ नए संकेत भी मिलेंगे। लेकिन महाराष्ट्र की सियासत में इस बार पटाखे बाहर कम और राजनीतिक गलियारों के भीतर ज्यादा फूटने की संभावना दिखाई दे रही है।















