“स्कूलों को बम से उड़ाने की धमकी से लेकर मुंबई के मेयर कार्यालय तक निशाने पर होने का दावा; यूपी ATS की जांच में सामने आया कथित नेटवर्क, अब सवाल—ईमेल के पीछे कौन, मकसद क्या और पैसे का अंतिम ठिकाना कहां?”
कानपुर/लखनऊ: डिजिटल दुनिया में पहचान बनाना अब मुश्किल नहीं, लेकिन सवाल तब खड़ा होता है, जब पहचान ही फर्जी हो, ईमेल लाखों में हों, भुगतान क्रिप्टोकरेंसी में आए और धमकी भरे संदेश स्कूलों से लेकर सरकारी कार्यालयों तक पहुंचने लगें। उत्तर प्रदेश एटीएस की कार्रवाई ने इसी डिजिटल दुनिया के एक ऐसे कथित नेटवर्क पर रोशनी डाली है, जिसकी परतें खुलने के साथ कई गंभीर सवाल भी सामने आ रहे हैं।
एटीएस के मुताबिक, कानपुर नगर से 24 वर्षीय अंकित शंखवार को 28 अक्टूबर को गिरफ्तार किया गया। जांच एजेंसी का दावा है कि उसके लैपटॉप से करीब पांच लाख ईमेल आईडी से संबंधित डेटा मिला है। आरोप है कि वह फर्जी पहचान के आधार पर ईमेल खाते तैयार करता था और उन्हें देश-विदेश में मौजूद लोगों को बेचता था। बदले में क्रिप्टोकरेंसी के जरिए भुगतान प्राप्त किए जाने की बात भी सामने आई है।
मामले की गंभीरता सिर्फ पांच लाख ईमेल आईडी तक सीमित नहीं है। जांच का एक सिरा नोएडा, दिल्ली और गुरुग्राम के स्कूलों को भेजे गए कथित बम धमकी वाले ईमेल से जुड़ता है, तो दूसरा मुंबई के मेयर कार्यालय को भेजे गए धमकी भरे संदेश तक पहुंचता है। तीसरा सिरा विदेशी संपर्कों और क्रिप्टो भुगतान के कथित लेनदेन से जुड़ा बताया जा रहा है।
यानी कहानी सिर्फ फर्जी ईमेल बनाने की नहीं, बल्कि इस बात की भी है कि डिजिटल पहचान का इस्तेमाल किस तरह डर फैलाने, धमकियां भेजने या दूसरे संदिग्ध कामों में किया जा सकता है। हालांकि, इन सभी गतिविधियों में आरोपी की भूमिका और कथित विदेशी संपर्कों के वास्तविक उद्देश्य का अंतिम निष्कर्ष जांच और न्यायिक प्रक्रिया के बाद ही निकलेगा।
पांच लाख ईमेल आईडी: डिजिटल दुनिया में पहचान का कथित कारखाना
एटीएस के अनुसार, आरोपी के लैपटॉप में कई एक्सेल फाइलें मिली हैं, जिनमें लगभग पांच लाख ईमेल आईडी का डेटा होने की बात कही गई है। जांच एजेंसी का दावा है कि इन आईडी को फर्जी पहचान के साथ इस्तेमाल करने के उद्देश्य से तैयार किया जाता था।
यहां एक अहम सवाल खड़ा होता है—ईमेल आईडी की इतनी बड़ी संख्या आखिर किस काम के लिए जुटाई जा रही थी? सामान्य इंटरनेट उपयोगकर्ता के लिए एक या दो ईमेल खाते पर्याप्त होते हैं। लेकिन जब खातों की संख्या लाखों में पहुंचने का दावा हो, तो जांच एजेंसियों के लिए यह पता लगाना जरूरी हो जाता है कि उनका इस्तेमाल कहां, किसने और किस उद्देश्य से किया।
एटीएस के मुताबिक, आरोपी वर्ष 2021 से इस काम में शामिल होने की बात पूछताछ में बता चुका है। यदि जांच में इन आरोपों की पुष्टि होती है, तो यह मामला केवल व्यक्तिगत स्तर पर ईमेल खाते बनाने का नहीं, बल्कि बड़े पैमाने पर डिजिटल पहचान उपलब्ध कराने के कथित कारोबार का हो सकता है।
फिर भी, एक बात स्पष्ट रहनी चाहिए: लैपटॉप में बड़ी संख्या में ईमेल आईडी का डेटा मिलना और उन सभी आईडी का आपराधिक गतिविधियों में इस्तेमाल होना दो अलग-अलग बातें हैं। हर खाते की भूमिका, उसके उपयोगकर्ता और उससे जुड़े लेनदेन की अलग-अलग जांच आवश्यक होगी।
स्कूलों को धमकी वाले ईमेल से कैसे जुड़ा कानपुर का नाम?
इस मामले की जांच तब आगे बढ़ी, जब यूपी एटीएस को सूचना मिली कि ‘simenbriones9265@gmail.com’ नाम की ईमेल आईडी से गौतम बुद्ध नगर, दिल्ली और गुरुग्राम के विभिन्न स्कूलों को धमकी भरे संदेश भेजे जा रहे हैं।
इन संदेशों में स्कूलों के अलावा दिल्ली-एनसीआर में पंजाबी गायक दिलजीत दोसांझ के प्रस्तावित शो और एक प्रसिद्ध बॉलीवुड अभिनेता के घर पर बम धमाके की धमकी का भी जिक्र होने की बात सामने आई।
ऐसे संदेशों का असर केवल किसी एक संस्थान तक सीमित नहीं रहता। स्कूलों में बच्चों की सुरक्षा, अभिभावकों की चिंता, पुलिस की तैनाती और प्रशासनिक संसाधनों पर इसका सीधा प्रभाव पड़ सकता है। धमकी वास्तविक हो या बाद में फर्जी साबित हो, उसकी जांच करना और सुरक्षा सुनिश्चित करना एजेंसियों की जिम्मेदारी होती है।
एटीएस के मुताबिक, संबंधित ईमेल आईडी का तकनीकी विश्लेषण किया गया। जांच में उसके एक्सेस का संबंध कानपुर नगर से सामने आने के बाद एजेंसी ने अंकित शंखवार की पहचान की और उसे गिरफ्तार किया।
लेकिन डिजिटल जांच में किसी खाते का एक्सेस किसी स्थान से मिलना, अपने आप में हर संदेश के लेखक या भेजने वाले की अंतिम पहचान साबित नहीं करता। इसके लिए डिवाइस, लॉगिन रिकॉर्ड, नेटवर्क संबंधी डेटा, संदेशों के समय और अन्य डिजिटल साक्ष्यों का आपस में मेल खाना महत्वपूर्ण होता है।
मुंबई के मेयर कार्यालय तक पहुंचा जांच का दूसरा सिरा
एटीएस ने जांच के दौरान एक दूसरी ईमेल आईडी—‘smithjohnson6889@gmail.com’—का भी उल्लेख किया है। एजेंसी के अनुसार, इस आईडी का संबंध 23 अक्टूबर को मुंबई में मेयर कार्यालय को बम विस्फोट की धमकी भेजे जाने के मामले से सामने आया है।
वहीं, ‘simenbriones9265@gmail.com’ से 12 अक्टूबर को नोएडा के विभिन्न स्कूलों और अन्य स्थानों पर धमकी भरे ईमेल भेजे जाने की बात कही गई है।
दोनों ईमेल आईडी का एक ही जांच में सामने आना एजेंसियों के लिए महत्वपूर्ण है। अब यह पता लगाना जरूरी होगा कि क्या इनके पीछे एक ही व्यक्ति की भूमिका थी, क्या किसी अन्य व्यक्ति ने इन खातों का इस्तेमाल किया या फिर खातों को उपलब्ध कराने और धमकी भेजने के बीच कोई अलग नेटवर्क काम कर रहा था।
यही इस मामले का अहम पहलू है। ईमेल खाता तैयार करने वाला व्यक्ति, उसे खरीदने वाला और उससे धमकी भेजने वाला हमेशा एक ही व्यक्ति हों, यह जरूरी नहीं। इसलिए जांच का दायरा केवल गिरफ्तारी तक सीमित नहीं रह सकता। डिजिटल साक्ष्यों की कड़ियां जोड़ना और वास्तविक जिम्मेदार लोगों की पहचान करना भी उतना ही महत्वपूर्ण है।
फेसबुक के Buy & Sell समूहों से विदेशी संपर्कों तक
एटीएस के दावे के मुताबिक, अंकित फेसबुक पर मौजूद ‘Buy & Sell’ समूहों के माध्यम से फर्जी ईमेल आईडी खरीदने-बेचने वाले नेटवर्क से जुड़ा था। धीरे-धीरे उसका संपर्क पाकिस्तान, बांग्लादेश, तुर्की और मिस्र सहित दूसरे देशों के लोगों और समूहों से होने की बात सामने आई है।
जांच एजेंसी का आरोप है कि ईमेल आईडी के साथ पासवर्ड, रिकवरी ईमेल और टू-फैक्टर ऑथेंटिकेशन से संबंधित जानकारी भी एक्सेल शीट में दर्ज करके भेजी जाती थी।
इस दावे की गंभीरता समझने के लिए डिजिटल खातों की सुरक्षा व्यवस्था को समझना जरूरी है। ईमेल खाते का पासवर्ड और रिकवरी से जुड़ी जानकारी किसी दूसरे व्यक्ति के हाथ लग जाए, तो खाते पर अनधिकृत नियंत्रण का खतरा बढ़ सकता है। टू-फैक्टर ऑथेंटिकेशन से संबंधित जानकारी का गलत इस्तेमाल भी सुरक्षा को कमजोर कर सकता है। हालांकि, इन जानकारियों की मौजूदगी से यह अपने आप साबित नहीं होता कि हर खाते की सुरक्षा व्यवस्था को वास्तव में दरकिनार किया गया था।
एटीएस के मुताबिक, आरोपी ने बांग्लादेशी नागरिक अलामीन इस्लाम उर्फ अलामीन के साथ फेसबुक और वॉट्सऐप के जरिए संपर्क होने की बात बताई। एजेंसी का दावा है कि ईमेल आईडी उपलब्ध कराने के बदले आरोपी को 6,000 USDT का भुगतान किया गया था। इस कथित भुगतान से जुड़े साक्ष्य मोबाइल फोन में मिलने की बात भी कही गई है।
यहां क्रिप्टोकरेंसी जांच का एक महत्वपूर्ण पहलू बन जाती है। डिजिटल मुद्रा के जरिए हुए लेनदेन की जांच में वॉलेट से जुड़े रिकॉर्ड, ट्रांजैक्शन का विवरण और संबंधित व्यक्तियों की पहचान अहम हो सकती है। लेकिन केवल किसी विदेशी व्यक्ति से संपर्क या क्रिप्टो भुगतान का दावा अपने आप में भारत विरोधी गतिविधियों में संलिप्तता का अंतिम प्रमाण नहीं है। इसके लिए धन के स्रोत, उपयोग और संबंधित गतिविधियों से उसके संबंध की पुष्टि जरूरी है।
क्रिप्टोकरेंसी का सुराग और जांच के बड़े सवाल
एटीएस के अनुसार, आरोपी के मोबाइल फोन और लैपटॉप से कई महत्वपूर्ण डिजिटल जानकारियां मिली हैं। इनमें एक्सेल फाइलें, क्रिप्टो वॉलेट से संबंधित विवरण और विभिन्न देशों के नंबरों से संपर्क के रिकॉर्ड शामिल बताए गए हैं।
एजेंसी ने पाकिस्तान, बांग्लादेश, मिस्र, तुर्की और अमेरिका समेत कई देशों के नंबरों से संपर्क तथा बड़ी मात्रा में USDT लेनदेन के संकेत मिलने का दावा किया है।
अब जांच के सामने कुछ अहम सवाल हैं। क्या ईमेल आईडी बेचने का कथित कारोबार केवल खातों की आपूर्ति तक सीमित था, या इनका इस्तेमाल किसी संगठित गतिविधि में भी हुआ? क्या धमकी भरे ईमेल भेजने वालों और खातों के कथित खरीदारों के बीच सीधा संबंध है? और क्या क्रिप्टोकरेंसी से जुड़े लेनदेन के जरिए पूरे नेटवर्क की दूसरी कड़ियों तक पहुंचा जा सकता है?
इन सवालों के जवाब जांच की दिशा तय कर सकते हैं। हालांकि, फिलहाल इन्हें जांच के विषय के रूप में ही देखा जाना चाहिए, न कि स्थापित तथ्यों के रूप में।
राजनीतिक पर्दे के पीछे की कहानी या डिजिटल अपराध का नेटवर्क?
इस मामले में विदेशी संपर्कों और भारत विरोधी तत्वों को ईमेल आईडी बेचे जाने के आरोप ने स्वाभाविक रूप से सुरक्षा संबंधी चिंताएं बढ़ाई हैं। लेकिन उपलब्ध जानकारी में किसी राजनीतिक दल, नेता या राजनीतिक संगठन की संलिप्तता का प्रमाण सामने नहीं आया है। इसलिए इसे किसी राजनीतिक साजिश का नाम देना अभी जल्दबाजी होगी।
राजनीतिक पर्दे के पीछे की असली कहानी का पता लगाने के लिए भी ठोस साक्ष्य जरूरी होते हैं। यदि किसी संगठित नेटवर्क, वित्तीय मदद या किसी अन्य व्यक्ति की भूमिका सामने आती है, तो जांच एजेंसियों को उसकी पुष्टि डिजिटल रिकॉर्ड और अन्य प्रमाणों के आधार पर करनी होगी।
इस मामले का व्यंग्यात्मक पहलू यही है कि इंटरनेट पर पहचान बनाना आसान हो सकता है, लेकिन फर्जी पहचान के पीछे छिपकर किए गए कामों के डिजिटल निशान हमेशा मिट जाएं, यह जरूरी नहीं। एक ईमेल आईडी भले ही नकली नाम से बनाई गई हो, लेकिन लॉगिन रिकॉर्ड, डिवाइस, भुगतान और संपर्कों की कड़ियां जांच को आगे बढ़ा सकती हैं।
अब आगे क्या?
एटीएस के मुताबिक, आरोपी के पास से एक मोबाइल फोन और एक लैपटॉप बरामद किया गया है। मामले में लखनऊ स्थित यूपी एटीएस थाने में संबंधित धाराओं के तहत मुकदमा दर्ज किया गया है।
आगे की जांच में कथित ईमेल खातों के वास्तविक उपयोगकर्ताओं की पहचान, धमकी भरे संदेशों से उनका संबंध, विदेशी संपर्कों की भूमिका और क्रिप्टोकरेंसी के लेनदेन की पुष्टि महत्वपूर्ण होगी। यह भी स्पष्ट होना बाकी है कि बरामद डेटा में मौजूद सभी ईमेल आईडी सक्रिय थीं या नहीं और उनमें से कितनों का इस्तेमाल किसी गैरकानूनी गतिविधि में हुआ।
फिलहाल, इस मामले में गिरफ्तारी और एटीएस के दावे जांच की एक महत्वपूर्ण शुरुआत हैं, अंतिम निष्कर्ष नहीं।
पांच लाख ईमेल आईडी का आंकड़ा चौंकाने वाला जरूर है, लेकिन इस कहानी का सबसे बड़ा सवाल संख्या नहीं, इस्तेमाल है। आखिर इन डिजिटल पहचानों का खरीदार कौन था, धमकी भरे संदेशों के पीछे किसकी भूमिका थी और क्रिप्टोकरेंसी का पैसा किन रास्तों से आया? इन सवालों के जवाब ही तय करेंगे कि यह मामला फर्जी ईमेल खातों के कथित कारोबार तक सीमित है या इसके पीछे कोई बड़ा नेटवर्क भी सक्रिय था।















