नई दिल्ली। अमेरिका में रोजगार आधारित इमिग्रेशन प्रोग्राम को लेकर बड़ा घटनाक्रम सामने आया है। अमेरिकी श्रम विभाग ने माइक्रोसॉफ्ट, एडोब, इंफोसिस, टीसीएस और विप्रो समेत आठ बड़ी टेक कंपनियों को PERM ग्रीन कार्ड कार्यक्रम से निलंबित कर दिया है। इस फैसले के बाद भारतीय आईटी पेशेवरों और अमेरिका में स्थायी निवास की उम्मीद कर रहे कर्मचारियों के बीच चिंता बढ़ सकती है। हालांकि, भारत के विदेश मंत्रालय ने स्पष्ट किया है कि इस कार्रवाई का मौजूदा H-1B वीजा धारकों और उनके आश्रितों की वीजा स्थिति पर सीधा असर नहीं पड़ेगा।
भारत ने अमेरिका के फैसले पर क्या कहा?
विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने कहा कि PERM प्रक्रिया और H-1B वीजा अलग-अलग इमिग्रेशन व्यवस्थाएं हैं। इसलिए PERM आवेदनों पर रोक को H-1B वीजा पर प्रतिबंध के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।
भारत ने यह भी रेखांकित किया कि कुशल पेशेवरों का दोनों देशों के बीच आवागमन भारत और अमेरिका की अर्थव्यवस्थाओं के लिए महत्वपूर्ण है। भारतीय प्रतिभाएं अमेरिकी कंपनियों को तकनीकी नवाचार, रिसर्च, उत्पादकता और रोजगार सृजन में मदद करती हैं।
किन 8 कंपनियों पर हुई कार्रवाई?
अमेरिकी श्रम विभाग की घोषणा के अनुसार, PERM कार्यक्रम से निलंबित की गई कंपनियों में शामिल हैं:
- माइक्रोसॉफ्ट (Microsoft)
- एडोब (Adobe)
- कॉग्निजेंट (Cognizant)
- इंफोसिस (Infosys)
- टाटा कंसल्टेंसी सर्विसेज (TCS)
- विप्रो (Wipro)
- एचसीएल टेक्नोलॉजीज (HCL Technologies)
- कैपजेमिनी (Capgemini)
रिपोर्ट के मुताबिक, इन कंपनियों से नए आवेदन स्वीकार नहीं किए जाएंगे और उनके लंबित आवेदनों पर भी कार्रवाई रोक दी गई है। इस कदम से प्रभावित कंपनियों के उन पात्र कर्मचारियों की स्थायी निवास प्रक्रिया में देरी हो सकती है, जो PERM के जरिए ग्रीन कार्ड प्राप्त करने की दिशा में आगे बढ़ रहे हैं।
PERM क्या है और ग्रीन कार्ड से इसका क्या संबंध है?
PERM यानी Program Electronic Review Management अमेरिकी श्रम विभाग की लेबर सर्टिफिकेशन प्रक्रिया है। इसके तहत नियोक्ता को यह साबित करना होता है कि संबंधित पद के लिए पर्याप्त योग्य और उपलब्ध अमेरिकी कर्मचारी नहीं हैं तथा विदेशी कर्मचारी को नियुक्त करने से समान पदों पर काम करने वाले अमेरिकी कर्मचारियों के वेतन और कामकाजी परिस्थितियों पर प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ेगा।
यह प्रक्रिया रोजगार आधारित ग्रीन कार्ड के लिए एक महत्वपूर्ण चरण है। PERM पर रोक लगने से संबंधित कंपनियों के कर्मचारियों की ग्रीन कार्ड प्रक्रिया प्रभावित हो सकती है, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि सभी कर्मचारियों का वीजा स्वतः रद्द हो जाएगा।
अमेरिका ने कंपनियों पर क्या आरोप लगाए?
अमेरिकी अधिकारियों ने आरोप लगाया है कि कुछ कंपनियों ने रोजगार आधारित इमिग्रेशन कार्यक्रमों का दुरुपयोग किया और अमेरिकी कर्मचारियों की जगह विदेशी कामगारों को प्राथमिकता दी। अमेरिकी श्रम सचिव कीथ सोंडरलिंग के हवाले से रिपोर्ट में दावा किया गया है कि वर्ष 2009 से इन कंपनियों ने लगभग 30 लाख विदेशी कामगारों की मांग की, उन्हें 2.30 लाख से अधिक H-1B वीजा स्वीकृतियां और एक लाख से अधिक स्थायी श्रम प्रमाणपत्र मिले।
अधिकारियों ने इन आंकड़ों के आधार पर अमेरिकी कामगारों के रोजगार अवसरों को लेकर सवाल उठाए हैं। हालांकि, कंपनियों के खिलाफ लगाए गए आरोपों को स्थापित तथ्य या अंतिम न्यायिक निष्कर्ष नहीं माना जाना चाहिए।
भारतीय आईटी कर्मचारियों पर क्या पड़ेगा असर?
इस फैसले का सबसे महत्वपूर्ण असर उन कर्मचारियों पर पड़ सकता है जिनकी ग्रीन कार्ड प्रक्रिया संबंधित कंपनियों के माध्यम से चल रही है। उनके आवेदन लंबित रह सकते हैं या स्थायी निवास हासिल करने में देरी हो सकती है।
वहीं, जिन कर्मचारियों के पास वैध H-1B वीजा है, उनकी मौजूदा वीजा स्थिति इस कार्रवाई से अपने आप समाप्त नहीं होती। प्रत्येक कर्मचारी की स्थिति उसके वीजा, आवेदन और संबंधित अमेरिकी नियमों पर निर्भर करेगी।
आगे क्या होगा?
अब नजर इस बात पर रहेगी कि अमेरिकी श्रम विभाग की कार्रवाई कितने समय तक जारी रहती है और प्रभावित कंपनियों तथा कर्मचारियों के आवेदनों पर आगे क्या निर्णय लिया जाता है। फिलहाल भारतीय विदेश मंत्रालय ने H-1B वीजा और PERM प्रक्रिया के बीच अंतर स्पष्ट करते हुए यह संदेश दिया है कि ग्रीन कार्ड कार्यक्रम पर कार्रवाई को सभी भारतीय पेशेवरों के लिए वीजा संकट के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।
अमेरिका की इस कार्रवाई से आठ कंपनियों के जरिए ग्रीन कार्ड पाने की प्रक्रिया में जुटे कर्मचारियों की मुश्किलें बढ़ सकती हैं, लेकिन मौजूदा H-1B वीजा धारकों का वीजा स्वतः रद्द होने का कोई संकेत इस घोषणा से नहीं मिलता।















