“रानी सराय के 50-60 साल पुराने पेड़ों पर टिकी तोतों की दुनिया, हाई कोर्ट में उठा बड़ा सवाल—विकास जरूरी है, लेकिन क्या उसकी कीमत विरासत और परिंदों का घर होगा?”
इंदौर। विकास की रफ्तार जब शहर की सड़कों पर दौड़ती है, तो उसके पहिए सिर्फ कंक्रीट और लोहे पर नहीं घूमते। कई बार उसी रफ्तार के नीचे शहर की पुरानी यादें, पेड़ों की छांव और उन पर बसे पक्षियों के आशियाने भी आ जाते हैं। इंदौर के रानी सराय क्षेत्र में प्रस्तावित मेट्रो स्टेशन को लेकर हाई कोर्ट में चल रही सुनवाई इसी टकराव की तस्वीर सामने ला रही है।
एक तरफ शहर को आधुनिक, तेज और बेहतर सार्वजनिक परिवहन देने वाली मेट्रो परियोजना है, तो दूसरी तरफ रानी सराय के दशकों पुराने पेड़ हैं, जिन पर लंबे समय से तोतों का बसेरा बताया जाता है। याचिकाकर्ता पक्ष का कहना है कि इन पेड़ों को बचाने के लिए प्रस्तावित मेट्रो स्टेशन का स्थान बदला जाना चाहिए। बुधवार को मामले की सुनवाई के दौरान मेट्रो कंपनी ने अदालत के सामने अपना जवाब रखा और वैकल्पिक स्थानों की व्यवहारिक चुनौतियों से कोर्ट को अवगत कराया।
मामला अब सिर्फ एक स्टेशन की जगह का नहीं रह गया है। सवाल यह भी है कि क्या विकास और पर्यावरण के बीच कोई ऐसा रास्ता निकाला जा सकता है, जिसमें मेट्रो भी बने और रानी सराय की वह प्राकृतिक विरासत भी बची रहे, जिसे वर्षों ने तैयार किया है?
मेट्रो की जगह बदली तो 400 करोड़ का अतिरिक्त बोझ!
मेट्रो कंपनी ने अदालत को बताया कि प्रस्तावित स्टेशन की जगह बदलने की संभावनाओं को लेकर रीगल टॉकीज, प्रीतमलाल दुआ सभागृह और गांधी हॉल के आसपास के विकल्पों का जायजा लिया गया है। लेकिन कंपनी के मुताबिक वैकल्पिक स्थान चुनना इतना आसान नहीं है।
कंपनी का कहना है कि स्टेशन का स्थान बदलने पर परियोजना की लागत में भारी बढ़ोतरी हो सकती है। अनुमान के मुताबिक अतिरिक्त खर्च करीब 400 करोड़ रुपये तक पहुंच सकता है। इसके अलावा लगभग 5 हजार वर्ग फीट जमीन की जरूरत पड़ सकती है।
सबसे बड़ी चुनौती जमीन से जुड़ी प्रक्रिया को लेकर बताई गई है। कंपनी के अनुसार जमीन अधिग्रहण में करीब दो साल लग सकते हैं। इसका सीधा असर मेट्रो परियोजना की समयसीमा पर पड़ सकता है और पूरी परियोजना तीन से चार साल तक पीछे जाने की आशंका जताई गई है।
यानी अदालत के सामने एक कठिन सवाल खड़ा है—एक तरफ करोड़ों रुपये की अतिरिक्त लागत और वर्षों की देरी, दूसरी तरफ पुराने पेड़ और पक्षियों का प्राकृतिक बसेरा।
रीगल टॉकीज विकल्प: स्टेशन बदला तो कई संपत्तियां आएंगी चपेट में
मेट्रो कंपनी ने रीगल टॉकीज के आसपास के विकल्प पर भी अपनी आपत्तियां रखीं। कंपनी के मुताबिक यहां स्टेशन का निर्माण करने पर आसपास मौजूद कई महत्वपूर्ण संपत्तियों के प्रभावित होने की संभावना है।
होटल, सरकारी आवास और जज बंगलों पर संभावित असर का उल्लेख कंपनी ने अपने जवाब में किया है। ऐसे में सवाल यह है कि अगर एक स्थान से पेड़ों को बचाने के लिए स्टेशन हटाया जाता है, तो क्या नया स्थान दूसरी संपत्तियों और सार्वजनिक ढांचे के लिए नई समस्या पैदा करेगा?
यही वजह है कि मामला महज नक्शे पर स्टेशन की जगह बदल देने जितना सरल दिखाई नहीं देता।
प्रीतमलाल दुआ सभागृह: यहां भी विकल्प नहीं आसान
दूसरा विकल्प प्रीतमलाल दुआ सभागृह के आसपास देखा गया। लेकिन मेट्रो कंपनी ने इस स्थान को लेकर भी कई चुनौतियां गिनाईं।
कंपनी के मुताबिक यहां स्टेशन निर्माण की स्थिति में प्रीतमलाल दुआ सभागृह, महावीर स्तंभ, सिंगापुर मार्केट और अहिल्या पुस्तकालय प्रभावित हो सकते हैं। निर्माण गतिविधियों का असर हाई कोर्ट के बगीचे पर भी पड़ने की संभावना बताई गई है।
इतना ही नहीं, निर्माण के दौरान गेट नंबर एक और दो को बंद रखने की जरूरत पड़ सकती है।
यानी रानी सराय के पेड़ों को बचाने के लिए यदि स्टेशन को दूसरी जगह ले जाया जाता है, तो वहां भी विरासत, सार्वजनिक उपयोग और प्रशासनिक ढांचे से जुड़े नए सवाल खड़े हो सकते हैं।
गांधी हॉल भी नहीं दे रहा आसान रास्ता
गांधी हॉल को लेकर मेट्रो कंपनी ने कहा कि मौजूदा रूट और राजवाड़ा स्टेशन के निर्माण की स्थिति को देखते हुए स्टेशन को यहां लाना संभव नहीं है।
गांधी हॉल को ऐतिहासिक इमारत बताते हुए कंपनी ने यह भी कहा कि इसके प्रभावित होने की स्थिति में विरोध की संभावना बन सकती है।
यानी तीन वैकल्पिक स्थानों की पड़ताल के बाद तस्वीर यह बनती है कि हर विकल्प अपने साथ नई चुनौती लेकर आता है।
लेकिन इसी बीच असली सवाल फिर रानी सराय के उन्हीं पुराने पेड़ों पर लौट आता है।
50-60 साल के पेड़ सिर्फ पेड़ नहीं, शहर की जीवित विरासत हैं
याचिकाकर्ता पक्ष ने अदालत के सामने रानी सराय के पुराने पेड़ों और उन पर रहने वाले तोतों के बसेरे का मुद्दा प्रमुखता से उठाया।
अधिवक्ता अभिनव धनौतकर ने अदालत के सामने करीब 50 से 60 साल पुराने पेड़ों का उल्लेख किया। उनका तर्क है कि नए पौधे लगाए जाने से पुराने पेड़ों का विकल्प तुरंत तैयार नहीं हो सकता।
पेड़ सिर्फ अपनी ऊंचाई या हरियाली से महत्वपूर्ण नहीं होते। वर्षों में उनकी शाखाएं, तने और प्राकृतिक संरचनाएं पक्षियों के लिए ऐसे आश्रय तैयार करती हैं, जिन्हें कुछ वर्षों में दोबारा बनाना संभव नहीं होता।
यही वह भावनात्मक बिंदु है जिसने इस पूरे विवाद को महज निर्माण बनाम पर्यावरण के विवाद से आगे पहुंचा दिया है।
तोतों का बसेरा—शहर के बीच बची एक छोटी-सी दुनिया
रानी सराय क्षेत्र में भारी ट्रैफिक और शहरी गतिविधियों के बावजूद तोतों के लंबे समय से बसेरा बनाने की बात याचिकाकर्ता पक्ष ने कही है।
सोचिए—जहां इंसान लगातार सड़क, इमारत और यातायात की जगह तलाश रहा है, वहीं उसी शहर के बीच कुछ पेड़ ऐसे भी हैं जिन्हें पक्षियों ने अपना घर मान लिया है।
उन पेड़ों की शाखाओं पर बसेरा बनाने वाले तोतों के लिए यह जगह कोई ‘प्रोजेक्ट साइट’ नहीं, बल्कि उनका घर है।
इंसान के पास विकल्प हैं—वह दूसरी जगह घर बना सकता है, कार्यालय बदल सकता है, सड़क का रास्ता बदल सकता है। लेकिन एक पक्षी के लिए उसका बसेरा उजड़ना उसकी पूरी दुनिया के उजड़ने जैसा हो सकता है।
यही संवेदनशीलता इस मामले को खास बनाती है।
जब हाई कोर्ट के न्यायाधीश खुद पहुंचे रानी सराय
इस मामले की गंभीरता का अंदाजा इस बात से भी लगाया जा सकता है कि हाल ही में हाई कोर्ट के दो न्यायाधीश शाम के समय रानी सराय क्षेत्र में तोतों का बसेरा देखने पहुंचे थे।
वकील की ओर से उन्हें क्षेत्र के पुराने पेड़ भी दिखाए गए।
यह दृश्य अपने आप में महत्वपूर्ण है। अदालत में दस्तावेजों और दलीलों के बीच जिस पर्यावरणीय वास्तविकता पर बहस हो रही थी, उसे जमीन पर जाकर देखने की कोशिश की गई।
अब सवाल यह है कि अदालत आगे इस मामले में क्या दिशा तय करती है।
विकास बनाम विरासत—क्या बीच का रास्ता संभव है?
मेट्रो शहर की जरूरत है। बेहतर सार्वजनिक परिवहन से यातायात का दबाव कम हो सकता है, समय बच सकता है और शहर के विकास को गति मिल सकती है। इस जरूरत को नकारा नहीं जा सकता।
लेकिन दूसरी तरफ पर्यावरण और ऐतिहासिक विरासत की कीमत को भी सिर्फ रुपये में नहीं तौला जा सकता।
यदि किसी विकल्प पर 400 करोड़ रुपये अतिरिक्त खर्च होने की संभावना है, तो यह निश्चित रूप से एक बड़ा वित्तीय सवाल है। यदि परियोजना तीन-चार साल पीछे जाती है, तो यह भी गंभीर चिंता है।
लेकिन अगर दशकों पुराने पेड़ों को हटाने की नौबत आती है, तो सवाल यह होगा कि उनकी जगह क्या लगाया जाएगा? क्या नए पौधे उन पेड़ों की उम्र, संरचना और पारिस्थितिक भूमिका तुरंत निभा पाएंगे?
और सबसे महत्वपूर्ण—क्या किसी पुराने पेड़ को काटने के बाद वहां दोबारा वही प्राकृतिक दुनिया लौटाई जा सकती है?
अब फैसला सिर्फ स्टेशन की जगह का नहीं
रानी सराय की याचिका ने शहर के सामने एक बड़ा सवाल रख दिया है।
क्या विकास का मतलब केवल नई सड़कें, नई इमारतें और नई परिवहन व्यवस्था है? या विकास की असली कसौटी यह भी होनी चाहिए कि आधुनिक शहर बनाते समय हम अपनी पुरानी प्राकृतिक और ऐतिहासिक विरासत को कितना बचा पाए?
हाई कोर्ट में फिलहाल सुनवाई जारी है। मेट्रो कंपनी ने वैकल्पिक स्थानों की तकनीकी, वित्तीय और प्रशासनिक चुनौतियां सामने रख दी हैं। याचिकाकर्ता पक्ष पुराने पेड़ों और तोतों के बसेरे को बचाने की मांग कर रहा है।
अब निगाहें अदालत की अगली सुनवाई पर हैं।
क्योंकि रानी सराय में सवाल सिर्फ यह नहीं है कि मेट्रो स्टेशन कहां बनेगा।
सवाल यह भी है कि इंदौर का भविष्य बनाते समय उसके अतीत की छांव कितनी बचाई जाएगी।
और उन पेड़ों पर बैठे तोतों की आवाज शायद इसी सवाल को सबसे ज्यादा मार्मिक बना रही है—शहर आपका है, लेकिन क्या आसमान और पेड़ भी सिर्फ आपके हैं?















