“सुप्रीम कोर्ट में आज CEC ज्ञानेश कुमार और SIR से जुड़ी दो अहम याचिकाओं पर सुनवाई; क्या चुनाव आयोग का फैसला सामूहिक था या सत्ता-केंद्रित?”
नई दिल्ली।
देश की चुनावी व्यवस्था की विश्वसनीयता और निर्वाचन आयोग की संस्थागत कार्यप्रणाली से जुड़े बेहद गंभीर सवालों पर आज, 5 अक्टूबर, सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई होने जा रही है। एक तरफ मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के कामकाज को लेकर सवाल उठाने वाली याचिका अदालत के सामने है, तो दूसरी ओर स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) को ही गैर-कानूनी घोषित करने की मांग वाली याचिका पर भी सुनवाई होगी।
मामले की अहमियत इसलिए और बढ़ जाती है क्योंकि मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ उठाए गए सवाल केवल किसी एक फैसले तक सीमित नहीं हैं, बल्कि याचिका में निर्वाचन आयोग के भीतर सामूहिक निर्णय प्रक्रिया, संवैधानिक जिम्मेदारी और चुनाव आयोग के बहु-सदस्यीय स्वरूप को लेकर गंभीर दावे किए गए हैं।
इन याचिकाओं पर सुनवाई भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्य कांत तथा न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना की पीठ करेगी।
CEC पर सीधे सवाल, SIT जांच की मांग
पटना के राकेश कुमार सिंह की ओर से दायर याचिका में मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के साथ निर्वाचन आयुक्तों सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी के बीच कथित मतभेदों तथा कुछ मुद्दों पर दर्ज आपत्तियों का उल्लेख किया गया है।
याचिका का मूल सवाल बेहद गंभीर है—क्या संविधान ने चुनावों की निगरानी और नियंत्रण का अधिकार केवल मुख्य चुनाव आयुक्त को दिया है या यह अधिकार पूरे निर्वाचन आयोग का सामूहिक संवैधानिक दायित्व है?
याचिका में संविधान के अनुच्छेद 324(1) का हवाला देते हुए कहा गया है कि चुनावों की निगरानी, निर्देशन और नियंत्रण का संवैधानिक अधिकार केवल CEC की व्यक्तिगत संस्था के रूप में नहीं, बल्कि Election Commission को दिया गया है।
यानी सवाल सिर्फ यह नहीं कि कोई निर्णय सही था या गलत। बड़ा सवाल यह है कि निर्णय लेने की प्रक्रिया संवैधानिक और सामूहिक थी या नहीं?
‘पद पर बने रहने’ पर भी अदालत से हस्तक्षेप की मांग
याचिका में सुप्रीम कोर्ट से मांग की गई है कि मामले की अंतिम सुनवाई तक मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को अपने पद का कार्यभार संभालने से रोका जाए।
इसके साथ यह मांग भी की गई है कि इस अवधि में निर्वाचन आयोग का काम दोनों अन्य निर्वाचन आयुक्तों—सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी—की सहमति से संचालित किया जाए।
याचिका में आयोग की सदस्यता और संस्थागत संतुलन बनाए रखने के लिए रिक्त पद पर नियुक्ति ऐसी समिति की सलाह पर किए जाने की मांग भी की गई है, जिसमें भारत के मुख्य न्यायाधीश भी शामिल हों।
हालांकि ये सभी मांगें फिलहाल याचिकाकर्ताओं की दलीलें और प्रार्थनाएं हैं। इन पर अंतिम निर्णय सुप्रीम कोर्ट को करना है।
SIT जांच की मांग ने बढ़ाई राजनीतिक और संवैधानिक गर्मी
मामले का सबसे संवेदनशील पहलू है—मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य संबंधित व्यक्तियों के खिलाफ विशेष जांच दल (SIT) से जांच कराने की मांग।
याचिका में आरोप लगाया गया है कि CEC की कार्यप्रणाली सामूहिक निर्णय लेने से जुड़े कानूनी और संवैधानिक नियमों के अनुरूप नहीं रही। याचिकाकर्ता ने अदालत से इस पूरे मामले की स्वतंत्र जांच की मांग की है।
यही वह बिंदु है जिसने मामले को सामान्य प्रशासनिक विवाद से निकालकर एक बड़े संवैधानिक सवाल के केंद्र में ला खड़ा किया है।
अगर अदालत इस मांग पर गंभीरता से विचार करती है, तो इसका असर केवल वर्तमान विवाद तक सीमित नहीं रहेगा। इससे भविष्य में निर्वाचन आयोग के भीतर निर्णय लेने की प्रक्रिया, CEC और अन्य निर्वाचन आयुक्तों की भूमिका तथा आयोग की संस्थागत जवाबदेही को लेकर भी व्यापक न्यायिक विमर्श खड़ा हो सकता है।
याचिका में कौन-कौन पक्षकार?
मामले में केंद्रीय कानून मंत्रालय, निर्वाचन आयोग, मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार, निर्वाचन आयुक्त सुखबीर सिंह संधू, निर्वाचन आयुक्त विवेक जोशी और निर्वाचन आयोग के वरिष्ठ अधिकारी मनीष गर्ग को पक्षकार बनाया गया है।
वकील चांद कुरैशी के माध्यम से शैलेंद्र मणि त्रिपाठी द्वारा दायर याचिका में निर्वाचन आयोग के निर्णय लेने की प्रक्रिया पर सवाल उठाए गए हैं।
याचिकाकर्ता का आरोप है कि मुख्य चुनाव आयुक्त के स्तर पर लिए गए कुछ फैसले सामूहिक निर्णय लेने की कानूनी व्यवस्था के अनुरूप नहीं हैं।
लेकिन यहां सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि ये आरोप अभी न्यायिक परीक्षण के अधीन हैं। अदालत में किसी पक्ष की ओर से लगाया गया आरोप अपने आप में स्थापित तथ्य नहीं बन जाता। इसकी संवैधानिक वैधता और तथ्यात्मक आधार पर अंतिम फैसला अदालत ही करेगी।
चुनाव आयोग का पलटवार—अलग राय होना असामान्य नहीं
दूसरी तरफ निर्वाचन आयोग ने आलोचनाओं को लेकर अपना पक्ष स्पष्ट किया है। आयोग का कहना है कि किसी भी संवैधानिक या संस्थागत व्यवस्था में विचार-विमर्श के दौरान अलग-अलग राय और मत होना सामान्य प्रक्रिया का हिस्सा है।
आयोग के मुताबिक उसके आदेश निर्धारित कानूनी प्रक्रियाओं के तहत जारी किए जाते हैं और उन्हें पूर्ण कानूनी मान्यता प्राप्त है।
यानी जहां याचिकाकर्ता आयोग की कार्यप्रणाली में कथित असहमति को संस्थागत संकट के रूप में देख रहे हैं, वहीं निर्वाचन आयोग इसे लोकतांत्रिक और प्रशासनिक प्रक्रिया में होने वाले सामान्य विचार-विमर्श के रूप में प्रस्तुत कर रहा है।
अब असली परीक्षा सुप्रीम कोर्ट के सामने है।
SIR पर भी अदालत की नजर—मतदाता सूची की शुद्धता बनाम अधिकारों का सवाल
आज की सुनवाई का दूसरा बड़ा मुद्दा Special Intensive Revision यानी SIR है।
याचिका में SIR को गैर-कानूनी घोषित करने की मांग की गई है। यह मामला सीधे मतदाता सूची, मतदाता अधिकार और निर्वाचन प्रक्रिया की पारदर्शिता से जुड़ता है।
मतदाता सूची का पुनरीक्षण चुनाव प्रक्रिया का महत्वपूर्ण हिस्सा है। एक तरफ निष्पक्ष चुनाव के लिए मतदाता सूची को अद्यतन और त्रुटिरहित रखना जरूरी है, तो दूसरी तरफ यह भी सुनिश्चित करना संवैधानिक रूप से महत्वपूर्ण है कि वास्तविक मतदाताओं के नाम किसी प्रक्रिया की वजह से अनुचित रूप से प्रभावित न हों।
यही संतुलन इस मामले को संवेदनशील बनाता है।
सवाल यह है कि क्या SIR जैसी प्रक्रिया मतदाता सूची को अधिक विश्वसनीय बनाने का वैध माध्यम है या इसकी प्रक्रिया में ऐसे तत्व हैं जो नागरिकों के मताधिकार पर प्रतिकूल प्रभाव डाल सकते हैं?
इसका उत्तर भी अदालत के समक्ष आने वाली दलीलों और रिकॉर्ड पर निर्भर करेगा।
आज की सुनवाई क्यों है बेहद अहम?
आज सुप्रीम कोर्ट के सामने दो अलग-अलग याचिकाएं हैं, लेकिन दोनों का केंद्र एक ही है—भारतीय चुनाव व्यवस्था की विश्वसनीयता।
एक मामला निर्वाचन आयोग की आंतरिक कार्यप्रणाली और CEC की भूमिका से जुड़ा है। दूसरा मतदाता सूची के विशेष पुनरीक्षण की वैधानिकता से।
एक तरफ सवाल है कि चुनाव आयोग में फैसले कैसे लिए जा रहे हैं?
दूसरी तरफ सवाल है कि मतदाता सूची में बदलाव की प्रक्रिया कितनी पारदर्शी और कानूनी है?
और दोनों सवाल अंततः लोकतंत्र की उस बुनियाद तक पहुंचते हैं जहां एक मतदाता का अधिकार और चुनावी संस्थाओं की निष्पक्षता सबसे महत्वपूर्ण मानी जाती है।
‘एक व्यक्ति बनाम पूरी संस्था’—क्या यही असली संवैधानिक सवाल?
याचिका में अनुच्छेद 324(1) को जिस तरह आधार बनाया गया है, उससे एक बड़ा संवैधानिक प्रश्न सामने आता है—क्या चुनाव आयोग का संचालन ऐसी व्यवस्था में होना चाहिए जिसमें CEC की भूमिका निर्णायक हो, या आयोग के सभी सदस्य मिलकर सामूहिक रूप से निर्णय लें?
यह प्रश्न केवल वर्तमान CEC या वर्तमान निर्वाचन आयुक्तों तक सीमित नहीं है।
यदि सुप्रीम कोर्ट इस मुद्दे पर कोई व्यापक टिप्पणी या दिशा-निर्देश देता है, तो उसका असर आने वाले वर्षों में निर्वाचन आयोग की कार्यप्रणाली पर पड़ सकता है।
इसीलिए आज की सुनवाई को केवल एक सामान्य याचिका की सुनवाई के रूप में देखना मुश्किल है।
अब निगाहें सुप्रीम कोर्ट पर
फिलहाल गेंद सुप्रीम कोर्ट के पाले में है।
याचिकाकर्ताओं ने CEC के खिलाफ गंभीर आरोप लगाते हुए SIT जांच, पद से दूर रखने और आयोग की संरचना को लेकर कई राहतें मांगी हैं। निर्वाचन आयोग ने दूसरी ओर अपने निर्णयों को कानूनी प्रक्रिया के तहत लिया गया बताते हुए आलोचनाओं का जवाब दिया है।
अब यह अदालत तय करेगी कि याचिकाओं में उठाए गए सवाल सिर्फ प्रशासनिक असहमति तक सीमित हैं या इनके पीछे कोई गंभीर संवैधानिक प्रश्न मौजूद है।
आज की सुनवाई इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि चुनाव आयोग लोकतांत्रिक व्यवस्था की उन संस्थाओं में शामिल है जिसकी निष्पक्षता पर जनता का भरोसा चुनावी प्रक्रिया की बुनियादी शर्त है।
सवाल सिर्फ CEC का नहीं है। सवाल यह है कि चुनाव आयोग जैसी संवैधानिक संस्था के भीतर सत्ता, सहमति, असहमति और निर्णय लेने की प्रक्रिया की अंतिम संवैधानिक सीमा क्या है?
और इसी सवाल का जवाब आज सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई से निकलने की उम्मीद है।
पर्दाफाश न्यूज़ की नजर में मामला सिर्फ एक याचिका का नहीं, बल्कि उस भरोसे का है जिस पर लोकतंत्र की पूरी चुनावी इमारत खड़ी है।















