“10 में 9 नगर निगमों पर बीजेपी का कब्जा, कांग्रेस बीकानेर तक सिमटी; मेयर चुनाव में क्रॉस वोटिंग से बदले समीकरण, जयपुर में धरना तो खाटूश्यामजी में कोर्ट की एंट्री”
पर्दाफाश न्यूज़ | राजस्थान
राजस्थान की शहरी राजनीति में नगर निगम मेयर चुनाव ने ऐसा सियासी संदेश दिया है, जिसकी गूंज आने वाले दिनों में प्रदेश की राजनीति में सुनाई दे सकती है। प्रदेश के तीन सबसे बड़े और राजनीतिक रूप से प्रभावशाली शहरों जयपुर, जोधपुर और कोटा में भारतीय जनता पार्टी ने मेयर की कुर्सी अपने नाम कर ली है। इसके साथ ही प्रदेश के 10 नगर निगमों में से 9 में बीजेपी ने अपना बोर्ड बना लिया, जबकि कांग्रेस की मौजूदगी फिलहाल बीकानेर तक सिमट गई है।
राजधानी जयपुर में सुनील कोठारी, जोधपुर में प्रसन्नचंद मेहता और कोटा में अनुसुईया गोस्वामी ने मेयर पद संभाल लिया है। लेकिन इन चुनावों की कहानी केवल जीत और हार की नहीं रही। कहीं मतदान से पहले ही राजनीतिक टकराव सामने आया, कहीं क्रॉस वोटिंग ने पूरा गणित बदल दिया और कहीं अदालत के आदेश ने मतगणना रोक दी।
यानी राजस्थान के नगर निगम चुनावों में कुर्सी एक थी, लेकिन दांव पर पूरा राजनीतिक प्रभाव था।
तीन बड़े शहरों में बीजेपी की बाजी, कांग्रेस के सामने बड़ा सवाल
जयपुर, जोधपुर और कोटा राजस्थान के प्रमुख शहरी राजनीतिक केंद्र हैं। इन तीनों जगहों पर बीजेपी का मेयर बनना स्थानीय निकायों के स्तर पर पार्टी की मजबूत स्थिति को सामने लाता है।
सबसे उल्लेखनीय बात यह रही कि तीनों प्रमुख नगर निगमों में बीजेपी को उसके पार्टी पार्षदों की संख्या से अधिक वोट मिले।
यहीं से चुनावी गणित ने राजनीतिक कहानी को दिलचस्प बना दिया।
अगर पार्षदों की संख्या एक तरफ हो और मेयर चुनाव में मिले वोट दूसरी तरफ, तो स्वाभाविक रूप से सवाल उठते हैं कि आखिर अतिरिक्त वोट कहां से आए?
यही सवाल कोटा में सबसे ज्यादा चर्चा का विषय बना, जहां कांग्रेस खेमे से बड़े पैमाने पर क्रॉस वोटिंग की बात सामने आई।
गोपनीय मतदान होने के कारण व्यक्तिगत तौर पर यह तय करना आसान नहीं होता कि किस पार्षद ने किसे वोट दिया, लेकिन परिणामों ने राजनीतिक दलों के सामने संगठनात्मक एकजुटता और पार्षदों के बीच तालमेल का सवाल जरूर खड़ा कर दिया।
जयपुर में मेयर चुनाव से पहले ‘गेट पर सियासत’
राजधानी जयपुर में मेयर चुनाव सिर्फ मतदान तक सीमित नहीं रहा। मतदान के दौरान कांग्रेस विधायक रफीक खान को निगम परिसर में प्रवेश से रोके जाने के बाद राजनीतिक विवाद तेज हो गया।
पुलिस-प्रशासन द्वारा निगम गेट पर रोके जाने के बाद रफीक खान वहीं धरने पर बैठ गए। मौके पर विरोध-प्रदर्शन हुआ और चुनावी प्रक्रिया को लेकर राजनीतिक तनाव बढ़ गया।
कांग्रेस पार्षद मुकेश छापोला ने भी प्रशासन पर मतदान से रोकने का गंभीर आरोप लगाया।
इन आरोपों के बीच सबसे बड़ा सवाल यही रहा कि जब नगर निगम का चुनाव लोकतांत्रिक प्रक्रिया के तहत हो रहा है, तब मतदान स्थल के बाहर इतना बड़ा राजनीतिक टकराव क्यों पैदा हुआ?
कांग्रेस की ओर से लगाए गए आरोपों पर संबंधित प्रशासनिक पक्ष का अपना पक्ष हो सकता है, लेकिन इतना जरूर हुआ कि जयपुर का मेयर चुनाव नतीजे आने से पहले ही राजनीतिक सुर्खियों में आ गया।
हंगामे के बीच सुनील कोठारी की जीत
विरोध और विवाद के बावजूद बीजेपी के सुनील कोठारी मेयर निर्वाचित हुए और उन्होंने पदभार संभाल लिया।
पदभार ग्रहण करने के बाद कोठारी ने सभी 150 पार्षदों को साथ लेकर जयपुर के विकास को गति देने की बात कही।
अब यही बयान उनके लिए राजनीतिक और प्रशासनिक चुनौती भी है।
क्योंकि चुनाव जीतना एक बात है और 150 पार्षदों वाले बड़े नगर निगम को प्रभावी तरीके से चलाना दूसरी।
जयपुर में सड़कें, सफाई, यातायात, जल निकासी, पार्किंग, कचरा प्रबंधन और शहरी सुविधाएं लगातार जनता के प्रमुख मुद्दे रहे हैं। ऐसे में नई मेयर टीम के सामने अब सबसे बड़ा सवाल यही होगा कि चुनावी जीत को जमीन पर विकास की रफ्तार में कैसे बदला जाता है।
जोधपुर में 53 वोटों से प्रसन्नचंद मेहता की एंट्री
जोधपुर में बीजेपी के प्रसन्नचंद मेहता ने 53 वोट हासिल कर मेयर पद पर जीत दर्ज की।
मेहता ने पद संभालते ही दीपावली से पहले शहर की क्षतिग्रस्त सड़कों के कायाकल्प को प्राथमिकता देने का ऐलान किया।
शहर की सड़कों की हालत को लेकर समय-समय पर सवाल उठते रहे हैं। ऐसे में मेहता का पहला फोकस सड़क सुधार पर रखना सीधे तौर पर नागरिक सुविधा से जुड़ा मुद्दा है।
अब जनता की निगाह इस बात पर होगी कि घोषणा कितनी जल्दी काम में बदलती है।
क्योंकि चुनाव के दौरान किया गया वादा और सत्ता संभालने के बाद पूरा किया गया काम—दोनों में फर्क जनता सबसे बेहतर तरीके से समझती है।
कोटा में जीत से ज्यादा चर्चा क्रॉस वोटिंग की
कोटा नगर निगम में बीजेपी की अनुसुईया गोस्वामी मेयर निर्वाचित हुईं।
कार्यभार ग्रहण करते समय वह भावुक हो गईं और उन्होंने मेयर की टेबल को प्रणाम किया। तस्वीर भावनात्मक थी, लेकिन कोटा की राजनीतिक कहानी का सबसे बड़ा हिस्सा चुनावी गणित बना।
बीजेपी को उसके पार्षदों की संख्या की तुलना में अधिक वोट मिलने के बाद क्रॉस वोटिंग की चर्चा तेज हो गई।
विशेष रूप से कांग्रेस पार्षदों की ओर से बड़े पैमाने पर क्रॉस वोटिंग की बात राजनीतिक गलियारों में चर्चा का विषय बनी।
यहां चुनावी परिणाम ने कांग्रेस के सामने एक बड़ा संगठनात्मक सवाल खड़ा किया है—क्या पार्टी अपने पार्षदों को एकजुट रखने में सफल रही?
हालांकि गोपनीय मतदान के कारण किसी व्यक्तिगत पार्षद के वोट को बिना प्रमाण के तय करना उचित नहीं होगा, लेकिन कुल नतीजों ने राजनीतिक समीकरणों को जरूर बदल दिया।
10 में 9 निगम बीजेपी के पास—कांग्रेस के लिए संगठनात्मक चुनौती
राजस्थान के 10 नगर निगमों में से 9 पर बीजेपी का बोर्ड बनना इस पूरे चुनावी घटनाक्रम की सबसे बड़ी तस्वीर है।
दूसरी ओर कांग्रेस केवल बीकानेर में बोर्ड बनाने की स्थिति में रही।
यह आंकड़ा स्थानीय निकाय स्तर पर दोनों दलों की वर्तमान राजनीतिक स्थिति को समझने का एक महत्वपूर्ण आधार देता है।
बीजेपी के लिए अब चुनौती सिर्फ बोर्ड बनाने की नहीं, बल्कि इन बोर्डों को प्रभावी ढंग से चलाने की है।
वहीं कांग्रेस के लिए चुनौती सिर्फ विपक्ष में बैठने की नहीं, बल्कि उन कारणों की समीक्षा करने की भी है जिनके चलते कई निगमों में पार्टी का चुनावी गणित उसके पक्ष में नहीं रहा।
सुकेत में बीजेपी, श्रीविजयनगर में कांग्रेस ने बचाई जमीन
अन्य निकायों के नतीजों में भी मुकाबला पूरी तरह एकतरफा नहीं रहा।
सुकेत नगर पालिका में बीजेपी के जितेंद्र चोपड़ा अध्यक्ष निर्वाचित हुए, जबकि श्रीविजयनगर में कांग्रेस के सुशील मिढ़ा ने अध्यक्ष पद पर जीत दर्ज की।
इससे यह भी स्पष्ट होता है कि स्थानीय निकायों में उम्मीदवार, स्थानीय समीकरण और पार्षदों का व्यक्तिगत प्रभाव कई बार व्यापक राजनीतिक समीकरणों से अलग परिणाम दे सकता है।
इसलिए पूरे प्रदेश की तस्वीर को केवल एक रंग में देखना पर्याप्त नहीं होगा।
खाटूश्यामजी में चुनावी फैसला अदालत की चौखट पर
सीकर के प्रसिद्ध तीर्थस्थल खाटूश्यामजी नगर पालिका में अध्यक्ष पद का चुनाव कानूनी पेच में फंस गया है।
यहां कुल 20 पार्षदों में से 19 ने मतदान किया, क्योंकि कांग्रेस की एक महिला पार्षद के लापता होने की बात सामने आई।
इसके बाद कांग्रेस प्रत्याशी विनीता की याचिका पर हाईकोर्ट ने डाले गए 19 वोटों की गिनती का आदेश दिया।
लेकिन रिटर्निंग ऑफिसर को अदालत के आदेश की सत्यापित प्रति नहीं मिलने के कारण मतगणना को आगामी आदेश तक स्थगित कर दिया गया।
अब इस मामले में आगे की प्रक्रिया अदालत के आदेश और आवश्यक प्रशासनिक औपचारिकताओं के आधार पर आगे बढ़ेगी।
जीत की तस्वीर साफ, लेकिन असली परीक्षा अब शुरू
नगर निगमों की कुर्सियां तय हो चुकी हैं। बीजेपी ने बड़े शहरी केंद्रों में अपना प्रभाव दर्ज कराया है। कांग्रेस के सामने संगठनात्मक चुनौती स्पष्ट दिखाई दे रही है। लेकिन लोकतांत्रिक राजनीति में चुनाव परिणाम अंतिम अध्याय नहीं होता।
अब असली सवाल है—इन बोर्डों के पांच साल के कामकाज का रिपोर्ट कार्ड क्या होगा?
जयपुर में 150 पार्षदों को साथ लेकर चलने की चुनौती है।
जोधपुर में सड़कों को सुधारने का वादा है।
कोटा में राजनीतिक समीकरणों के बीच नगर निगम चलाने की चुनौती है।
और कांग्रेस के सामने अपनी स्थानीय राजनीतिक जमीन को मजबूत करने की चुनौती है।
पर्दाफाश न्यूज़ का सवाल: ‘बोर्ड किसका?’ से आगे बढ़कर ‘काम किसका?’
नगर निगम चुनाव के बाद सबसे ज्यादा चर्चा इस बात की है कि किस पार्टी का बोर्ड बना और किसके मेयर ने कुर्सी संभाली।
लेकिन शहर के आम नागरिक के लिए सवाल इससे आगे का है।
सड़क कब बनेगी?
कचरा कब उठेगा?
जलभराव कब रुकेगा?
ट्रैफिक की समस्या कब सुधरेगी?
शहर की सफाई व्यवस्था कब बेहतर होगी?
और नगर निगम की योजनाओं का लाभ आम आदमी तक कब पहुंचेगा?
बीजेपी ने चुनावी मैदान में बढ़त हासिल कर ली है। अब जनता की निगाहें उसके बोर्डों के कामकाज पर रहेंगी।
कांग्रेस के सामने परिणामों की समीक्षा और संगठन को मजबूत करने की चुनौती होगी।
राजस्थान के नगर निगमों में सत्ता का नक्शा बदल चुका है।
अब जनता को राजनीतिक शोर नहीं, काम का असर चाहिए।
क्योंकि मेयर की कुर्सी पर बैठना चुनाव की जीत है—
लेकिन शहर की उम्मीदों पर खरा उतरना असली परीक्षा है।















