“2021 के शासन निर्देश और 2024 के प्राधिकरण के जवाब को आमने-सामने रखकर संगठन ने मांगा हिसाब—“सूची पुलिस को दी तो कब, किसे और किस पत्र से?”
नोएडा: शासनादेश है, कानून है, सर्वे की व्यवस्था है, वेंडिंग जोन की व्यवस्था है और रेहड़ी-पटरी संचालकों के अधिकारों की रक्षा के लिए बाकायदा अधिनियम भी मौजूद है। लेकिन इन सबके बीच अगर कोई सबसे सरल सवाल पूछ दे—“रेहड़ी-पटरी वालों की सूची पुलिस को भेजी गई या नहीं?”—तो सरकारी व्यवस्था अचानक फाइलों, पत्रावलियों और जवाबों की भूलभुलैया में प्रवेश करती दिखाई देती है।
यही सवाल अब उत्तर प्रदेश सरकार और नोएडा प्राधिकरण के सामने खड़ा है।
राष्ट्रीय संगठन रेहड़ी पटरी संचालक की ओर से मुख्यमंत्री और नोएडा विकास प्राधिकरण के मुख्य कार्यपालक अधिकारी को भेजे गए पत्र में शासनादेशों, कानून तथा न्यायालयीन निर्देशों के अनुपालन को लेकर कई सवाल उठाए गए हैं। संगठन के राष्ट्रीय अध्यक्ष एवं संस्थापक श्याम किशोर गुप्ता की ओर से भेजे गए पत्र में विशेष रूप से 14 जुलाई 2021 के शासन स्तर के निर्देश और 12 फरवरी 2024 को मुख्यमंत्री जनसुनवाई/IGRS शिकायत के जवाब में नोएडा प्राधिकरण द्वारा दिए गए उत्तर का उल्लेख किया गया है।
संगठन का कहना है कि दोनों दस्तावेजों को साथ रखकर देखने पर कई सवाल सामने आते हैं और इनका स्पष्ट उत्तर रिकॉर्ड के आधार पर दिया जाना चाहिए।
कागज पर संरक्षण, सड़क पर असमंजस
स्ट्रीट वेंडर्स (जीविका संरक्षण एवं पथ विक्रय विनियमन) अधिनियम, 2014 के तहत रेहड़ी-पटरी संचालकों के लिए कानूनी व्यवस्था बनाई गई है। इसके पीछे उद्देश्य यही है कि आजीविका कमाने वाले स्ट्रीट वेंडरों के रोजगार और अधिकारों की रक्षा की जा सके तथा शहरी व्यवस्था में उनके लिए नियमन की स्पष्ट प्रणाली हो।
संगठन के पत्र में इसी कानूनी ढांचे और शासन स्तर के निर्देशों का हवाला देते हुए सवाल उठाया गया है कि यदि वेंडरों की सूची तैयार कर संबंधित पुलिस अधिकारियों को उपलब्ध कराने के निर्देश थे, तो नोएडा प्राधिकरण ने उसका पालन किस प्रकार किया?
सवाल फिर वही—सूची भेजी गई या नहीं?
अगर भेजी गई तो—
- कब भेजी गई?
- किस अधिकारी को भेजी गई?
- किस पत्र संख्या से भेजी गई?
- पत्र की प्रमाणित प्रति कहां है?
और अगर नहीं भेजी गई तो—
क्यों नहीं भेजी गई?
सरकारी कामकाज में इससे ज्यादा सीधा सवाल शायद ही कोई हो सकता है।
“काम हुआ है तो कागज दिखाइए”
संगठन ने केवल मौखिक स्पष्टीकरण मांगने के बजाय संबंधित दस्तावेजों की प्रमाणित प्रति उपलब्ध कराने की मांग की है।
यानी मामला बयान का नहीं, रिकॉर्ड का है।
किसी कार्यालय में यह कहना कि “कार्रवाई कर दी गई है” अपेक्षाकृत आसान है। लेकिन कार्रवाई कब हुई, किस आदेश के तहत हुई और उसका दस्तावेज कहां है—यह सवाल व्यवस्था को वास्तविक परीक्षा में डाल देता है।
व्यंग्य का सबसे बड़ा बिंदु भी शायद यही है कि जनता को अक्सर बताया जाता है कि “फाइल प्रक्रिया में है”, लेकिन जनता यह पूछे कि फाइल आखिर किस टेबल पर है, तो जवाब खोजने के लिए दूसरी फाइल खोलनी पड़ती है।
सर्वे हुआ तो प्रमाण-पत्र कहां?
संगठन ने वेंडरों के सर्वे, प्रमाण-पत्र और वेंडिंग जोन से संबंधित कार्रवाई में लागू कानून तथा शासन निर्देशों का पालन सुनिश्चित करने की मांग की है।
विशेष चिंता उन वेंडरों को लेकर जताई गई है जिनका सर्वे या वैधानिक प्रक्रिया अभी पूरी नहीं हुई है।
संगठन के पत्र के अनुसार ऐसे लोगों के खिलाफ कार्रवाई करने से पहले लागू कानूनी प्रावधानों और न्यायालयीन निर्देशों का पालन किया जाना चाहिए।
यहां मुद्दा सिर्फ एक ठेले या रेहड़ी का नहीं है।
जिस ठेले को प्रशासनिक नजर से सड़क किनारे खड़ा सामान समझा जा सकता है, वही किसी परिवार के लिए महीने की पूरी आय का साधन हो सकता है।
उससे घर चलता है।
बच्चों की फीस जाती है।
राशन आता है।
दवा खरीदी जाती है।
इसलिए किसी वेंडर के लिए सूची में नाम होना केवल सरकारी रिकॉर्ड का हिस्सा नहीं, बल्कि उसके रोजगार की सुरक्षा से जुड़ा सवाल है।
2024 के जवाब की भी जांच क्यों?
संगठन ने 12 फरवरी 2024 को मुख्यमंत्री जनसुनवाई/IGRS पर नोएडा प्राधिकरण द्वारा दिए गए जवाब को भी जांच के दायरे में रखने की मांग की है।
संगठन चाहता है कि यह स्पष्ट किया जाए कि जवाब तैयार करते समय संबंधित शासन निर्देशों और न्यायालयीन आदेशों का अध्ययन किस आधार पर किया गया।
यानी सवाल सिर्फ यह नहीं है कि क्या जवाब दिया गया, बल्कि यह भी है कि जवाब का आधार क्या था।
सरकारी जवाब अगर कानून और शासनादेश के आधार पर तैयार हुआ है तो संबंधित रिकॉर्ड होना चाहिए। और अगर रिकॉर्ड मौजूद है तो उसे सामने लाने में कठिनाई क्यों?
सबसे गंभीर सवाल: क्या शासनादेश कार्यालय की चौखट पर रुक जाते हैं?
संगठन ने अपने पत्र में एक कथित टिप्पणी का भी उल्लेख किया है, जिसमें यदि किसी अधिकारी या कर्मचारी द्वारा यह कहा गया हो कि नोएडा प्राधिकरण में शासन या न्यायालय के आदेश लागू नहीं होते अथवा अधिकारी अपने स्तर पर अलग आदेश चला सकते हैं, तो संगठन ने उसकी निष्पक्ष जांच की मांग की है।
यहां सावधानी जरूरी है।
यह संगठन द्वारा उठाया गया आरोप/दावा है, स्थापित तथ्य नहीं।
इसीलिए संगठन ने भी जांच की मांग की है कि यदि ऐसा कथन वास्तव में दिया गया था और जांच में प्रमाणित होता है, तभी नियमानुसार कार्रवाई की जाए।
लेकिन सवाल व्यापक है।
यदि शासनादेश किसी प्राधिकरण तक पहुंचता है, तो उसका पालन होना चाहिए। यदि किसी कारण से पालन नहीं हुआ, तो कारण दर्ज होना चाहिए। और यदि किसी अधिकारी की व्याख्या शासन के निर्देश से अलग है, तो उस अंतर की जांच भी रिकॉर्ड के आधार पर होनी चाहिए।
वरना व्यवस्था का अर्थ ही उलट जाएगा—ऊपर से आदेश निकलेगा और नीचे पहुंचते-पहुंचते उसकी नई व्याख्या तैयार हो जाएगी।
रिकॉर्ड सुरक्षित रखिए, क्योंकि कल सवाल फिर उठेंगे
संगठन ने सर्वे रिकॉर्ड, वेंडरों की सूची, वेंडिंग प्रमाण-पत्र, वेंडिंग जोन से जुड़े दस्तावेज और पुलिस को भेजे गए पत्रों को सुरक्षित रखने की मांग की है।
यह मांग प्रशासनिक दृष्टि से इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि किसी भी विवाद में बाद में सबसे अहम चीज होती है—उस समय का आधिकारिक रिकॉर्ड।
किसने क्या कहा, यह याददाश्त का विषय हो सकता है।
लेकिन किस तारीख को कौन-सा पत्र जारी हुआ, किस अधिकारी को भेजा गया और किस दस्तावेज पर क्या दर्ज था—यह रिकॉर्ड से तय किया जा सकता है।
इसलिए यदि सूची भेजी गई है तो रिकॉर्ड सुरक्षित रहना चाहिए।
यदि नहीं भेजी गई तो उसका कारण भी रिकॉर्ड में होना चाहिए।
15 दिन में अनुपालन रिपोर्ट की मांग
संगठन ने मुख्यमंत्री से पूरे मामले की उच्चस्तरीय जांच कराने तथा 15 दिनों के भीतर लिखित अनुपालन रिपोर्ट उपलब्ध कराने का अनुरोध किया है।
संगठन की मांग है कि वेंडरों के संबंध में लागू कानून, शासनादेश और न्यायालयीन निर्देशों का पूरी तरह पालन सुनिश्चित किया जाए।
साथ ही पत्र में यह भी कहा गया है कि निर्धारित अवधि में उचित कार्रवाई नहीं होने पर संगठन उपलब्ध दस्तावेजों के आधार पर सक्षम न्यायालय और अन्य वैधानिक मंचों के समक्ष कानूनी कार्रवाई करने के लिए स्वतंत्र होगा।
अर्थात अभी मामला पत्र और जवाब की सीमा में है, लेकिन आगे इसका रास्ता न्यायिक मंच तक भी जा सकता है।
मुख्य सचिव से पुलिस आयुक्त तक भेजी गई प्रतिलिपि
पत्र की प्रतिलिपि उत्तर प्रदेश के मुख्य सचिव, प्रमुख सचिव नगर विकास विभाग, पुलिस आयुक्त गौतमबुद्ध नगर और जिलाधिकारी गौतमबुद्ध नगर को भी भेजी गई है।
इससे स्पष्ट है कि संगठन मामले को केवल नोएडा प्राधिकरण तक सीमित नहीं रखना चाहता।
अब मामला शासन, प्राधिकरण और जिला प्रशासन—तीनों स्तरों के सामने है।
अब असली सवाल जवाब का नहीं, दस्तावेज का है
रेहड़ी-पटरी संचालकों के अधिकारों को लेकर कानून मौजूद है। शासनादेश मौजूद हैं। प्रशासनिक व्यवस्था मौजूद है। लेकिन किसी व्यवस्था की असली परीक्षा उसके कागजों से नहीं, जमीन पर उसके क्रियान्वयन से होती है।
अब देखना यह है कि 14 जुलाई 2021 के निर्देशों के अनुपालन का रिकॉर्ड क्या कहता है।
क्या सूची पुलिस को भेजी गई थी?
अगर हां, तो कब?
किसे भेजी गई?
किस पत्र संख्या से?
उस पत्र की प्रमाणित प्रति कहां है?
और अगर सूची नहीं भेजी गई तो क्यों नहीं भेजी गई?
यही वे सवाल हैं जिनका उत्तर अब कागज पर नहीं, दस्तावेज के साथ देना होगा।
क्योंकि रेहड़ी-पटरी वाले के लिए यह सरकारी फाइल का एक और पन्ना नहीं है।
उसके लिए यह सवाल है कि कल सुबह वह अपनी रोजी लेकर सड़क पर खड़ा होगा तो उसके पास रोजगार का अधिकार होगा या सिर्फ अपनी बात साबित करने के लिए एक और आवेदन?
फाइलों में रोजगार सुरक्षित दिख सकता है।
लेकिन असली कहानी सड़क पर दिखाई देगी।
और इस बार सवाल यह नहीं कि फाइल कहां है?
सवाल यह है कि फाइल में दर्ज अधिकार आखिर सड़क तक कब पहुंचेंगे?















