“सेक्टर-104 हाजीपुर में पहली बड़ी बुलडोजर कार्रवाई के बाद प्राधिकरण की निगरानी व्यवस्था पर सवाल—80 फीसदी निर्माण पूरा होने के बाद कार्रवाई, कहीं यह सिर्फ खानापूर्ति तो नहीं?”
नोएडा। सेक्टर-104 के हाजीपुर गांव में खसरा नंबर-412 पर शुक्रवार, 11 सितंबर 2026 को नोएडा प्राधिकरण ने अवैध निर्माण के खिलाफ बड़ी कार्रवाई की। सीईओ कृष्णा करुणेश के सख्त निर्देश और नवनियुक्त एसीईओ पुष्पराज के नेतृत्व में हुई इस कार्रवाई को प्राधिकरण भू-माफियाओं के खिलाफ बड़ी कार्रवाई बता रहा है।
कार्रवाई के दौरान बेसमेंट और चार मंजिला अवैध इमारत के पिलर पंचर किए गए, छत और स्लैब तोड़े गए तथा दीवारों पर लाल रंग से “यह बिल्डिंग अवैध है” लिखवाया गया। मौके पर भारी पुलिस बल और पीएसी भी तैनात रही।
प्राधिकरण के अनुसार खसरा संख्या-412 की कुल करीब 7,950 वर्गमीटर जमीन पर अवैध निर्माण किया गया था। शुक्रवार की कार्रवाई करीब 1,200 वर्गमीटर क्षेत्र में बने बेसमेंट और चार मंजिला निर्माण पर केंद्रित रही।
इस पूरी कार्रवाई के बीच एक सवाल सबसे ज्यादा चर्चा में है—
क्या इतनी बड़ी इमारत एक ही दिन में खड़ी हो गई थी?
स्थानीय स्तर पर लोग सवाल कर रहे हैं कि यदि निर्माण अवैध था, जमीन प्राधिकरण द्वारा अधिग्रहित थी और विवाद भी वर्षों से चल रहा था, तो फिर निर्माण को बेसमेंट से लेकर चार मंजिल तक पहुंचने कैसे दिया गया?
इसी के साथ जनता के बीच एक और चर्चा ने जोर पकड़ा है—
क्या प्राधिकरण को इस महीने का ‘पैसा’ नहीं मिला था, जिसकी वजह से अचानक इतनी तेजी से कार्रवाई हुई?
यह सवाल किसी आधिकारिक जांच का निष्कर्ष नहीं है और न ही इसे किसी अधिकारी के खिलाफ प्रमाणित आरोप माना जा सकता है। लेकिन कार्रवाई की टाइमिंग को लेकर स्थानीय स्तर पर उठ रही यह चर्चा बताती है कि लोगों के मन में प्राधिकरण की कार्यप्रणाली को लेकर गंभीर सवाल मौजूद हैं।
80 फीसदी निर्माण पूरा होने के बाद जागा प्राधिकरण?
जिस इमारत पर शुक्रवार को कार्रवाई हुई, उसके बारे में स्थानीय स्तर पर निर्माण करीब 80 फीसदी पूरा होने की बात कही जा रही है।
अगर यह दावा सही है तो मामला सिर्फ एक अवैध इमारत गिराने तक सीमित नहीं रह जाता, बल्कि यह सीधे-सीधे प्राधिकरण की निगरानी और प्रवर्तन व्यवस्था पर सवाल खड़ा करता है।
एक बहुमंजिला इमारत का निर्माण बेसमेंट खोदने, पिलर खड़े करने, स्लैब डालने और लगातार मंजिलें तैयार करने की प्रक्रिया से गुजरता है। इसमें काफी समय लगता है।
तो फिर सवाल है—
जब पहली ईंट रखी गई थी, तब प्राधिकरण कहां था?
जब बेसमेंट बना, तब किसने देखा?
जब पिलर खड़े हुए, तब किस अधिकारी ने निरीक्षण किया?
जब एक के बाद दूसरी मंजिल तैयार हुई, तब कार्रवाई क्यों नहीं हुई?
और सबसे अहम—
जब निर्माण लगभग पूरा होने की स्थिति में पहुंच गया, तभी बुलडोजर क्यों पहुंचा?
ग़लत की उम्र नहीं होती @Noida_authority pic.twitter.com/3n7N9xL7V4
— Indu Prakash Singh (@InduPrakashPCS) September 11, 2026
20 करोड़ की इमारत पर कार्रवाई या सिर्फ प्रतीकात्मक एक्शन?
स्थानीय चर्चाओं और उपलब्ध जानकारी के अनुसार शुक्रवार को तोड़ी गई इमारत की कीमत 20 करोड़ रुपये से अधिक बताई जा रही है।
इतनी बड़ी इमारत को खड़ा करने में करोड़ों रुपये लगाए गए होंगे। ऐसे में कार्रवाई के तरीके को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं।
स्थानीय स्तर पर चर्चा है कि जेसीबी से इमारत के शीशे, खिड़कियां और कुछ हिस्सों को नुकसान पहुंचाया गया। सवाल यह है कि यदि निर्माण पूरी तरह अवैध था तो क्या कार्रवाई का पूरा उद्देश्य इमारत को जमींदोज करना था?
क्या सिर्फ कुछ हिस्सों को तोड़ना पर्याप्त है?
क्या इससे भविष्य में दोबारा निर्माण की संभावना पूरी तरह समाप्त हो जाएगी?
प्राधिकरण की ओर से कार्रवाई को सख्त कदम बताया गया है, लेकिन अब जनता यह देखना चाहती है कि—
क्या यह वास्तव में निर्णायक कार्रवाई है या केवल प्रतीकात्मक कदम?
जिस जमीन पर प्राधिकरण की टीम को घेरा गया था, वहां निर्माण आगे कैसे बढ़ा?
खसरा नंबर-412 का विवाद नया नहीं है। कुछ समय पहले जब नोएडा प्राधिकरण के वर्क सर्किल-8 की टीम निर्माण कार्य रुकवाने पहुंची थी, तब टीम को कथित तौर पर घेर लिया गया था।
आरोप है कि वर्क सर्किल-8 के प्रबंधक दीपक कुमार को इमारत के अंदर घसीटकर ले जाया गया और उन पर डीजल डालकर जिंदा जलाने का प्रयास किया गया।
घटना के बाद नोएडा प्राधिकरण की ओर से भू-माफियाओं के खिलाफ एफआईआर दर्ज कराई गई थी।
इतनी गंभीर घटना के बाद भी सवाल बना हुआ है—
आखिर इस विवादित जमीन पर निर्माण की गतिविधियां किस तरह आगे बढ़ती रहीं?
यदि प्राधिकरण को पहले से जानकारी थी तो लगातार निगरानी क्यों नहीं हुई?
यदि निगरानी की गई तो निर्माण किस स्तर पर पकड़ा गया?
और यदि निर्माण रोकने के आदेश थे तो उनका पालन किसने कराया?
2002 में अधिग्रहित जमीन, 2023 में शुरू हुआ निर्माण
प्राधिकरण के रिकॉर्ड के अनुसार खसरा संख्या-412 की जमीन वर्ष 2002 में नियमानुसार अधिग्रहित की जा चुकी थी।
इसके बावजूद वर्ष 2023 में ‘निश्याम बिल्डकान प्राइवेट लिमिटेड’ और ‘हिमश्री हिमालय बिल्डटेक प्राइवेट लिमिटेड’ जैसी कंपनियों द्वारा यहां पांच मंजिला कमर्शियल कॉम्प्लेक्स का निर्माण शुरू किए जाने की बात सामने आई।
यानी प्राधिकरण के रिकॉर्ड के अनुसार जमीन की स्थिति पहले से स्पष्ट थी।
इसके बावजूद निर्माण शुरू हुआ और धीरे-धीरे एक विशाल ढांचा खड़ा हो गया।
यहीं से सवाल और गंभीर हो जाता है—
2023 से 2026 तक निर्माण चलता रहा और निर्णायक कार्रवाई 11 सितंबर 2026 को क्यों हुई?
अगर अदालत की रोक कार्रवाई में बाधा थी, तो उस दौरान निर्माण को रोकने के लिए कौन-कौन से प्रशासनिक और वैधानिक कदम उठाए गए?
अदालत की रोक हटने के बाद खुला कार्रवाई का रास्ता
प्राधिकरण के अनुसार मामले में कानूनी अड़चनें दूर होने के बाद यह कार्रवाई की गई।
गौतमबुद्धनगर की अपर सिविल जज (सीनियर डिवीजन) अदालत ने प्राधिकरण के खिलाफ जारी एकपक्षीय स्थगनादेश को खारिज कर दिया, जिसके बाद ध्वस्तीकरण का रास्ता साफ हुआ।
यह कानूनी पहलू कार्रवाई की टाइमिंग को समझने के लिए महत्वपूर्ण है।
लेकिन इसके साथ यह सवाल भी अपनी जगह कायम है कि—
अदालत में मामला लंबित रहने के दौरान क्या अवैध निर्माण को आगे बढ़ने से रोकने के लिए पर्याप्त कदम उठाए गए थे?
क्योंकि स्टे किसी निर्माण को अनंतकाल तक बढ़ाते रहने की अनुमति नहीं देता। ऐसे मामलों में निगरानी और अन्य वैधानिक कार्रवाई की भूमिका भी महत्वपूर्ण होती है।
जून में एडवाइजरी, सितंबर में बुलडोजर
मामले की गंभीरता को देखते हुए नोएडा प्राधिकरण ने जून 2026 में सार्वजनिक एडवाइजरी जारी की थी।
इसमें हाजीपुर के खसरा नंबर-412 के साथ-साथ सलारपुर और भंगेल के कई खसरों को ‘अवैध और विवादित’ बताया गया था।
प्राधिकरण ने स्पष्ट किया था कि इन जमीनों पर किसी भी प्रकार के भूखंड या बिल्डिंग का नक्शा पास नहीं किया गया है।
एडवाइजरी में ग्राम सलारपुर खादर और ग्राम भंगेल बेगमपुर के कई खसरा नंबरों का भी उल्लेख किया गया था।
जनता को चेतावनी दी गई थी कि इन जमीनों पर खरीद-फरोख्त अथवा निर्माण करने से होने वाली कानूनी कार्रवाई की जिम्मेदारी खरीदार और विक्रेता की होगी।
हाजीपुर-सलारपुर में हजारों करोड़ की जमीन पर कब्जे का दावा
स्थानीय स्तर पर यह भी दावा किया जा रहा है कि हाजीपुर और सलारपुर गांव में भू-माफियाओं ने हजारों करोड़ रुपये मूल्य की संपत्ति पर कब्जा कर रखा है।
यह दावा बेहद गंभीर है। यदि वास्तव में इतनी बड़ी मात्रा में प्राधिकरण अथवा सरकारी भूमि पर अवैध कब्जे और निर्माण हैं, तो शुक्रवार की कार्रवाई को केवल एक इमारत तक सीमित नहीं रखा जा सकता।
अब असली परीक्षा यह होगी कि—
क्या खसरा नंबर-412 के बाद दूसरे विवादित खसरों पर भी इसी तरह कार्रवाई होगी?
क्या वर्षों से खड़े दूसरे अवैध निर्माणों पर भी बुलडोजर चलेगा?
क्या केवल इमारतें गिरेंगी या अवैध कब्जे के पीछे के पूरे नेटवर्क की भी जांच होगी?
कार्रवाई करने वाले अधिकारियों को सलाम
जहां एक तरफ इस पूरे मामले में प्राधिकरण की पुरानी निगरानी व्यवस्था पर सवाल उठ रहे हैं, वहीं शुक्रवार की कार्रवाई को जमीन पर उतारने वाले अधिकारियों और कर्मचारियों की भूमिका की सराहना भी जरूरी है।
आज जिन अधिकारियों की देखरेख और नेतृत्व में इस कार्रवाई को अंजाम तक पहुंचाया गया, उनकी हिम्मत और दृढ़ता को सलाम करना चाहिए।
अवैध निर्माण के खिलाफ मौके पर उतरकर कार्रवाई करना हमेशा आसान नहीं होता। खासकर तब, जब मामला करोड़ों रुपये की संपत्ति, विवादित जमीन और कथित भू-माफिया नेटवर्क से जुड़ा हो।
सीईओ कृष्णा करुणेश के निर्देश, एसीईओ पुष्पराज के नेतृत्व और मौके पर मौजूद अधिकारियों-कर्मचारियों की टीम ने जिस तरह कार्रवाई को अंजाम दिया, वह यह संदेश जरूर देता है कि यदि प्रशासनिक मशीनरी दृढ़ इच्छाशक्ति के साथ काम करे तो बड़े से बड़े अवैध निर्माण के खिलाफ भी कार्रवाई संभव है।
भारी पुलिस बल और पीएसी की मौजूदगी के बीच टीम ने मौके पर कार्रवाई पूरी की और अवैध निर्माण के हिस्सों को ध्वस्त किया।
इसलिए सवाल उठाने के साथ-साथ उन अधिकारियों और कर्मचारियों के साहस को भी सलाम किया जाना चाहिए, जिन्होंने मौके पर जाकर कार्रवाई को अंजाम दिया।
लेकिन यही प्रशंसा एक दूसरा सवाल भी पैदा करती है—
अगर आज अधिकारी इतनी मजबूती से कार्रवाई कर सकते हैं, तो यह कार्रवाई पहले क्यों नहीं हो सकी?
अधिकारियों की भूमिका पर भी उठ रहे सवाल
इस पूरे प्रकरण में सबसे संवेदनशील मुद्दा प्राधिकरण के अपने तंत्र की भूमिका है।
स्थानीय स्तर पर आरोप लगाए जा रहे हैं कि अवैध निर्माण और जमीन के कारोबार में केवल भू-माफिया ही नहीं, बल्कि प्राधिकरण के कुछ अधिकारियों की मिलीभगत भी हो सकती है।
इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि आवश्यक है। किसी अधिकारी को बिना जांच दोषी ठहराना उचित नहीं होगा।
लेकिन करोड़ों रुपये की इमारत यदि महीनों या वर्षों में तैयार हुई है तो प्रशासनिक जवाबदेही का सवाल जरूर उठता है।
क्या संबंधित अधिकारियों ने समय पर रिपोर्ट भेजी?
क्या निर्माण रोकने के लिए नोटिस जारी हुए?
क्या कोई विभागीय जांच होगी?
क्या यह पता लगाया जाएगा कि निर्माण की जानकारी पहली बार प्राधिकरण को कब मिली?
और यदि लापरवाही या मिलीभगत सामने आती है तो—
जनता के बीच खुली चर्चा—क्या इस महीने ‘पैसा’ नहीं मिला?
जिम्मेदार अधिकारियों पर कार्रवाई होगी या नहीं?
CEO और DM को भी उतरना पड़ा था मौके पर
मामले की गंभीरता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि करीब 1,200 वर्गमीटर के कथित अतिक्रमण को रुकवाने के लिए एक समय नोएडा के सीईओ और जिलाधिकारी तक को मौके पर उतरना पड़ा था।
जब किसी अवैध निर्माण को रोकने के लिए जिले और प्राधिकरण के शीर्ष अधिकारियों को खुद मैदान में आना पड़े, तो यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि निचले स्तर की निगरानी और प्रवर्तन व्यवस्था आखिर किस स्थिति में थी।
यही कारण है कि शुक्रवार की कार्रवाई के बाद लोगों की नजर अब सिर्फ बुलडोजर पर नहीं, बल्कि जवाबदेही पर भी है।
‘यह बिल्डिंग अवैध है’ लिख दिया, लेकिन सवाल वहीं खड़ा है
कार्रवाई के बाद इमारत की दीवार पर लाल रंग से लिख दिया गया—
“यह बिल्डिंग अवैध है।”
जनता को खरीद-फरोख्त और निर्माण से बचने की चेतावनी दी गई है।
लेकिन जनता का सवाल इससे आगे है—
अगर बिल्डिंग अवैध थी तो इसकी नींव पड़ते समय चेतावनी क्यों नहीं दिखाई गई?
क्योंकि किसी अवैध निर्माण के खिलाफ सबसे प्रभावी कार्रवाई तब होती है जब पहली ईंट रखी जाती है।
बेसमेंट बन जाने, पिलर खड़े होने, कई मंजिलें तैयार होने और करोड़ों रुपये खर्च होने के बाद बुलडोजर चलाने का मतलब है कि नुकसान पहले ही हो चुका है।
अब बुलडोजर के साथ जवाबदेही की भी जरूरत
नोएडा प्राधिकरण ने शुक्रवार की कार्रवाई के जरिए यह संदेश जरूर दिया है कि अदालत की बाधा हटने के बाद अधिग्रहित जमीन को भू-माफियाओं के कब्जे से मुक्त कराने के लिए सख्त कदम उठाए जा सकते हैं।
और आज की कार्रवाई को अंजाम देने वाले अधिकारियों को इस बात के लिए निश्चित तौर पर सराहा जाना चाहिए कि उन्होंने मौके पर पहुंचकर कार्रवाई को पूरा किया।
लेकिन कार्रवाई की असली सफलता तभी मानी जाएगी जब यह भी पता चले कि—
इतना बड़ा निर्माण आखिर खड़ा कैसे हुआ?
इमारत किस तारीख से बननी शुरू हुई?
पहली मंजिल कब बनी?
वर्क सर्किल ने कितनी बार निरीक्षण किया?
कब-कब नोटिस जारी हुए?
किस स्तर पर निर्माण रोकने की कोशिश हुई?
कानूनी विवाद के दौरान निर्माण पर नजर रखने की जिम्मेदारी किसकी थी?
और यदि कहीं लापरवाही या मिलीभगत हुई तो उसकी जवाबदेही किसकी तय होगी?
जनता के बीच चल रही ‘महीने के पैसे’ वाली चर्चा का भी यही संदर्भ है।
क्या वास्तव में कोई ऐसा आर्थिक या प्रशासनिक दबाव था, जिसके कारण कार्रवाई में देरी हुई?
इसका जवाब फिलहाल आधिकारिक रूप से सामने नहीं है। इसलिए इस चर्चा की पुष्टि जांच के बिना संभव नहीं है।
लेकिन सवाल जरूर है—
अगर किसी तरह का दबाव, लापरवाही या मिलीभगत नहीं थी, तो वर्षों तक निर्माण को रोकने में इतनी देर क्यों हुई?
सवाल सिर्फ एक इमारत का नहीं, पूरे सिस्टम का है
जनता को केवल यह नहीं जानना कि आज बुलडोजर चला या नहीं।
जनता यह भी जानना चाहती है—
“जिस इमारत को आज गिराया जा रहा है, उसे कल और परसों बनने किसने दिया?”
नोएडा में भू-माफियाओं के खिलाफ अभियान का दावा अब तक कई बार किया गया है।
हाजीपुर के खसरा नंबर-412 की कार्रवाई के बाद अब देखना होगा कि यह अभियान वास्तव में कितना व्यापक होता है।
क्या अब हाजीपुर और सलारपुर की बाकी विवादित जमीनों पर भी कार्रवाई होगी?
क्या अवैध निर्माण के साथ उन लोगों की भूमिका भी जांची जाएगी, जिनकी जिम्मेदारी उसे रोकने की थी?
और सबसे अहम—
क्या नोएडा में अब बुलडोजर सिर्फ बनी हुई इमारतों पर चलेगा, या पहली ईंट पड़ते ही अवैध निर्माण रोकने वाला सिस्टम भी बनेगा?
क्योंकि सवाल सिर्फ एक बिल्डिंग का नहीं है।
सवाल उस पूरे सिस्टम का है, जिसकी निगरानी में एक कथित अवैध निर्माण इतना बड़ा हो गया कि उसे गिराने के लिए आखिरकार बुलडोजर और भारी पुलिस बल उतारना पड़ा।
और शुक्रवार की कार्रवाई में जिस साहस और दृढ़ता के साथ अधिकारियों ने मौके पर पहुंचकर कार्रवाई को अंजाम दिया, उसके लिए उन सभी अधिकारियों और कर्मचारियों को सलाम, जिन्होंने दबाव की परवाह किए बिना अपनी जिम्मेदारी निभाई।
अब जनता की नजर इस बात पर है कि क्या यह कार्रवाई एक शुरुआत है—या सिर्फ एक दिन की बड़ी खबर?














