“वर्षा पर डेढ़ घंटे चली समन्वय समिति की बैठक में सत्ता-साझेदारी के लंबित मुद्दों पर मंथन | विधायक संख्या के अनुपात में बीजेपी, शिवसेना और एनसीपी को मिल सकती है जिम्मेदारी | DPC फंड के लिए 70:30 का फॉर्मूला चर्चा में | सहयोगी दलों के नेताओं को सार्वजनिक बयानबाजी से बचने की सलाह”
मुंबई: महाराष्ट्र की महायुति सरकार में लंबे समय से अटके महामंडलों और निगमों के बंटवारे को लेकर अब सियासी तस्वीर साफ होने की उम्मीद बढ़ गई है। मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस के सरकारी आवास वर्षा पर सोमवार, 24 अगस्त को हुई महायुति समन्वय समिति की महत्वपूर्ण बैठक में बीजेपी, शिवसेना और एनसीपी के बीच सत्ता-साझेदारी से जुड़े कई लंबित मुद्दों पर विस्तार से चर्चा हुई। करीब डेढ़ घंटे चली बैठक में महामंडलों और निगमों के बंटवारे के साथ-साथ जिला नियोजन समिति (DPC) के फंड, गठबंधन के भीतर समन्वय और सहयोगी दलों के नेताओं की सार्वजनिक बयानबाजी जैसे मुद्दे प्रमुख रहे।
बैठक के बाद सामने आई जानकारी के मुताबिक, महामंडलों के बंटवारे की प्रक्रिया को अब और लंबा खींचने के बजाय जल्द अंतिम रूप देने पर सहमति बनी है। हालांकि, अभी किसी भी तरह की औपचारिक घोषणा नहीं की गई है। सूत्रों का कहना है कि अगले 15 दिनों के भीतर महामंडलों के बंटवारे पर अंतिम फैसला हो सकता है। इससे पहले महायुति के शीर्ष नेताओं के बीच एक-दो दौर की और बातचीत होने की संभावना है।
महामंडलों पर अब ‘विधायक संख्या’ का फॉर्मूला
महामंडलों और निगमों के बंटवारे को लेकर महायुति में जिस फॉर्मूले पर सबसे ज्यादा चर्चा हो रही है, उसका आधार विधानसभा में तीनों दलों की ताकत को बनाया जा सकता है। यानी जिस दल के पास जितनी विधायक संख्या है, उसे उसी अनुपात में महामंडलों और निगमों की जिम्मेदारी देने की कोशिश की जा सकती है।
इस फॉर्मूले का मकसद गठबंधन के भीतर किसी भी दल को हिस्सेदारी कम या ज्यादा मिलने की शिकायत से बचाना माना जा रहा है। हालांकि, अभी यह तय नहीं हुआ है कि कुल कितने महामंडल किस पार्टी के हिस्से में आएंगे और किन महत्वपूर्ण निगमों की कमान किस सहयोगी दल को सौंपी जाएगी।
महायुति के लिए यह बंटवारा इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि महामंडल और निगम राजनीतिक नियुक्तियों के लिहाज से काफी अहम माने जाते हैं। इनके जरिए लंबे समय से पार्टी और गठबंधन के लिए काम कर रहे नेताओं, पदाधिकारियों और कार्यकर्ताओं को जिम्मेदारी देने का रास्ता खुल सकता है।
वर्षा पर तीनों दलों की पूरी ताकत रही मौजूद
समन्वय समिति की बैठक में महायुति के तीनों प्रमुख घटकों के वरिष्ठ नेताओं की मौजूदगी ने इसकी राजनीतिक अहमियत बढ़ा दी। मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस के साथ बीजेपी की ओर से वरिष्ठ नेता गिरीश महाजन और प्रदेश अध्यक्ष चंद्रशेखर बावनकुले बैठक में शामिल हुए।
शिवसेना की ओर से उपमुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे के अलावा उदय सामंत, शंभूराज देसाई और दादा भुसे मौजूद रहे। वहीं एनसीपी की ओर से सुनेत्रा पवार, छगन भुजबल, हसन मुश्रीफ और संजय खोडके बैठक में शामिल हुए।
तीनों दलों के वरिष्ठ नेताओं की मौजूदगी में हुई इस बैठक को महायुति के भीतर सत्ता और संगठन से जुड़े लंबित मामलों को सुलझाने की कोशिश के तौर पर देखा जा रहा है। खासतौर पर महामंडलों का बंटवारा लंबे समय से गठबंधन के भीतर चर्चा का विषय रहा है।
DPC फंड में 70:30 के फॉर्मूले पर विचार
महामंडलों के अलावा बैठक में जिला नियोजन समिति यानी DPC फंड के इस्तेमाल को लेकर भी संभावित व्यवस्था पर चर्चा हुई। सामने आई जानकारी के अनुसार, जिला विकास के लिए उपलब्ध राशि में से 70 फीसदी फंड स्थानीय विधायकों के माध्यम से विकास कार्यों पर खर्च करने और शेष 30 फीसदी राशि पालकमंत्री के स्तर पर तय होने वाले विकास कार्यों के लिए इस्तेमाल करने का प्रस्ताव चर्चा में आया है।
यह फॉर्मूला लागू होता है तो विकास निधि के इस्तेमाल को लेकर विधायकों और पालकमंत्रियों के बीच अधिकारों का संतुलन बनाने की कोशिश होगी। हालांकि, इसे अंतिम रूप दिए जाने से पहले महायुति के भीतर इस पर और चर्चा की जा सकती है।
विवाद हुआ तो पहले आयुक्त, फिर फडणवीस-शिंदे करेंगे फैसला
DPC फंड के इस्तेमाल को लेकर यदि महायुति के घटक दलों के बीच किसी जिले में मतभेद पैदा होता है तो उसे सुलझाने के लिए भी एक व्यवस्था पर चर्चा हुई है। प्रस्तावित व्यवस्था के मुताबिक, विवाद की स्थिति में पहले आयुक्त स्तर पर समाधान निकालने का प्रयास किया जाएगा।
यदि आयुक्त स्तर पर भी सहमति नहीं बनती है तो मामले को मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस और उपमुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे के स्तर पर भेजा जा सकता है। इस व्यवस्था का उद्देश्य स्थानीय स्तर के मतभेदों को गठबंधन के बड़े राजनीतिक विवाद में बदलने से रोकना माना जा रहा है।
महायुति नेताओं की बयानबाजी पर भी ब्रेक लगाने की कोशिश
बैठक में सिर्फ सत्ता और फंड के बंटवारे पर ही चर्चा नहीं हुई, बल्कि गठबंधन की एकजुटता को लेकर भी चिंता सामने आई। महायुति के अलग-अलग घटक दलों के नेताओं और कार्यकर्ताओं की ओर से समय-समय पर एक-दूसरे के खिलाफ सार्वजनिक बयानबाजी होती रही है।
बैठक में सहयोगी दलों के नेताओं को एक-दूसरे की पार्टी, विधायक, सांसद या वरिष्ठ नेताओं के खिलाफ सार्वजनिक मंचों पर टिप्पणी करने से बचने की सलाह दिए जाने की जानकारी सामने आई है। माना जा रहा है कि नेतृत्व अब ऐसी बयानबाजी पर लगाम लगाकर गठबंधन की अंदरूनी खींचतान को सार्वजनिक होने से रोकना चाहता है।
नियुक्तियों का इंतजार कर रहे नेताओं की बढ़ी उम्मीदें
महामंडलों और निगमों का बंटवारा केवल राजनीतिक हिस्सेदारी का मामला नहीं है, बल्कि इसके साथ बड़ी संख्या में राजनीतिक नियुक्तियों का रास्ता भी खुल सकता है। महायुति के तीनों घटक दलों में लंबे समय से ऐसे नेता और पदाधिकारी हैं, जो सरकार में किसी जिम्मेदारी का इंतजार कर रहे हैं।
ऐसे में अगर अगले 15 दिनों में बंटवारे का फॉर्मूला अंतिम रूप लेता है तो उसके बाद अलग-अलग महामंडलों और निगमों में अध्यक्ष, उपाध्यक्ष तथा अन्य पदों पर नियुक्तियों की प्रक्रिया शुरू होने की संभावना बन सकती है।
सवाल सिर्फ महामंडलों का नहीं, गठबंधन के संतुलन का भी
दरअसल, महायुति सरकार के भीतर बीजेपी, शिवसेना और एनसीपी के बीच राजनीतिक संतुलन बनाए रखना लगातार महत्वपूर्ण मुद्दा रहा है। विधानसभा में ताकत के आधार पर महामंडलों का बंटवारा करने का फॉर्मूला इसी संतुलन को साधने की कोशिश के रूप में देखा जा रहा है।
अगर तीनों दल इस फार्मूले पर सहमत होते हैं तो लंबे समय से लंबित नियुक्तियों का रास्ता खुल सकता है। लेकिन असली चुनौती यह होगी कि कौन-सा महत्वपूर्ण महामंडल किस दल के हिस्से में जाता है। राजनीतिक रूप से प्रभावशाली विभागों और निगमों को लेकर अंतिम दौर की बातचीत में सबसे ज्यादा पेंच फंसने की संभावना मानी जा रही है।
अगले 15 दिन होंगे निर्णायक
वर्षा पर हुई बैठक के बाद फिलहाल महायुति के भीतर महामंडलों और निगमों के बंटवारे को लेकर उम्मीद जगी है। अगले कुछ दिनों में होने वाली बैठकों में विभागवार और निगमवार हिस्सेदारी पर चर्चा आगे बढ़ सकती है। इसके बाद अंतिम सूची को मंजूरी मिलने की संभावना है।
कुल मिलाकर, सोमवार की बैठक को महायुति के भीतर सत्ता-साझेदारी के लंबित अध्याय को बंद करने की दिशा में अहम कदम माना जा रहा है। महामंडलों का बंटवारा, DPC फंड का फॉर्मूला और सहयोगी दलों के बीच बयानबाजी पर नियंत्रण—इन तीनों मुद्दों पर सहमति बनाना गठबंधन के लिए जरूरी माना जा रहा है।
अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि विधायकों की संख्या के हिसाब से महामंडलों की राजनीतिक हिस्सेदारी कैसे तय होती है और किस दल की झोली में कौन-सा बड़ा निगम जाता है। अगले 15 दिन महाराष्ट्र की महायुति सरकार की सत्ता-साझेदारी की तस्वीर के लिहाज से बेहद महत्वपूर्ण साबित हो सकते हैं।














