“103 पन्नों के जवाब पर भी उठा सवाल, बचाव पक्ष को चार हफ्ते की मोहलत—अदालत ने कहा, अब और समय नहीं”
नई दिल्ली। दिल्ली के कथित आबकारी नीति मामले में पूर्व मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल, पूर्व उपमुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया और अन्य आरोपियों को निचली अदालत से मिली राहत के खिलाफ केंद्रीय जांच ब्यूरो (CBI) की याचिका पर दिल्ली हाईकोर्ट में सुनवाई के दौरान कानूनी पेच और गहरा गया। अदालत में सुनवाई का बड़ा हिस्सा इस सवाल पर केंद्रित रहा कि CBI की ओर से दायर याचिका को कानूनी रूप से रिविज़न याचिका के तौर पर सुनवाई योग्य माना भी जा सकता है या नहीं।
मामले की सुनवाई के दौरान आरोपियों की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ताओं ने शुरुआत में ही CBI की याचिका की मेंटेनिबिलिटी यानी सुनवाई योग्य होने पर गंभीर आपत्तियां उठाईं। अरविंद केजरीवाल की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता विक्रम चौधरी ने अदालत के समक्ष तर्क रखा कि यदि CBI की याचिका को ही रिविज़न के रूप में स्वीकार करने का कानूनी आधार स्पष्ट नहीं है, तो अदालत को मामले के गुण-दोष पर आगे बढ़ने की जरूरत नहीं होनी चाहिए।
हालांकि, हाईकोर्ट ने स्पष्ट कर दिया कि वह मामले को केवल शुरुआती आपत्तियों तक सीमित रखकर नहीं सुनेगा। अदालत ने कहा कि आरोपियों की ओर से उठाई गई आपत्तियों को रिकॉर्ड पर लिया जाएगा, लेकिन साथ ही मामले के अन्य पहलुओं पर भी दलीलें सुनी जाएंगी।
‘पहले यह तय हो कि याचिका सुनवाई योग्य है या नहीं’—केजरीवाल की ओर से जोरदार आपत्ति
सुनवाई के दौरान अरविंद केजरीवाल की ओर से पेश वरिष्ठ वकील विक्रम चौधरी ने अदालत के सामने सबसे पहले प्रक्रिया से जुड़ा सवाल उठाया। उनका कहना था कि CBI की याचिका को रिविज़न याचिका मानने से पहले यह देखना जरूरी है कि क्या ऐसी याचिका कानून के तहत सुनवाई योग्य है।
बचाव पक्ष का तर्क था कि यह महज तकनीकी आपत्ति नहीं बल्कि पूरे मामले की बुनियाद से जुड़ा सवाल है। यदि अदालत इस निष्कर्ष पर पहुंचती है कि CBI की याचिका ही सुनवाई योग्य नहीं है, तो उसके बाद आरोपों और मामले के गुण-दोष पर बहस करने का सवाल ही नहीं उठता।
यही वजह रही कि सुनवाई के शुरुआती चरण में अदालत में कानूनी प्रक्रिया और अधिकार क्षेत्र को लेकर लंबी बहस हुई। बचाव पक्ष ने अदालत से आग्रह किया कि पहले इसी प्रारंभिक मुद्दे का फैसला किया जाए और उसके बाद ही मामले के दूसरे पहलुओं पर विचार किया जाए।
लेकिन अदालत ने संकेत दिया कि वह मामले को अलग-अलग खानों में बांटकर नहीं सुनेगी। कोर्ट ने कहा कि शुरुआती आपत्तियां रिकॉर्ड पर रहेंगी, लेकिन सुनवाई के दौरान दूसरे कानूनी और तथ्यात्मक पहलुओं पर भी दलीलें सुनी जाएंगी।
CBI बनाम बचाव पक्ष: अदालत में आमने-सामने वरिष्ठ वकील
इस महत्वपूर्ण सुनवाई में CBI की ओर से अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल (ASG) एसवी राजू और सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता पेश हुए। दूसरी ओर, अरविंद केजरीवाल, मनीष सिसोदिया और अन्य आरोपियों की ओर से भी कई वरिष्ठ अधिवक्ताओं ने अदालत के सामने अपनी दलीलें रखीं।
सुनवाई के दौरान केवल याचिका की मेंटेनेबिलिटी ही मुद्दा नहीं रही। लिखित दलीलों, जवाब दाखिल करने की प्रक्रिया और समय सीमा को लेकर भी दोनों पक्षों के बीच तीखी बहस हुई।
CBI का जोर इस बात पर था कि मामले को अनावश्यक रूप से लंबा नहीं खींचा जाना चाहिए। वहीं बचाव पक्ष ने कहा कि अभियोजन की ओर से दाखिल किए गए विस्तृत लिखित जवाब में यदि नए आधार या नए तर्क शामिल किए गए हैं, तो आरोपियों को उनका जवाब देने का पूरा अवसर मिलना चाहिए।
अदालत ने दोनों पक्षों की दलीलें सुनीं और प्रक्रिया में संतुलन बनाए रखने की कोशिश की।
103 पेज का जवाब बना नया विवाद, बचाव पक्ष ने मांगा जवाब का अधिकार
सुनवाई के दौरान अरविंद केजरीवाल की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता हरिहरन ने CBI द्वारा दाखिल किए गए 103 पन्नों के लिखित जवाब का मुद्दा उठाया।
बचाव पक्ष की ओर से कहा गया कि CBI के लिखित जवाब में कुछ ऐसे आधार और तर्क शामिल हैं, जो उसकी मूल रिविज़न याचिका का हिस्सा नहीं थे। ऐसे में आरोपियों को उन नए बिंदुओं पर जवाब देने के लिए पर्याप्त समय मिलना चाहिए।
बचाव पक्ष का कहना था कि न्यायिक प्रक्रिया में किसी पक्ष को ऐसे नए आधारों का जवाब दिए बिना आगे बढ़ना उचित नहीं होगा। खासकर तब, जब मामला आरोपियों की व्यक्तिगत स्वतंत्रता और गंभीर आपराधिक आरोपों से जुड़ा हो।
अदालत ने इस दलील को भी सुना। कोर्ट ने याद दिलाया कि पहले ही जवाब दाखिल करने के लिए समय दिया जा चुका है। इसके बावजूद निष्पक्षता को ध्यान में रखते हुए अदालत ने बचाव पक्ष को जवाब तैयार करने और दाखिल करने के लिए चार सप्ताह का समय देने पर सहमति जताई।
यह फैसला सुनवाई की अगली दिशा के लिहाज से महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
चार हफ्ते की मोहलत पर CBI ने जताई आपत्ति
बचाव पक्ष को चार सप्ताह का समय दिए जाने पर सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने आपत्ति जताई। CBI की ओर से कहा गया कि मामले में पहले ही पर्याप्त समय दिया जा चुका है और इतनी लंबी मोहलत से सुनवाई में अनावश्यक देरी हो सकती है।
अभियोजन पक्ष की चिंता यह थी कि यदि जवाब और प्रतिजवाब दाखिल करने की प्रक्रिया लंबी होती गई तो मुख्य मुद्दे पर सुनवाई आगे खिसकती जाएगी।
हालांकि, अदालत ने बचाव पक्ष को चार सप्ताह का समय दे दिया। साथ ही कोर्ट ने स्पष्ट संकेत दिया कि इसके बाद मामले में अतिरिक्त समय मांगने की गुंजाइश नहीं होगी।
अदालत का यह रुख बताता है कि वह दोनों पक्षों को पर्याप्त अवसर देने के साथ-साथ सुनवाई को अनिश्चितकाल तक लंबा खिंचने से रोकना चाहती है।
अदालत का संदेश—आपत्ति भी सुनी जाएगी, मेरिट पर बहस भी होगी
सुनवाई के दौरान अदालत की एक अहम टिप्पणी यह रही कि मामले को अलग-अलग हिस्सों में बांटकर नहीं सुना जाएगा। यानी बचाव पक्ष की शुरुआती कानूनी आपत्ति को दरकिनार नहीं किया गया, लेकिन अदालत ने यह भी साफ कर दिया कि केवल मेंटेनेबिलिटी के सवाल पर सुनवाई रोककर आगे की दलीलों को टाला नहीं जाएगा।
अदालत ने यह भी कहा कि यदि शुरुआती आपत्ति खारिज होती है तो बचाव पक्ष को मामले के गुण-दोष यानी मेरिट पर अपनी बात रखने का पूरा अवसर मिलेगा।
इससे साफ है कि हाईकोर्ट फिलहाल मामले के हर महत्वपूर्ण कानूनी पहलू को रिकॉर्ड पर लेना चाहता है। अदालत के सामने एक ओर CBI की रिविज़न याचिका है, तो दूसरी ओर आरोपियों की ओर से उसकी वैधता और सुनवाई योग्य होने पर उठाई गई आपत्तियां हैं।
सिर्फ तकनीकी सवाल नहीं, अब आगे की सुनवाई पर सबकी नजर
आबकारी नीति मामले में हाईकोर्ट की यह सुनवाई इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि निचली अदालत से आरोपियों को मिली राहत के खिलाफ CBI ने हाईकोर्ट का रुख किया है। ऐसे में हाईकोर्ट के सामने सबसे पहले यह सवाल महत्वपूर्ण बन गया है कि CBI की चुनौती किस कानूनी दायरे में सुनी जा सकती है।
बचाव पक्ष की कोशिश है कि मामले की सुनवाई शुरू होने से पहले ही याचिका की वैधता पर फैसला हो। दूसरी ओर CBI इस स्तर पर मामले को आगे बढ़ाने और अपनी चुनौती पर सुनवाई जारी रखने के पक्ष में है।
यानी आने वाली सुनवाई में सिर्फ आरोपों की कहानी नहीं, बल्कि न्यायिक प्रक्रिया की वह सीमा भी तय हो सकती है जिसके तहत CBI की चुनौती पर हाईकोर्ट विचार करेगा।
5 और 6 अक्टूबर को फिर आमना-सामना
दिल्ली हाईकोर्ट ने अब मामले की अगली सुनवाई के लिए 5 और 6 अक्टूबर की तारीख तय की है। अदालत के निर्देश के अनुसार, बचाव पक्ष चार सप्ताह के भीतर अपना जवाब दाखिल करेगा। इसके बाद अभियोजन पक्ष अपनी दलीलों की शुरुआत करेगा।
अगली सुनवाई में यह देखना अहम होगा कि अदालत सबसे पहले आरोपियों की ओर से उठाई गई मेंटेनेबिलिटी की आपत्तियों पर किस तरह विचार करती है और CBI की रिविज़न याचिका को किस कानूनी कसौटी पर परखा जाता है।
इसके साथ ही 103 पन्नों के जवाब पर उठे विवाद का असर भी आगे की सुनवाई में दिखाई दे सकता है। बचाव पक्ष अब CBI की लिखित दलीलों में बताए गए उन बिंदुओं का जवाब दाखिल करेगा, जिन पर उसने आपत्ति जताई है।
हाईकोर्ट की अगली सुनवाई तय करेगी मामले की दिशा
फिलहाल अदालत ने दोनों पक्षों को अपना पक्ष पूरी तरह रखने का अवसर दिया है। एक तरफ CBI अपनी याचिका के जरिए निचली अदालत के आदेश को चुनौती दे रही है, वहीं दूसरी ओर केजरीवाल, सिसोदिया और अन्य आरोपियों की ओर से सुनवाई की बुनियादी कानूनी वैधता पर सवाल उठाए जा रहे हैं।
इस पूरे घटनाक्रम में सबसे अहम बात यह है कि अदालत ने शुरुआती आपत्तियों को रिकॉर्ड पर लेते हुए भी सुनवाई को केवल उसी मुद्दे तक सीमित रखने से इनकार किया है। अब चार सप्ताह की मोहलत के बाद जब 5 और 6 अक्टूबर को अदालत फिर बैठेगी, तब दोनों पक्षों की कानूनी रणनीति और अधिक स्पष्ट होगी।
अब असली सवाल यही है—क्या हाईकोर्ट CBI की रिविज़न याचिका को सुनवाई योग्य मानकर मामले के गुण-दोष पर आगे बढ़ेगा, या मेंटेनेबिलिटी की दलील ही इस कानूनी लड़ाई की पहली बड़ी बाधा साबित होगी?
5 और 6 अक्टूबर की सुनवाई इस सवाल का अगला जवाब सामने ला सकती है।














