अमेरिका और ईरान के बीच जारी सैन्य टकराव अब एक नए और अधिक खतरनाक चरण में प्रवेश करता दिखाई दे रहा है। संघर्ष के 12वें दिन दोनों देशों के बीच केवल सैन्य ठिकानों तक सीमित हमले नहीं रहे, बल्कि बुनियादी ढांचे और नागरिक सुविधाओं को भी निशाना बनाए जाने के आरोप सामने आए हैं। इससे न केवल क्षेत्रीय सुरक्षा बल्कि वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति और अंतरराष्ट्रीय व्यापार पर भी गंभीर असर पड़ने की आशंका बढ़ गई है।
ईरानी सरकारी मीडिया के अनुसार अमेरिकी सेना ने पश्चिमी ईरान के कई इलाकों, जिनमें अहवाज, रामशिर और एंडिमेश्क के आसपास के क्षेत्र शामिल हैं, पर मिसाइल हमले किए। रिपोर्टों के मुताबिक शालमचेह क्षेत्र में हुए एक हमले में दो लोगों की मौत हुई। दूसरी ओर अमेरिकी सेंट्रल कमांड का कहना है कि उसके अभियान का उद्देश्य ईरान की उन क्षमताओं को कमजोर करना है जिनसे वह होर्मुज जलडमरूमध्य और समुद्री मार्गों पर अंतरराष्ट्रीय जहाजों के लिए खतरा पैदा कर सकता है।
होर्मुज जलडमरूमध्य बना संघर्ष का केंद्र
इस पूरे संघर्ष का सबसे महत्वपूर्ण पहलू होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) है। दुनिया के समुद्री तेल व्यापार का बड़ा हिस्सा इसी मार्ग से होकर गुजरता है। अमेरिका का दावा है कि वह इस महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग पर सुरक्षित नौवहन और वैश्विक व्यापार को बहाल रखने के लिए कार्रवाई कर रहा है।
राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने हाल ही में चेतावनी दी थी कि यदि ईरान किसी भी जहाज पर हमला करता है तो अमेरिका जवाबी कार्रवाई में ईरानी बुनियादी ढांचे को निशाना बनाएगा। इस बयान के बाद दोनों देशों के बीच तनाव और बढ़ गया।
ईरान का कड़ा जवाब
अमेरिकी चेतावनी के बाद ईरान ने भी सख्त प्रतिक्रिया दी है। ईरानी विदेश मंत्री सैयद अब्बास अरागची ने स्पष्ट किया कि उनका देश “जैसे को तैसा” की नीति अपनाएगा। उनके अनुसार यदि ईरान के नागरिक या बुनियादी ढांचे पर हमला होता है तो उसका जवाब भी निर्णायक और शक्तिशाली होगा।
विश्लेषकों का मानना है कि इस तरह के बयान संघर्ष को और लंबा खींच सकते हैं तथा दोनों देशों के बीच कूटनीतिक समाधान की संभावनाओं को कमजोर कर सकते हैं।
सैन्य ठिकानों से आगे बढ़े हमले
संघर्ष के शुरुआती दिनों में दोनों पक्ष मुख्य रूप से सैन्य लक्ष्यों पर हमले कर रहे थे। लेकिन अब रिपोर्टों में बिजली संयंत्रों, पुलों, जल शोधन संयंत्रों और अन्य महत्वपूर्ण ढांचों को निशाना बनाए जाने की बात सामने आ रही है।
यदि यह प्रवृत्ति जारी रहती है तो इसका सीधा असर आम नागरिकों के जीवन पर पड़ सकता है। बिजली, पानी और परिवहन जैसी आवश्यक सेवाएं प्रभावित होने से मानवीय संकट भी पैदा हो सकता है।
तेल बाजार में उथल-पुथल
युद्ध का असर वैश्विक बाजारों पर भी दिखाई देने लगा है। होर्मुज जलडमरूमध्य में तनाव बढ़ने के कारण कच्चे तेल की कीमतों में तेज उछाल दर्ज किया गया है। ब्रेंट क्रूड की कीमत 90 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर पहुंचने की खबरें सामने आई हैं।
तेल की कीमतों में वृद्धि का असर केवल ऊर्जा क्षेत्र तक सीमित नहीं रहता। इससे परिवहन, उत्पादन और उपभोक्ता वस्तुओं की लागत बढ़ती है, जिसके परिणामस्वरूप दुनिया भर में महंगाई बढ़ सकती है।
भारत जैसे तेल आयातक देशों के लिए भी यह स्थिति चिंता का विषय है क्योंकि कच्चे तेल की कीमतों में बढ़ोतरी सीधे पेट्रोल और डीजल की कीमतों को प्रभावित कर सकती है।
वैश्विक व्यापार पर खतरा
होर्मुज जलडमरूमध्य के अलावा लाल सागर (Red Sea) क्षेत्र में भी तनाव बढ़ने की खबरें हैं। यदि समुद्री मार्ग असुरक्षित होते हैं तो अंतरराष्ट्रीय व्यापार प्रभावित हो सकता है। इससे शिपिंग लागत बढ़ेगी और आपूर्ति श्रृंखलाओं (Supply Chains) पर दबाव बढ़ सकता है।
कोविड महामारी के बाद वैश्विक व्यापार अभी पूरी तरह स्थिर नहीं हुआ है। ऐसे में मध्य पूर्व में बढ़ता सैन्य तनाव विश्व अर्थव्यवस्था के लिए एक नई चुनौती बन सकता है।
अमेरिका की लागत भी बढ़ी
युद्ध का आर्थिक बोझ अमेरिका पर भी पड़ रहा है। रक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि लंबे समय तक चलने वाले सैन्य अभियानों की लागत बहुत अधिक होती है। अमेरिकी रक्षा प्रतिष्ठान के कुछ अनुमानों के अनुसार संघर्ष पर अरबों डॉलर खर्च हो चुके हैं।
इसके अलावा सैन्य हताहतों और संसाधनों के बढ़ते उपयोग के कारण अमेरिका के भीतर भी इस अभियान को लेकर राजनीतिक बहस तेज हो सकती है।
आगे क्या?
फिलहाल सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या यह संघर्ष सीमित रहेगा या व्यापक क्षेत्रीय युद्ध का रूप ले सकता है। यदि दोनों पक्ष अपने रुख पर अड़े रहते हैं और कूटनीतिक प्रयास विफल होते हैं, तो स्थिति और गंभीर हो सकती है।
अंतरराष्ट्रीय समुदाय, संयुक्त राष्ट्र और कई प्रमुख देशों की कोशिश होगी कि तनाव को कम किया जाए और दोनों पक्ष वार्ता की मेज पर लौटें। क्योंकि अमेरिका और ईरान के बीच सीधा टकराव केवल दो देशों का मुद्दा नहीं है, बल्कि इसका असर पूरी दुनिया की सुरक्षा, ऊर्जा आपूर्ति और अर्थव्यवस्था पर पड़ सकता है।
अमेरिका और ईरान के बीच जारी संघर्ष अब केवल सैन्य शक्ति प्रदर्शन तक सीमित नहीं दिखाई देता। बुनियादी ढांचे पर हमलों के आरोप, होर्मुज जलडमरूमध्य में बढ़ता तनाव, तेल की कीमतों में उछाल और वैश्विक व्यापार पर मंडराता खतरा इस संकट को और गंभीर बना रहे हैं। आने वाले दिनों में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि क्या दोनों देश सैन्य कार्रवाई का दायरा बढ़ाते हैं या फिर कूटनीतिक समाधान की दिशा में कदम उठाते हैं। फिलहाल पूरी दुनिया की नजर मध्य पूर्व की इस तेजी से बदलती स्थिति पर टिकी हुई है।














