बिहार के बहुचर्चित टेंडर घोटाला मामले में विशेष निगरानी इकाई (SVU) की ताजा कार्रवाई ने राज्य की नौकरशाही और ठेकेदारी व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। गुरुवार को संयुक्त सचिव स्तर के अधिकारी मुमुक्षु चौधरी, इंजीनियर तारिणी दास और इंजीनियर उमेश कुमार सिंह की गिरफ्तारी के बाद यह मामला केवल भ्रष्टाचार का नहीं, बल्कि सरकारी संसाधनों के कथित दुरुपयोग, प्रभावशाली अधिकारियों की मिलीभगत और करोड़ों रुपये के वित्तीय नेटवर्क की जांच तक पहुंच गया है।
रिशु श्री की पूछताछ से खुलीं कई परतें
इस पूरे मामले का केंद्र बिंदु ठेकेदार रिशु श्री को माना जा रहा है। जांच एजेंसियों के अनुसार रिशु श्री से पूछताछ में ऐसे कई तथ्य सामने आए हैं, जिनसे संकेत मिलता है कि सरकारी विभागों में ठेके हासिल करने के लिए कथित रूप से कमीशन आधारित व्यवस्था संचालित की जा रही थी। जांचकर्ताओं का दावा है कि सरकारी परियोजनाओं के आवंटन में प्रभाव, संपर्क और आर्थिक लेन-देन की भूमिका की जांच की जा रही है।
संयुक्त सचिव स्तर के अधिकारी की गिरफ्तारी से बढ़े सवाल
वर्तमान में वित्त विभाग में संयुक्त सचिव पद पर तैनात मुमुक्षु चौधरी पर आरोप है कि उन्होंने नगर आयुक्त के रूप में कार्यकाल के दौरान कुछ कंपनियों को लाभ पहुंचाने के लिए कथित तौर पर कमीशन लिया और सरकारी ठेकों के आवंटन में भूमिका निभाई। यदि ये आरोप साबित होते हैं, तो यह मामला स्थानीय निकायों में पारदर्शिता और जवाबदेही की स्थिति पर गंभीर प्रश्नचिह्न खड़ा करेगा।
ईडी की छापेमारी में करोड़ों की बरामदगी
प्रवर्तन निदेशालय (ED) की पूर्व छापेमारियों में आरोपित अधिकारियों के ठिकानों से करोड़ों रुपये नकद मिलने की जानकारी सामने आई थी। मुमुक्षु चौधरी के परिसरों से लगभग 2 करोड़ रुपये और इंजीनियर तारिणी दास के यहां से भी भारी मात्रा में नकदी बरामद होने का दावा जांच एजेंसियों ने किया है। यह बरामदगी जांच को और अधिक संवेदनशील बना देती है, क्योंकि इससे आय के ज्ञात स्रोतों और वास्तविक संपत्ति के बीच अंतर की पड़ताल तेज हो गई है।
फरार आईएएस संजीव हंस की तलाश
इस मामले में सबसे चर्चित नाम पूर्व आईएएस अधिकारी संजीव हंस का है। जांच एजेंसियों के अनुसार जल संसाधन, ऊर्जा और अन्य महत्वपूर्ण विभागों में पदस्थापना के दौरान उनकी भूमिका की भी जांच की जा रही है। एसवीयू, ईडी और अन्य एजेंसियों की जांच में उनका नाम सामने आने के बाद उनकी तलाश तेज कर दी गई है। उनका फरार होना मामले की गंभीरता को और बढ़ा रहा है।
मनी लॉन्ड्रिंग के नेटवर्क की भी जांच
जांच एजेंसियों को ऐसे संकेत मिले हैं कि रिशु श्री से जुड़ी कुछ कंपनियों के माध्यम से कथित रूप से काले धन को वैध बनाने का नेटवर्क संचालित किया जा रहा था। यदि यह पहलू जांच में प्रमाणित होता है, तो मामला केवल भ्रष्टाचार तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि मनी लॉन्ड्रिंग, अवैध वित्तीय लेन-देन और संगठित आर्थिक अपराध के दायरे में भी आएगा।
सबसे बड़े सवाल
क्या सरकारी ठेकों के आवंटन में वर्षों से कमीशन आधारित तंत्र सक्रिय था?
क्या कुछ अधिकारियों और ठेकेदारों के गठजोड़ ने सरकारी योजनाओं को प्रभावित किया?
करोड़ों रुपये की नकदी आखिर किन स्रोतों से जुटाई गई?
क्या यह नेटवर्क केवल कुछ विभागों तक सीमित था या इसका दायरा पूरे प्रशासनिक ढांचे में फैला हुआ था?
इस कथित भ्रष्टाचार से सरकारी खजाने और आम जनता को कितना नुकसान हुआ?
जांच का बढ़ता दायरा
विशेष निगरानी इकाई, ईडी और अन्य एजेंसियां अब इस पूरे नेटवर्क की तह तक पहुंचने का प्रयास कर रही हैं। सूत्रों के अनुसार आने वाले दिनों में कई और अधिकारियों, ठेकेदारों तथा प्रभावशाली व्यक्तियों से पूछताछ हो सकती है। जैसे-जैसे जांच आगे बढ़ रही है, बिहार के हालिया वर्षों के सबसे बड़े प्रशासनिक और वित्तीय घोटालों में से एक की तस्वीर और स्पष्ट होती जा रही है।
यह मामला केवल कुछ गिरफ्तारियों का नहीं, बल्कि उस व्यवस्था की जांच का है जिसमें सरकारी धन, सार्वजनिक परियोजनाओं और प्रशासनिक अधिकारों के कथित दुरुपयोग के आरोप लगे हैं। अब पूरे राज्य की निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि जांच एजेंसियां इस मामले को किस अंजाम तक पहुंचाती हैं और क्या वास्तव में भ्रष्टाचार के इस कथित नेटवर्क के सभी जिम्मेदार लोगों को कानून के कटघरे तक लाया जा सकेगा।














