भारत में विकास और पर्यावरण संरक्षण के बीच संतुलन को लेकर लंबे समय से बहस होती रही है। विशेष रूप से खनन गतिविधियों को अक्सर वनों की कटाई, जैव विविधता के नुकसान और पर्यावरणीय क्षरण से जोड़कर देखा जाता है। ऐसे परिदृश्य में छत्तीसगढ़ के सरगुजा जिले स्थित पर्सा ईस्ट एवं कांता बसन (PEKB) कोयला खदान क्षेत्र में किया गया व्यापक हरित पुनर्स्थापन एक महत्वपूर्ण अध्ययन का विषय बनकर उभर रहा है।
जिस भूमि पर कभी भारी मशीनें कोयला निकालने में लगी थीं, उसी क्षेत्र में आज 568 हेक्टेयर भूमि पर 16 लाख से अधिक वृक्ष एवं पौधे लगाए जा चुके हैं। यह केवल वृक्षारोपण का आंकड़ा नहीं, बल्कि खनन के बाद भूमि पुनर्वास (Mine Reclamation) और पारिस्थितिक पुनर्स्थापन (Ecological Restoration) की एक संगठित प्रक्रिया का उदाहरण है।
केवल पौधे लगाना नहीं, बल्कि पारिस्थितिकी को पुनर्जीवित करना
खनन परियोजनाओं में अक्सर वृक्षारोपण को औपचारिकता माना जाता है, लेकिन यहां प्रत्येक एक पेड़ के बदले 40 नए पौधे लगाने का लक्ष्य निर्धारित किया गया। इससे स्पष्ट होता है कि उद्देश्य केवल क्षतिपूर्ति नहीं, बल्कि खोई हुई हरित संपदा को कई गुना बढ़ाना है।
पुनर्वनीकरण के लिए साल, महुआ, तेंदू, अमलतास और सिधा जैसी स्थानीय एवं पारंपरिक प्रजातियों का चयन किया गया है। इन प्रजातियों का महत्व केवल पर्यावरणीय नहीं बल्कि सामाजिक और आर्थिक भी है, क्योंकि ये आदिवासी एवं ग्रामीण समुदायों की आजीविका, खाद्य सुरक्षा और सांस्कृतिक जीवन से गहराई से जुड़ी हुई हैं।
88 प्रतिशत जीवित पौधे: सफलता का वास्तविक पैमाना
वृक्षारोपण अभियानों की सबसे बड़ी चुनौती पौधों का जीवित रहना होता है। इस परियोजना में लगभग 88 प्रतिशत पौधों के जीवित रहने की रिपोर्ट यह दर्शाती है कि केवल पौधे लगाए नहीं गए, बल्कि उनकी निरंतर निगरानी, सिंचाई और संरक्षण भी सुनिश्चित किया गया। पर्यावरण विशेषज्ञों के अनुसार यह दर बड़े पैमाने की पुनर्वनीकरण परियोजनाओं में उल्लेखनीय मानी जाती है।
5 लाख पौधों की नर्सरी: भविष्य की हरित योजना
परियोजना क्षेत्र में 3.5 हेक्टेयर में विकसित नर्सरी में लगभग 5 लाख पौधे तैयार किए जा रहे हैं। यह दर्शाता है कि हरित विकास को एक दीर्घकालिक कार्यक्रम के रूप में देखा जा रहा है, न कि एक बार की गतिविधि के रूप में।
4,000 हेक्टेयर से अधिक क्षेत्र में प्रतिपूरक वनीकरण
केवल खदान क्षेत्र तक सीमित रहने के बजाय सरगुजा, कोरिया, बलरामपुर और सूरजपुर के चार वन मंडलों में 4,000 हेक्टेयर से अधिक क्षेत्र में प्रतिपूरक वनीकरण किया गया है। इससे क्षेत्रीय स्तर पर हरित आवरण बढ़ाने, वन्यजीव आवासों को मजबूत करने और कार्बन अवशोषण क्षमता बढ़ाने में मदद मिल सकती है।
₹259 करोड़ का निवेश: पर्यावरणीय दायित्व की आर्थिक अभिव्यक्ति
पर्यावरण संरक्षण केवल घोषणाओं से संभव नहीं होता। इस दिशा में छत्तीसगढ़ सरकार के पास 259 करोड़ रुपये से अधिक की राशि जमा कराई गई है, जिसका उपयोग वनीकरण, वन्यजीव संरक्षण, जल संसाधन विकास और अन्य पर्यावरणीय उपायों में किया जाना है। यह दर्शाता है कि पर्यावरणीय उत्तरदायित्व को वित्तीय संसाधनों के साथ जोड़ा गया है।
जलवायु परिवर्तन के दौर में बढ़ता महत्व
आज जब दुनिया जलवायु परिवर्तन, बढ़ते तापमान, जल संकट और जैव विविधता के क्षरण जैसी चुनौतियों से जूझ रही है, तब खनन के बाद भूमि पुनर्स्थापन की ऐसी पहलें केवल स्थानीय महत्व की नहीं रह जातीं। ये कार्बन अवशोषण बढ़ाने, भूमि क्षरण कम करने और पारिस्थितिक संतुलन को पुनर्स्थापित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती हैं।
2030 तक 40 लाख पेड़ों का लक्ष्य
परियोजना का लक्ष्य दशक के अंत तक 40 लाख से अधिक वृक्ष लगाने का है। यदि यह लक्ष्य सफलतापूर्वक प्राप्त होता है, तो यह भारत में खनन क्षेत्र के पर्यावरणीय पुनर्वास के सबसे बड़े उदाहरणों में से एक बन सकता है।
पर्सा ईस्ट एवं कांता बसन खदान क्षेत्र का यह परिवर्तन इस बात का संकेत है कि खनन और पर्यावरण संरक्षण को परस्पर विरोधी मानने की पारंपरिक सोच से आगे बढ़कर संतुलित विकास का मॉडल विकसित किया जा सकता है। हालांकि ऐसी परियोजनाओं का वास्तविक मूल्यांकन दीर्घकालिक वैज्ञानिक अध्ययन, जैव विविधता की बहाली और स्थानीय समुदायों को होने वाले लाभों के आधार पर ही किया जाएगा, फिर भी यह पहल इस दिशा में एक महत्वपूर्ण उदाहरण प्रस्तुत करती है कि खदान बंद होने के बाद भूमि को पुनः जीवन दिया जा सकता है।
“जहां कभी कोयले की खुदाई होती थी, वहां आज लाखों पेड़ भविष्य की हरियाली और पर्यावरणीय पुनर्जागरण की कहानी लिख रहे हैं।”














