लखनऊ। पूर्वांचल एक्सप्रेस-वे पर हुए भीषण सड़क हादसे ने परिवहन व्यवस्था और चेकिंग तंत्र पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। पंजाब से लखनऊ आ रही एक निजी बस में क्षमता से तीन गुना अधिक यात्रियों को ठूंसकर ले जाया जा रहा था। हादसे में 5 यात्रियों की दर्दनाक मौत हो गई, जबकि 45 लोग गंभीर रूप से घायल बताए जा रहे हैं।
क्षमता 48 की, सवार थे 150 से अधिक यात्री
जानकारी के मुताबिक, बस 48 सीटर थी, लेकिन उसमें 150 से अधिक यात्री सवार थे। बस में 16 स्लीपर और 32 बैठने की सीटें स्वीकृत थीं, मगर मौके पर जांच में 43 स्लीपर और 9 बैठने की सीटें मिलीं।
हैरान करने वाली बात यह है कि इमरजेंसी गेट के सामने भी सीटें लगाई गई थीं, जिससे हादसे के समय यात्रियों को बाहर निकलने में भारी दिक्कत हुई। बस के पीछे का हिस्सा अवैध रूप से मॉडिफाई कर स्लीपर में तब्दील किया गया था।
67 बार चालान, फिर भी सड़कों पर दौड़ती रही बस
परिवहन विभाग के रिकॉर्ड के अनुसार, हादसे वाली बस का 67 बार चालान किया जा चुका था। इनमें कई चालान ओवरस्पीडिंग के भी थे। इसके बावजूद बस बिना किसी सख्त कार्रवाई के लगातार सड़कों पर दौड़ती रही।
पंजाब से लखनऊ तक नहीं हुई चेकिंग
सबसे बड़ा सवाल यह है कि बस पंजाब से लखनऊ तक पहुंच गई, लेकिन रास्ते में कहीं भी प्रभावी चेकिंग नहीं हुई। इतनी बड़ी संख्या में अवैध स्लीपर और अतिरिक्त यात्री होने के बावजूद किसी भी टोल या चेकपोस्ट पर कार्रवाई नहीं की गई।
घायलों का इलाज जारी
हादसे के बाद स्थानीय प्रशासन और पुलिस ने राहत एवं बचाव कार्य चलाया। घायलों को नजदीकी अस्पतालों में भर्ती कराया गया है। कई की हालत गंभीर बताई जा रही है।
जिम्मेदार कौन?
यह हादसा केवल ड्राइवर की लापरवाही नहीं, बल्कि परिवहन विभाग की निगरानी प्रणाली पर भी सवाल खड़े करता है। बार-बार चालान होने के बावजूद बस का परमिट रद्द क्यों नहीं किया गया? अवैध मॉडिफिकेशन की जांच क्यों नहीं हुई?
पूर्वांचल एक्सप्रेस-वे पर हुआ यह हादसा एक बार फिर साबित करता है कि नियमों की अनदेखी और प्रशासनिक ढिलाई की कीमत आम लोगों को अपनी जान देकर चुकानी पड़ती है।














