“स्कंदमाता की आराधना के बीच मुख्यमंत्री का संदेश—बेटियों की शिक्षा, मातृ स्वास्थ्य और महिला सशक्तीकरण से ही सुरक्षित होगा प्रदेश का भविष्य; पुराने शासन पर सवाल, नौ वर्षों के कामकाज को बताया बदलाव की बुनियाद”
लखनऊ। नवरात्र में मां भगवती के स्कंदमाता स्वरूप की आराधना के बीच मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने महिला सशक्तीकरण को प्रदेश के विकास, सामाजिक सुरक्षा और उज्ज्वल भविष्य की बुनियाद बताते हुए अपनी सरकार के कामकाज का राजनीतिक और प्रशासनिक लेखा-जोखा सामने रखा है। मुख्यमंत्री का संदेश केवल धार्मिक आस्था तक सीमित नहीं रहा, बल्कि उसके केंद्र में बेटियों की शिक्षा, माताओं का स्वास्थ्य, सुरक्षित मातृत्व और महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाने का व्यापक सवाल रहा। उन्होंने कहा कि जब नारीशक्ति स्वस्थ, शिक्षित और समर्थ होती है, तभी राष्ट्र का वर्तमान सुरक्षित और भविष्य उज्ज्वल बनता है।
मुख्यमंत्री ने वर्ष 2017 से पहले की सरकारों पर निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि उस दौर में बेटियों और माताओं के हितों की अपेक्षित अनदेखी हुई तथा राजनीतिक परिवारों और सत्ता के संरक्षण की राजनीति जनकल्याण पर भारी पड़ी। इसके विपरीत उन्होंने अपनी सरकार के कार्यकाल को बुनियादी सुविधाओं के विस्तार, बालिका शिक्षा में सुधार और महिला कल्याण की योजनाओं के व्यापक क्रियान्वयन से जोड़कर प्रस्तुत किया।
राजनीतिक संदेश साफ है—योगी सरकार महिला सशक्तीकरण को केवल कल्याणकारी योजनाओं की सूची के रूप में नहीं, बल्कि अपने शासन मॉडल की उपलब्धि के रूप में स्थापित करना चाहती है। हालांकि, इन दावों का वास्तविक मूल्यांकन आंकड़ों, योजनाओं के जमीनी क्रियान्वयन और लाभार्थियों तक पहुंच के आधार पर ही संभव है।
2017 से पहले की व्यवस्था पर सीधा प्रहार, लेकिन सवाल जवाबदेही का भी
मुख्यमंत्री ने अपने संदेश में आरोप लगाया कि वर्ष 2017 से पहले प्रदेश में माताओं के स्वास्थ्य और बेटियों की शिक्षा को पर्याप्त प्राथमिकता नहीं मिली। उन्होंने अस्पतालों की बदहाली, दवाओं की कमी और संस्थागत प्रसव की कमजोर व्यवस्था का उल्लेख करते हुए कहा कि इन परिस्थितियों का असर मातृ एवं शिशु स्वास्थ्य पर पड़ रहा था।
यह आरोप प्रदेश की पूर्ववर्ती सरकारों के कामकाज पर राजनीतिक प्रहार के साथ-साथ सार्वजनिक स्वास्थ्य व्यवस्था की पुरानी चुनौतियों की ओर भी ध्यान खींचता है। ग्रामीण क्षेत्रों में स्वास्थ्य सेवाओं की उपलब्धता, चिकित्सकों और नर्सिंग कर्मचारियों की तैनाती, प्रसव केंद्रों की क्षमता, आवश्यक दवाओं की नियमित आपूर्ति और समय पर इलाज आज भी किसी भी सरकार की प्रशासनिक दक्षता परखने के महत्वपूर्ण पैमाने हैं।
लेकिन यहां एक बुनियादी प्रश्न भी खड़ा होता है। यदि पिछली व्यवस्था में कमियां थीं, तो वर्तमान व्यवस्था में उनका समाधान किस सीमा तक हुआ? कितने स्वास्थ्य केंद्रों में सुविधाएं पूरी तरह उपलब्ध हैं? गर्भवती महिलाओं को समय पर जांच, पोषण, संस्थागत प्रसव और प्रसवोत्तर देखभाल कितनी प्रभावी ढंग से मिल रही है? इन सवालों के जवाब केवल राजनीतिक आरोपों से नहीं, बल्कि सत्यापित स्वास्थ्य आंकड़ों और स्वतंत्र मूल्यांकन से मिलेंगे।
योगी सरकार का पक्ष है कि उसने पिछले साढ़े नौ वर्षों में महिला कल्याण और बालिका शिक्षा को अधिक व्यापक दृष्टिकोण के साथ आगे बढ़ाया है। इस दावे की मजबूती इस बात से तय होगी कि सरकारी योजनाओं का लाभ कागजों से निकलकर प्रदेश के दूरदराज गांवों और आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों तक कितना पहुंचा है।
बेटी के जन्म से शिक्षा तक: सरकार ने पेश किया समग्र कल्याण का खाका
मुख्यमंत्री ने कहा कि डबल इंजन सरकार ने बेटी के जन्म से लेकर उसकी शिक्षा और सुरक्षित मातृत्व तक सुरक्षा एवं कल्याण का व्यापक ढांचा तैयार किया है। उनका दावा है कि पहले सुविधाओं के अभाव में अनेक बेटियों को पढ़ाई बीच में छोड़नी पड़ती थी, जबकि अब शिक्षा तक पहुंच बढ़ाने और सामाजिक बाधाओं को कम करने के लिए विभिन्न स्तरों पर प्रयास किए गए हैं।
बालिका शिक्षा का प्रश्न केवल विद्यालय में नामांकन तक सीमित नहीं है। विद्यालय तक सुरक्षित पहुंच, अलग और स्वच्छ शौचालय, पेयजल, शिक्षकों की उपलब्धता, डिजिटल संसाधन, परिवार की आर्थिक स्थिति और किशोरियों की सुरक्षा जैसे कारक तय करते हैं कि कोई छात्रा अपनी पढ़ाई कितनी दूर तक जारी रख पाएगी।
इसीलिए किसी भी सरकारी शिक्षा नीति की सफलता का आकलन केवल स्कूलों में सुविधाएं बढ़ने के दावे से नहीं किया जा सकता। यह देखना भी आवश्यक है कि कितनी छात्राएं प्राथमिक स्तर से माध्यमिक और उच्च माध्यमिक स्तर तक पहुंच रही हैं, कितनी पढ़ाई छोड़ रही हैं और कितनी आगे की शिक्षा या रोजगार से जुड़ पा रही हैं।
सरकार की ओर से प्रस्तुत तस्वीर में बालिका शिक्षा को आत्मविश्वास, आत्मनिर्भरता और सामाजिक परिवर्तन का माध्यम बताया गया है। यह दृष्टिकोण महत्वपूर्ण है, क्योंकि शिक्षित लड़की न केवल अपने जीवन के विकल्पों को बेहतर बना सकती है, बल्कि परिवार के स्वास्थ्य, आर्थिक निर्णयों और अगली पीढ़ी की शिक्षा पर भी सकारात्मक प्रभाव डाल सकती है।
फिर भी चुनौती कम नहीं है। गरीब परिवारों, ग्रामीण इलाकों और सामाजिक रूप से वंचित समुदायों की लड़कियों के सामने शिक्षा जारी रखने की बाधाएं अलग-अलग हो सकती हैं। इसलिए योजनाओं का वास्तविक प्रभाव समझने के लिए नामांकन के साथ उपस्थिति, पढ़ाई पूरी करने की दर और आगे की शिक्षा में प्रवेश के आंकड़ों को भी देखना होगा।
सिंहासनगता नित्यं पद्माश्रितकरद्वया।
शुभदास्तु सदा देवी स्कन्दमाता यशस्विनी।।आदिशक्ति माँ दुर्गा के पंचम स्वरूप माँ स्कन्दमाता के चरणों में कोटि-कोटि नमन।
माँ की कृपा से सभी के संकल्पों को सामर्थ्य मिले, जीवन में मंगल हो और परिवारों में प्रेम व प्रसन्नता बनी रहे।
जय माँ स्कन्दमाता।
— Yogi Adityanath (@myogiadityanath) October 14, 2026
ऑपरेशन कायाकल्प: 36 से 96 प्रतिशत से अधिक सुविधाओं का दावा
मुख्यमंत्री ने ऑपरेशन कायाकल्प का उल्लेख करते हुए कहा कि प्राथमिक विद्यालयों में बुनियादी सुविधाओं का सैचुरेशन 36 प्रतिशत से बढ़कर 96 प्रतिशत से अधिक हो गया है। यह आंकड़ा सही संदर्भ और समान मानकों के साथ सत्यापित होने पर सरकारी विद्यालयों के बुनियादी ढांचे में बड़े विस्तार का संकेत दे सकता है।
विद्यालयों में आवश्यक सुविधाओं की उपलब्धता शिक्षा की गुणवत्ता के लिए आधार तैयार करती है। लेकिन भवन, शौचालय, पेयजल और दूसरी मूलभूत व्यवस्थाएं उपलब्ध होने के बाद अगला सवाल यह है कि उनका रखरखाव कैसा है और छात्र-छात्राओं को उनका नियमित लाभ मिल रहा है या नहीं।
किसी विद्यालय में सुविधा का दर्ज होना और उसका हर दिन प्रभावी ढंग से काम करना दो अलग बातें हैं। इसलिए उपलब्धियों का आकलन करते समय यह देखना भी जरूरी है कि स्कूलों में साफ-सफाई, सुरक्षित पेयजल, उपयोग योग्य शौचालय और अन्य जरूरी व्यवस्थाएं लगातार बनी हुई हैं या नहीं।
मुख्यमंत्री ने स्कूल ड्रॉपआउट रेट 20 प्रतिशत से घटकर 3 प्रतिशत से भी कम होने का दावा भी किया। यदि यह कमी समान परिभाषा, आयु वर्ग, कक्षाओं और तुलनीय समयावधियों के आधार पर दर्ज हुई है, तो यह शिक्षा व्यवस्था के लिए महत्वपूर्ण उपलब्धि होगी। हालांकि, इसकी पूरी तस्वीर के लिए संबंधित सरकारी आंकड़ों, गणना की पद्धति और विभिन्न सामाजिक समूहों के परिणामों का परीक्षण आवश्यक है।
कस्तूरबा विद्यालयों से अटल आवासीय स्कूलों तक: वंचित बेटियों पर जोर
सरकार ने कस्तूरबा गांधी बालिका विद्यालयों में कक्षा 12 तक शिक्षा की सुविधा के विस्तार और अटल आवासीय विद्यालयों के माध्यम से श्रमिक एवं वंचित परिवारों के बच्चों को आधुनिक आवासीय शिक्षा उपलब्ध कराने को अपनी प्रमुख पहलों में गिनाया है।
आवासीय शिक्षा उन बच्चों के लिए विशेष महत्व रखती है जिनके घरों में पढ़ाई के अनुकूल वातावरण, आर्थिक संसाधन या नजदीक गुणवत्तापूर्ण विद्यालय उपलब्ध नहीं होते। विशेष रूप से लड़कियों के लिए सुरक्षित आवास, नियमित पढ़ाई, पोषण और मार्गदर्शन की व्यवस्था शिक्षा जारी रखने में सहायक हो सकती है।
लेकिन इन संस्थानों की सफलता का पैमाना केवल सीटों की संख्या या भवनों का निर्माण नहीं होना चाहिए। शिक्षकों की उपलब्धता, विषयवार पढ़ाई, छात्रावासों की सुरक्षा, भोजन की गुणवत्ता, स्वास्थ्य सुविधाएं, परीक्षा परिणाम और आगे की शिक्षा के अवसर भी उतने ही महत्वपूर्ण हैं।
सरकार के सामने यह सुनिश्चित करने की चुनौती है कि इन योजनाओं का लाभ सबसे जरूरतमंद छात्राओं तक पहुंचे और आर्थिक या सामाजिक परिस्थितियों के कारण कोई भी योग्य छात्रा शिक्षा से वंचित न रह जाए।
मातृ स्वास्थ्य: योजनाओं से आगे, जमीन पर परिणाम की परीक्षा
मुख्यमंत्री के संदेश में मातृ स्वास्थ्य और सुरक्षित मातृत्व को महिला कल्याण की केंद्रीय धुरी के रूप में रखा गया है। यह ऐसा क्षेत्र है जहां सरकारी नीतियों का प्रभाव सीधे महिलाओं और नवजात शिशुओं के जीवन से जुड़ता है।
गर्भावस्था के दौरान नियमित जांच, पर्याप्त पोषण, समय पर रेफरल, प्रशिक्षित स्वास्थ्यकर्मियों की उपलब्धता, सुरक्षित प्रसव और प्रसव के बाद देखभाल—इन सभी का समन्वय मातृ एवं शिशु स्वास्थ्य के लिए आवश्यक है। केवल अस्पताल में प्रसव की संख्या बढ़ना पर्याप्त नहीं; इलाज की गुणवत्ता, आपातकालीन सेवाओं की उपलब्धता और जटिल परिस्थितियों में समय पर चिकित्सा सहायता भी निर्णायक हैं।
ग्रामीण और पिछड़े इलाकों में स्वास्थ्य सेवाओं की पहुंच, परिवहन, आर्थिक कठिनाइयों और जागरूकता से जुड़ी चुनौतियां भी महत्वपूर्ण बनी रहती हैं। ऐसे में सरकार की उपलब्धियों का वास्तविक आकलन मातृ मृत्यु दर, शिशु मृत्यु दर, संस्थागत प्रसव, गर्भवती महिलाओं की जांच और स्वास्थ्य सेवाओं की गुणवत्ता जैसे संकेतकों से किया जाना चाहिए।
महिला सशक्तीकरण की कोई भी नीति तभी सार्थक मानी जाएगी जब महिलाओं को केवल योजनाओं का लाभार्थी नहीं, बल्कि अपने स्वास्थ्य और जीवन से जुड़े निर्णय लेने में सक्षम नागरिक के रूप में देखा जाए।
धार्मिक संदेश के साथ राजनीतिक संकेत: अब कसौटी परिणामों की
स्कंदमाता के वात्सल्य, ममता और पोषण के स्वरूप का उल्लेख करते हुए मुख्यमंत्री ने नारीशक्ति को समाज की मजबूती से जोड़ा। नवरात्र के धार्मिक वातावरण में दिया गया यह संदेश सांस्कृतिक आस्था और सरकारी प्राथमिकताओं को एक साथ प्रस्तुत करता है।
राजनीतिक दृष्टि से यह संदेश शासन की उपलब्धियों को जनता के सामने रखने का प्रयास भी है। वर्ष 2017 से पहले की व्यवस्थाओं की आलोचना और उसके बाद हुए बदलावों का दावा, दोनों ही सरकार की व्यापक राजनीतिक दलील का हिस्सा हैं। लेकिन किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था में सत्ता पक्ष के दावों के साथ स्वतंत्र समीक्षा और जनता के अनुभवों को भी बराबर महत्व मिलना चाहिए।
सरकार के लिए असली उपलब्धि वह होगी जो आंकड़ों के साथ-साथ आम परिवारों के जीवन में दिखाई दे—जब किसी गांव की लड़की बिना आर्थिक बाधा के बारहवीं तक पढ़ सके, जब गर्भवती महिला को समय पर और गुणवत्तापूर्ण इलाज मिले, जब विद्यालय की सुविधाएं नियमित रूप से काम करें और जब महिलाओं को शिक्षा, रोजगार तथा सामाजिक सुरक्षा के वास्तविक अवसर प्राप्त हों।
दावों से आगे बढ़े बहस: महिला सशक्तीकरण का असली अर्थ
मुख्यमंत्री ने स्पष्ट किया कि बेटियों की शिक्षा में निवेश, उनके आत्मविश्वास और प्रदेश के भविष्य को सशक्त बनाने में निवेश है। इस विचार से इनकार नहीं किया जा सकता कि शिक्षा, स्वास्थ्य और सुरक्षा किसी भी समाज की प्रगति के मूल आधार हैं। लेकिन इन क्षेत्रों में स्थायी परिवर्तन के लिए योजनाओं की घोषणा के साथ पर्याप्त बजट, प्रभावी निगरानी, जवाबदेही और समयबद्ध परिणाम भी जरूरी हैं।
योगी सरकार ने अपने कार्यकाल की उपलब्धियों के रूप में विद्यालयों की सुविधाओं में विस्तार, ड्रॉपआउट दर में कमी, आवासीय शिक्षा और मातृ स्वास्थ्य से जुड़ी पहलों को सामने रखा है। इन दावों की पुष्टि और विस्तृत मूल्यांकन के लिए आधिकारिक आंकड़ों तथा स्वतंत्र आकलन का महत्व बना रहेगा।















