मध्य पूर्व में अमेरिका और ईरान के बीच तनाव एक बार फिर खतरनाक मोड़ पर पहुंचता दिखाई दे रहा है। अमेरिकी सेंट्रल कमांड (CENTCOM) ने दावा किया है कि उसने लगातार तीसरी रात ईरान के सैन्य ठिकानों, ड्रोन नेटवर्क और तटीय रक्षा क्षमताओं को निशाना बनाकर कार्रवाई की है। हालांकि इन दावों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हो सकी है। दूसरी ओर, ईरान ने इन कार्रवाइयों को अपनी संप्रभुता का खुला उल्लंघन बताते हुए इसकी कड़ी निंदा की है और चेतावनी दी है कि यदि ऐसी गतिविधियां जारी रहीं तो वह अपने राष्ट्रीय हितों और सुरक्षा की रक्षा के लिए आवश्यक कदम उठाएगा।
इस बीच दक्षिणी ईरान के कई रणनीतिक इलाकों, जिनमें बंदर अब्बास, किश द्वीप और फारस की खाड़ी से जुड़े अन्य सैन्य एवं तटीय क्षेत्र शामिल बताए जा रहे हैं, में विस्फोटों की खबरें सामने आई हैं। स्थानीय और अंतरराष्ट्रीय मीडिया में इन घटनाओं को लेकर अलग-अलग दावे किए गए हैं, लेकिन नुकसान और संभावित हताहतों के संबंध में अभी तक कोई स्वतंत्र एवं आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है। यही कारण है कि विशेषज्ञ इन घटनाओं पर अंतिम निष्कर्ष निकालने से पहले आधिकारिक सूचनाओं का इंतजार करने की सलाह दे रहे हैं।
क्या है पूरा विवाद?
अमेरिका और ईरान के बीच तनाव कोई नया नहीं है। पिछले कई वर्षों से दोनों देशों के बीच परमाणु कार्यक्रम, क्षेत्रीय सुरक्षा, प्रतिबंधों, पश्चिम एशिया में प्रभाव और समुद्री सुरक्षा जैसे मुद्दों को लेकर लगातार मतभेद बने हुए हैं। समय-समय पर दोनों देशों के बीच सैन्य गतिविधियां, आर्थिक प्रतिबंध, बयानबाजी और अप्रत्यक्ष टकराव देखने को मिले हैं।
हाल के घटनाक्रम ने एक बार फिर इन पुराने विवादों को हवा दे दी है। अमेरिकी प्रशासन का कहना है कि उसकी सैन्य गतिविधियों का उद्देश्य अंतरराष्ट्रीय समुद्री मार्गों की सुरक्षा, सहयोगी देशों की रक्षा और क्षेत्र में संभावित खतरों को रोकना है। वहीं ईरान का आरोप है कि अमेरिका अंतरराष्ट्रीय कानूनों की अनदेखी करते हुए उसकी संप्रभुता में हस्तक्षेप कर रहा है।
होर्मुज स्ट्रेट क्यों है इतना महत्वपूर्ण?
वर्तमान संकट का सबसे संवेदनशील पहलू होर्मुज स्ट्रेट को लेकर बढ़ता तनाव है। फारस की खाड़ी को अरब सागर से जोड़ने वाला यह संकरा समुद्री मार्ग दुनिया की ऊर्जा आपूर्ति की सबसे महत्वपूर्ण धमनियों में से एक माना जाता है।
दुनिया के बड़े तेल उत्पादक देशों—जैसे सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात, कुवैत, कतर और इराक—से निर्यात होने वाले कच्चे तेल और प्राकृतिक गैस का बड़ा हिस्सा इसी मार्ग से होकर अंतरराष्ट्रीय बाजारों तक पहुंचता है। यही वजह है कि इस जलमार्ग में किसी भी प्रकार की अस्थिरता का असर केवल मध्य पूर्व तक सीमित नहीं रहता, बल्कि एशिया, यूरोप और अमेरिका सहित पूरी दुनिया के ऊर्जा बाजारों पर पड़ता है।
यदि इस समुद्री मार्ग पर जहाजों की आवाजाही बाधित होती है, तो तेल और गैस की वैश्विक आपूर्ति प्रभावित हो सकती है। इससे ऊर्जा की कीमतों में तेज वृद्धि और परिवहन लागत में इजाफा होने की आशंका रहती है।
अमेरिका का पक्ष
अमेरिकी प्रशासन का कहना है कि उसकी प्राथमिकता अंतरराष्ट्रीय नौवहन की स्वतंत्रता सुनिश्चित करना और समुद्री व्यापार को सुरक्षित बनाए रखना है। वॉशिंगटन का आरोप है कि ईरान समर्थित गतिविधियां क्षेत्रीय सुरक्षा के लिए चुनौती बन रही हैं और समुद्री मार्गों पर खतरा उत्पन्न कर सकती हैं।
अमेरिका यह भी कहता रहा है कि यदि उसके सैनिकों, सैन्य ठिकानों या सहयोगी देशों की सुरक्षा को खतरा पहुंचता है तो वह आवश्यक सैन्य कार्रवाई करने से पीछे नहीं हटेगा। इसी नीति के तहत हाल के अभियानों को भी देखा जा रहा है।
ईरान की प्रतिक्रिया
तेहरान ने अमेरिकी दावों और कथित सैन्य कार्रवाइयों की कड़ी आलोचना की है। ईरानी अधिकारियों का कहना है कि किसी भी विदेशी सैन्य हस्तक्षेप को स्वीकार नहीं किया जाएगा और देश अपनी सुरक्षा तथा क्षेत्रीय अखंडता की रक्षा के लिए हर आवश्यक कदम उठाने का अधिकार रखता है।
ईरान का यह भी कहना है कि पश्चिम एशिया की सुरक्षा का समाधान बाहरी सैन्य हस्तक्षेप नहीं, बल्कि क्षेत्रीय देशों के बीच संवाद और सहयोग है। ईरानी नेतृत्व लंबे समय से अमेरिकी सैन्य मौजूदगी का विरोध करता रहा है।
वैश्विक ऊर्जा बाजारों में बढ़ी बेचैनी
मध्य पूर्व में बढ़ते तनाव का असर अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा बाजारों पर दिखाई देने लगा है। विश्लेषकों का मानना है कि यदि हालात और बिगड़ते हैं या होर्मुज स्ट्रेट में किसी प्रकार की बाधा उत्पन्न होती है, तो कच्चे तेल की कीमतों में तेज उछाल आ सकता है।
ऊर्जा विशेषज्ञों के अनुसार, तेल की कीमतों में वृद्धि का असर केवल पेट्रोल और डीजल तक सीमित नहीं रहेगा। इससे परिवहन, विमानन, शिपिंग, उर्वरक, बिजली उत्पादन और विनिर्माण क्षेत्र की लागत भी बढ़ सकती है। परिणामस्वरूप कई देशों में महंगाई पर दबाव बढ़ने की आशंका है।
भारत जैसे बड़े ऊर्जा आयातक देशों के लिए भी यह स्थिति महत्वपूर्ण मानी जा रही है। भारत अपनी तेल आवश्यकताओं का बड़ा हिस्सा आयात करता है। यदि वैश्विक बाजार में कीमतें लगातार बढ़ती हैं, तो इसका प्रभाव घरेलू ईंधन कीमतों, उद्योगों की लागत और समग्र अर्थव्यवस्था पर पड़ सकता है।
वैश्विक कूटनीति की चुनौती
संयुक्त राष्ट्र सहित कई अंतरराष्ट्रीय संगठनों और देशों ने दोनों पक्षों से संयम बरतने की अपील की है। विशेषज्ञों का मानना है कि किसी भी प्रकार की व्यापक सैन्य कार्रवाई पूरे पश्चिम एशिया को अस्थिर कर सकती है।
यूरोप और एशिया के कई देशों ने भी संवाद और कूटनीतिक समाधान का समर्थन किया है। उनका कहना है कि मौजूदा तनाव को बातचीत के माध्यम से कम करना ही सभी पक्षों के हित में होगा।
क्या बढ़ सकता है क्षेत्रीय संघर्ष?
रक्षा मामलों के जानकारों का मानना है कि यदि सैन्य कार्रवाई और जवाबी कदमों का सिलसिला जारी रहता है, तो इसका दायरा केवल अमेरिका और ईरान तक सीमित नहीं रहेगा। पश्चिम एशिया के अन्य देशों, समुद्री व्यापार मार्गों और क्षेत्रीय सुरक्षा व्यवस्था पर भी इसका असर पड़ सकता है।
विशेषज्ञों के अनुसार, किसी भी बड़े संघर्ष की स्थिति में वैश्विक अर्थव्यवस्था, ऊर्जा आपूर्ति, समुद्री व्यापार और निवेश बाजारों पर व्यापक प्रभाव देखने को मिल सकता है। इसलिए दुनिया के अधिकांश देश तनाव कम करने के प्रयासों का समर्थन कर रहे हैं।
आगे क्या?
फिलहाल स्थिति बेहद संवेदनशील बनी हुई है। अमेरिका अपने सुरक्षा हितों और समुद्री मार्गों की रक्षा की बात दोहरा रहा है, जबकि ईरान इसे अपनी संप्रभुता पर हमला मानते हुए कड़ा विरोध जता रहा है। दोनों पक्षों के बीच बयानबाजी भी तेज हो गई है।
हालांकि, अभी तक ऐसी कोई स्पष्ट जानकारी सामने नहीं आई है जिससे यह कहा जा सके कि दोनों देश पूर्ण सैन्य संघर्ष की ओर बढ़ चुके हैं। आने वाले दिनों में कूटनीतिक प्रयास, अंतरराष्ट्रीय दबाव और दोनों देशों के अगले कदम इस संकट की दिशा तय करेंगे।
दुनिया की नजरें अब इस बात पर टिकी हैं कि क्या वॉशिंगटन और तेहरान बातचीत और कूटनीति का रास्ता अपनाते हैं या फिर सैन्य तनाव और गहराता है। यदि संवाद की संभावनाएं कमजोर पड़ती हैं, तो इसका असर केवल पश्चिम एशिया तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि वैश्विक ऊर्जा बाजारों, अंतरराष्ट्रीय व्यापार और विश्व अर्थव्यवस्था पर भी दूरगामी प्रभाव पड़ सकता है।














