“जलभराव, जाम नाले और मच्छरों के आतंक के बीच बुनियादी सुविधाओं पर उठे गंभीर सवाल; सेक्टर-105 आरडब्ल्यूए अध्यक्ष दिव्य कृष्णात्रेय ने जनप्रतिनिधियों और प्राधिकरण पर साधा निशाना”
नोएडा। देश के सबसे आधुनिक और हाईटेक शहरों में शुमार नोएडा और ग्रेटर नोएडा की चमक-दमक पर मानसून ने बड़ा सवालिया निशान लगा दिया है। करोड़ों रुपये के विकास कार्यों और “स्मार्ट सिटी” के दावों के बीच शहर के कई सेक्टर इन दिनों जलभराव, जाम नालों और मच्छरों के आतंक से जूझ रहे हैं। हालात ऐसे हैं कि बारिश के कुछ ही दिनों में डेंगू के दर्जनों मामले सामने आने लगे हैं, जबकि मलेरिया और अन्य मच्छर जनित बीमारियों का खतरा भी लगातार बढ़ रहा है। स्थानीय निवासी इसे केवल मौसमी समस्या नहीं, बल्कि वर्षों से चली आ रही प्रशासनिक लापरवाही का परिणाम बता रहे हैं।
शहर के कई सेक्टरों में मानसून से पहले नालों की तली झाड़ सफाई नहीं कराई गई। परिणामस्वरूप मुख्य नाले गाद और कचरे से भर गए हैं। इनकी निकासी बाधित होने से अंदरूनी नालियों का पानी बाहर नहीं निकल पा रहा और गंदा पानी कई-कई दिनों तक जमा रह रहा है। यही ठहरा हुआ पानी अब मच्छरों की सबसे बड़ी प्रजनन स्थली बन चुका है।
जाम नालों ने बढ़ाई मुश्किलें, बदबू और गंदगी से बेहाल लोग
शहर के अनेक सेक्टरों में बारिश के बाद सड़कें और गलियां तालाब का रूप ले लेती हैं। नालियों का गंदा पानी सड़कों पर बहता रहता है और कई स्थानों पर दिनों तक जमा रहता है। इसके कारण न केवल आवाजाही प्रभावित होती है, बल्कि आसपास रहने वाले लोगों का जीवन भी दूभर हो गया है।
स्थानीय लोगों का कहना है कि बदबू इतनी अधिक होती है कि घरों की खिड़कियां तक बंद रखनी पड़ती हैं। वहीं बच्चों और बुजुर्गों के लिए यह स्थिति स्वास्थ्य की दृष्टि से बेहद खतरनाक साबित हो रही है। लगातार जमा रहने वाले पानी में मच्छरों की संख्या तेजी से बढ़ रही है, जिससे डेंगू, मलेरिया और चिकनगुनिया जैसी बीमारियों का खतरा लगातार बढ़ता जा रहा है।
डेंगू की दस्तक ने बढ़ाई चिंता, स्वास्थ्य विभाग भी सतर्क
मानसून की शुरुआत के साथ ही डेंगू के मामलों में वृद्धि ने स्वास्थ्य विभाग की चिंता बढ़ा दी है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि जलभराव और मच्छरों की रोकथाम के लिए समय रहते प्रभावी कदम नहीं उठाए गए तो आने वाले दिनों में स्थिति और गंभीर हो सकती है।
चिकित्सकों के अनुसार डेंगू फैलाने वाला एडीज मच्छर साफ और ठहरे हुए पानी में तेजी से पनपता है। वहीं गंदे पानी में अन्य मच्छरों की संख्या भी बढ़ जाती है, जिससे मलेरिया सहित कई अन्य बीमारियों का खतरा कई गुना बढ़ जाता है। ऐसे में नियमित फॉगिंग और एंटी-लार्वा अभियान बेहद जरूरी हो जाता है।
‘स्मार्ट सिटी’ के दावों पर उठे सवाल
नोएडा और ग्रेटर नोएडा को विश्वस्तरीय शहर बनाने के दावे लगातार किए जाते रहे हैं। आधुनिक सड़कें, चौड़ी एक्सप्रेसवे, ऊंची इमारतें और डिजिटल सुविधाओं को विकास का प्रतीक बताया जाता है। लेकिन मानसून आते ही बुनियादी सुविधाओं की पोल खुल जाती है।
स्थानीय नागरिकों का कहना है कि यदि शहर की नालियां समय पर साफ नहीं हो सकतीं, जल निकासी की व्यवस्था प्रभावी नहीं है और बारिश के कुछ घंटों बाद ही सड़कें जलमग्न हो जाती हैं, तो ऐसे में स्मार्ट सिटी की अवधारणा केवल कागजों तक सीमित दिखाई देती है।
आरडब्ल्यूए अध्यक्ष दिव्य कृष्णात्रेय का प्राधिकरण और जनप्रतिनिधियों पर बड़ा हमला
सेक्टर-105 आरडब्ल्यूए अध्यक्ष दिव्य कृष्णात्रेय ने शहर की मौजूदा स्थिति पर गहरा आक्रोश व्यक्त किया है। उन्होंने कहा कि जनता के वोटों से चुनकर सत्ता तक पहुंचने वाले जनप्रतिनिधि इस गंभीर समस्या पर पूरी तरह मौन हैं।
उन्होंने कहा कि चुनाव के समय स्मार्ट नोएडा, विश्वस्तरीय सुविधाओं और विकास के बड़े-बड़े दावे किए जाते हैं, लेकिन जैसे ही बारिश शुरू होती है, जनता को जलभराव, गंदगी और मच्छरों के भरोसे छोड़ दिया जाता है।
दिव्य कृष्णात्रेय ने कहा कि शहर के नागरिक टैक्स और विभिन्न शुल्क समय पर जमा करते हैं, लेकिन बदले में उन्हें स्वच्छ वातावरण और सुरक्षित जीवन नहीं मिल पा रहा है। यह स्थिति किसी भी आधुनिक शहर के लिए बेहद चिंताजनक है।
‘कागजों पर स्मार्ट, जमीन पर बदहाल व्यवस्था’
दिव्य कृष्णात्रेय का कहना है कि शहर को कागजों पर स्मार्ट घोषित कर देना पर्याप्त नहीं है। असली स्मार्ट सिटी वही होती है जहां नागरिकों को साफ-सफाई, बेहतर जल निकासी, स्वच्छ वातावरण और सुरक्षित स्वास्थ्य सुविधाएं मिलें।
उन्होंने कहा कि यदि मुख्य नालों की समय पर सफाई कर दी जाती और मानसून पूर्व तैयारी गंभीरता से होती तो आज अधिकांश सेक्टर जलभराव की समस्या से नहीं जूझ रहे होते। प्रशासनिक उदासीनता का खामियाजा अब आम नागरिक भुगत रहे हैं।
फॉगिंग और एंटी-लार्वा अभियान की उठी मांग
दिव्य कृष्णात्रेय ने प्राधिकरण से मांग की है कि शहर के सभी मुख्य नालों और अंदरूनी नालियों की तत्काल तली झाड़ सफाई कराई जाए। साथ ही जहां-जहां जलभराव है, वहां युद्धस्तर पर पानी की निकासी सुनिश्चित की जाए।
उन्होंने यह भी कहा कि सभी प्रभावित सेक्टरों में नियमित फॉगिंग कराई जाए तथा एंटी-लार्वा दवा का व्यापक छिड़काव किया जाए, ताकि मच्छरों की संख्या को नियंत्रित किया जा सके। यदि यह अभियान लगातार नहीं चलाया गया तो आने वाले दिनों में डेंगू और मलेरिया के मामलों में और अधिक बढ़ोतरी हो सकती है।
जनता पूछ रही—जिम्मेदारी आखिर किसकी?
शहर के नागरिक अब यह सवाल उठा रहे हैं कि हर वर्ष मानसून से पहले करोड़ों रुपये के सफाई अभियान चलाए जाने के बावजूद हालात क्यों नहीं बदलते? यदि नालों की सफाई के दावे किए जाते हैं तो बारिश के पहले ही पानी निकासी व्यवस्था क्यों ठप हो जाती है?
लोगों का कहना है कि केवल बैठकों और योजनाओं से शहर की समस्याओं का समाधान नहीं होगा। इसके लिए नियमित मॉनिटरिंग, जवाबदेही और समयबद्ध कार्रवाई आवश्यक है।
जनस्वास्थ्य से जुड़ा मुद्दा, राजनीति से ऊपर उठकर कार्रवाई की जरूरत
विशेषज्ञों का मानना है कि जलभराव और मच्छर जनित बीमारियां केवल सफाई का विषय नहीं, बल्कि जनस्वास्थ्य से जुड़ा गंभीर संकट हैं। यदि समय रहते प्रभावी कदम नहीं उठाए गए तो अस्पतालों पर मरीजों का बोझ बढ़ सकता है और हजारों परिवार प्रभावित हो सकते हैं।
ऐसे में आवश्यक है कि नोएडा और ग्रेटर नोएडा प्राधिकरण, स्वास्थ्य विभाग और जनप्रतिनिधि राजनीतिक बयानबाजी से ऊपर उठकर संयुक्त रूप से ठोस कार्ययोजना लागू करें। मुख्य नालों की वैज्ञानिक सफाई, नियमित फॉगिंग, एंटी-लार्वा छिड़काव, जल निकासी व्यवस्था की निगरानी और नागरिकों की शिकायतों का त्वरित समाधान ही इस समस्या का स्थायी उपचार हो सकता है।
फिलहाल सबसे बड़ा सवाल यही है—क्या नोएडा और ग्रेटर नोएडा वास्तव में स्मार्ट सिटी बनने की दिशा में बढ़ रहे हैं, या फिर हर मानसून के साथ विकास के दावे जलभराव और बीमारियों के दलदल में डूबते रहेंगे?














