नोएडा। शहर में सार्वजनिक सुविधाओं के निर्माण और फिर कुछ वर्षों के भीतर उनके ध्वस्तीकरण को लेकर नागरिकों के बीच गंभीर असंतोष और चिंताएं सामने आ रही हैं। नोएडा के विभिन्न सेक्टरों में सार्वजनिक धन से निर्मित कई सार्वजनिक शौचालयों को हाल के समय में विकास कार्यों अथवा प्रशासनिक कारणों का हवाला देते हुए हटाया या ध्वस्त किया गया है। अब इस पूरे मामले ने केवल सुविधाओं के अभाव का नहीं, बल्कि शहरी नियोजन, सरकारी जवाबदेही, करदाताओं के पैसे के उपयोग और दीर्घकालिक विकास नीति पर भी बड़े प्रश्न खड़े कर दिए हैं।
पूर्व नोएडा प्राधिकरण सीईओ रितु माहेश्वरी के कार्यकाल के दौरान “स्वच्छ नोएडा, क्लीन नोएडा” अभियान के अंतर्गत शहर के विभिन्न हिस्सों में बड़ी संख्या में सार्वजनिक शौचालयों का निर्माण कराया गया था। इसका उद्देश्य नागरिकों, महिलाओं, वरिष्ठ नागरिकों, रिक्शा चालकों, श्रमिकों, राहगीरों और सार्वजनिक स्थलों पर आने-जाने वाले लोगों को स्वच्छ एवं सुलभ सुविधाएं उपलब्ध कराना था।
उस समय इन निर्माण कार्यों को शहर की आधुनिक शहरी व्यवस्था और नागरिक सुविधा विस्तार की दिशा में महत्वपूर्ण कदम बताया गया था। लेकिन अब इन संरचनाओं का ध्वस्तीकरण कई गंभीर प्रश्न खड़े कर रहा है—
क्या निर्माण से पहले पर्याप्त योजना बनाई गई थी?
स्थानीय नागरिकों का कहना है कि यदि कुछ वर्षों बाद ही सार्वजनिक धन से बनी संरचनाओं को हटाना पड़ रहा है, तो यह जांच का विषय होना चाहिए कि—
क्या स्थान चयन वैज्ञानिक और व्यवहारिक अध्ययन के आधार पर किया गया था?
क्या भविष्य की सड़क, मेट्रो, हरित क्षेत्र, यातायात या अन्य विकास योजनाओं का पूर्व आकलन किया गया था?
क्या निर्माण से पहले दीर्घकालिक उपयोगिता का विश्लेषण हुआ था?
यदि योजना उचित थी, तो फिर आज इन्हें हटाने की आवश्यकता क्यों पड़ी?
रखरखाव में लापरवाही या निगरानी तंत्र की विफलता?
पिछले कुछ वर्षों में कई क्षेत्रों से शिकायतें सामने आती रही हैं कि अनेक सार्वजनिक शौचालयों की नियमित सफाई, रखरखाव और निगरानी पर्याप्त रूप से नहीं हुई। कई स्थानों पर अवैध कब्जे, कार वॉशिंग जैसी गतिविधियां तथा अन्य व्यावसायिक उपयोग होने की बातें भी नागरिकों द्वारा उठाई गईं।
यदि ऐसी गतिविधियां चल रही थीं तो प्रश्न यह भी उठता है—
निगरानी तंत्र कहां था?
जिम्मेदार अधिकारियों पर क्या कार्रवाई हुई?
जनसुविधाओं की सुरक्षा के लिए कौन उत्तरदायी था?
सार्वजनिक धन और जवाबदेही का सवाल
नागरिकों का सबसे बड़ा सवाल वित्तीय जवाबदेही को लेकर है। करदाताओं के पैसे से बनी संरचनाओं का कुछ वर्षों बाद ध्वस्तीकरण केवल एक प्रशासनिक निर्णय नहीं बल्कि सार्वजनिक संसाधनों के उपयोग पर भी सवाल खड़ा करता है।
नागरिक मांग कर रहे हैं कि—
इन निर्माण कार्यों पर कुल कितना खर्च हुआ?
ध्वस्तीकरण की प्रक्रिया पर कितना खर्च आया?
क्या मरम्मत, पुनर्विकास या बेहतर प्रबंधन जैसे विकल्पों पर विचार किया गया?
क्या किसी स्वतंत्र एजेंसी से तकनीकी मूल्यांकन कराया गया?
महिलाओं, वरिष्ठ नागरिकों और श्रमिक वर्ग पर प्रभाव
सार्वजनिक शौचालय केवल एक निर्माण संरचना नहीं बल्कि सार्वजनिक स्वास्थ्य, महिला सुरक्षा, स्वच्छता और मानव गरिमा से जुड़ा विषय है।
विशेषज्ञ भी मानते हैं कि शहरों में पर्याप्त सार्वजनिक स्वच्छता सुविधाओं की अनुपलब्धता का सीधा असर महिलाओं, दिव्यांगजनों, वरिष्ठ नागरिकों, श्रमिकों और गरीब वर्ग पर पड़ता है।
ऐसे में नागरिक पूछ रहे हैं कि यदि पुराने शौचालय हटाए गए हैं तो—
क्या उनके स्थान पर वैकल्पिक सुविधाएं उपलब्ध कराई गई हैं?
भविष्य की सार्वजनिक स्वच्छता नीति क्या है?
“स्वच्छ नोएडा, क्लीन नोएडा” अभियान की वर्तमान स्थिति क्या है?
नागरिकों की प्रमुख मांगें
नोएडा निवासी प्राधिकरण से निम्नलिखित बिंदुओं पर सार्वजनिक स्पष्टीकरण चाहते हैं—निर्माण और ध्वस्तीकरण से जुड़े सभी निर्णयों की पारदर्शी जानकारी।
1.सार्वजनिक धन के उपयोग का विस्तृत विवरण।
2.रखरखाव और निगरानी में कथित लापरवाही की जवाबदेही तय करना।
3.भविष्य की जनसुविधाओं के लिए दीर्घकालिक शहरी योजना सार्वजनिक करना।
4.जनभागीदारी आधारित विकास मॉडल अपनाना।
5.नई सार्वजनिक सुविधाओं के निर्माण में पारदर्शिता, निगरानी और गुणवत्ता नियंत्रण सुनिश्चित करना।
जनहित का मूल प्रश्न
विकास कार्य आवश्यक हैं, लेकिन विकास की परिभाषा केवल निर्माण और ध्वस्तीकरण तक सीमित नहीं हो सकती। सतत शहरी विकास, वित्तीय जिम्मेदारी, दीर्घकालिक योजना और प्रशासनिक जवाबदेही किसी भी आधुनिक शहर की बुनियाद होती है।
नोएडा के नागरिक चाहते हैं कि इस पूरे विषय पर प्राधिकरण स्पष्ट स्थिति सार्वजनिक करे ताकि भविष्य में जनसुविधाओं के निर्माण और रखरखाव में पारदर्शिता, उत्तरदायित्व और जनविश्वास मजबूत हो सके।














