Thursday, June 4, 2026
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नोएडा स्काईवॉक: 5 महीने का वादा, 36 महीने का इंतजार! 33.50 करोड़ खर्च, 9 डेडलाइन फेल, फिर भी यात्री सड़क पर

“ब्लू लाइन और एक्वा लाइन को जोड़ने वाला बहुप्रतीक्षित प्रोजेक्ट बना सरकारी दावों, प्रशासनिक सुस्ती और बढ़ती लागत का प्रतीक”

देश के सबसे आधुनिक शहरों में गिने जाने वाले नोएडा में एक ऐसा प्रोजेक्ट है, जो विकास के दावों और जमीनी हकीकत के बीच की खाई को साफ-साफ दिखाता है। सेक्टर-52 और सेक्टर-51 मेट्रो स्टेशन के बीच बन रहा स्काईवॉक आज भी अधूरा खड़ा है। यह वही परियोजना है जिसे शुरू करते समय दावा किया गया था कि मात्र पांच महीने में तैयार कर दिया जाएगा, ताकि दिल्ली मेट्रो की ब्लू लाइन और नोएडा मेट्रो की एक्वा लाइन के बीच सफर करने वाले यात्रियों को निर्बाध और सुरक्षित कनेक्टिविटी मिल सके।

लेकिन आज स्थिति यह है कि परियोजना शुरू होने के करीब तीन साल बाद भी यात्री उसी परेशानी से गुजर रहे हैं, जिसे खत्म करने के लिए यह स्काईवॉक बनाया जा रहा था।

करोड़ों खर्च, लेकिन सुविधा अभी भी अधूरी

इस परियोजना की लागत लगातार बढ़ती हुई अब लगभग 33.50 करोड़ रुपये तक पहुंच चुकी है। सवाल यह है कि जब परियोजना का उद्देश्य यात्रियों को राहत देना था, तो करोड़ों रुपये खर्च होने के बाद भी राहत आखिर दिखाई क्यों नहीं दे रही?

हर बार नई तकनीकी बाधा, नई समीक्षा, नया डिजाइन और नई समयसीमा सामने आती है, लेकिन स्काईवॉक पूरा होने का इंतजार खत्म नहीं होता।

नौ डेडलाइन गुजर गईं, जवाबदेही कहीं नजर नहीं आई

जून 2023 में परियोजना का शिलान्यास हुआ। अधिकारियों ने भरोसा दिलाया कि पांच महीने में निर्माण पूरा कर लिया जाएगा। लेकिन इसके बाद एक नहीं, दो नहीं, बल्कि नौ बार समयसीमा बदली गई।

हर डेडलाइन के साथ यात्रियों को नया आश्वासन मिला, लेकिन स्काईवॉक नहीं मिला।

सबसे बड़ा सवाल यह है कि आखिर इन नौ विफल डेडलाइन के लिए जिम्मेदार कौन है?

क्या किसी अधिकारी से जवाब मांगा गया?

क्या किसी निर्माण एजेंसी पर कार्रवाई हुई?

क्या किसी स्तर पर समीक्षा कर यह तय किया गया कि बार-बार हो रही देरी का कारण क्या है?

यदि नहीं, तो फिर यह परियोजना प्रशासनिक जवाबदेही पर गंभीर प्रश्न खड़े करती है।

दो महीने से पूरी तरह बंद पड़ा है निर्माण कार्य

स्थिति की गंभीरता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि पिछले लगभग दो महीनों से निर्माण कार्य पूरी तरह ठप पड़ा हुआ है।

जिस परियोजना को तेजी से पूरा करने का दावा किया जा रहा था, वहां मशीनें खामोश हैं, निर्माण गतिविधियां बंद हैं और यात्री रोजाना परेशान हो रहे हैं।

यह केवल देरी नहीं है, बल्कि सार्वजनिक परियोजनाओं के प्रबंधन पर सवाल है।

डिजाइन बदलने का सिलसिला आखिर कब खत्म होगा?

जानकारी के अनुसार नोएडा प्राधिकरण, नोएडा मेट्रो और IKEA के बीच कई बैठकों के बाद एक बार फिर डिजाइन में बदलाव का प्रस्ताव सामने आया है।

बताया जा रहा है कि पहले से तैयार हिस्से को आगे बढ़ाकर बाएं मोड़ के माध्यम से जोड़ने पर विचार किया जा रहा है।

यहां सवाल यह उठता है कि क्या परियोजना शुरू करने से पहले पर्याप्त तकनीकी सर्वे और व्यवहार्यता अध्ययन नहीं किया गया था?

यदि डिजाइन में बार-बार बदलाव की जरूरत पड़ रही है, तो क्या प्रारंभिक योजना में गंभीर खामियां थीं?

और यदि खामियां थीं, तो उनकी जिम्मेदारी किसकी है?

स्मार्ट सिटी में यात्रियों की ‘पैदल परीक्षा’

देश में स्मार्ट सिटी, आधुनिक परिवहन और विश्वस्तरीय बुनियादी ढांचे के बड़े-बड़े दावे किए जाते हैं। लेकिन सेक्टर-52 और सेक्टर-51 स्टेशन के बीच मेट्रो बदलने वाले यात्रियों की वास्तविकता कुछ और ही कहानी कहती है।

आज भी यात्रियों को स्टेशन से बाहर निकलना पड़ता है, सीढ़ियां चढ़नी पड़ती हैं, सड़क पार करनी पड़ती है और कई सौ मीटर पैदल चलना पड़ता है।

गर्मी के दिनों में तापमान 45 डिग्री सेल्सियस के आसपास पहुंच रहा है। ऐसे में बुजुर्गों, महिलाओं, बच्चों और दिव्यांग यात्रियों को सबसे ज्यादा परेशानी का सामना करना पड़ रहा है।

विडंबना यह है कि जिस सुविधा के लिए स्काईवॉक बनाया जा रहा है, उसकी अनुपस्थिति ही यात्रियों के लिए रोज की समस्या बन चुकी है।

IIT से मंजूरी मिल गई, फिर देरी क्यों?

नोएडा प्राधिकरण के महाप्रबंधक एसपी सिंह का कहना है कि संशोधित डिजाइन पर चर्चा पूरी हो चुकी है और IIT से तकनीकी मंजूरी भी प्राप्त हो चुकी है।

यदि मंजूरी मिल चुकी है तो फिर काम शुरू होने में देरी क्यों हो रही है?

क्या प्रशासन के पास इसका स्पष्ट जवाब है?

या फिर यह मामला भी उन परियोजनाओं में शामिल हो गया है, जहां “जल्द शुरू होगा” और “शीघ्र पूरा होगा” जैसे वाक्य ही सबसे ज्यादा उपयोग किए जाते हैं?

25 जून की दसवीं डेडलाइन: उम्मीद या औपचारिकता?

अब इस परियोजना की दसवीं डेडलाइन 25 जून निर्धारित की गई है।

लेकिन पिछले रिकॉर्ड को देखते हुए यात्रियों के मन में स्वाभाविक रूप से संदेह है।

क्योंकि नौ बार डेडलाइन चूकने के बाद दसवीं डेडलाइन पर भरोसा करना आसान नहीं है।

लोग पूछ रहे हैं कि क्या इस बार वास्तव में स्काईवॉक पूरा होगा या फिर एक नई समीक्षा बैठक, एक नया तकनीकी कारण और एक नई तारीख घोषित कर दी जाएगी?

जनता का सवाल: आखिर जिम्मेदार कौन?

नोएडा के लाखों यात्रियों का सवाल सीधा और सरल है—

यदि परियोजना समय पर पूरी नहीं हुई तो जिम्मेदार कौन?

यदि लागत बढ़ी तो जिम्मेदार कौन?

यदि बार-बार डिजाइन बदला गया तो जिम्मेदार कौन?

यदि यात्रियों को वर्षों तक परेशानी झेलनी पड़ी तो जिम्मेदार कौन?

जब तक इन सवालों के जवाब तय नहीं होंगे, तब तक हर नई डेडलाइन केवल एक नई घोषणा और हर नई घोषणा केवल एक नया इंतजार बनकर रह जाएगी।

निष्कर्ष

नोएडा का स्काईवॉक अब केवल कंक्रीट और लोहे का ढांचा नहीं रह गया है। यह सरकारी परियोजनाओं की कार्यशैली, प्रशासनिक समन्वय, जवाबदेही और समयबद्ध क्रियान्वयन की वास्तविक परीक्षा बन चुका है।

25 जून की डेडलाइन अब सिर्फ निर्माण कार्य की तारीख नहीं, बल्कि उन वादों की विश्वसनीयता की परीक्षा है जो पिछले तीन वर्षों से बार-बार किए जा रहे हैं।

अब देखना यह है कि इस बार यात्रियों को स्काईवॉक मिलता है या फिर एक और आश्वासन।

 

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VIKAS TRIPATHI
VIKAS TRIPATHIhttp://www.pardaphaas.com
VIKAS TRIPATHI भारत देश की सभी छोटी और बड़ी खबरों को सामने दिखाने के लिए "पर्दाफास न्यूज" चैनल को लेके आए हैं। जिसके लोगो के बीच में करप्शन को कम कर सके। हम देश में समान व्यवहार के साथ काम करेंगे। देश की प्रगति को बढ़ाएंगे।
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