महाराष्ट्र सरकार के मंत्री और नितेश राणे के हालिया बयान ने राज्य की राजनीति में नया विवाद खड़ा कर दिया है। कोल्हापुर के विशालगढ़ में आयोजित एक कार्यक्रम में उन्होंने कहा कि उन्हें “हरे रंग के वोटर्स” से कोई लेना-देना नहीं है और वे न तो “सर्व धर्म समभाव” के विचार को मानते हैं और न ही “गंगा-जमुनी तहजीब” को। उन्होंने यह भी कहा कि उनकी प्राथमिकता केवल हिंदू समाज और हिंदुत्व के हित हैं, उसके बाद ही वे अन्य धर्मों के बारे में सोचेंगे।
हालांकि राणे ने किसी समुदाय का नाम नहीं लिया, लेकिन उनके “हरे रंग के वोटर्स” वाले बयान को व्यापक रूप से मुस्लिम समुदाय की ओर संकेत माना जा रहा है। इस बयान के बाद राजनीतिक दलों के बीच तीखी प्रतिक्रियाओं की संभावना बढ़ गई है।
राणे ने अपने चुनावी प्रदर्शन का उल्लेख करते हुए कहा कि वे 2014 में लगभग 26 हजार वोटों के अंतर से जीते थे, जबकि 2024 में “कट्टर हिंदुत्व” के मुद्दे पर चुनाव लड़कर लगभग 56 हजार वोटों के अंतर से विजयी हुए। उन्होंने दावा किया कि उनकी राजनीतिक सफलता हिंदू मतदाताओं के समर्थन का परिणाम है।
कार्यक्रम के दौरान उन्होंने यह भी कहा कि वर्तमान महाराष्ट्र सरकार “हिंदुत्ववादी सरकार” है और हिंदू मतदाताओं के समर्थन से सत्ता में आई है। उन्होंने मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस का उल्लेख करते हुए कहा कि उन्हें हिंदू समाज ने नेतृत्व का जनादेश दिया है।
समान नागरिक संहिता और शिवाजी महाराज पर भी दिए बयान
राणे ने अपने संबोधन में समान नागरिक संहिता (Uniform Civil Code) का समर्थन करते हुए कहा कि छत्रपति शिवाजी महाराज उसके वास्तविक प्रेरणास्रोत थे। उनका कहना था कि जो कानून हिंदुओं पर लागू होते हैं, वही सभी धर्मों पर समान रूप से लागू होने चाहिए और राज्य में समान नागरिक कानून लागू किया जाएगा।
उन्होंने शिवाजी महाराज की विरासत को लेकर भी टिप्पणी की और कहा कि उन्हें केवल धर्मनिरपेक्ष दृष्टिकोण से प्रस्तुत करना इतिहास की अधूरी व्याख्या है। विशालगढ़ कार्यक्रम में मुस्लिम समुदाय की अनुपस्थिति का उल्लेख करते हुए भी उन्होंने विवादित टिप्पणियां कीं।
विशालगढ़ अतिक्रमण पर कार्रवाई का संकेत
विशालगढ़ किले पर कथित अतिक्रमण के मुद्दे पर राणे ने अधिकारियों को चेतावनी देते हुए कहा कि सरकार उचित समय पर बुलडोजर कार्रवाई करेगी। उन्होंने दावा किया कि उनकी सरकार विशालगढ़ को “अतिक्रमण से मुक्त” कराएगी और वाघजाई देवी मंदिर के जीर्णोद्धार की जिम्मेदारी स्वयं उठाने की घोषणा भी की।
राजनीतिक और संवैधानिक संदर्भ
राणे का बयान ऐसे समय आया है जब देश में धार्मिक पहचान, बहुसंख्यक राजनीति, समान नागरिक संहिता और धर्मनिरपेक्षता जैसे मुद्दों पर लगातार बहस जारी है। उनके बयान को समर्थक हिंदुत्व की स्पष्ट राजनीतिक अभिव्यक्ति बता रहे हैं, जबकि आलोचक इसे संविधान की समानता और सभी नागरिकों के प्रति निर्वाचित प्रतिनिधियों की निष्पक्ष जिम्मेदारी के विपरीत मान सकते हैं।
भारतीय संविधान के अनुसार, सरकार और उसके मंत्री सभी नागरिकों के प्रतिनिधि होते हैं, चाहे उनका धर्म, जाति या समुदाय कोई भी हो। इसी कारण ऐसे बयानों पर अक्सर राजनीतिक और संवैधानिक दोनों स्तरों पर चर्चा होती है।नितेश राणे का यह बयान केवल एक राजनीतिक भाषण नहीं है, बल्कि यह महाराष्ट्र और राष्ट्रीय राजनीति में हिंदुत्व, धर्मनिरपेक्षता, अल्पसंख्यक प्रतिनिधित्व और संवैधानिक मूल्यों के बीच चल रही व्यापक वैचारिक बहस को एक बार फिर केंद्र में ले आया है। आने वाले दिनों में इस पर सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच राजनीतिक टकराव और तेज होने की संभावना है।














