मुंबई में मराठी भाषा को लेकर एक बार फिर बड़ा विवाद खड़ा हो गया है। मीरा-भायंदर क्षेत्र में ऑटो रिक्शा चालकों के लिए मराठी बोलने, लिखने और पढ़ने को अनिवार्य करने के कथित आदेश के बाद राजनीतिक टकराव तेज हो गया है। इस फैसले के विरोध में शिवसेना नेता संजय निरुपम खुलकर सामने आए, जबकि दहिसर में मनसे कार्यकर्ताओं के साथ उनकी तीखी झड़प देखने को मिली। स्थिति बिगड़ने पर पुलिस को हस्तक्षेप करना पड़ा और माहौल को नियंत्रित किया गया।
विवाद की शुरुआत महाराष्ट्र सरकार के परिवहन मंत्री प्रताप सरनाईक के उस आदेश से मानी जा रही है, जिसमें मीरा-भायंदर में ऑटो ड्राइवरों के लिए मराठी भाषा का ज्ञान अनिवार्य बताया गया है। इस आदेश का संजय निरुपम ने कड़ा विरोध किया है। उनका कहना है कि केवल ऑटो और टैक्सी चालकों पर इस तरह की शर्त थोपना अनुचित है। उन्होंने मंत्री को पत्र लिखकर इस फैसले पर पुनर्विचार करने की मांग भी की है।
इसी मुद्दे को लेकर संजय निरुपम दहिसर इलाके में कुछ ऑटो चालकों से मिलने पहुंचे थे। लेकिन वहां पहले से मौजूद मनसे कार्यकर्ताओं ने उन्हें घेर लिया और “निरुपम गो बैक” तथा “एक ही भाषा, मराठी भाषा” जैसे नारे लगाने शुरू कर दिए। देखते ही देखते माहौल गर्म हो गया और दोनों पक्षों के बीच तनाव बढ़ गया।
मौके पर बड़ी संख्या में पुलिसकर्मी तैनात थे, जिन्होंने तुरंत स्थिति संभाली। पुलिस ने संजय निरुपम को सुरक्षित बाहर निकाला और कुछ मनसे कार्यकर्ताओं को हिरासत में भी लिया गया। फिलहाल इलाके में शांति बनी हुई है, लेकिन किसी भी तरह की अप्रिय घटना से बचने के लिए सुरक्षा व्यवस्था कड़ी कर दी गई है।
इस पूरे मामले पर यूबीटी प्रवक्ता आनंद दुबे ने भी प्रतिक्रिया दी। उन्होंने सोशल मीडिया पर वीडियो और ट्वीट के जरिए कहा कि मराठी भाषा का सम्मान होना चाहिए और महाराष्ट्र में रहने वाले हर नागरिक को मराठी बोलना और समझना आना चाहिए। हालांकि, उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अगर यह नियम है, तो फिर केवल टैक्सी और ऑटो चालकों के लिए ही ऐसा प्रावधान क्यों किया जा रहा है। उन्होंने उद्योगपतियों, कॉर्पोरेट कर्मचारियों, फिल्मी सितारों, क्रिकेटरों और आईएएस-आईपीएस अधिकारियों का उदाहरण देते हुए इस नीति की समानता पर प्रश्न उठाया।
यह विवाद अब सिर्फ भाषा तक सीमित नहीं रहा, बल्कि राजनीति, क्षेत्रीय अस्मिता और रोज़मर्रा के रोजगार से जुड़े मुद्दे के रूप में भी देखा जा रहा है। एक ओर मराठी अस्मिता के नाम पर दबाव बनाने की राजनीति है, तो दूसरी ओर यह तर्क भी दिया जा रहा है कि भाषा को लेकर नियम सभी पर समान रूप से लागू होने चाहिए, किसी एक वर्ग पर नहीं।
फिलहाल सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या परिवहन मंत्री प्रताप सरनाईक इस आदेश पर पुनर्विचार करेंगे या विवाद आने वाले दिनों में और गहराएगा। दहिसर की इस झड़प ने एक बार फिर यह दिखा दिया है कि मुंबई और महाराष्ट्र में भाषा का मुद्दा कितनी जल्दी सियासी टकराव में बदल सकता है।














