उत्तरी कश्मीर के बारामूला जिले के गुलमर्ग सेक्टर में शनिवार को हुई एक दर्दनाक घटना ने एक बार फिर यह प्रश्न खड़ा कर दिया है कि सीमा से लगे संवेदनशील क्षेत्रों में वर्षों पुराने अनफटे गोले (Unexploded Ordnance – UXO) आज भी आम नागरिकों की जान के लिए कितना बड़ा खतरा बने हुए हैं।
सुमलोवाली डॉक के पास अचानक हुए शेल विस्फोट में बारामूला के चंदूसा निवासी जुबैर अहमद बजाद की मौके पर ही मौत हो गई, जबकि कई अन्य लोग घायल हो गए। प्रारंभिक जानकारी के अनुसार यह गोला पहले की सैन्य गतिविधियों का बचा हुआ अनफटा मोर्टार शेल हो सकता है, जो अचानक फट गया।
यह घटना केवल एक स्थानीय दुर्घटना नहीं है, बल्कि सीमा क्षेत्रों में रहने वाले हजारों नागरिकों की सुरक्षा से जुड़ा गंभीर राष्ट्रीय मुद्दा है।
सीमा क्षेत्रों में क्यों बना रहता है ऐसा खतरा?
भारत-पाकिस्तान नियंत्रण रेखा (LoC) के आसपास कई दशकों से सैन्य तनाव, गोलाबारी और मुठभेड़ें होती रही हैं। इन परिस्थितियों में दागे गए अनेक मोर्टार, गोले और अन्य विस्फोटक कभी-कभी फट नहीं पाते और वर्षों तक जमीन, जंगलों या चरागाहों में दबे रह जाते हैं।
ऐसे अनफटे विस्फोटक (UXO) समय के साथ और अधिक अस्थिर हो जाते हैं। हल्की छेड़छाड़, कंपन, मौसम या अन्य कारणों से भी इनमें विस्फोट हो सकता है, जिससे स्थानीय ग्रामीणों, चरवाहों, मजदूरों और पर्यटकों की जान जोखिम में पड़ जाती है।
क्या केवल सैन्य क्षेत्र ही नहीं, नागरिक क्षेत्र भी हैं खतरे में?
गुलमर्ग जैसे इलाके पर्यटन, कृषि, पशुपालन और स्थानीय आजीविका के महत्वपूर्ण केंद्र हैं। ऐसे क्षेत्रों में यदि अनफटे गोले मौजूद हों, तो खतरा केवल सेना तक सीमित नहीं रहता बल्कि आम नागरिक भी इसकी चपेट में आ सकते हैं।
विशेषज्ञ लंबे समय से मांग करते रहे हैं कि—
सीमा क्षेत्रों की नियमित Explosive Clearance (विस्फोटक सफाई) की जाए।
संवेदनशील स्थानों का वैज्ञानिक सर्वेक्षण किया जाए।
स्थानीय लोगों को UXO की पहचान और उससे बचाव का प्रशिक्षण दिया जाए।
संदिग्ध वस्तु मिलने पर तत्काल सूचना देने की प्रभावी व्यवस्था बनाई जाए।
स्कूलों और पंचायत स्तर पर जागरूकता अभियान चलाए जाएं।
अफवाहों पर भी प्रशासन की सख्ती
घटना के बाद सोशल मीडिया पर यह दावा भी किया गया कि आशा पोस्ट पर सेना के जवान घायल हुए हैं। हालांकि बारामूला पुलिस ने स्पष्ट किया कि यह सूचना पूरी तरह झूठी और भ्रामक है तथा किसी भी सैनिक के घायल होने की पुष्टि नहीं हुई है।
पुलिस ने चेतावनी दी है कि झूठी या भ्रामक जानकारी फैलाने वालों के विरुद्ध कानून के अनुसार सख्त कार्रवाई की जाएगी।
यह पहलू इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि संवेदनशील सीमा क्षेत्रों में फैलाई गई अफवाहें न केवल लोगों में भय पैदा करती हैं बल्कि सुरक्षा व्यवस्था और सार्वजनिक शांति को भी प्रभावित कर सकती हैं।
इस घटना से उठते महत्वपूर्ण प्रश्न
क्या LoC से लगे क्षेत्रों में अनफटे गोले हटाने की प्रक्रिया पर्याप्त है?
क्या स्थानीय नागरिकों को संभावित विस्फोटकों के प्रति पर्याप्त जागरूक किया गया है?
क्या सीमा क्षेत्रों में नियमित सुरक्षा ऑडिट और जोखिम मानचित्रण (Risk Mapping) किया जाता है?
क्या पर्यटन और नागरिक गतिविधियों वाले इलाकों की समय-समय पर विशेष जांच होनी चाहिए?
क्या भारत को युद्ध के अवशेषों से नागरिकों की सुरक्षा के लिए और अधिक व्यापक नीति अपनाने की आवश्यकता है?
गुलमर्ग की यह दुखद घटना केवल एक व्यक्ति की मृत्यु तक सीमित नहीं है, बल्कि यह याद दिलाती है कि युद्ध और सीमा संघर्षों के प्रभाव केवल युद्धभूमि तक सीमित नहीं रहते, बल्कि उनके अवशेष वर्षों बाद भी निर्दोष नागरिकों की जान ले सकते हैं।
आवश्यक है कि सीमा क्षेत्रों में आधुनिक तकनीक के माध्यम से अनफटे विस्फोटकों की पहचान और निष्क्रियकरण, नागरिक जागरूकता, नियमित सुरक्षा सर्वेक्षण तथा अफवाहों पर त्वरित नियंत्रण को राष्ट्रीय सुरक्षा और मानव सुरक्षा—दोनों के दृष्टिकोण से सर्वोच्च प्राथमिकता दी जाए। ऐसी घटनाएं केवल सुरक्षा व्यवस्था ही नहीं, बल्कि संवेदनशील क्षेत्रों में रहने वाले नागरिकों के जीवन और विश्वास की रक्षा की भी चुनौती हैं।














