वाराणसी: टकसाल सिनेमा शूटआउट मामले में 24 साल बाद आए फैसले ने सिर्फ एक आपराधिक केस का पटाक्षेप नहीं किया, बल्कि पूर्वांचल की राजनीति की उस पुरानी कहानी को भी फिर से चर्चा में ला दिया, जिसमें कभी गहरे दोस्त रहे अभय सिंह और धनंजय सिंह वक्त के साथ कट्टर दुश्मन बन गए।
जब दोस्ती थी मिसाल
एक समय ऐसा था जब अभय सिंह और धनंजय सिंह की दोस्ती पूर्वांचल में मिसाल मानी जाती थी। दोनों का राजनीतिक और सामाजिक दायरा एक-दूसरे से जुड़ा हुआ था। कार्यक्रमों, चुनावी रणनीतियों और स्थानीय प्रभाव को बढ़ाने में दोनों एक-दूसरे के सहयोगी माने जाते थे। उनकी जोड़ी को “पावर कॉम्बिनेशन” कहा जाता था, जहां एक की ताकत दूसरे की पहचान को और मजबूत करती थी।
दरार की शुरुआत कैसे हुई?
राजनीति में बढ़ते प्रभाव और वर्चस्व की लड़ाई ने इस दोस्ती में पहली दरार डाली। जैसे-जैसे दोनों नेताओं का कद बढ़ा, वैसे-वैसे उनके समर्थक गुटों के बीच टकराव भी बढ़ने लगा। स्थानीय स्तर पर ठेके, जमीन, वर्चस्व और राजनीतिक पकड़ को लेकर मतभेद सामने आने लगे। यह टकराव धीरे-धीरे व्यक्तिगत अहं और प्रतिष्ठा की लड़ाई में बदल गया।
चुनावी प्रतिस्पर्धा बनी दुश्मनी की वजह
राजनीतिक महत्वाकांक्षा इस रिश्ते के टूटने की सबसे बड़ी वजह मानी जाती है। जब दोनों नेता एक ही क्षेत्र में मजबूत पकड़ बनाने लगे, तो चुनावी मुकाबले और समर्थन आधार को लेकर प्रतिस्पर्धा तेज हो गई। समर्थकों के बीच हुई झड़पों और आरोप-प्रत्यारोप ने हालात को और बिगाड़ दिया। दोनों खेमों के बीच अविश्वास इतना बढ़ा कि संवाद लगभग खत्म हो गया।
टकसाल शूटआउट: दुश्मनी का चरम
4 अक्टूबर 2002 को वाराणसी के टकसाल सिनेमा के पास हुआ शूटआउट इसी दुश्मनी का चरम माना गया। आरोप था कि धनंजय सिंह के काफिले पर अंधाधुंध फायरिंग की गई, जिसमें उनके गनर और ड्राइवर समेत कई लोग घायल हुए।
इस घटना के बाद दोनों नेताओं के बीच रिश्ते पूरी तरह टूट गए और मामला अदालत तक पहुंच गया।
‘दोस्ती से दुश्मनी’ की राजनीति
पूर्वांचल की राजनीति में ऐसे कई उदाहरण रहे हैं, जहां दोस्ती सत्ता और प्रभाव की लड़ाई में बदलकर दुश्मनी में तब्दील हो जाती है। अभय सिंह और धनंजय सिंह की कहानी भी इसी ट्रेंड का हिस्सा मानी जाती है—जहां व्यक्तिगत संबंध, राजनीतिक महत्वाकांक्षा के आगे टिक नहीं पाए।
24 साल बाद आया फैसला
अब 24 साल बाद MP-MLA कोर्ट ने सबूतों के अभाव में अभय सिंह समेत अन्य आरोपियों को बरी कर दिया है। लेकिन यह फैसला उस दौर की राजनीति, दोस्ती और दुश्मनी की कहानी को फिर से सामने ले आया है।
यह पूरा घटनाक्रम बताता है कि राजनीति में रिश्ते कितने जल्दी बदल सकते हैं—जहां कभी साथ चलने वाले लोग हालात के चलते आमने-सामने खड़े हो जाते हैं।














