Sunday, August 16, 2026
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फंदे से लटका मिला पूर्व डिप्टी स्पीकर आशीष बनर्जी का शव, सुसाइड नोट में लिखा—‘भ्रष्टाचार नहीं किया, राजनीति में आने का अफसोस’

“बीरभूम के TMC कार्यालय में मिली 74 वर्षीय वरिष्ठ नेता की लाश, रेत टेंडर और कई सरकारी प्रक्रियाओं का सुसाइड नोट में जिक्र; पांच बार रामपुरहाट से विधायक रहे, ममता सरकार में मंत्री और विधानसभा के डिप्टी स्पीकर भी बने”

कोलकाता/बीरभूम। पश्चिम बंगाल की राजनीति में लंबे समय तक सक्रिय रहे तृणमूल कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और विधानसभा के पूर्व डिप्टी स्पीकर आशीष बनर्जी की संदिग्ध परिस्थितियों में मौत से राजनीतिक गलियारों में हलचल मच गई है। 74 वर्षीय बनर्जी का शव रविवार सुबह बीरभूम जिले स्थित टीएमसी कार्यालय में फांसी के फंदे से लटका मिला। घटना की जानकारी मिलते ही पुलिस मौके पर पहुंची और जांच शुरू कर दी। पुलिस को शव के पास से एक सुसाइड नोट भी मिला है, जिसमें आशीष बनर्जी ने भ्रष्टाचार के आरोपों से खुद को अलग बताया है और कुछ सरकारी टेंडर, प्लान पास करने, एनओसी तथा चेक से जुड़े मामलों का जिक्र किया है।

पुलिस फिलहाल मामले की जांच कर रही है। ऐसे में उनकी मौत को लेकर अंतिम निष्कर्ष जांच पूरी होने के बाद ही सामने आएगा। हालांकि, शुरुआती जानकारी और बरामद नोट ने कई सवाल खड़े कर दिए हैं। खास तौर पर यह सवाल कि आखिर लंबे राजनीतिक अनुभव और पार्टी में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले एक वरिष्ठ नेता ने ऐसा कदम क्यों उठाया?

पांच बार विधायक, ममता सरकार में मंत्री और विधानसभा के डिप्टी स्पीकर

आशीष बनर्जी को तृणमूल कांग्रेस के उन नेताओं में गिना जाता था, जिन्होंने लंबे समय तक पार्टी और पश्चिम बंगाल की राजनीति में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। रामपुरहाट विधानसभा सीट पर उनकी मजबूत राजनीतिक पकड़ थी। वह लगातार पांच बार विधायक चुने गए।

उन्होंने वर्ष 2001, 2006, 2011, 2016 और 2021 के विधानसभा चुनावों में रामपुरहाट सीट से जीत हासिल की। यह लगातार पांच चुनावों में उनकी जीत थी, जो क्षेत्र में उनके मजबूत जनाधार को दर्शाती थी। बाद में ममता बनर्जी के नेतृत्व वाली सरकार में उन्हें कई महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां मिलीं। वह राज्य सरकार में अलग-अलग विभागों के मंत्री रहे और विधानसभा के डिप्टी स्पीकर का पद भी संभाला।

हालांकि, 2026 में हुए विधानसभा चुनाव में उनका विजय रथ रुक गया। रामपुरहाट सीट पर उन्हें बीजेपी उम्मीदवार ध्रुबा साहा के हाथों हार का सामना करना पड़ा। यह उनके लंबे राजनीतिक करियर में एक बड़ा झटका माना गया।

राजनीति में आने से पहले थे प्रोफेसर

आशीष बनर्जी का राजनीतिक सफर सीधे राजनीति से शुरू नहीं हुआ था। सक्रिय राजनीति में आने से पहले वह शिक्षा के क्षेत्र से जुड़े थे और रामपुरहाट कॉलेज में प्रोफेसर के तौर पर काम कर चुके थे। शिक्षण के क्षेत्र से निकलकर उन्होंने तृणमूल कांग्रेस का दामन थामा और धीरे-धीरे पार्टी के प्रमुख नेताओं में अपनी जगह बनाई।

तृणमूल कांग्रेस में उनकी संगठनात्मक क्षमता और क्षेत्र में पकड़ को देखते हुए उन्हें कई महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां दी गईं। ममता बनर्जी के करीबी नेताओं में शामिल आशीष बनर्जी ने राज्य सरकार में भी कई विभागों की जिम्मेदारी संभाली।

वर्ष 2014 में उन्हें पहली बार आयुष विभाग का राज्य मंत्री बनाया गया। इसके बाद उन्होंने कृषि और स्कूल शिक्षा समेत कई विभागों की जिम्मेदारी संभाली। सरकार और संगठन, दोनों स्तरों पर लंबे समय तक सक्रिय रहने के कारण वह बीरभूम की राजनीति में टीएमसी के प्रमुख चेहरों में शामिल रहे।

दो जून को पार्टी की अहम जिम्मेदारी से दिया था इस्तीफा

आशीष बनर्जी की मौत से पहले उनके राजनीतिक जीवन में एक महत्वपूर्ण बदलाव भी हुआ था। उन्होंने 2 जून को तृणमूल कांग्रेस के बीरभूम जिला अध्यक्ष और जिला कोर कमेटी के अध्यक्ष पद से इस्तीफा दे दिया था।

इस्तीफा देते समय उन्होंने कहा था कि जिला कोर कमेटी निष्क्रिय हो चुकी थी और अब उसके काम करने की जरूरत नहीं रह गई थी। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया था कि वह आगे पार्टी में सिर्फ एक सामान्य सदस्य के रूप में रहेंगे।

उनका इस्तीफा ऐसे समय आया था, जब विधानसभा चुनाव में तृणमूल कांग्रेस को राज्य में बड़ा राजनीतिक झटका लगा था। चुनाव परिणामों के बाद पार्टी के भीतर संगठनात्मक स्तर पर भी कई तरह के बदलाव और मंथन चल रहे थे। आशीष बनर्जी जैसे वरिष्ठ नेता का जिला संगठन की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी छोड़ना इसलिए भी चर्चा में रहा।

स्वतंत्रता दिवस पर फहराया था तिरंगा, तस्वीरें भी की थीं साझा

सबसे अहम बात यह है कि आशीष बनर्जी ने मौत से एक दिन पहले यानी 15 अगस्त को स्वतंत्रता दिवस के मौके पर तिरंगा फहराया था। बताया गया कि उन्होंने बीरभूम में अपने घर के पास आयोजित कार्यक्रम में हिस्सा लिया और झंडा फहराया।

उन्होंने इस कार्यक्रम की तस्वीरें सोशल मीडिया पर भी साझा की थीं। परिवार के मुताबिक उस दिन भी उनके व्यवहार में ऐसी कोई बात नजर नहीं आई, जिससे किसी बड़े संकट का अंदाजा लगाया जा सके।

आशीष बनर्जी के भाई प्रशांत बनर्जी ने बताया कि परिवार को तब शक हुआ, जब दरवाजे में मौजूद थोड़ी सी जगह से रस्सी लटकी हुई दिखाई दी। इसके बाद परिवार के सदस्यों को बुलाया गया और पुलिस को सूचना दी गई।

परिवार के मुताबिक आशीष बनर्जी रोजाना की तरह लोगों से मिलते-जुलते थे। उनके भाई ने कहा कि रात तक भी ऐसा कुछ असामान्य महसूस नहीं हुआ था। दिनभर वह उसी कार्यालय में मौजूद रहे थे, जहां स्वतंत्रता दिवस के मौके पर कार्यक्रम हुआ था और सब कुछ सामान्य दिखाई दे रहा था।

सुसाइड नोट में रेत टेंडर और भ्रष्टाचार का जिक्र

मामले में सबसे महत्वपूर्ण कड़ी पुलिस को मिला वह सुसाइड नोट है, जिसमें आशीष बनर्जी ने कुछ सरकारी कामकाज और टेंडर से जुड़े मामलों का जिक्र किया है।

बताया जा रहा है कि नोट में उन्होंने रेत के टेंडर का उल्लेख किया और कहा कि उन्होंने कभी भ्रष्टाचार नहीं किया तथा किसी काम के बदले पैसे नहीं लिए। उन्होंने TRDA यानी तारापीठ-रामपुरहाट डेवलपमेंट अथॉरिटी से जुड़े टेंडर, प्लान पास करने, एनओसी और चेक से संबंधित मामलों में अपनी भूमिका से इनकार किया।

नोट में उन्होंने अपनी मौत के लिए किसी को जिम्मेदार नहीं बताया। साथ ही, उन्होंने राजनीति में आने पर अफसोस जताया। पुलिस अब इस नोट की प्रामाणिकता और उसमें किए गए दावों की जांच कर रही है।

यह भी पता लगाने की कोशिश की जा रही है कि नोट में जिन टेंडर और सरकारी प्रक्रियाओं का जिक्र किया गया है, उनका पूरा संदर्भ क्या है और क्या हाल के दिनों में इन मामलों को लेकर आशीष बनर्जी किसी दबाव या विवाद में थे।

राजनीतिक सफर का अंत सवालों के बीच

आशीष बनर्जी की मौत ने उनके दशकों लंबे राजनीतिक सफर पर भी सवाल खड़े कर दिए हैं। एक शिक्षक के तौर पर करियर शुरू करने वाले आशीष बनर्जी ने राजनीति में आने के बाद लगातार अपना प्रभाव बढ़ाया। रामपुरहाट से पांच बार विधायक बनना उनकी राजनीतिक ताकत का सबसे बड़ा प्रमाण रहा।

ममता बनर्जी सरकार में मंत्री से लेकर विधानसभा के डिप्टी स्पीकर तक की जिम्मेदारी संभालने वाले आशीष बनर्जी बीरभूम में टीएमसी के महत्वपूर्ण नेताओं में शामिल थे। हालांकि, 2026 के विधानसभा चुनाव में उनकी हार और इसके बाद जिला संगठन की जिम्मेदारी से उनका इस्तीफा उनके राजनीतिक जीवन के आखिरी दौर में बड़े बदलाव के रूप में देखा गया।

अब उनकी संदिग्ध मौत ने इन घटनाओं को एक बार फिर चर्चा के केंद्र में ला दिया है। क्या राजनीतिक जीवन से जुड़े हालिया घटनाक्रम का उनकी मानसिक स्थिति पर कोई असर था? क्या सुसाइड नोट में किए गए दावों के पीछे कोई बड़ा विवाद था? या फिर मौत के पीछे कोई अन्य वजह थी? इन सवालों के जवाब पुलिस जांच के बाद ही स्पष्ट हो पाएंगे।

परिवार ने बताया—रात तक सबकुछ सामान्य था

परिवार के लिए भी यह घटना किसी सदमे से कम नहीं है। भाई प्रशांत बनर्जी के अनुसार, आशीष बनर्जी से परिवार के लोगों की नियमित मुलाकात होती थी और घटना से पहले तक उनके व्यवहार में किसी बड़े बदलाव की जानकारी नहीं थी।

15 अगस्त को भी वह सार्वजनिक कार्यक्रम में सक्रिय नजर आए। उन्होंने तिरंगा फहराया, तस्वीरें साझा कीं और दिनभर पार्टी कार्यालय में रहे। इसके बाद अगले ही दिन उनका शव उसी कार्यालय में फंदे से लटका मिला।

घटना की सूचना के बाद पुलिस ने मौके पर पहुंचकर शव को कब्जे में लिया और आवश्यक कानूनी प्रक्रिया शुरू की। सुसाइड नोट को भी जांच का अहम हिस्सा माना जा रहा है। पुलिस यह पता लगाने में जुटी है कि नोट में लिखी गई बातें किन परिस्थितियों से जुड़ी थीं और आशीष बनर्जी की मौत की वास्तविक वजह क्या थी।

प्रोफेसर से मंत्री तक का सफर, फिर राजनीति से दूरी

आशीष बनर्जी की कहानी पश्चिम बंगाल की राजनीति में एक ऐसे नेता की कहानी रही, जिसने शिक्षा के क्षेत्र से निकलकर सत्ता के शीर्ष स्तर तक अपनी जगह बनाई। रामपुरहाट कॉलेज के प्रोफेसर से लेकर पांच बार विधायक, मंत्री और विधानसभा के डिप्टी स्पीकर तक उनका सफर लंबा और प्रभावशाली रहा।

लेकिन राजनीतिक करियर के अंतिम चरण में परिस्थितियां बदलती चली गईं। 2026 के विधानसभा चुनाव में हार, इसके बाद जिला संगठन की जिम्मेदारियों से इस्तीफा और अब टीएमसी कार्यालय में उनकी संदिग्ध मौत—इन घटनाओं ने उनके अंतिम दौर को कई सवालों से घेर दिया है।

फिलहाल सबसे जरूरी है कि पुलिस हर पहलू की निष्पक्ष जांच करे और सुसाइड नोट में लिखी बातों की सत्यता की पड़ताल करे। आशीष बनर्जी की मौत ने न सिर्फ उनके परिवार और समर्थकों को गहरा सदमा दिया है, बल्कि पश्चिम बंगाल की राजनीति में भी एक वरिष्ठ और लंबे समय तक सक्रिय रहे नेता के अचानक चले जाने से शोक और चर्चा का माहौल पैदा कर दिया है।

आशीष बनर्जी की मौत के पीछे की पूरी सच्चाई जांच के बाद ही सामने आएगी, लेकिन उनकी जिंदगी का राजनीतिक सफर—प्रोफेसर से मंत्री, पांच बार विधायक और विधानसभा के डिप्टी स्पीकर तक—पश्चिम बंगाल की राजनीति में लंबे समय तक याद किया जाएगा।

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VIKAS TRIPATHI
VIKAS TRIPATHIhttp://www.pardaphaas.com
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