Thursday, April 30, 2026
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“ऑर्डर मानो वरना अवमानना झेलो”: सुप्रीम कोर्ट का केंद्र और AIIMS पर सख्त प्रहार, नाबालिग रेप पीड़िता के गर्भपात में देरी पर फूटा गुस्सा

देश की सर्वोच्च अदालत ने नाबालिग रेप पीड़िता के गर्भपात मामले में आदेश के पालन में हुई देरी को लेकर केंद्र सरकार और All India Institute of Medical Sciences पर अभूतपूर्व सख्ती दिखाई है। Supreme Court of India ने केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय के वरिष्ठ अधिकारियों और AIIMS निदेशक को अवमानना नोटिस जारी करते हुए सोमवार 4 मई तक जवाब तलब किया है और साफ चेतावनी दी है कि यदि तब तक उसके आदेश का पालन नहीं हुआ तो अदालत अवमानना में आरोप तय करने की कार्रवाई शुरू करेगी।

यह मामला उस 15 वर्षीय नाबालिग लड़की से जुड़ा है जिसकी 30 सप्ताह से अधिक की अनचाही गर्भावस्था को समाप्त करने की अनुमति अदालत ने 24 अप्रैल को दी थी। अदालत का मानना था कि किसी भी महिला—विशेषकर एक नाबालिग रेप पीड़िता—को उसकी इच्छा के विरुद्ध मातृत्व ढोने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता। इसके बावजूद आदेश के अनुपालन में लगातार टालमटोल और कानूनी आपत्तियों ने अदालत को बेहद नाराज कर दिया।


जस्टिस नागरत्ना की बेंच का अल्टीमेटम — सोमवार तक पालन नहीं तो चार्ज फ्रेम

Justice B. V. Nagarathna और Justice Ujjal Bhuyan की बेंच ने कथित अवमानना याचिका पर सुनवाई करते हुए मिनिस्ट्री ऑफ हेल्थ एंड फैमिली वेलफेयर के प्रिंसिपल सेक्रेटरी, डिपार्टमेंट ऑफ हेल्थ के सेक्रेटरी और AIIMS निदेशक को वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए 4 मई को व्यक्तिगत रूप से उपस्थित रहने का आदेश दिया।

बेंच ने दो टूक कहा— अदालत को किसी बहाने, किसी तकनीकी तर्क या किसी प्रशासनिक सफाई से मतलब नहीं; उसे केवल अपने आदेश का पालन चाहिए। न्यायालय ने स्पष्ट कर दिया कि अगर सोमवार तक गर्भसमापन की प्रक्रिया नहीं कराई गई तो संबंधित अधिकारियों के खिलाफ कंटेम्प्ट चार्ज फ्रेम किए जाएंगे।


क्या है पूरा विवाद? 24 अप्रैल के आदेश के बाद भी क्यों अटका मामला

नाबालिग की मां ने मेडिकल टर्मिनेशन ऑफ प्रेग्नेंसी एक्ट की वैधानिक सीमा से आगे जाकर गर्भपात की अनुमति मांगी थी। अदालत ने मामले की संवेदनशीलता, लड़की की उम्र, मानसिक स्थिति और उसकी स्पष्ट अनिच्छा को देखते हुए मेडिकल टर्मिनेशन की अनुमति दी थी।

कोर्ट ने अपने आदेश में कहा था कि:

अनचाही गर्भावस्था को जारी रखने के लिए मजबूर करना महिला की शारीरिक स्वायत्तता पर हमला है

नाबालिग पर मातृत्व थोपना उसे आजीवन मानसिक, भावनात्मक और शारीरिक आघात देगा

यह Article 21 of Constitution के तहत उसके मौलिक अधिकारों का उल्लंघन होगा

अदालत ने साफ कहा था कि “गोद देने” का विकल्प किसी महिला पर जबरन गर्भ जारी रखने का संवैधानिक औचित्य नहीं बन सकता।


AIIMS ने पहले रिव्यू, फिर क्यूरेटिव पिटीशन दाखिल कर बढ़ाई अदालत की नाराजगी

आदेश के बाद AIIMS ने मेडिकल जटिलताओं और भ्रूण की जीवित स्थिति का हवाला देते हुए पहले रिव्यू पिटीशन दाखिल की। उसका तर्क था कि 30 सप्ताह की गर्भावस्था में टर्मिनेशन सामान्य गर्भपात नहीं बल्कि प्री-टर्म डिलीवरी जैसा होगा, जिससे नाबालिग और भ्रूण दोनों के लिए गंभीर खतरे पैदा हो सकते हैं।

लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने AIIMS की इस दलील को खारिज करते हुए टिप्पणी की कि यह “अजीब” है कि देश का सबसे बड़ा मेडिकल संस्थान सुप्रीम कोर्ट के आदेश का पालन करने के बजाय नाबालिग के संवैधानिक अधिकारों को निष्प्रभावी करने की कोशिश कर रहा है।

इतना ही नहीं, बाद में क्यूरेटिव पिटीशन के जरिए भी आदेश को चुनौती देने की कोशिश हुई, जिसे CJI Surya Kant और Justice Joymalya Bagchi की बेंच ने सुनने से इनकार कर दिया। कोर्ट ने कहा— “Parents will choose, not AIIMS.” यानी फैसला संस्थान नहीं, पीड़िता का परिवार करेगा; संस्थान का काम विकल्प उपलब्ध कराना है, निर्णय थोपना नहीं।


“अनचाही प्रेग्नेंसी महिला पर नहीं थोपी जा सकती” — सुप्रीम कोर्ट ने दोहराया सिद्धांत

सुनवाई के दौरान अदालत ने बेहद मानवीय और संवेदनशील टिप्पणी करते हुए कहा कि यह एक चाइल्ड रेप सर्वाइवर का मामला है। जिस उम्र में लड़की को स्कूल, सपने और सामान्य जीवन जीना चाहिए, उस उम्र में उसे जबरन मां बनने के लिए कहना न्याय नहीं हो सकता।

कोर्ट ने कहा कि:

“Unwanted pregnancy cannot be thrust on a person… imagine the pain, humiliation and lifelong trauma.”

अदालत ने केंद्र सरकार को यह भी सुझाव दिया कि रेप पीड़िताओं के मामलों में गर्भपात की समयसीमा पर कानून की पुनर्समीक्षा की जानी चाहिए, क्योंकि ऐसे मामलों में कठोर समय सीमा कई बार पीड़िता के अधिकारों के खिलाफ चली जाती है।


देशभर में छिड़ी बहस — संवैधानिक अधिकार बनाम मेडिकल एथिक्स

यह मामला अब सिर्फ एक अदालत के आदेश के अनुपालन का नहीं रह गया है, बल्कि यह देश में महिला की शारीरिक स्वायत्तता, नाबालिग पीड़िताओं के अधिकार और मेडिकल संस्थानों की भूमिका पर राष्ट्रीय बहस का केंद्र बन गया है।

ऑनलाइन चर्चाओं में भी दो राय दिख रही हैं— एक पक्ष अदालत के महिला की पसंद को सर्वोच्च मानने वाले रुख की सराहना कर रहा है, जबकि दूसरा पक्ष 30 सप्ताह के उन्नत गर्भ में मेडिकल जटिलताओं को लेकर डॉक्टरों की दुविधा पर चर्चा कर रहा है।


सोमवार को तय होगा— आदेश का सम्मान या अवमानना की तलवार

अब निगाहें 4 मई पर टिक गई हैं। यदि तब तक सुप्रीम कोर्ट के आदेश के अनुसार मेडिकल टर्मिनेशन नहीं कराया जाता, तो केंद्र सरकार के स्वास्थ्य अधिकारी और AIIMS प्रशासन सीधे अवमानना की कार्रवाई का सामना करेंगे।

यह मामला साफ संकेत दे रहा है कि सुप्रीम कोर्ट महिला की पसंद, गरिमा और संवैधानिक स्वतंत्रता के सवाल पर किसी भी संस्थागत प्रतिरोध को बर्दाश्त करने के मूड में नहीं है। सोमवार की सुनवाई सिर्फ एक केस नहीं, बल्कि न्यायपालिका बनाम संस्थागत हिचकिचाहट की बड़ी परीक्षा बन चुकी है।

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VIKAS TRIPATHI
VIKAS TRIPATHIhttp://www.pardaphaas.com
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