“पहले मुठभेड़, फिर सवाल, उसके बाद स्वीकारोक्ति”
बिहार के भोजपुर जिले में भरत तिवारी की कथित पुलिस मुठभेड़ में हुई मौत ने राज्य की कानून-व्यवस्था और प्रशासनिक जवाबदेही पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। विडंबना देखिए कि जिस सरकार ने वर्षों तक “सुशासन” को अपनी सबसे बड़ी उपलब्धि बताया, उसी सरकार को अब अपनी पुलिस की कार्रवाई पर सफाई देनी पड़ रही है।
पहले मुठभेड़ हुई। फिर पुलिस ने कार्रवाई को उचित ठहराया। इसके बाद सवाल उठे, वीडियो वायरल हुए, मामला अदालत पहुँचा और अंततः पुलिस मुख्यालय को स्वीकार करना पड़ा कि पूरे ऑपरेशन में “गंभीर चूक” हुई थी।
ऐसा लगता है कि आजकल सच घटनास्थल से नहीं, बल्कि सोशल मीडिया और अदालतों के रास्ते सामने आता है।
चूक हुई, लेकिन जिम्मेदार कौन?
पुलिस मुख्यालय ने शाहपुर थाना प्रभारी समेत पाँच पुलिसकर्मियों को निलंबित कर दिया है। लेकिन सबसे बुनियादी सवाल अब भी अनुत्तरित है—यदि कार्रवाई में इतनी गंभीर चूक हुई, तो उसका जिम्मेदार कौन है?
क्या पुलिस अभियान बिना स्पष्ट नेतृत्व के चलाया गया? क्या किसी अधिकारी ने ऑपरेशन की निगरानी नहीं की? क्या फायरिंग का कोई स्पष्ट रिकॉर्ड नहीं रखा गया?
अगर सरकार के पास इन सवालों के जवाब नहीं हैं, तो यह केवल एक प्रशासनिक चूक नहीं, बल्कि पूरी व्यवस्था की विफलता है।
चार गोलियाँ चलीं, लेकिन किसने चलाईं?
यह शायद देश के इतिहास का सबसे विचित्र सवाल है कि पुलिस कार्रवाई के कई दिन बाद भी यह स्पष्ट नहीं हो पाया है कि भरत तिवारी को लगी चार गोलियाँ किसने चलाईं।
क्या सभी गोलियाँ एक ही हथियार से चलीं? क्या कई पुलिसकर्मियों ने फायरिंग की? क्या फायरिंग आत्मरक्षा में हुई? क्या बल प्रयोग के मानकों का पालन किया गया?
जब पुलिस खुद इन सवालों का जवाब नहीं दे पा रही है, तो आम नागरिकों का भरोसा कैसे कायम रहेगा?
वायरल वीडियो ने खोली प्रशासनिक दावों की परतें
मामले ने नया मोड़ तब लिया, जब निलंबित थाना प्रभारी का एक वीडियो सामने आया। वीडियो में कथित तौर पर दावा किया गया कि एसटीएफ के एक जवान ने भरत तिवारी के पैर में गोली मारी थी।
अब सवाल यह है कि यदि गोली पैर में लगी थी, तो मौत कैसे हुई?
अगर मौत किसी अन्य कारण से हुई, तो वह क्या था? अगर अन्य गोलियाँ भी चलीं, तो उन्हें किसने चलाया? और यदि यह सब पुलिस को नहीं पता, तो फिर ऑपरेशन का संचालन किस तरह किया गया?
ऐसा प्रतीत होता है कि सरकार के पास जवाब कम और सवाल अधिक हैं।
जांच आयोग: समाधान या समय खरीदने का माध्यम?
जैसे ही मामला राजनीतिक और कानूनी रूप से संवेदनशील हुआ, सरकार ने न्यायिक जांच आयोग के गठन की घोषणा कर दी।
हमारे लोकतंत्र में जांच आयोग अक्सर सच्चाई तक पहुँचने का माध्यम कम और तत्काल जवाबदेही से बचने का सुविधाजनक रास्ता अधिक बन जाते हैं।
आयोग बनेगा, बयान दर्ज होंगे, रिपोर्ट तैयार होगी और फिर शायद कोई नई घटना पुरानी घटना की जगह ले लेगी।
जनता का सवाल सीधा है—क्या इस बार भी ऐसा ही होगा?
सुशासन का दावा और जमीनी हकीकत
बिहार सरकार लंबे समय से कानून-व्यवस्था को अपनी बड़ी उपलब्धियों में गिनाती रही है। लेकिन भोजपुर की यह घटना एक असहज प्रश्न खड़ा करती है—क्या कानून-व्यवस्था का अर्थ केवल अपराधियों पर कार्रवाई करना है, या फिर यह सुनिश्चित करना भी है कि हर कार्रवाई कानून के दायरे में हो?
लोकतांत्रिक व्यवस्था में पुलिस को शक्ति मिलती है, लेकिन उस शक्ति के साथ जवाबदेही भी जुड़ी होती है।
अगर जवाबदेही केवल तब तय होती है, जब वीडियो वायरल हो जाएँ, जनदबाव बढ़ जाए और अदालतें हस्तक्षेप करें, तो यह सुशासन नहीं, बल्कि प्रतिक्रियात्मक शासन का संकेत है।
अदालतों की दहलीज पर न्याय की उम्मीद
अब यह मामला पटना हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट तक पहुँच चुका है। याचिकाओं में स्वतंत्र जांच, दोषी पुलिसकर्मियों के खिलाफ कार्रवाई और सीबीआई जांच की मांग की गई है।
यह अपने आप में एक बड़ा संकेत है कि जनता का भरोसा प्रशासनिक जांच से अधिक न्यायपालिका पर टिकता जा रहा है।
जब हर बड़े मामले में अंतिम उम्मीद अदालतों से जुड़ जाए, तो सरकार को आत्ममंथन करने की आवश्यकता होती है।
असली सवाल भरत तिवारी नहीं, व्यवस्था है
यह मामला केवल एक व्यक्ति की मौत का नहीं है। यह उस व्यवस्था की परीक्षा है, जो कानून लागू करने का दावा करती है।
सवाल यह नहीं है कि भरत तिवारी कौन था। सवाल यह है कि क्या किसी भी व्यक्ति के साथ कानून के दायरे से बाहर जाकर कार्रवाई की जा सकती है?
और यदि कार्रवाई में चूक हुई है, तो क्या जिम्मेदार लोगों की पहचान और जवाबदेही तय होगी, या फिर यह मामला भी जांच, फाइलों और बयानबाजी के बीच कहीं खो जाएगा?
अंत में…
बिहार की जनता जानना चाहती है कि अगर पुलिस मुख्यालय खुद मान रहा है कि कार्रवाई में गंभीर चूक हुई, तो आखिर उस चूक की कीमत कौन चुकाएगा?
क्योंकि लोकतंत्र में सबसे खतरनाक स्थिति वह नहीं होती, जब गलती हो जाए; सबसे खतरनाक स्थिति तब होती है, जब गलती स्वीकार तो कर ली जाए, लेकिन जिम्मेदार कोई न मिले।














