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अयोध्या के मंच से योगी का सियासी तीर: ‘राम के दरबार में आने से पहले माफी मांगें अखिलेश’, दीपोत्सव में आस्था के साथ चुनावी अतीत भी हुआ जीवंत!

“10वें दीपोत्सव में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने रामनगरी के गौरव, रामभक्तों के बलिदान और अयोध्या के विकास को बनाया राजनीतिक विमर्श का केंद्र; अखिलेश यादव के 12 दिसंबर के प्रस्तावित अयोध्या दौरे से पहले उठाया पुराना गोलीकांड, संतों का अपमान और राम मंदिर विरोध का मुद्दा।”

अयोध्या। रामनगरी में दीपों की रोशनी के बीच इस बार सियासत के पुराने पन्ने भी खूब चमके। मंच दीपोत्सव का था, वातावरण रामभक्ति का था और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के शब्दों में अयोध्या के गौरव की गूंज थी, लेकिन उनके संबोधन का एक बड़ा हिस्सा सीधे समाजवादी पार्टी और उसके राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव की राजनीति पर केंद्रित रहा। मुख्यमंत्री ने राम मंदिर आंदोलन के दौर की घटनाओं को याद करते हुए ऐसा राजनीतिक सवाल खड़ा किया, जिसका सीधा संबंध अखिलेश यादव के 12 दिसंबर को प्रस्तावित अयोध्या दौरे से जुड़ता दिखाई दिया।

योगी का संदेश साफ था—अयोध्या आइए, प्रभु श्रीराम के दर्शन कीजिए, हनुमानगढ़ी में माथा टेकिए, लेकिन उससे पहले उन रामभक्तों और संतों से माफी भी मांगिए, जिनके साथ अतीत में कथित तौर पर अन्याय हुआ। मुख्यमंत्री ने अपने संबोधन में रामभक्तों पर चली गोलियों, संतों पर हुए लाठीचार्ज और राम मंदिर के मुद्दे पर विरोध की राजनीति को याद दिलाकर विपक्ष को कठघरे में खड़ा करने की कोशिश की।

राजनीतिक पर्दे के पीछे की कहानी भी कम दिलचस्प नहीं है। एक ओर अखिलेश यादव ने अयोध्या जाकर हनुमानगढ़ी और राम मंदिर में दर्शन करने का कार्यक्रम घोषित किया है, तो दूसरी ओर योगी आदित्यनाथ ने उसी यात्रा से पहले ऐसा राजनीतिक नैरेटिव तैयार किया, जिसमें अयोध्या का रास्ता केवल धार्मिक आस्था का नहीं, बल्कि अतीत के राजनीतिक हिसाब-किताब का रास्ता भी बनता नजर आया।

दीपोत्सव में रामकथा के साथ सियासत का नया अध्याय

मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने 10वें दीपोत्सव कार्यक्रम में अयोध्या के बदले स्वरूप का उल्लेख करते हुए कहा कि आज की अयोध्या त्रेतायुग का स्मरण करा रही है। अयोध्या अब केवल इतिहास और धार्मिक ग्रंथों में वर्णित नगरी नहीं, बल्कि जीवंत होती सांस्कृतिक चेतना का प्रतीक बनकर सामने आ रही है।

उन्होंने कहा कि श्रीराम भारत के आत्मसम्मान हैं। आज अयोध्या धाम ने फिर से वह गौरव प्राप्त किया है, जिसके लिए कारसेवकों और संतों ने बलिदान दिया था। मुख्यमंत्री ने अतीत की उन घटनाओं को भी याद किया, जब रामभक्तों पर गोलियां चलाई गईं, लाठियां बरसाई गईं और आंदोलन से जुड़े लोगों को अत्याचार का सामना करना पड़ा।

योगी के भाषण का राजनीतिक संदेश यहीं से स्पष्ट होने लगा। अयोध्या के पुनरुत्थान की कहानी सुनाते-सुनाते मुख्यमंत्री ने राम मंदिर आंदोलन के पुराने अध्याय को वर्तमान राजनीति से जोड़ दिया। उनका संकेत उन राजनीतिक ताकतों की ओर था, जिनकी सरकारों के कार्यकाल में राम मंदिर आंदोलन के दौरान हुई घटनाएं आज भी राजनीतिक बहस का हिस्सा बनी हुई हैं।

अखिलेश की कथा पर योगी का कटाक्ष: ‘कथा को मुशायरा समझ लेते हैं’

मुख्यमंत्री ने अखिलेश यादव पर तंज कसते हुए कहा कि कुछ लोग जब कथाओं में जाते हैं तो उन्हें कथा की मर्यादा तक का ज्ञान नहीं होता। वे कथा को मुशायरा समझ लेते हैं।

योगी ने कहा कि एक समय अयोध्या में ऐसा माहौल बनाया जाता था कि कोई यहां आएगा नहीं और कोई जय श्रीराम बोलेगा नहीं। आज स्थिति बदल चुकी है। उन्होंने दावा किया कि जो लोग कभी राम के अस्तित्व को लेकर सवाल उठाते थे और राम मंदिर के खिलाफ कानूनी लड़ाई में वकीलों की फौज खड़ी करते थे, वे भी अब राम के अस्तित्व को स्वीकार कर रहे हैं। मुख्यमंत्री ने इसे भी अपनी सरकार के दौर की बड़ी उपलब्धियों में शामिल किया।

उन्होंने कथा की परंपरा और उसकी पवित्रता का उल्लेख करते हुए विपक्ष पर आरोप लगाया कि अपनी उच्छृंखल प्रवृत्ति के कारण कुछ लोग धार्मिक आयोजनों की मर्यादा और पवित्रता का ध्यान नहीं रखते। उनके मुताबिक, कथा को भी मुशायरे के दायरे में लाकर उसकी गरिमा को प्रभावित करने का प्रयास किया जाता है।

यहां योगी का निशाना केवल किसी एक बयान या कार्यक्रम तक सीमित नहीं था। धार्मिक मंचों की भाषा, प्रस्तुति और राजनीतिक इस्तेमाल को लेकर भी उन्होंने विपक्ष को घेरने की कोशिश की। संदेश यह था कि रामकथा केवल सार्वजनिक मंच पर उपस्थिति दर्ज कराने का अवसर नहीं, बल्कि एक ऐसी परंपरा है, जिसकी अपनी मर्यादा और अनुशासन है।

‘अयोध्या आएं जरूर, लेकिन पहले रामभक्तों से माफी मांगें’

मुख्यमंत्री के संबोधन का सबसे तीखा राजनीतिक हिस्सा तब सामने आया, जब उन्होंने अखिलेश यादव के प्रस्तावित अयोध्या दौरे को लेकर सीधी टिप्पणी की।

योगी आदित्यनाथ ने कहा कि जिन लोगों ने रामभक्तों की उपेक्षा की, उन्हें अपमानित किया, उन पर गोलियां चलवाईं और संतों पर लाठीचार्ज कराया, वे अयोध्या जरूर आएं, लेकिन माफी मांगकर आएं।

उन्होंने कहा कि रामभक्तों से एक बार माफी मांग लें, संतों से माफी मांग लें और अपने कृत्यों के लिए पश्चाताप कर लें।

इस बयान में मुख्यमंत्री ने अखिलेश यादव को व्यक्तिगत रूप से राजनीतिक चुनौती देने के साथ-साथ समाजवादी पार्टी के अतीत को भी चुनावी बहस के केंद्र में लाने की कोशिश की। यह एक तरह से पहले से तैयार किया गया राजनीतिक सवाल है—अगर विपक्षी नेता रामनगरी में दर्शन करने पहुंचते हैं, तो क्या वे राम मंदिर आंदोलन के इतिहास और अपनी पार्टी की पुरानी राजनीतिक भूमिका पर भी कुछ कहेंगे?

यही वह बिंदु है, जहां अखिलेश यादव की प्रस्तावित धार्मिक यात्रा राजनीतिक परीक्षा में बदलती दिखाई देती है। अब उनके सामने चुनौती केवल अयोध्या पहुंचने और दर्शन करने की नहीं होगी, बल्कि उस राजनीतिक विमर्श का सामना करने की भी होगी, जिसे मुख्यमंत्री ने उनके दौरे से पहले ही हवा दे दी है।

प्रभु श्रीराम सबको माफ करेंगे, लेकिन अहंकार का अंत भी करते हैं: योगी

मुख्यमंत्री ने अपने संबोधन में धार्मिक आस्था के साथ सत्ता और अहंकार का संदर्भ भी जोड़ा। उन्होंने कहा कि प्रभु श्रीराम अत्यंत सदाचारी, सबके पालनहार और सबके प्रति कृपालु हैं। वे सभी को माफ कर सकते हैं, लेकिन अहंकारी सत्ता को समाप्त करने में भी प्रभु क्षणभर की देर नहीं लगाते।

योगी ने कहा कि जब किसी को अहंकार हो जाता है तो उसके दंभ को समाप्त करने में भी प्रभु देर नहीं करते।

इस टिप्पणी को भी राजनीतिक संदर्भ में देखा जा रहा है। मुख्यमंत्री ने सीधे किसी चुनाव का उल्लेख नहीं किया, लेकिन सत्ता के अहंकार, उसके पतन और जनता के सामने जवाबदेही का संदेश देकर विपक्ष पर वैचारिक हमला बोला।

उनकी राजनीति का यह अंदाज नया नहीं है। धार्मिक प्रतीकों और ऐतिहासिक घटनाओं को वर्तमान राजनीतिक विमर्श से जोड़ना भाजपा की अयोध्या केंद्रित राजनीति का एक महत्वपूर्ण हिस्सा रहा है। इस बार भी दीपोत्सव का मंच उस राजनीतिक संदेश को दोहराने का माध्यम बनता दिखाई दिया।

12 दिसंबर: अयोध्या में अखिलेश की मौजूदगी और सियासी सवाल

मुख्यमंत्री का यह हमला ऐसे समय आया है, जब समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव के 12 दिसंबर को अयोध्या पहुंचने की घोषणा की गई है। सपा नेता पवन पांडे ने छोटी दीपावली के अवसर पर इसकी जानकारी देते हुए बताया कि अखिलेश यादव हनुमानगढ़ी में माथा टेकेंगे और राम मंदिर में प्रभु श्रीराम के दर्शन करेंगे।

अखिलेश का यह दौरा कई मायनों में राजनीतिक महत्व रखता है। अयोध्या उत्तर प्रदेश की राजनीति का ऐसा केंद्र है, जहां धार्मिक आस्था, सांस्कृतिक पहचान और राजनीतिक संदेश एक-दूसरे से अलग नहीं किए जा सकते।

राम मंदिर निर्माण के बाद अयोध्या की राजनीति का स्वरूप भी बदला है। अब यहां पहुंचने वाला प्रत्येक बड़ा राजनीतिक चेहरा अपने साथ एक संदेश लेकर आता है। कोई इसे श्रद्धा की यात्रा बताता है, कोई सांस्कृतिक जुड़ाव का प्रतीक, तो किसी के लिए यह राजनीतिक स्वीकार्यता और जनभावनाओं से जुड़ने का अवसर बन जाता है।

अखिलेश यादव के लिए भी यह दौरा केवल मंदिर दर्शन तक सीमित नहीं माना जा सकता। समाजवादी पार्टी को अपनी उस राजनीतिक छवि से आगे बढ़ने की जरूरत है, जिसे भाजपा लगातार राम मंदिर आंदोलन और कारसेवकों पर गोली चलने की घटनाओं से जोड़ती रही है।

दूसरी तरफ भाजपा के लिए यह मौका विपक्ष को उसके पुराने राजनीतिक रिकॉर्ड की याद दिलाने का है। योगी का बयान इसी रणनीति का हिस्सा दिखाई देता है।

अयोध्या का एयरपोर्ट बना विकास बनाम पुराने शासन का राजनीतिक प्रतीक

मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने केवल राम मंदिर और रामभक्तों के बलिदान की बात नहीं की, बल्कि अयोध्या में हुए विकास कार्यों को भी अपनी सरकार की उपलब्धियों के रूप में प्रस्तुत किया।

उन्होंने कहा कि पहले अयोध्या में हवाई अड्डे की कल्पना भी संभव नहीं लगती थी, लेकिन आज महर्षि वाल्मीकि के नाम पर अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा मौजूद है।

यहां मुख्यमंत्री ने अयोध्या के धार्मिक पुनरुत्थान को आधुनिक बुनियादी ढांचे के विकास से जोड़ने की कोशिश की। उनके संदेश का आशय था कि अयोध्या अब केवल श्रद्धालुओं के लिए धार्मिक नगरी नहीं रही, बल्कि आधुनिक सुविधाओं, बेहतर संपर्क और अंतरराष्ट्रीय पहचान की दिशा में भी आगे बढ़ रही है।

दरअसल, भाजपा अयोध्या के विकास को अपनी राजनीतिक उपलब्धियों की सूची में प्रमुखता से रखती रही है। राम मंदिर, एयरपोर्ट, सड़कें, पर्यटन सुविधाएं और दीपोत्सव जैसे आयोजनों को एक साथ रखकर सरकार यह बताना चाहती है कि उसने अयोध्या की धार्मिक पहचान को विकास की नई संभावनाओं से जोड़ा है।

हालांकि विकास की इस तस्वीर के साथ नागरिक सुविधाओं, स्थानीय व्यापारियों, विस्थापन, रोजगार और बुनियादी ढांचे से जुड़े सवालों पर भी चर्चा जरूरी है। किसी भी शहर की वास्तविक प्रगति केवल बड़े प्रोजेक्ट और भव्य आयोजन से नहीं, बल्कि आम नागरिक के जीवन में आए बदलाव से भी मापी जाती है।

दीपों के उजाले में पुरानी राजनीति की परछाइयां

इस बार अयोध्या का दीपोत्सव केवल दीपों की संख्या, सांस्कृतिक कार्यक्रमों और धार्मिक उल्लास तक सीमित नहीं रहा। मुख्यमंत्री के भाषण ने इसे एक बार फिर उत्तर प्रदेश की राजनीतिक लड़ाई के केंद्र में ला खड़ा किया।

एक तरफ योगी आदित्यनाथ ने राम मंदिर आंदोलन के इतिहास को याद दिलाकर समाजवादी पार्टी को घेरने की कोशिश की, तो दूसरी तरफ अखिलेश यादव का प्रस्तावित अयोध्या दौरा इस पूरे घटनाक्रम को और दिलचस्प बना रहा है।

सवाल यह है कि क्या अखिलेश यादव अयोध्या पहुंचकर केवल दर्शन-पूजन करेंगे या राम मंदिर आंदोलन से जुड़े राजनीतिक सवालों पर भी अपनी बात रखेंगे? क्या वे मुख्यमंत्री के माफी मांगने वाले बयान का जवाब देंगे? और क्या उनकी यात्रा भाजपा के उस नैरेटिव को चुनौती दे पाएगी, जिसमें अयोध्या की आस्था और राम मंदिर आंदोलन की विरासत को एक-दूसरे से जोड़कर देखा जाता है?

फिलहाल, दीपोत्सव के मंच से योगी आदित्यनाथ ने राजनीतिक बहस की दिशा तय करने की कोशिश कर दी है। अब निगाहें 12 दिसंबर पर रहेंगी।

अयोध्या में उस दिन दीपों की जगह भले ही दर्शन और श्रद्धा का वातावरण हो, लेकिन राजनीतिक गलियारों में एक सवाल जरूर गूंजता रहेगा—क्या अखिलेश यादव रामलला के दरबार में केवल माथा टेकेंगे या उस सियासी अतीत का भी सामना करेंगे, जिसे योगी आदित्यनाथ ने दीपोत्सव के मंच से फिर जीवंत कर दिया है?

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VIKAS TRIPATHI
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