“महाराष्ट्र की सियासत में एनसीपी के दोनों गुटों के विलय को लेकर फिर छिड़ी जुबानी जंग। सुनील तटकरे के बयान ने अजित पवार की गैरमौजूदगी में राजनीतिक अटकलों को हवा दी, तो अनिल देशमुख ने दो टूक कह दिया- पार्टी में आने का रास्ता खुला है, लेकिन विलय की दुकान बंद है। सवाल यह है कि जब अजित पवार जीवित थे, तब विलय की पटकथा किसने लिखी थी और अब उनके नाम पर राजनीतिक दावे करने की जरूरत क्यों पड़ रही है?”
महाराष्ट्र की राजनीति में कुछ कहानियां ऐसी होती हैं, जिनका पर्दा कभी पूरी तरह नहीं गिरता। किरदार बदलते रहते हैं, बयान बदलते रहते हैं, राजनीतिक समीकरणों की व्याख्या भी बदलती रहती है, लेकिन कहानी के पीछे चल रही पटकथा हमेशा चर्चा में बनी रहती है। राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (एनसीपी) के दो विरोधी गुटों के विलय की कहानी भी इन दिनों कुछ इसी मोड़ पर खड़ी है। यहां एक तरफ सत्तारूढ़ एनसीपी के प्रदेश अध्यक्ष सुनील तटकरे हैं, जो दावा कर रहे हैं कि अजित पवार जीवित होते तो दोनों गुटों का विलय फरवरी में ही हो गया होता। दूसरी तरफ शरदचंद्र पवार गुट के वरिष्ठ नेता और महाराष्ट्र के पूर्व गृह मंत्री अनिल देशमुख हैं, जिन्होंने इस पूरी संभावना पर ही पानी फेर दिया है।
देशमुख का संदेश साफ है- हमारी पार्टी में आना है तो स्वागत है, लेकिन दोनों दलों के विलय की उम्मीद लेकर कोई दरवाजे पर खड़ा है तो उसे अभी से निराश हो जाना चाहिए।
इस बयान ने महाराष्ट्र की सियासत में चल रही विलय की चर्चाओं को एक नया मोड़ दे दिया है। क्योंकि मामला केवल दो राजनीतिक दलों के एक होने या अलग रहने का नहीं है। इसके भीतर नेतृत्व, राजनीतिक अस्तित्व, सत्ता की हिस्सेदारी, संगठन पर नियंत्रण और अजित पवार की राजनीतिक विरासत जैसे कई सवाल छिपे हैं। दिलचस्प बात यह है कि इस पूरी बहस में सबसे बड़ा नाम अजित पवार का है, लेकिन अब वे इस दुनिया में नहीं हैं। ऐसे में उनके नाम पर किए जा रहे दावों की सियासी अहमियत और भी बढ़ जाती है।
तटकरे के बयान से खुला पुराना राजनीतिक अध्याय
दरअसल, सत्तारूढ़ एनसीपी की महाराष्ट्र इकाई के अध्यक्ष सुनील तटकरे ने हाल ही में यह दावा किया कि यदि तत्कालीन उपमुख्यमंत्री और एनसीपी अध्यक्ष अजित पवार जीवित होते तो दोनों विरोधी गुटों का विलय इसी साल फरवरी में हो गया होता।
यह कोई मामूली राजनीतिक टिप्पणी नहीं थी। इस एक बयान ने उस पुराने सवाल को फिर से खड़ा कर दिया कि क्या एनसीपी के दोनों गुट वास्तव में एक होने की तैयारी कर रहे थे? क्या दोनों पक्षों के बीच कोई राजनीतिक सहमति बन चुकी थी? क्या सत्ता और संगठन के स्तर पर कोई समझौता तय हो रहा था? और अगर ऐसा था तो फिर उस समझौते की जानकारी सार्वजनिक रूप से सामने क्यों नहीं आई?
तटकरे के बयान में सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि उन्होंने विलय की संभावित तारीख तक का संकेत दिया। उन्होंने कहा कि अजित पवार जीवित होते तो फरवरी में ही दोनों गुट एक हो गए होते। यानी उनके दावे के मुताबिक, यह महज राजनीतिक इच्छा या बातचीत का मामला नहीं था, बल्कि एक ऐसी संभावना थी जो जल्द ही वास्तविकता बन सकती थी।
लेकिन राजनीति में दावों की उम्र अक्सर परिस्थितियों के हिसाब से बदलती रहती है। जिस बात को कल तक असंभव बताया जा रहा हो, वही बात आज संभावित समझौते के रूप में पेश होने लगती है। यही वजह है कि तटकरे के बयान ने विरोधी खेमे को सवाल उठाने का मौका दे दिया।
देशमुख ने पूछा- आखिर बयान बदलने की जरूरत क्यों पड़ रही है?
नागपुर में पत्रकारों से बातचीत के दौरान अनिल देशमुख ने तटकरे के दावे पर सीधा सवाल खड़ा किया। उनका आरोप है कि तटकरे विलय के मुद्दे पर बार-बार अपना रुख बदल रहे हैं। देशमुख के मुताबिक, अजित पवार के जीवित रहते ही यह तय हो गया था कि एनसीपी भाजपा के नेतृत्व वाली सरकार से बाहर होगी और दोनों गुटों का विलय किया जाएगा।
लेकिन अजित पवार की 28 जनवरी को पुणे जिले के बारामती में विमान दुर्घटना में मौत के बाद राजनीतिक बयानबाजी का रुख बदल गया।
देशमुख ने दावा किया कि अजित पवार के निधन के बाद तटकरे ने यह कहा था कि तत्कालीन एनसीपी अध्यक्ष ने पार्टी के नेताओं को दोनों विरोधी गुटों के संभावित विलय के बारे में कुछ नहीं बताया था। अब वही तटकरे यह कह रहे हैं कि यदि अजित पवार जीवित होते तो 12 फरवरी को दोनों गुटों का विलय हो गया होता।
यहीं से देशमुख का सवाल राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण हो जाता है। अगर पार्टी के नेताओं को विलय की जानकारी नहीं थी, तो फिर अब इतनी निश्चितता के साथ फरवरी की तारीख कैसे बताई जा रही है? और यदि विलय की तैयारी वास्तव में अंतिम चरण में थी, तो उस समय इसकी जानकारी किस-किस को थी?
राजनीति में कभी-कभी बयान खुद से ज्यादा उन सवालों को जन्म देते हैं, जिनका जवाब देने से बयान देने वाले बचना चाहते हैं। तटकरे के बयान के साथ भी कुछ ऐसा ही होता दिखाई दे रहा है।
देशमुख ने साफ कर दिया कि शरदचंद्र पवार के नेतृत्व वाली एनसीपी और सत्तारूढ़ एनसीपी के एक होने का फिलहाल कोई सवाल नहीं है। उन्होंने कहा कि जो भी उनकी पार्टी में शामिल होना चाहता है, उसका स्वागत है, लेकिन दोनों दलों के विलय की कोई संभावना नहीं है।
इस बयान का राजनीतिक अर्थ भी कम दिलचस्प नहीं है। देशमुख ने विलय का दरवाजा बंद करने के साथ-साथ व्यक्तिगत रूप से नेताओं के पार्टी में आने का रास्ता खुला रखा है। यानी संदेश यह है कि पार्टी में वापसी या नई एंट्री का स्वागत हो सकता है, लेकिन इसके लिए संगठन की पहचान और नेतृत्व की शर्तों से समझौता नहीं किया जाएगा।
अजित पवार की गैरमौजूदगी में उनके नाम पर राजनीति
इस पूरे विवाद का सबसे संवेदनशील पहलू अजित पवार की राजनीतिक विरासत है। 28 जनवरी को बारामती में विमान दुर्घटना में उनकी मौत के बाद महाराष्ट्र की राजनीति में एक बड़ा खालीपन पैदा हुआ। वे केवल उपमुख्यमंत्री या एनसीपी के अध्यक्ष नहीं थे, बल्कि अपने समर्थकों और राजनीतिक विरोधियों के बीच एक प्रभावशाली नेता के रूप में पहचाने जाते थे।
उनकी राजनीति का सबसे बड़ा गुण परिस्थितियों के हिसाब से फैसले लेने की क्षमता मानी जाती थी। उन्होंने सत्ता के लिए कई राजनीतिक समीकरण बदले और अपने फैसलों से महाराष्ट्र की राजनीति में कई बार नए समीकरण पैदा किए।
अब उनके निधन के बाद उनके पुराने फैसलों, संभावित योजनाओं और राजनीतिक इरादों की व्याख्या अलग-अलग नेता अपने-अपने तरीके से कर रहे हैं। कोई कह रहा है कि वे दोनों गुटों को मिलाना चाहते थे, तो कोई इस दावे पर सवाल खड़ा कर रहा है।
यहां एक महत्वपूर्ण अंतर समझना जरूरी है। अजित पवार वास्तव में क्या चाहते थे, इसका अंतिम और निर्णायक जवाब अब उनके पास ही था। उनके निधन के बाद कोई भी दावा राजनीतिक बयान और संबंधित नेताओं की व्याख्या के दायरे में ही रहेगा। इसलिए फरवरी में संभावित विलय को लेकर तटकरे का दावा महत्वपूर्ण जरूर है, लेकिन उसे स्थापित तथ्य मान लेना जल्दबाजी होगी।
राजनीति का यही वह पर्दे के पीछे वाला हिस्सा है, जहां दिवंगत नेता की विरासत पर अधिकार जताने की कोशिश भी राजनीतिक ताकत का हिस्सा बन जाती है। सवाल यह भी है कि अजित पवार की राजनीतिक सोच को आगे कौन और किस रूप में पेश करेगा?
विलय की चर्चा के पीछे सत्ता का गणित भी है
एनसीपी के दोनों गुटों का विलय केवल भावनात्मक एकता का मामला नहीं है। इसके पीछे महाराष्ट्र की सत्ता और संगठन का पूरा गणित जुड़ा हुआ है।
एक ओर शरद पवार का राजनीतिक अनुभव, उनका राष्ट्रीय स्तर का प्रभाव और पुराने संगठनात्मक नेटवर्क हैं। दूसरी ओर अजित पवार के नेतृत्व में सत्तारूढ़ एनसीपी का वह राजनीतिक ढांचा रहा है, जिसने सत्ता में भागीदारी के जरिए अपनी अलग पहचान बनाई।
दोनों गुटों के एक होने की स्थिति में सबसे बड़ा सवाल यह होगा कि नेतृत्व किसके हाथ में रहेगा? संगठन का नियंत्रण किसके पास होगा? चुनाव चिह्न और राजनीतिक पहचान को लेकर क्या व्यवस्था बनेगी? सरकार में शामिल रहने या बाहर आने का फैसला कौन करेगा? और सबसे महत्वपूर्ण, पार्टी के भीतर किस नेता का कितना प्रभाव होगा?
इन सवालों का जवाब दिए बिना विलय की बात करना आसान है, लेकिन उसे जमीन पर उतारना बिल्कुल अलग चुनौती है।
क्योंकि राजनीतिक दलों का विलय केवल दो कार्यालयों के बोर्ड बदलने या नेताओं के एक मंच पर आने से नहीं होता। उसके लिए कार्यकर्ताओं से लेकर शीर्ष नेतृत्व तक विश्वास और सहमति की जरूरत होती है। जिन नेताओं ने एक-दूसरे के खिलाफ चुनाव लड़े हों, जिनके समर्थकों ने वर्षों तक एक-दूसरे को राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी माना हो, उनके बीच संगठनात्मक एकता स्थापित करना आसान नहीं होता।
ऐसे में देशमुख का बयान केवल एक राजनीतिक प्रतिक्रिया नहीं, बल्कि शरद पवार खेमे की उस आशंका का संकेत भी माना जा सकता है कि विलय की चर्चा के जरिए कहीं उनके संगठन की स्वतंत्र राजनीतिक पहचान को कमजोर करने की कोशिश तो नहीं हो रही?
शरद पवार से मिलने पहुंचे शिंदे, बढ़ी राजनीतिक हलचल
इसी राजनीतिक पृष्ठभूमि में एकनाथ शिंदे और वरिष्ठ नेताओं के एक समूह का ब्रीच कैंडी अस्पताल पहुंचकर शरद पवार से मुलाकात करना भी चर्चा का विषय बन गया।
शरद पवार सीने में जकड़न की शिकायत के बाद अस्पताल में भर्ती हैं। ऐसे समय में उपमुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे और अन्य वरिष्ठ नेताओं का उनसे मिलने पहुंचना स्वाभाविक रूप से राजनीतिक हलकों में चर्चा का कारण बना।
हालांकि किसी वरिष्ठ नेता से अस्पताल में मुलाकात को सीधे राजनीतिक समझौते या किसी नए गठबंधन का संकेत मान लेना उचित नहीं होगा। सार्वजनिक जीवन में शिष्टाचार और राजनीतिक संवाद की अपनी जगह होती है। लेकिन महाराष्ट्र की मौजूदा परिस्थितियों में जब एनसीपी के दोनों गुटों के विलय की चर्चा पहले से गर्म है, तब ऐसी मुलाकातों को लेकर राजनीतिक अटकलें लगना भी अस्वाभाविक नहीं है।
यहां दिलचस्प बात यह है कि एक तरफ तटकरे विलय की संभावनाओं को अजित पवार की अधूरी राजनीतिक इच्छा के रूप में पेश कर रहे हैं, तो दूसरी तरफ शरद पवार खेमे से देशमुख साफ संदेश दे रहे हैं कि विलय की कोई गुंजाइश नहीं है।
यानी महाराष्ट्र की राजनीति में बातचीत के दरवाजे भले खुले दिखाई दें, लेकिन उन दरवाजों के पीछे कौन-सी शर्तें रखी जाएंगी, यह अभी स्पष्ट नहीं है।
क्या विलय की चर्चा राजनीतिक दबाव बनाने का तरीका है?
इस पूरे घटनाक्रम का एक दूसरा पहलू भी है। क्या दोनों गुटों के विलय की चर्चा वास्तव में किसी ठोस राजनीतिक पहल का हिस्सा है या इसके जरिए राजनीतिक दबाव बनाने की कोशिश हो रही है?
तटकरे का बयान सत्तारूढ़ एनसीपी की ओर से आया है। ऐसे में उनके बयान को केवल व्यक्तिगत राय मानकर नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। दूसरी ओर देशमुख ने जिस स्पष्टता से इसका खंडन किया है, उससे यह भी जाहिर होता है कि शरद पवार खेमे में इस मुद्दे को लेकर असहजता है।
यदि विलय की चर्चा को बार-बार सार्वजनिक किया जाता है तो उसका असर दोनों दलों के कार्यकर्ताओं पर भी पड़ सकता है। सत्तारूढ़ गुट के समर्थकों में यह संदेश जा सकता है कि भविष्य में एक बड़े संगठन का हिस्सा बनने की संभावना है। वहीं शरद पवार खेमे के कार्यकर्ताओं के सामने अपनी अलग राजनीतिक पहचान और भविष्य को लेकर सवाल खड़े हो सकते हैं।
यही वजह है कि देशमुख ने विलय की संभावना को सिरे से खारिज करते हुए पार्टी में व्यक्तिगत रूप से शामिल होने का विकल्प खुला रखा। उनके बयान में एक तरह की राजनीतिक सीमा रेखा दिखाई देती है- नेता आ सकते हैं, लेकिन संगठन की पहचान को किसी संभावित समझौते की मेज पर नहीं रखा जाएगा।
महाराष्ट्र की राजनीति में अभी कई पन्ने खुलने बाकी
फिलहाल इस पूरे विवाद में तीन बातें सबसे अधिक महत्वपूर्ण हैं। पहली, सुनील तटकरे का दावा कि अजित पवार जीवित होते तो फरवरी में दोनों गुटों का विलय हो जाता। दूसरी, अनिल देशमुख का आरोप कि तटकरे विलय के मुद्दे पर अपने बयान बदल रहे हैं। और तीसरी, शरद पवार खेमे की ओर से यह स्पष्ट संदेश कि दोनों दलों का विलय कोई तय राजनीतिक विकल्प नहीं है।
इन तीनों के बीच एक ऐसा सवाल खड़ा है जिसका जवाब महाराष्ट्र की राजनीति के आने वाले दिनों में तलाशा जाएगा- क्या एनसीपी के दोनों गुट वास्तव में एक-दूसरे के करीब आने की कोशिश कर रहे हैं या विलय की चर्चा केवल राजनीतिक बयानबाजी तक सीमित है?
फिलहाल तस्वीर में सबसे बड़ा विरोधाभास यही है कि जिस नेता के नाम पर विलय की संभावित तारीख बताई जा रही है, वे अब इस राजनीतिक बहस में अपना पक्ष रखने के लिए मौजूद नहीं हैं। उनके सहयोगी उनके इरादों का हवाला दे रहे हैं, जबकि विरोधी खेमे के नेता उन दावों की विश्वसनीयता पर सवाल उठा रहे हैं।
महाराष्ट्र की राजनीति में अजित पवार की गैरमौजूदगी ने केवल एक नेता की जगह खाली नहीं की है, बल्कि कई राजनीतिक समीकरणों को भी अनिश्चितता के हवाले कर दिया है। ऐसे में विलय की चर्चा जितनी सरल सुनाई देती है, उसके पीछे का सत्ता-संगठन का गणित उतना ही पेचीदा है।
फिलहाल देशमुख ने विलय की संभावनाओं पर पूर्णविराम लगाने की कोशिश की है, लेकिन महाराष्ट्र की राजनीति में पूर्णविराम अक्सर अल्पविराम साबित होते हैं। आज विलय से इनकार है, कल बातचीत की संभावना से इनकार होगा या नहीं, यह वक्त बताएगा। इतना जरूर है कि एनसीपी के दोनों गुटों के बीच असली लड़ाई केवल एक होने या अलग रहने की नहीं, बल्कि अजित पवार के बाद महाराष्ट्र की राजनीति में किसकी चलेगी, इसकी भी है। और इस सवाल का जवाब किसी एक प्रेस कॉन्फ्रेंस से नहीं, आने वाले राजनीतिक फैसलों से मिलेगा।















