“महाराष्ट्र की सियासत में NCP के भीतर कुछ ऐसा पक रहा है, जिसकी आंच अब बंद कमरों से निकलकर बैठकों तक पहुंच गई है। पार्टी की कमान सुनेत्रा पवार के हाथ में है, लेकिन फैसलों में किसकी कितनी चल रही है, यही सबसे बड़ा सवाल बन गया है। पार्थ पवार की बढ़ती भूमिका, पुराने नेताओं की अनदेखी, विधायकों के अटके काम और वित्त विभाग की वापसी की मांग ने पार्टी के भीतर नई सियासी बेचैनी पैदा कर दी है।”
महाराष्ट्र की राजनीति में राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (NCP) इन दिनों एक ऐसे मोड़ पर खड़ी दिखाई दे रही है, जहां बाहर से सबकुछ सामान्य दिखाने की कोशिश है, लेकिन भीतर कई सवाल एक साथ सिर उठा रहे हैं। अजित पवार के निधन के बाद पार्टी की कमान सुनेत्रा पवार के हाथों में आई। उम्मीद थी कि उनके नेतृत्व में संगठन एकजुट रहेगा और अजित पवार की बनाई राजनीतिक जमीन को आगे बढ़ाया जाएगा। मगर सियासत में विरासत संभालना और विरासत के सभी हिस्सेदारों को साथ लेकर चलना दो अलग-अलग काम हैं। NCP में अब यही अंतर दिखाई देने लगा है।
पार्टी के भीतर उठ रही आवाजों को देखें तो मामला केवल संगठनात्मक फेरबदल तक सीमित नहीं है। असली सवाल यह है कि पार्टी में अंतिम फैसला कौन ले रहा है? राष्ट्रीय अध्यक्ष, वरिष्ठ नेताओं की कोर कमेटी या फिर पार्थ पवार? पार्टी के कुछ वरिष्ठ नेताओं की नाराजगी के पीछे यही सवाल बताया जा रहा है।
दिलचस्प यह है कि जिन नेताओं ने अजित पवार के साथ मिलकर पार्टी की राजनीतिक लड़ाई लड़ी, सरकार में हिस्सेदारी हासिल की और संगठन को खड़ा करने में भूमिका निभाई, अब वही नेता अपने अधिकार और अहमियत को लेकर असहज बताए जा रहे हैं। राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि पार्टी में नई पीढ़ी को आगे बढ़ाने की कोशिश के बीच पुराने नेताओं की भूमिका सीमित होती दिखाई दे रही है।
कुर्सी पर सुनेत्रा, फैसलों के केंद्र में पार्थ? यही है अंदरूनी बेचैनी की जड़
NCP के भीतर सबसे अधिक चर्चा पार्थ पवार की बढ़ती भूमिका को लेकर है। पार्टी सूत्रों के मुताबिक, कुछ वरिष्ठ नेताओं को शिकायत है कि संगठन के बड़े फैसले लेने से पहले उनसे पर्याप्त चर्चा नहीं की जाती। उनकी नाराजगी इस बात को लेकर भी बताई जा रही है कि पार्थ पवार की राय को अधिक महत्व मिल रहा है, जबकि अनुभवी नेताओं को कई मामलों में भरोसे में नहीं लिया जा रहा।
यहीं से पार्टी के भीतर नेतृत्व और अधिकारों का सवाल खड़ा होता है।
सुनेत्रा पवार पार्टी की राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं और महाराष्ट्र की उपमुख्यमंत्री भी। ऐसे में स्वाभाविक सवाल है कि क्या पार्टी के संगठनात्मक और राजनीतिक फैसलों की पूरी जिम्मेदारी उन्हीं के नेतृत्व में तय हो रही है? अगर ऐसा है तो फिर वरिष्ठ नेताओं की नाराजगी किस बात को लेकर है? और अगर फैसलों में दूसरे लोगों की भूमिका बढ़ रही है तो क्या पार्टी के भीतर अधिकारों की नई व्यवस्था तैयार हो रही है?
पार्थ पवार की राजनीतिक भूमिका पर सवाल उठना अपने आप में किसी विवाद का अंतिम निष्कर्ष नहीं है। लेकिन पार्टी के भीतर इस विषय पर चर्चा होना बताता है कि नेतृत्व की नई व्यवस्था को लेकर सभी नेताओं की सोच एक जैसी नहीं है।
अजित पवार के रहते संगठन में फैसले लेने का एक स्थापित तरीका था। उनके जाने के बाद उसी व्यवस्था को किस रूप में आगे बढ़ाया जाए, इस पर सहमति बनाना आसान नहीं दिख रहा।
अमित शाह से मुलाकात ने बढ़ाई सियासी हलचल, लेकिन सवालों के जवाब अब भी अधूरे
NCP के भीतर चल रही चर्चाओं को उस समय और हवा मिली, जब पार्टी के कुछ वरिष्ठ नेता दिल्ली में केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह से मिले। इस मुलाकात में प्रफुल्ल पटेल, सुनील तटकरे, छगन भुजबल, हसन मुश्रीफ, दिलीप वलसे पाटील और धनंजय मुंडे जैसे नेता शामिल थे।
ध्यान देने वाली बात यह रही कि इस बैठक में सुनेत्रा पवार और पार्थ पवार मौजूद नहीं थे।
सियासत में कई बार बैठक में मौजूद लोगों से ज्यादा चर्चा उन लोगों की होती है, जो बैठक में मौजूद नहीं होते। इस मुलाकात के बाद भी कुछ ऐसा ही हुआ। पार्टी के भीतर नेतृत्व, आपसी तालमेल और फैसलों में वरिष्ठ नेताओं की भूमिका को लेकर चर्चाएं तेज हो गईं।
हालांकि NCP की ओर से यह स्पष्ट किया गया कि अमित शाह के साथ मुलाकात को अनावश्यक रूप से विवाद का रूप दिया जा रहा है। पार्टी प्रवक्ताओं ने इसे सामान्य राजनीतिक और संगठनात्मक बातचीत बताया।
लेकिन सवाल यह है कि अगर सबकुछ सामान्य है तो फिर पार्टी को लगातार बैठकों की जरूरत क्यों पड़ रही है? और अगर संगठन में कोई गंभीर मतभेद नहीं हैं तो नेताओं के बीच तालमेल सुधारने के लिए नई व्यवस्था बनाने की चर्चा क्यों हो रही है?
इन सवालों के जवाब पार्टी नेतृत्व को ही देने होंगे।
चार घंटे की बैठक में विधायकों ने खोली अपने इलाकों की परेशानी
मंगलवार, 3 नवंबर की रात सुनेत्रा पवार के सरकारी आवास देवगिरी बंगले पर पार्टी विधायकों और पदाधिकारियों की बैठक हुई। बैठक करीब चार घंटे चली और रात 10:30 बजे समाप्त हुई।
इस बैठक में पार्टी के विधायकों और अन्य जनप्रतिनिधियों ने अपनी समस्याएं रखीं। उपलब्ध रिपोर्टों के मुताबिक, बैठक में करीब 50 पदाधिकारी और जनप्रतिनिधि शामिल हुए, जिनमें 41 में से 29 विधायक मौजूद थे।
बैठक में उठे मुद्दों ने यह साफ किया कि पार्टी के सामने चुनौती केवल बड़े नेताओं के बीच आपसी तालमेल की नहीं है। जमीनी स्तर पर भी विधायकों की अपनी परेशानियां हैं।
कुछ विधायकों की शिकायत थी कि पार्टी सरकार में शामिल है, मंत्री पद भी हैं और सत्ता में भागीदारी भी, लेकिन उनके विधानसभा क्षेत्रों में विकास कार्यों के लिए पर्याप्त धनराशि नहीं मिल रही। सवाल उठाया गया कि जब पार्टी सरकार का हिस्सा है तो फिर विधायकों को अपने ही क्षेत्रों में काम कराने के लिए परेशानी क्यों उठानी पड़ रही है?
कुछ विधायकों ने यह भी शिकायत की कि एकनाथ शिंदे के नेतृत्व वाली शिवसेना के मंत्रियों के विभागों में उनके प्रस्तावों और विकास कार्यों को अपेक्षित गति नहीं मिल रही।
यहां पार्टी के सामने एक अलग तरह की राजनीतिक विडंबना है। सरकार में हिस्सेदारी होने के बावजूद अगर विधायक अपने क्षेत्र में काम नहीं करा पा रहे हैं तो जनता के सामने जवाबदेही किसकी होगी? विधायक जनता को सरकार का हिस्सा होने का भरोसा दें या फिर फाइलों के आगे अटके कामों का हिसाब समझाएं?
विधायकों के लिए राजनीति केवल बड़े नेताओं की बैठकों और दिल्ली के दौरों का नाम नहीं है। उन्हें अपने क्षेत्र में सड़क, पानी, सिंचाई, स्वास्थ्य और विकास कार्यों के लिए जवाब देना पड़ता है।
जीशान सिद्दीकी और उमेश पाटील की नियुक्तियों ने भी बढ़ाई नाराजगी
पार्टी के भीतर दूसरा बड़ा विवाद हाल में हुई दो नियुक्तियों को लेकर बताया जा रहा है।
पहली नियुक्ति जीशान सिद्दीकी को मुंबई अध्यक्ष बनाने की है। दूसरी नियुक्ति उमेश पाटील को राष्ट्रीय मुख्य प्रवक्ता की जिम्मेदारी देने की है।
इन नियुक्तियों को लेकर कुछ वरिष्ठ नेताओं की शिकायत है कि फैसले लेने से पहले कोर कमेटी के सदस्यों से पर्याप्त सलाह-मशविरा नहीं किया गया।
छगन भुजबल की नाराजगी भी इस मामले में चर्चा में रही। वह पहले कह चुके हैं कि उन्हें इन नियुक्तियों की जानकारी पार्टी के भीतर से नहीं, बल्कि मीडिया में आई खबरों से मिली थी।
यह बात अपने आप में संगठन के कामकाज पर सवाल खड़े करती है। आखिर जिस पार्टी में बड़े नेताओं को महत्वपूर्ण नियुक्तियों की जानकारी बाहर से मिले, वहां आंतरिक संवाद की स्थिति कैसी होगी?
पार्टी में नए चेहरों को अवसर देना गलत नहीं है। हर संगठन को समय के साथ नई पीढ़ी और नए नेतृत्व की जरूरत होती है। लेकिन नई पीढ़ी को आगे लाने और पुराने नेताओं को विश्वास में लेने के बीच संतुलन बनाना भी जरूरी है।
NCP में इस समय यही संतुलन बिगड़ने की शिकायत सामने आ रही है।
चार पन्नों की योजना: जनता दरबार से लेकर विधायकों की साप्ताहिक बैठक तक
लगातार उठ रहे सवालों के बीच पार्टी के कामकाज को दुरुस्त करने के लिए चार पन्नों की एक योजना तैयार किए जाने की बात सामने आई है।
इस योजना में कई अहम प्रस्ताव शामिल हैं।
सबसे पहले पार्टी कार्यालय में जनता दरबार की पुरानी व्यवस्था फिर शुरू करने की बात है। इसके जरिए आम लोगों और कार्यकर्ताओं की समस्याओं को सीधे पार्टी नेतृत्व तक पहुंचाने की कोशिश होगी।
दूसरा, विधायकों और विधान परिषद सदस्यों के साथ हर सप्ताह बैठक करने का प्रस्ताव है, ताकि उनके क्षेत्र की समस्याओं और संगठन से जुड़े मुद्दों पर नियमित चर्चा हो सके।
तीसरा, पार्टी के सभी बड़े नेताओं के बीच बेहतर तालमेल बनाने पर जोर दिया गया है। चौथा, विधायकों के निर्वाचन क्षेत्रों में विकास कार्यों को प्राथमिकता देने की बात कही गई है।
इन प्रस्तावों को देखें तो पार्टी की परेशानी के तीन बड़े पहलू सामने आते हैं—संगठन में संवाद की कमी, नेताओं के बीच अधिकारों का संतुलन और सरकार में रहते हुए भी विधायकों के कामकाज में आ रही बाधाएं।
हालांकि योजना बनाना और उसे जमीन पर लागू करना अलग-अलग बातें हैं। जनता दरबार शुरू होने से लेकर विधायकों के प्रस्तावों को मंजूरी मिलने तक पार्टी को अपने कामकाज में वास्तविक बदलाव दिखाना होगा।
सुनेत्रा पवार का संदेश: 2029 का लक्ष्य, लेकिन पहले घर संभालना होगा
मंगलवार की बैठक में सुनेत्रा पवार ने पार्टी नेताओं और विधायकों से एकजुट होकर काम करने की अपील की। उन्होंने 2029 के विधानसभा चुनाव में पार्टी की सीटें बढ़ाने का लक्ष्य भी सामने रखा।
मंत्रियों को निर्देश दिया गया कि वे विधायकों के साथ मिलकर उनके क्षेत्रों में विकास कार्यों को आगे बढ़ाएं। सूखाग्रस्त इलाकों में जाकर किसानों की समस्याएं समझने और उन्हें सरकारी सहायता दिलाने पर भी जोर दिया गया।
यह संदेश राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण है। पार्टी नेतृत्व भविष्य की चुनावी तैयारी की बात कर रहा है, लेकिन संगठन के भीतर वर्तमान की चुनौतियां अभी भी मौजूद हैं।
2029 की सीटों का लक्ष्य तय करना आसान है, लेकिन उससे पहले पार्टी के नेताओं के बीच भरोसा कायम करना जरूरी होगा। जिस संगठन में विधायक अपने काम के लिए फंड मांग रहे हों, वरिष्ठ नेता नियुक्तियों पर सवाल उठा रहे हों और नेतृत्व के अधिकारों को लेकर चर्चाएं चल रही हों, वहां चुनावी लक्ष्य को जमीन पर उतारने के लिए आंतरिक एकजुटता जरूरी है।
बैठक में वित्त विभाग को फिर से NCP के हिस्से में लाने का मुद्दा भी उठा। अजित पवार के पास रहा यह विभाग पार्टी के लिए राजनीतिक और प्रशासनिक दृष्टि से महत्वपूर्ण माना जाता रहा है। ऐसे में उसकी वापसी की मांग केवल मंत्रालय मिलने का सवाल नहीं, बल्कि सरकार में पार्टी की भूमिका और प्रभाव से भी जुड़ी है।
कोर कमेटी की बैठक: फिलहाल कुर्सियां वही, निगाहें अगले छह महीने पर
बुधवार, 4 नवंबर को पार्टी की कोर कमेटी की बैठक भी हुई। इसके बाद सामने आई जानकारी के मुताबिक, हाल में की गई नियुक्तियों में तत्काल कोई बदलाव नहीं करने का फैसला लिया गया। जीशान सिद्दीकी मुंबई अध्यक्ष और उमेश पाटील मुख्य प्रवक्ता बने रहेंगे।
पार्थ पवार की ओर से इन दोनों के कामकाज पर अगले छह महीने तक नजर रखने और उसके बाद आगे का फैसला करने की बात सामने आई है। साथ ही भविष्य में बड़े फैसले कोर कमेटी से चर्चा के बाद लेने का भरोसा भी दिया गया।
लेकिन इस बैठक से पार्टी के भीतर चल रहे सभी सवालों का अंतिम समाधान नहीं निकल सका।
यहां छह महीने की समयसीमा अपने आप में महत्वपूर्ण है। इसका अर्थ है कि फिलहाल नियुक्तियों को लेकर विवाद को टालने की कोशिश की गई है, जबकि उनके कामकाज की समीक्षा बाद में होगी।
लेकिन क्या छह महीने में नेताओं के बीच भरोसा भी वापस आ जाएगा? क्या वरिष्ठ नेताओं को लगेगा कि उनकी राय को महत्व दिया जा रहा है? क्या पार्थ पवार की भूमिका को लेकर स्पष्ट व्यवस्था बनाई जाएगी? इन सवालों पर अभी स्थिति साफ नहीं है।
शरद पवार की NCP से विलय की चर्चा भी राजनीतिक गणित का हिस्सा
इस पूरे घटनाक्रम के बीच एक और सवाल बार-बार उठ रहा है—क्या अजित पवार और शरद पवार के नेतृत्व वाली दोनों NCP के बीच भविष्य में फिर से एकजुट होने की कोई संभावना है?
फिलहाल इस मुद्दे पर अलग-अलग राजनीतिक चर्चाएं जरूर हैं, लेकिन पार्टी नेताओं की ओर से विलय की अटकलों को खारिज किया गया है। वरिष्ठ नेताओं की दिल्ली में हुई मुलाकात के बाद भी इस विषय को लेकर कोई अंतिम निर्णय सार्वजनिक नहीं हुआ है।
दोनों गुटों के बीच संभावित राजनीतिक समीकरण महाराष्ट्र की राजनीति के लिए महत्वपूर्ण हो सकते हैं, लेकिन इसे तय मान लेना अभी जल्दबाजी होगी।
फिलहाल सुनेत्रा पवार के नेतृत्व वाली NCP के सामने अपनी संगठनात्मक स्थिति मजबूत करने और आंतरिक मतभेदों को संभालने की चुनौती है।
असली परीक्षा अब शुरू होगी!
NCP की मौजूदा स्थिति को केवल पार्थ पवार बनाम पुराने नेताओं के विवाद के रूप में देखना पूरी तस्वीर नहीं होगी। इसके पीछे नेतृत्व का नया ढांचा, संगठन में अधिकारों का बंटवारा, सरकार में हिस्सेदारी का लाभ, विधायकों की क्षेत्रीय जरूरतें और पार्टी के भविष्य की रणनीति जैसे कई मुद्दे जुड़े हुए हैं।
अजित पवार के निधन के बाद पार्टी एक नए दौर में दाखिल हुई है। सुनेत्रा पवार के सामने अब केवल पार्टी अध्यक्ष की जिम्मेदारी निभाने का सवाल नहीं है, बल्कि अलग-अलग राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं, अनुभवों और अपेक्षाओं वाले नेताओं को एक साथ लेकर चलने की चुनौती भी है।
प्रफुल्ल पटेल, सुनील तटकरे और छगन भुजबल जैसे अनुभवी नेताओं की संगठन में भूमिका क्या होगी? पार्थ पवार की जिम्मेदारियां किस सीमा तक तय होंगी? क्या कोर कमेटी वास्तव में सामूहिक फैसलों का केंद्र बनेगी? क्या विधायकों के क्षेत्रीय विकास कार्यों के लिए पर्याप्त धन मिलेगा? और क्या वित्त विभाग की वापसी के लिए पार्टी नेतृत्व सरकार में प्रभावी बातचीत कर पाएगा?
ये ऐसे सवाल हैं जिनका जवाब केवल बैठकों के बाद जारी होने वाले एकता के संदेशों से नहीं मिलेगा।
क्योंकि राजनीति में एकजुटता का दावा करना और एकजुट होकर फैसले लेना दो अलग-अलग बातें हैं। बैठक में सभी नेता एक साथ बैठ सकते हैं, तस्वीरें भी साथ खिंच सकती हैं, लेकिन संगठन की असली मजबूती तब दिखाई देती है जब फैसलों में सबकी भागीदारी और जिम्मेदारियों में स्पष्टता हो।
NCP में फिलहाल बैठकें जारी हैं, योजनाएं बन रही हैं और नेतृत्व की ओर से एकजुट रहने की अपील भी की जा रही है। लेकिन पार्टी के भीतर उठ रहे सवाल अब भी अपनी जगह मौजूद हैं।
सवाल सिर्फ यह नहीं कि NCP की कमान किसके हाथ में है, बल्कि यह भी है कि उस कमान के साथ फैसले लेने का अधिकार किस-किस के पास है। सुनेत्रा पवार के सामने सबसे बड़ी चुनौती यही है कि पार्टी में किसी को यह महसूस न हो कि वह सत्ता में तो साथ है, लेकिन फैसलों की मेज पर उसकी कुर्सी खाली है।















