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जामिया में टकराव तेज: छात्रों को आखिरी अल्टीमेटम, प्रशासन ने खाली करने को कहा गुलिस्तान-ए-गालिब भवन; मांगें पूरी होने तक पीछे हटने को तैयार नहीं प्रदर्शनकारी

“छात्रसंघ चुनाव और संविधान को मंजूरी देने की मांग पर 12 अक्टूबर से आंदोलन और भूख हड़ताल का दावा • अंतिम नोटिस से बढ़ा तनाव, 8 नवंबर तक ऑनलाइन कक्षाएं और ऑनलाइन मिड-सेमेस्टर परीक्षाओं का फैसला • निलंबन और कारण बताओ नोटिस वापस लेने के बावजूद नहीं टूटा गतिरोध”

नई दिल्ली। जामिया मिलिया इस्लामिया में छात्रसंघ चुनाव बहाल करने और छात्रसंघ के संविधान को मंजूरी देने की मांग को लेकर शुरू हुआ आंदोलन अब विश्वविद्यालय प्रशासन और प्रदर्शनकारी छात्रों के बीच सीधे टकराव की स्थिति में पहुंचता दिखाई दे रहा है। 12 अक्टूबर से जारी आंदोलन और भूख हड़ताल के बीच प्रशासन ने सख्त रुख अपनाते हुए प्रदर्शनकारी छात्रों को गुलिस्तान-ए-गालिब बिल्डिंग और गालिब लॉन खाली करने का अंतिम नोटिस जारी किया है। दूसरी ओर, छात्र अपनी मांगों पर ठोस निर्णय और स्पष्ट समयसीमा मिलने तक आंदोलन समाप्त करने के लिए तैयार नहीं हैं। विश्वविद्यालय परिसर में बढ़ते तनाव ने एक बार फिर उच्च शिक्षण संस्थानों में छात्र प्रतिनिधित्व, लोकतांत्रिक भागीदारी और प्रशासनिक जवाबदेही से जुड़े सवालों को केंद्र में ला दिया है।

मामले की गंभीरता केवल परिसर खाली कराने के आदेश तक सीमित नहीं है। एक तरफ विश्वविद्यालय प्रशासन विभागों के नियमित कामकाज और शैक्षणिक गतिविधियों में बाधा का हवाला दे रहा है, तो दूसरी तरफ आंदोलनकारी छात्र छात्रसंघ चुनाव की बहाली और अपने प्रतिनिधित्व से जुड़े सवालों पर स्पष्ट आश्वासन मांग रहे हैं। ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या प्रशासनिक सख्ती से आंदोलन थमेगा या फिर संवाद की कमी दोनों पक्षों के बीच टकराव को और गहरा करेगी?

अंतिम नोटिस से बढ़ा दबाव, विभागों के कामकाज में बाधा का हवाला

विश्वविद्यालय प्रशासन की ओर से एक छात्र को भेजे गए नोटिस में कहा गया है कि गुलिस्तान-ए-गालिब बिल्डिंग में राजनीति विज्ञान और अर्थशास्त्र विभाग स्थित हैं। प्रशासन के अनुसार, वहां छात्रों की मौजूदगी अनधिकृत है और इससे विभागों के सुचारू संचालन में बाधा उत्पन्न हो रही है। इसी आधार पर छात्रों को तत्काल परिसर खाली करने का निर्देश दिया गया है।

नोटिस में आदेश का पालन नहीं करने की स्थिति में अनुशासनात्मक और कानूनी कार्रवाई की चेतावनी भी दी गई है। इस कदम के बाद आंदोलनकारियों पर दबाव बढ़ना तय माना जा रहा है। हालांकि, नोटिस में इस्तेमाल किए गए प्रशासनिक तर्क और छात्रों की मांगों के बीच मूल विवाद का समाधान अभी सामने नहीं आया है।

विश्वविद्यालय परिसर में किसी विभाग का कामकाज बाधित होने की शिकायत को प्रशासनिक स्तर पर संबोधित करना जरूरी हो सकता है, लेकिन छात्र आंदोलन से जुड़े विवाद में यह भी महत्वपूर्ण है कि कार्रवाई पारदर्शी हो, नियमों के अनुरूप हो और संबंधित पक्षों को अपनी बात रखने का अवसर मिले। दूसरी ओर, प्रदर्शनकारियों के लिए भी यह आवश्यक है कि उनका आंदोलन दूसरे छात्रों की पढ़ाई, शिक्षकों के कामकाज और विश्वविद्यालय की आवश्यक गतिविधियों को अनिश्चितकाल तक प्रभावित न करे।

अब निगाहें इस बात पर हैं कि प्रशासन अंतिम नोटिस के बाद क्या कदम उठाता है और क्या छात्रों के साथ बातचीत के जरिए ऐसा रास्ता निकल सकता है, जिसमें शैक्षणिक गतिविधियां भी सामान्य हों और छात्रसंघ चुनाव को लेकर उठाए गए सवालों का भी जवाब मिले।

छात्रसंघ चुनाव पर तारीख क्यों नहीं? आंदोलन का केंद्रीय सवाल

प्रदर्शनकारी छात्रों की प्रमुख मांग छात्रसंघ के संविधान को मंजूरी देने और चुनाव कराने की प्रक्रिया को आगे बढ़ाने की है। छात्रों का आरोप है कि विश्वविद्यालय प्रशासन ने अब तक चुनाव कराने के लिए कोई निश्चित समयसीमा घोषित नहीं की है। इसी कथित अनिश्चितता को वे अपने आंदोलन का मुख्य आधार बता रहे हैं।

छात्रसंघ किसी भी विश्वविद्यालय में विद्यार्थियों और प्रशासन के बीच संवाद का एक महत्वपूर्ण माध्यम हो सकता है। इसके जरिए छात्र अपनी शैक्षणिक समस्याओं, परिसर की सुविधाओं, छात्र कल्याण और प्रशासनिक निर्णयों से जुड़े मुद्दों को संगठित तरीके से उठा सकते हैं। ऐसे में छात्र प्रतिनिधित्व की व्यवस्था को लेकर स्पष्टता की मांग को केवल परिसर में प्रदर्शन के प्रश्न तक सीमित करके नहीं देखा जा सकता।

हालांकि, छात्रसंघ चुनाव की बहाली की मांग और चुनाव की प्रक्रिया से जुड़े प्रशासनिक निर्णय अलग-अलग स्तर के विषय हैं। चुनाव कराने से पहले संविधान की मंजूरी, लागू नियमों, संबंधित संस्थागत प्रक्रियाओं और समयसीमा पर स्पष्ट जानकारी देना विवाद को कम करने में मदद कर सकता है। प्रशासन की ओर से यदि कोई प्रक्रिया लंबित है, तो उसके कारणों और संभावित समयसीमा को सार्वजनिक करना भी गतिरोध दूर करने का व्यावहारिक रास्ता हो सकता है।

फिलहाल छात्रों का कहना है कि जब तक उनकी सभी मांगों पर ठोस कार्रवाई नहीं होती, वे आंदोलन जारी रखेंगे। ऐसे में विवाद का केंद्र अब केवल धरना स्थल नहीं, बल्कि यह सवाल भी है कि छात्रसंघ चुनाव की दिशा में विश्वविद्यालय प्रशासन का अगला कदम क्या होगा।

8 नवंबर तक ऑनलाइन पढ़ाई, परीक्षाओं का तरीका भी बदला

आंदोलन के बीच विश्वविद्यालय प्रशासन ने 8 नवंबर तक ऑनलाइन कक्षाएं आयोजित करने का फैसला लिया है। इसके साथ ही मिड-सेमेस्टर परीक्षाएं भी ऑनलाइन कराने का निर्णय लिया गया है। इस फैसले से फिलहाल शैक्षणिक गतिविधियों को जारी रखने का विकल्प सामने आया है, लेकिन परिसर में सामान्य स्थिति कब लौटेगी, यह स्पष्ट नहीं है।

ऑनलाइन कक्षाओं और परीक्षाओं का निर्णय छात्रों के लिए पढ़ाई जारी रखने का माध्यम बन सकता है, मगर इससे आंदोलन के मूल मुद्दे अपने आप हल नहीं होते। छात्रसंघ चुनाव की मांग, संविधान की मंजूरी और प्रशासन के साथ संवाद जैसे सवालों का समाधान अलग से निकालना होगा।

लंबे समय तक परिसर में असामान्य शैक्षणिक व्यवस्था बने रहने से विद्यार्थियों की पढ़ाई, परीक्षा की तैयारी और विश्वविद्यालय के नियमित कामकाज पर असर पड़ सकता है। इसलिए जरूरी है कि ऑनलाइन व्यवस्था को केवल तत्काल प्रबंधन के उपाय के रूप में नहीं, बल्कि सामान्य शैक्षणिक गतिविधियों की बहाली की व्यापक योजना के साथ देखा जाए।

विश्वविद्यालय प्रशासन के सामने चुनौती दोहरी है—एक ओर उसे शैक्षणिक व्यवस्था सुचारू रखनी है, वहीं दूसरी ओर आंदोलन के पीछे उठाए जा रहे सवालों पर ऐसा जवाब देना है जो छात्रों के बीच भरोसा पैदा कर सके।

निलंबन और कारण बताओ नोटिस वापस, फिर भी नहीं बनी सहमति

इस पूरे विवाद के बीच एक महत्वपूर्ण घटनाक्रम यह भी है कि प्रदर्शन के दौरान छात्रों को जारी किए गए निलंबन और कारण बताओ नोटिस वापस लिए जाने की बात सामने आई है। इसके अतिरिक्त, सुरक्षा कर्मचारियों के आचरण की जांच के लिए एक समिति गठित करने की बात भी कही गई है।

इन कदमों को तनाव कम करने की दिशा में संभावित पहल के रूप में देखा जा सकता है। लेकिन इनके बावजूद आंदोलन समाप्त होने के संकेत नहीं मिले हैं। प्रदर्शनकारी छात्र प्रशासन की ओर से किए जा रहे दावों को खारिज करते हुए कह रहे हैं कि उनकी मूल मांगों पर अभी तक निर्णायक कार्रवाई नहीं हुई है।

विश्वविद्यालय प्रशासन के अनुसार, छात्रों ने कथित मानहानिकारक बयानों के लिए सार्वजनिक रूप से माफी मांगने और सोशल मीडिया पोस्ट हटाने पर सहमति जताई थी। हालांकि, प्रदर्शनकारी छात्रों ने प्रशासन के इस दावे को स्वीकार नहीं किया है। इस तरह दोनों पक्षों के बयानों में अंतर सामने आया है।

ऐसी स्थिति में किसी कथित सहमति को अंतिम समाधान मानने से पहले यह स्पष्ट होना जरूरी है कि किन मुद्दों पर सहमति बनी थी, किन शर्तों पर बातचीत हुई और क्या उन शर्तों की पुष्टि दोनों पक्षों ने की है। जब तक इन बिंदुओं पर स्पष्टता नहीं आती, विवाद के अलग-अलग पहलुओं को लेकर दावों और प्रतिदावों का सिलसिला जारी रह सकता है।

परिसर में नारेबाजी के बाद सुरक्षा बढ़ी

23 अक्टूबर को विश्वविद्यालय परिसर में ‘फ्री शरजील इमाम’ और ‘फ्री कश्मीर’ से जुड़े नारे लिखे जाने की खबर सामने आई थी। इसके अलावा प्रधानमंत्री के खिलाफ नारेबाजी किए जाने की जानकारी भी दी गई थी। इस घटनाक्रम के बाद परिसर के बाहर सुरक्षा व्यवस्था कड़ी करते हुए दिल्ली पुलिस और अर्धसैनिक बलों की तैनाती की गई।

इस घटनाक्रम ने पहले से जारी आंदोलन के बीच सुरक्षा और कानून-व्यवस्था से जुड़े सवालों को भी चर्चा में ला दिया। हालांकि, किसी नारे, पोस्ट या कथित घटना की जिम्मेदारी तय करने के लिए तथ्यों की पुष्टि और निष्पक्ष जांच आवश्यक है। केवल किसी विवादित गतिविधि के सामने आने से पूरे आंदोलन या सभी प्रदर्शनकारी छात्रों को उसके लिए जिम्मेदार ठहराना उचित नहीं होगा।

विश्वविद्यालय परिसर में सुरक्षा बनाए रखना प्रशासन की जिम्मेदारी है, लेकिन सुरक्षा व्यवस्था और छात्रों की शांतिपूर्ण असहमति के अधिकार के बीच संतुलन भी उतना ही महत्वपूर्ण है। किसी भी संभावित उल्लंघन पर कार्रवाई संबंधित नियमों और उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर होनी चाहिए।

अब सवाल टकराव का नहीं, समाधान का है

गुलिस्तान-ए-गालिब बिल्डिंग और गालिब लॉन खाली करने के अंतिम नोटिस ने जामिया के आंदोलन को एक निर्णायक मोड़ पर ला खड़ा किया है। प्रशासन विभागों के कामकाज में बाधा का हवाला देकर परिसर खाली कराने पर जोर दे रहा है, जबकि प्रदर्शनकारी छात्र छात्रसंघ चुनाव और अपने अन्य मुद्दों पर ठोस निर्णय की मांग कर रहे हैं।

इस बीच निलंबन और कारण बताओ नोटिस वापस लेने तथा सुरक्षा कर्मचारियों के आचरण की जांच के लिए समिति बनाने की बात सामने आई है। इसके बावजूद दोनों पक्षों के बीच मूल मुद्दों पर सहमति बनती नहीं दिख रही। ऑनलाइन कक्षाओं और परीक्षाओं की व्यवस्था ने तत्काल शैक्षणिक संचालन का रास्ता तो दिया है, लेकिन आंदोलन के स्थायी समाधान की तस्वीर अभी साफ नहीं है।

अब विश्वविद्यालय प्रशासन के सामने सबसे अहम चुनौती यह है कि वह अंतिम नोटिस और संभावित अनुशासनात्मक कार्रवाई के साथ-साथ संवाद की प्रक्रिया को भी आगे बढ़ाए। यदि छात्रसंघ के संविधान, चुनाव की प्रक्रिया और संभावित समयसीमा पर स्पष्ट स्थिति सामने आती है, तो विवाद को कम करने का रास्ता निकल सकता है। वहीं प्रदर्शनकारी छात्रों की भी जिम्मेदारी होगी कि आंदोलन शांतिपूर्ण रहे और दूसरे विद्यार्थियों की पढ़ाई तथा विभागों के नियमित कामकाज को अनावश्यक नुकसान न पहुंचे।

जामिया का यह घटनाक्रम केवल एक धरने या परिसर खाली कराने के आदेश की कहानी नहीं है। यह छात्र प्रतिनिधित्व, प्रशासनिक पारदर्शिता और संस्थागत संवाद की परीक्षा भी है। फिलहाल दोनों पक्ष अपने-अपने रुख पर कायम हैं। ऐसे में सबसे महत्वपूर्ण सवाल यही है—क्या अंतिम नोटिस के बाद टकराव और बढ़ेगा, या विश्वविद्यालय प्रशासन और छात्र प्रतिनिधि बातचीत के जरिए ऐसा समाधान निकालेंगे, जिससे पढ़ाई भी सामान्य हो और छात्रसंघ चुनाव को लेकर जारी अनिश्चितता भी समाप्त हो?

फिलहाल जामिया में गतिरोध बरकरार है। छात्रों का आंदोलन जारी रखने का संकल्प और प्रशासन की सख्ती, दोनों के बीच अब समाधान की जिम्मेदारी संवाद, पारदर्शिता और नियमसम्मत कार्रवाई पर टिक गई है।

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VIKAS TRIPATHI
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