“13 दिनों से भूख हड़ताल पर बैठे चार छात्र, विरोध दबाने के आरोपों से गरमाया माहौल; विश्वविद्यालय ने सुरक्षा का हवाला देकर ऑनलाइन कीं कक्षाएं, गेट और लाइब्रेरी बंद रखने का फैसला”
नई दिल्ली: जामिया मिलिया इस्लामिया में छात्र संघ की बहाली की मांग को लेकर जारी आंदोलन अब विश्वविद्यालय प्रशासन, प्रदर्शनकारी छात्रों और पुलिस के बीच गंभीर टकराव का रूप लेता दिखाई दे रहा है। एक ओर छात्र लोकतांत्रिक प्रतिनिधित्व और अपने निर्वाचित संगठन की बहाली की मांग पर अड़े हैं, तो दूसरी ओर विश्वविद्यालय प्रशासन ने आंदोलन के बीच सुरक्षा संबंधी चिंताओं का हवाला देते हुए कक्षाएं ऑनलाइन कर दी हैं और परिसर के गेट तथा लाइब्रेरी को अगली सूचना तक बंद रखने का फैसला किया है। इसी बीच कांग्रेस के लोकसभा सांसद इमरान मसूद, राज्यसभा सदस्य इमरान प्रतापगढ़ी और अन्य लोगों के खिलाफ विश्वविद्यालय की ओर से दिल्ली पुलिस में शिकायत दर्ज कराए जाने से विवाद ने नया राजनीतिक और प्रशासनिक मोड़ ले लिया है।
विश्वविद्यालय के एक अधिकारी के मुताबिक, शिकायत में आरोप लगाया गया है कि संबंधित जनप्रतिनिधि बिना अनुमति परिसर में दाखिल हुए और छात्र संघ चुनाव बहाल करने की मांग को लेकर चल रहे प्रदर्शन के दौरान अशांति फैलाने में शामिल रहे। हालांकि, ये आरोप हैं और इनकी स्वतंत्र पुष्टि होना बाकी है। शिकायत पर दिल्ली पुलिस की ओर से अब तक कोई प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है। ऐसे में यह स्पष्ट नहीं है कि पुलिस ने शिकायत के आधार पर क्या कार्रवाई की है या मामले में आगे की जांच किस दिशा में बढ़ेगी।
इस पूरे घटनाक्रम का सबसे अहम सवाल यही है कि आखिर छात्र संघ की बहाली की मांग को लेकर शुरू हुआ विरोध इतना गंभीर टकराव क्यों बन गया कि विश्वविद्यालय में सामान्य शैक्षणिक गतिविधियां प्रभावित होने लगीं, छात्र भूख हड़ताल पर बैठ गए और परिसर के बाहर भारी पुलिस बल की तैनाती तथा हिरासत में लिए जाने के आरोप सामने आने लगे। फिलहाल, इस सवाल का जवाब केवल आरोप-प्रत्यारोप से नहीं, बल्कि प्रशासन, छात्रों और पुलिस के तथ्यों पर आधारित स्पष्टीकरण से ही मिल सकता है।
13 दिन से भूख हड़ताल, फिर भी समाधान दूर
जामिया में जारी आंदोलन की गंभीरता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि चार छात्र कथित तौर पर पिछले 13 दिनों से भूख हड़ताल पर बैठे हैं। प्रदर्शनकारी छात्र जामिया मिलिया इस्लामिया स्टूडेंट्स यूनियन (JMISU) की बहाली और छात्र संघ चुनाव दोबारा शुरू कराने की मांग कर रहे हैं। उपलब्ध जानकारी के मुताबिक, विश्वविद्यालय में वर्ष 2006 के बाद से छात्र संघ के चुनाव नहीं हुए हैं। यही लंबा अंतराल अब छात्रों की मांग और प्रशासन के सामने उठ रहे जवाबदेही के सवालों के केंद्र में है।
छात्र संघ किसी भी विश्वविद्यालय में केवल एक संगठनात्मक व्यवस्था नहीं होता। वह विद्यार्थियों की सामूहिक आवाज, उनकी समस्याओं को प्रशासन तक पहुंचाने और शैक्षणिक परिसर में प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करने का माध्यम भी हो सकता है। ऐसे में छात्र संघ की बहाली की मांग को महज परिसर के भीतर का विवाद मानकर नजरअंदाज करना उचित नहीं होगा। साथ ही, यह भी जरूरी है कि आंदोलन के दौरान परिसर की सुरक्षा, शैक्षणिक गतिविधियों और दूसरे विद्यार्थियों के अधिकारों को लेकर उठने वाली चिंताओं का समाधान संवाद और स्पष्ट नियमों के जरिए किया जाए।
चार छात्रों की लगातार भूख हड़ताल ने इस विवाद को और संवेदनशील बना दिया है। लंबे समय तक भूखे रहने से स्वास्थ्य पर गंभीर असर पड़ सकता है। इसलिए प्रशासन और प्रदर्शनकारियों, दोनों के लिए यह जरूरी है कि छात्रों की सेहत की निगरानी हो, चिकित्सा सहायता उपलब्ध रहे और किसी भी संभावित आपात स्थिति को रोकने के लिए तत्काल कदम उठाए जाएं। आंदोलन का समाधान निकलना जितना आवश्यक है, प्रदर्शन कर रहे छात्रों की सुरक्षा भी उतनी ही महत्वपूर्ण है।
सांसदों के खिलाफ शिकायत से बढ़ा विवाद
विश्वविद्यालय प्रशासन की ओर से इमरान मसूद, इमरान प्रतापगढ़ी और अन्य लोगों के खिलाफ पुलिस में शिकायत दर्ज कराना इस घटनाक्रम का एक महत्वपूर्ण पहलू है। शिकायत में बिना अनुमति परिसर में प्रवेश और प्रदर्शन के दौरान अशांति फैलाने के आरोप लगाए गए हैं। इन आरोपों की जांच और उनका सत्यापन संबंधित अधिकारियों का विषय है। किसी भी व्यक्ति की जिम्मेदारी तय करने से पहले उपलब्ध साक्ष्यों, संबंधित पक्षों के बयान और घटनाक्रम की परिस्थितियों की निष्पक्ष जांच आवश्यक होगी।
इस मामले में एक बुनियादी अंतर समझना भी जरूरी है। किसी विश्वविद्यालय परिसर में प्रवेश से जुड़े नियमों का उल्लंघन हुआ या नहीं, यह एक तथ्यात्मक और कानूनी प्रश्न है। इसी तरह, किसी व्यक्ति ने वास्तव में अशांति फैलाई या नहीं, इसका निर्धारण भी साक्ष्यों के आधार पर ही किया जा सकता है। केवल शिकायत दर्ज होने से आरोप सिद्ध नहीं हो जाते और न ही किसी जनप्रतिनिधि को आरोपों के आधार पर दोषी माना जा सकता है।
दूसरी ओर, जनप्रतिनिधियों की भूमिका और विश्वविद्यालय प्रशासन की जिम्मेदारी को लेकर भी सवाल उठ सकते हैं। यदि कोई जनप्रतिनिधि छात्रों की मांगों के समर्थन में परिसर पहुंचता है, तो उसके प्रवेश और गतिविधियों को लागू नियमों के संदर्भ में देखा जाना चाहिए। वहीं, यदि किसी नियम का उल्लंघन हुआ है, तो प्रशासन और पुलिस को कानून के अनुरूप कार्रवाई करने का अधिकार है। इस पूरे मामले में पारदर्शिता इसलिए भी जरूरी है, ताकि न तो किसी को राजनीतिक दबाव में निशाना बनाए जाने की आशंका रहे और न ही किसी संभावित उल्लंघन को बिना जांच के नजरअंदाज किया जाए।
गेट नंबर 7 पर पुलिस कार्रवाई का आरोप
विवाद के बीच स्टूडेंट्स फेडरेशन ऑफ इंडिया (SFI) की जामिया इकाई ने पुलिस कार्रवाई को लेकर गंभीर आरोप लगाए हैं। संगठन का दावा है कि परिसर के गेट नंबर 7 के बाहर सैकड़ों पुलिसकर्मियों की मौजूदगी के बीच छात्रों को हिरासत में लिया गया। एक छात्र के हवाले से भी बताया गया है कि परिसर के बाहर भारी पुलिस बल तैनात था, विद्यार्थियों को अंदर आने से रोका जा रहा था और कुछ छात्रों को हिरासत में लिया जा रहा था।
SFI ने सोशल मीडिया पर इस घटनाक्रम को छात्रों के खिलाफ कठोर कार्रवाई करार दिया है। हालांकि, हिरासत में लिए गए छात्रों की संख्या, कार्रवाई के कानूनी आधार और हिरासत में लिए गए लोगों की स्थिति के बारे में स्वतंत्र रूप से पुष्ट जानकारी उपलब्ध नहीं है। पुलिस की ओर से आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने आने के बाद ही इन आरोपों की स्थिति स्पष्ट हो सकेगी।
यदि छात्रों को हिरासत में लिया गया है, तो यह जानना महत्वपूर्ण होगा कि कितने लोगों को हिरासत में लिया गया, उन्हें किस आधार पर रोका गया और क्या उनके परिजनों या कानूनी प्रतिनिधियों को आवश्यक जानकारी दी गई। किसी भी कानून-व्यवस्था संबंधी कार्रवाई में वैधानिक प्रक्रिया और नागरिकों के अधिकारों का सम्मान अनिवार्य है। इसी तरह, यदि प्रशासन के पास सुरक्षा संबंधी ठोस चिंताएं हैं, तो उन्हें भी तथ्यों और स्पष्ट कारणों के साथ सार्वजनिक करना चाहिए।
शिक्षकों का मार्च, अपील बेअसर रहने का दावा
विश्वविद्यालय के अनुसार, शनिवार को कुलपति मजहर आसिफ और रजिस्ट्रार मोहम्मद महताब आलम रिजवी सहित 1,500 से अधिक शिक्षण और गैर-शिक्षण कर्मचारी अंसारी ऑडिटोरियम के लॉन से गेट नंबर 7 तक मार्च करते हुए पहुंचे। प्रशासन का कहना है कि इस पहल का उद्देश्य प्रदर्शन कर रहे छात्रों को आंदोलन समाप्त करने के लिए मनाना था।
विश्वविद्यालय के मुताबिक, कर्मचारियों ने लगभग दो घंटे तक छात्रों से बार-बार अपील की, लेकिन प्रदर्शनकारियों ने वहां से हटने से इनकार कर दिया। इस घटनाक्रम से यह संकेत मिलता है कि प्रशासन की ओर से आंदोलन खत्म कराने की कोशिश की गई, लेकिन दोनों पक्षों के बीच ऐसा समाधान नहीं निकल सका जो प्रदर्शन को समाप्त करा पाता।
हालांकि, किसी आंदोलन को समाप्त करने की अपील और उसके पीछे मौजूद मांगों का समाधान दो अलग-अलग बातें हैं। यदि छात्रों की मुख्य मांग छात्र संघ चुनाव बहाल करना है, तो केवल प्रदर्शन स्थल खाली कराने की कोशिश से विवाद का मूल कारण खत्म नहीं होगा। इसके लिए प्रशासन को यह स्पष्ट करना होगा कि छात्र संघ की बहाली पर उसकी नीति क्या है, चुनाव कराने की संभावनाओं पर विचार किया जा रहा है या नहीं और यदि कोई बाधा है तो उसका आधार क्या है।
टेंट हटाने और छात्राओं से दुर्व्यवहार के आरोप
SFI की जामिया इकाई ने विश्वविद्यालय के प्रॉक्टर और रजिस्ट्रार पर सुरक्षा सलाहकार के साथ मिलकर भूख हड़ताल कर रहे छात्रों को हटाने की कोशिश करने का आरोप लगाया है। संगठन का दावा है कि प्रदर्शन स्थल पर लगे टेंट उखाड़ दिए गए और छात्राओं को घसीटा गया।
ये आरोप गंभीर हैं और इनकी निष्पक्ष जांच जरूरी है। फिलहाल, उपलब्ध जानकारी के आधार पर यह नहीं कहा जा सकता कि घटनाक्रम ठीक किस तरह हुआ, किसने क्या कार्रवाई की और क्या किसी नियम या अधिकार का उल्लंघन हुआ। विश्वविद्यालय प्रशासन का विस्तृत पक्ष और संबंधित अधिकारियों की प्रतिक्रिया इस मामले में महत्वपूर्ण होगी।
यदि प्रदर्शन स्थल से टेंट हटाए गए, तो प्रशासन को कार्रवाई के कारण और अपनाई गई प्रक्रिया स्पष्ट करनी चाहिए। यदि छात्राओं के साथ बल प्रयोग हुआ, तो संबंधित परिस्थितियों की जांच कर जिम्मेदारी तय की जानी चाहिए। दूसरी ओर, किसी भी पक्ष के विरुद्ध निष्कर्ष पर पहुंचने से पहले संबंधित पक्षों को अपना पक्ष रखने का अवसर मिलना चाहिए। गंभीर आरोपों का जवाब भी गंभीर जांच से ही दिया जा सकता है।
ऑनलाइन कक्षाएं, बंद गेट और लाइब्रेरी: छात्रों की पढ़ाई पर असर
विश्वविद्यालय ने सुरक्षा कारणों का हवाला देते हुए कक्षाओं को ऑनलाइन माध्यम से संचालित करने का फैसला किया है। विद्यार्थियों को परिसर नहीं आने की सलाह दी गई है। साथ ही, गेट और लाइब्रेरी अगली सूचना तक बंद रखने की बात कही गई है। इस निर्णय का सीधा असर उन छात्रों पर पड़ सकता है जिन्हें पढ़ाई, पुस्तकालय, प्रयोगशालाओं या अन्य शैक्षणिक सुविधाओं के लिए परिसर पर निर्भर रहना पड़ता है।
प्रशासन के सामने परिसर में सुरक्षा बनाए रखने की जिम्मेदारी है, लेकिन विश्वविद्यालय का मूल उद्देश्य शिक्षा और स्वतंत्र शैक्षणिक वातावरण सुनिश्चित करना भी है। इसलिए अस्थायी प्रतिबंधों की आवश्यकता, उनकी अवधि और उन्हें हटाने की शर्तों के बारे में स्पष्ट जानकारी देना जरूरी है। छात्रों को यह भी बताया जाना चाहिए कि ऑनलाइन कक्षाओं, परीक्षाओं, उपस्थिति और अन्य शैक्षणिक गतिविधियों पर इन फैसलों का क्या प्रभाव पड़ेगा।
अब सवाल जवाबदेही और समाधान का
जामिया का मौजूदा विवाद कई महत्वपूर्ण सवाल छोड़ रहा है। वर्ष 2006 के बाद से छात्र संघ चुनाव नहीं होने के पीछे क्या कारण रहे हैं? क्या प्रशासन छात्र संघ की बहाली पर औपचारिक संवाद के लिए तैयार है? भूख हड़ताल पर बैठे चार छात्रों की स्वास्थ्य सुरक्षा कैसे सुनिश्चित की जा रही है? गेट नंबर 7 पर पुलिस की कार्रवाई को लेकर लगाए गए आरोपों की स्थिति क्या है? और सांसदों के खिलाफ दर्ज शिकायत पर पुलिस की अगली कार्रवाई क्या होगी?
इन सवालों के जवाब केवल बयान जारी करने से नहीं मिलेंगे। विश्वविद्यालय प्रशासन को अपनी नीति और कार्रवाई का स्पष्ट पक्ष रखना होगा, प्रदर्शनकारी छात्रों को अपनी मांगों और आरोपों के समर्थन में उपलब्ध तथ्य सामने रखने होंगे और पुलिस को हिरासत तथा शिकायत से संबंधित स्थिति स्पष्ट करनी होगी।
इस पूरे घटनाक्रम में किसी भी पक्ष को पहले से दोषी मानना उचित नहीं होगा। लेकिन यह भी उतना ही महत्वपूर्ण है कि छात्र संघ की बहाली की मांग, भूख हड़ताल कर रहे छात्रों की स्थिति और पुलिस कार्रवाई के आरोपों को मामूली विवाद समझकर टाल न दिया जाए।
जामिया में तत्काल जरूरत टकराव को और बढ़ाने की नहीं, बल्कि ऐसा पारदर्शी रास्ता निकालने की है जिसमें सुरक्षा और कानून का पालन भी सुनिश्चित हो तथा छात्रों की मांगों पर गंभीरता से विचार भी किया जाए। यदि विश्वविद्यालय प्रशासन, छात्र प्रतिनिधियों और संबंधित अधिकारियों के बीच समयबद्ध संवाद शुरू होता है, तो गतिरोध खत्म करने की संभावना बन सकती है। इसके विपरीत, यदि संवाद की जगह केवल आरोप-प्रत्यारोप और प्रतिबंध हावी रहे, तो विवाद लंबा खिंच सकता है और इसका नुकसान सबसे अधिक विद्यार्थियों की पढ़ाई तथा विश्वविद्यालय के शैक्षणिक माहौल को उठाना पड़ सकता है।
जामिया का सवाल अब केवल एक छात्र आंदोलन तक सीमित नहीं रह गया है। यह प्रतिनिधित्व, प्रशासनिक जवाबदेही, परिसर की सुरक्षा और लोकतांत्रिक संवाद के बीच संतुलन स्थापित करने की चुनौती बन चुका है। इसका समाधान आरोपों को सच मान लेने या मांगों को खारिज कर देने में नहीं, बल्कि तथ्यों की निष्पक्ष जांच और बातचीत के जरिए ठोस निर्णय लेने में है।















