“क्यों न टूटे पुराने कार्यकर्ताओं का सब्र?”
लखनऊ: भारतीय जनता पार्टी की राजनीति की सबसे महत्वपूर्ण पहचान लंबे समय तक उसकी कैडर आधारित संगठनात्मक व्यवस्था रही है। बूथ से लेकर मंडल, जिला और प्रदेश स्तर तक कार्यकर्ताओं की लंबी श्रृंखला ने पार्टी को उत्तर प्रदेश जैसे बड़े और राजनीतिक रूप से जटिल राज्य में मजबूत संगठन खड़ा करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। लेकिन सत्ता और संगठन के विस्तार के साथ अब पार्टी के भीतर एक व्यापक संगठनात्मक सवाल भी चर्चा में है—जो कार्यकर्ता वर्षों तक पार्टी के लिए संघर्ष करते रहे, उनकी राजनीतिक हिस्सेदारी और भविष्य की भूमिका किस तरह तय हो रही है?
यह सवाल किसी एक व्यक्ति, किसी एक जाति या किसी एक पद तक सीमित नहीं है। इसके केंद्र में वह कार्यकर्ता है जिसने ऐसे समय में पार्टी का झंडा उठाया, जब चुनावी सफलता सुनिश्चित नहीं थी और संगठन के पास आज जैसी राजनीतिक ताकत भी नहीं थी।
आज भाजपा उत्तर प्रदेश में एक विशाल राजनीतिक संगठन है। ऐसे में नए सामाजिक समूहों को प्रतिनिधित्व देना, युवा नेतृत्व को आगे बढ़ाना, क्षेत्रीय संतुलन बनाना और दूसरे दलों से आने वाले नेताओं को राजनीतिक अवसर देना—ये सभी चुनावी राजनीति का हिस्सा हैं। लेकिन इसी प्रक्रिया के बीच पुराने कार्यकर्ताओं की अपेक्षाएं भी बढ़ती हैं।
और यहीं से सवाल उठता है—क्या संगठन के विस्तार के साथ पुराने कैडर की उम्मीदों का भी विस्तार हुआ है?
नई प्रदेश टीम ने फिर सामने ला दिया सामाजिक प्रतिनिधित्व का सवाल
जून 2026 में घोषित उत्तर प्रदेश भाजपा की नई संगठनात्मक टीम में सामाजिक और क्षेत्रीय संतुलन पर खास जोर दिखाई दिया। “पर्दाफाश न्यूज़” की रिपोर्ट के मुताबिक, 64 पदाधिकारियों वाली टीम में 30 यानी करीब 47 प्रतिशत ओबीसी वर्ग से हैं, जबकि सामान्य वर्ग के 26 पदाधिकारी हैं। अनुसूचित जाति के सात और अनुसूचित जनजाति के एक प्रतिनिधि को भी स्थान मिला है। सामान्य वर्ग के भीतर ब्राह्मण समुदाय के 10 पदाधिकारी बताए गए हैं, जो इस वर्ग में सबसे बड़ा समूह है।
रिपोर्ट में अभिजीत मिश्रा, बृज बहादुर, अर्चना मिश्रा, शंकर गिरी, अंकुर शर्मा, यतेंद्र शर्मा, रजनी पांडेय और अवधेश द्विवेदी जैसे नामों का भी उल्लेख है।
इस तस्वीर को केवल इस आधार पर देखना कि भाजपा ने ब्राह्मण समाज को कितना प्रतिनिधित्व दिया, अधूरा होगा। असली चर्चा इससे आगे जाती है।
इन पदों पर पहुंचे चेहरों की संगठनात्मक पृष्ठभूमि क्या है? कितने नेता लंबे समय से पार्टी के साथ हैं? कितने लोगों ने बूथ और मंडल स्तर से अपनी राजनीतिक यात्रा शुरू की? और कितने चेहरे बदलते राजनीतिक समीकरणों के बीच तेजी से ऊपर आए?
यही वह अंतर है, जहां “प्रतिनिधित्व” और “कैडर का सम्मान” दो अलग-अलग सवाल बन जाते हैं।
संख्या से आगे बढ़कर अब ‘चेहरे’ और उनकी संगठनात्मक यात्रा पर नजर
किसी संगठन में किसी सामाजिक समूह की संख्या बढ़ना एक महत्वपूर्ण तथ्य हो सकता है, लेकिन कार्यकर्ताओं के लिए केवल संख्या हमेशा पर्याप्त नहीं होती।
पुराना कार्यकर्ता यह देखता है कि उसके बीच से कौन ऊपर आया। किसने संगठन में वर्षों काम किया। किसने कठिन चुनावों में जिम्मेदारी संभाली। किसने पार्टी के लिए लगातार जनसंपर्क किया। और जब सत्ता में अवसर बढ़े तो उस संगठनात्मक अनुभव का राजनीतिक उपयोग किस तरह हुआ।
यही वजह है कि भाजपा में “मूल कैडर” की चर्चा केवल भावनात्मक शब्द नहीं है। यह पार्टी की उस संगठनात्मक संस्कृति से जुड़ी है जिसमें लंबे समय तक कार्यकर्ताओं को पार्टी की सबसे बड़ी ताकत माना गया।
जब कोई दल विपक्ष में होता है, तब संगठन के कार्यकर्ताओं की भूमिका दिखाई देती है। लेकिन सत्ता में आने के बाद राजनीतिक अवसरों की संख्या सीमित रहती है और दावेदार बढ़ जाते हैं।
यहीं से अपेक्षा और अवसर के बीच अंतर पैदा होता है।
विधान परिषद: पुराने संगठनात्मक चेहरों के लिए एक रास्ता
उत्तर प्रदेश में विधान परिषद लंबे समय से राजनीतिक दलों के लिए ऐसे नेताओं को अवसर देने का एक माध्यम भी रही है, जिन्हें विधानसभा या लोकसभा चुनाव के रास्ते तत्काल राजनीतिक पद नहीं मिल पाता।
2021 में भाजपा ने विधान परिषद के लिए जिन उम्मीदवारों का नामांकन कराया, उनमें प्रदेश महामंत्री गोविंद नारायण शुक्ल और संगठन से जुड़े अश्विनी त्यागी तथा सलिल बिश्नोई जैसे नेता भी शामिल थे। “पर्दाफाश न्यूज़” की उस समय की रिपोर्ट में इन नामों का उल्लेख भाजपा के उम्मीदवारों में किया गया था।
यह उदाहरण इस बात को समझने के लिए महत्वपूर्ण है कि संगठनात्मक जिम्मेदारी निभाने वाले नेताओं को राजनीतिक संस्थाओं में जगह देने की व्यवस्था भाजपा की राजनीति में मौजूद रही है।
लेकिन यहां भी सवाल यही है कि क्या ऐसे अवसर पर्याप्त हैं?
क्योंकि किसी बड़े राजनीतिक दल में वर्षों से काम करने वाले कार्यकर्ताओं की संख्या हजारों-लाखों में हो सकती है, जबकि विधान परिषद, निगम, आयोग, बोर्ड, संगठनात्मक पद और चुनावी टिकट सीमित होते हैं।
इसलिए हर नियुक्ति किसी न किसी दूसरे दावेदार के लिए प्रतीक्षा का कारण बनती है।
जितिन प्रसाद का उदाहरण: कैडर और राजनीतिक विस्तार के बीच दूसरी तस्वीर
भाजपा में दूसरी पार्टियों से आने वाले प्रभावशाली नेताओं को महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां मिलने की चर्चा भी इसी बहस का हिस्सा है।
जितिन प्रसाद ने जून 2021 में कांग्रेस छोड़कर भाजपा का दामन थामा। उसी वर्ष उन्हें उत्तर प्रदेश विधान परिषद में मनोनीत किया गया और बाद में योगी आदित्यनाथ सरकार में मंत्री बनाया गया। उस समय उनके राजनीतिक महत्व को सामाजिक और क्षेत्रीय समीकरणों से जोड़कर भी देखा गया था।
लेकिन 2024 में लोकसभा चुनाव जीतने के बाद उन्होंने विधान परिषद की सदस्यता छोड़ दी।“पर्दाफाश न्यूज़”की जुलाई 2026 की रिपोर्ट के अनुसार, विधान परिषद की यह सीट 10 जून 2024 को रिक्त घोषित हुई थी और दो साल से अधिक समय बाद भी उस पर फैसला नहीं हुआ था।
यह घटनाक्रम अपने आप में किसी नीति की सफलता या विफलता का प्रमाण नहीं है। लेकिन यह जरूर दिखाता है कि राजनीतिक दलों में नए प्रभावशाली चेहरों को शामिल करने और संगठन के पुराने दावेदारों के लिए अवसर बनाए रखने के बीच संतुलन कितना जटिल हो सकता है।
दूसरे दलों से आने वाले नेताओं के लिए दरवाजे खोलना चुनावी राजनीति में सामान्य प्रक्रिया है। लेकिन इसके साथ यह प्रश्न भी बना रहता है कि लंबे समय से संगठन में सक्रिय कार्यकर्ताओं को किस प्रकार यह भरोसा दिया जाए कि उनकी राजनीतिक यात्रा भी आगे बढ़ सकती है।
भाजपा के पास पुराने कैडर को आगे बढ़ाने के उदाहरण भी मौजूद
पूरी तस्वीर का दूसरा पक्ष भी उतना ही महत्वपूर्ण है।
सुभाष यदुवंश इसका एक उदाहरण हैं। उनकी आधिकारिक वेबसाइट पर उन्हें भाजपा उत्तर प्रदेश का प्रदेश महामंत्री, विधान परिषद सदस्य और पूर्व प्रदेश अध्यक्ष—भाजयुमो के रूप में दर्ज किया गया है।
इससे यह निष्कर्ष निकालना उचित नहीं होगा कि भाजपा में पुराने कार्यकर्ताओं के लिए अवसर समाप्त हो गए हैं। इसके उलट, ऐसे उदाहरण बताते हैं कि संगठनात्मक पृष्ठभूमि से आए नेताओं को महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां मिलती रही हैं।
इसलिए वास्तविक बहस “पुराने कार्यकर्ता बनाम नए नेता” की नहीं है।
असल सवाल यह है कि दोनों के बीच संतुलन किस आधार पर बनाया जाए।
ब्राह्मण नेतृत्व का इतिहास लंबा, लेकिन वर्तमान सवाल अलग
उत्तर प्रदेश भाजपा के इतिहास में ब्राह्मण नेतृत्व की भूमिका महत्वपूर्ण रही है। पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष के रूप में माधव प्रसाद त्रिपाठी, कलराज मिश्र, केशरीनाथ त्रिपाठी, रमापति राम त्रिपाठी, लक्ष्मीकांत वाजपेयी और महेंद्र नाथ पांडेय जैसे ब्राह्मण नेताओं ने अलग-अलग समय में संगठन का नेतृत्व किया। “पर्दाफाश न्यूज़” के अनुसार, उत्तर प्रदेश भाजपा के इतिहास में सात बार ब्राह्मण नेताओं को प्रदेश अध्यक्ष बनाया गया, जबकि चेहरों के हिसाब से छह अलग-अलग ब्राह्मण नेता इस पद पर रहे।
यह इतिहास बताता है कि भाजपा के संगठन में ब्राह्मण नेतृत्व कोई नई बात नहीं है।
लेकिन वर्तमान सवाल अलग है।
आज चर्चा इस बात की नहीं कि इतिहास में कितने ब्राह्मण प्रदेश अध्यक्ष रहे। चर्चा यह है कि मौजूदा संगठन में लंबे समय से काम कर रहे ब्राह्मण नेताओं की अगली पीढ़ी कौन है?
क्या उनके पास संगठनात्मक जिम्मेदारियों से राजनीतिक नेतृत्व तक पहुंचने के पर्याप्त रास्ते हैं?
और क्या पार्टी के पुराने ब्राह्मण कार्यकर्ता अपने राजनीतिक भविष्य को लेकर उसी तरह आश्वस्त हैं, जैसा वे पार्टी के विस्तार के शुरुआती दौर में थे?
सिर्फ ब्राह्मण नहीं, हर सामाजिक समूह के पुराने कार्यकर्ताओं की यही चिंता
इस बहस को केवल ब्राह्मण राजनीति तक सीमित करना भी तस्वीर को छोटा कर देगा।
आज भाजपा के भीतर ओबीसी, दलित, वैश्य, कायस्थ, क्षत्रिय और अन्य सामाजिक समूहों से आने वाले पुराने कार्यकर्ताओं के सामने भी अलग-अलग रूप में यही प्रश्न मौजूद हो सकता है।
“पर्दाफाश न्यूज़” की जून 2026 की रिपोर्ट बताती है कि नई प्रदेश टीम में ओबीसी को सबसे अधिक प्रतिनिधित्व दिया गया और साथ ही सामान्य वर्ग, अनुसूचित जाति तथा अनुसूचित जनजाति को भी जगह मिली। टीम में क्षेत्रीय संतुलन, युवा चेहरों और महिलाओं की भागीदारी पर भी जोर दिया गया।
इसका अर्थ है कि भाजपा का मौजूदा संगठनात्मक मॉडल केवल एक सामाजिक समूह पर आधारित नहीं है।
लेकिन जैसे-जैसे सामाजिक प्रतिनिधित्व का दायरा बढ़ता है, वैसे-वैसे पुराने कार्यकर्ताओं की अपेक्षाओं का सवाल भी बड़ा होता जाता है।
सत्ता बढ़ी तो दावेदार भी बढ़े
जब भाजपा उत्तर प्रदेश में सत्ता से बाहर थी, तब पार्टी के कार्यकर्ता के सामने प्राथमिक लक्ष्य संगठन को मजबूत करना था।
आज परिस्थितियां अलग हैं।
सत्ता के साथ राजनीतिक अवसर बढ़ते हैं—मंत्रिमंडल, विधान परिषद, निगम, आयोग, बोर्ड, संगठनात्मक पद, चुनावी टिकट और अन्य जिम्मेदारियां।
लेकिन अवसरों की तुलना में दावेदार हमेशा ज्यादा होते हैं।
यही वजह है कि किसी कार्यकर्ता की नाराजगी केवल टिकट नहीं मिलने से पैदा हो, यह जरूरी नहीं।
कई बार सवाल टिकट से पहले सम्मान और संवाद का होता है।
पुराना कार्यकर्ता यह चाहता है कि पार्टी उसे पहचाने। उसकी वर्षों की मेहनत का मूल्यांकन हो। चुनाव के समय ही नहीं, सामान्य राजनीतिक गतिविधियों में भी उसकी भूमिका दिखाई दे।
सबसे महत्वपूर्ण बात—उसे यह महसूस हो कि संगठन में उसके लिए आगे बढ़ने का रास्ता अभी भी खुला है।
‘सम्मान’ बनाम ‘समीकरण’ की बहस क्यों महत्वपूर्ण है?
बड़े राजनीतिक दलों में सामाजिक समीकरणों की भूमिका से इनकार नहीं किया जा सकता।
चुनावी राजनीति में जातीय प्रतिनिधित्व, क्षेत्रीय संतुलन, युवा चेहरा, महिला भागीदारी और अलग-अलग सामाजिक समूहों को प्रतिनिधित्व देना राजनीतिक रणनीति का हिस्सा होता है। 2026 में उत्तर प्रदेश भाजपा की संगठनात्मक टीम को लेकर प्रकाशित विश्लेषण भी इसी तरह के सामाजिक और क्षेत्रीय संतुलन की ओर संकेत करता है।
लेकिन कार्यकर्ता के नजरिए से सवाल यह होता है कि क्या संगठनात्मक योगदान भी निर्णय लेने की प्रक्रिया में पर्याप्त महत्व रखता है?
अगर किसी कार्यकर्ता को लगता है कि उसकी वर्षों की सेवा और संगठनात्मक अनुभव का मूल्यांकन हो रहा है, तो प्रतीक्षा भी उसके लिए स्वीकार्य हो सकती है।
लेकिन अगर उसे यह महसूस हो कि राजनीतिक अवसरों का निर्धारण केवल तत्कालीन समीकरणों से हो रहा है, तो असंतोष की गुंजाइश बढ़ सकती है।
यह किसी व्यक्ति विशेष पर आरोप नहीं, बल्कि बड़े राजनीतिक संगठनों के सामने मौजूद सामान्य संगठनात्मक चुनौती है।
भाजपा के सामने सबसे बड़ी चुनौती: विस्तार और कैडर के बीच संतुलन
आज की भाजपा उस भाजपा से काफी अलग है, जो दशकों पहले सीमित राजनीतिक प्रभाव के साथ चुनाव मैदान में उतरती थी।
अब संगठन बड़ा है। सामाजिक आधार व्यापक है। राजनीतिक जिम्मेदारियां अधिक हैं और पार्टी के भीतर नए चेहरों की मांग भी बनी रहती है।
ऐसे में दूसरे दलों से आने वाले नेताओं को जगह देना एक राजनीतिक विकल्प हो सकता है।
नए सामाजिक समूहों को प्रतिनिधित्व देना भी जरूरी हो सकता है।
युवा चेहरों को आगे लाना भी संगठन की जरूरत हो सकती है।
महिलाओं की भागीदारी बढ़ाना और क्षेत्रीय संतुलन कायम रखना भी संगठनात्मक प्राथमिकता हो सकती है।
लेकिन इन सबके बीच वह कार्यकर्ता भी मौजूद है जिसने पार्टी को उस समय संभाला था जब सत्ता दूर थी।
यही भाजपा के सामने मूल संगठनात्मक सवाल है—कैडर को साथ रखते हुए विस्तार कैसे किया जाए?
सब्र की असली परीक्षा पद की नहीं, भरोसे की है
पुराने कार्यकर्ता का धैर्य केवल इस बात पर निर्भर नहीं करता कि उसे पद मिला या नहीं मिला।
उसके लिए यह भी महत्वपूर्ण है कि क्या पार्टी उससे संवाद कर रही है।
क्या उसकी भूमिका स्पष्ट है?
क्या उसके अनुभव का इस्तेमाल हो रहा है?
क्या नई पीढ़ी को तैयार करने में उसे जिम्मेदारी मिल रही है?
क्या संगठनात्मक मेहनत राजनीतिक यात्रा का हिस्सा बन सकती है?
और क्या पार्टी यह संदेश दे रही है कि नए चेहरे आने का अर्थ पुराने चेहरों का अंत नहीं है?
अगर इन सवालों के जवाब संगठनात्मक व्यवहार में दिखाई देते हैं, तो कैडर और विस्तार के बीच संतुलन बनाए रखना संभव हो सकता है।
आखिरकार सवाल किसी जाति का नहीं, संगठन की संस्कृति का है
उत्तर प्रदेश भाजपा में ब्राह्मण प्रतिनिधित्व को लेकर चर्चा निश्चित रूप से महत्वपूर्ण है। नई संगठनात्मक टीम में ब्राह्मणों की मौजूदगी का तथ्य भी सामने है और पार्टी के इतिहास में ब्राह्मण प्रदेश अध्यक्षों की लंबी सूची भी रही है।
लेकिन पूरे विषय को केवल जातीय प्रतिनिधित्व तक सीमित करना इस बहस के मूल प्रश्न को नजरअंदाज कर देगा।
मूल सवाल है—क्या भाजपा अपने पुराने कैडर को बदलते राजनीतिक दौर में भी पर्याप्त संगठनात्मक और राजनीतिक जगह दे पा रही है?
क्योंकि राजनीतिक दल केवल शीर्ष नेतृत्व से नहीं चलते। बूथ पर बैठा कार्यकर्ता, मंडल में काम करने वाला पदाधिकारी, चुनाव के दौरान घर-घर पहुंचने वाला कार्यकर्ता और वर्षों से संगठन से जुड़े स्थानीय नेता—ये सभी किसी भी कैडर आधारित पार्टी की वास्तविक संरचना का हिस्सा होते हैं।
भाजपा के सामने चुनौती इसलिए केवल नए नेताओं को आगे बढ़ाने की नहीं है।
चुनौती यह भी है कि पुराने कार्यकर्ता को यह भरोसा बना रहे कि पार्टी बदल सकती है, राजनीति बदल सकती है, समीकरण बदल सकते हैं—लेकिन उसके योगदान का मूल्य नहीं बदलेगा।
यही भरोसा कैडर को लंबे समय तक जोड़े रखता है।
और शायद आने वाले समय में उत्तर प्रदेश भाजपा की संगठनात्मक राजनीति का सबसे बड़ा सवाल भी यही होगा—
क्या बदलती राजनीति के बीच पुराने कार्यकर्ताओं के सब्र, सम्मान और हिस्सेदारी का संतुलन कायम रह पाएगा?















