“पुतिन का G7 पर सीधा हमला, मोदी ने दिखाई BRICS की ताकत; 40% वैश्विक अर्थव्यवस्था और करीब आधी आबादी वाले समूह ने डॉलर व पश्चिमी आर्थिक दबदबे को दी चुनौती”
नई दिल्ली: राजधानी दिल्ली में BRICS का मंच सजा है और पूरी दुनिया की नजरें भारत पर टिकी हैं। भारत की मेजबानी में हो रहा यह शिखर सम्मेलन महज नेताओं की बैठक या आर्थिक सहयोग का मंच नहीं रह गया है। इसके केंद्र में अब दुनिया के बदलते शक्ति संतुलन का बड़ा सवाल है। एक तरफ अमेरिका और G7 के नेतृत्व वाला पुराना पश्चिमी आर्थिक ढांचा है, जिसने दशकों तक वैश्विक अर्थव्यवस्था, डॉलर, अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं और नियमों पर अपना प्रभाव बनाए रखा। दूसरी तरफ BRICS का लगातार विस्तार करता हुआ मंच है, जहां रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन, चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग, ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेश्कियान समेत उभरती अर्थव्यवस्थाओं के नेता एक साथ दिखाई दे रहे हैं।
दिल्ली में जुटे BRICS देशों और साझीदार देशों की मौजूदगी ने यह संकेत जरूर दे दिया है कि 21वीं सदी की वैश्विक व्यवस्था अब केवल पश्चिम के इर्द-गिर्द नहीं घूमेगी। आर्थिक ताकत, ऊर्जा, व्यापार, डिजिटल भुगतान और स्थानीय मुद्राओं में कारोबार जैसे मुद्दे BRICS के एजेंडे में लगातार अहम होते जा रहे हैं।
सबसे बड़ा संदेश यही है कि दुनिया में शक्ति का केंद्र धीरे-धीरे बहुध्रुवीय होता जा रहा है।
पुतिन ने G7 को आंकड़ों से घेरा, बोले- BRICS का हिस्सा 40 फीसदी से ज्यादा
BRICS के मंच से रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने पश्चिमी देशों और खासकर G7 की आर्थिक ताकत पर सीधा निशाना साधा। पुतिन ने दावा किया कि पिछले वर्षों में वैश्विक GDP में BRICS देशों की हिस्सेदारी 40 फीसदी से अधिक रही है, जबकि G7 का योगदान करीब 29 फीसदी है।
पुतिन का संदेश साफ था—दुनिया की आर्थिक ताकत का आकलन केवल पुराने पश्चिमी समूहों की भूमिका से नहीं किया जा सकता। उनके मुताबिक BRICS देशों के पास दुनिया की आधी से अधिक आबादी, बड़े घरेलू बाजार और महत्वपूर्ण प्राकृतिक एवं ऊर्जा संसाधन मौजूद हैं।
यही वजह है कि BRICS का विस्तार सिर्फ सदस्य देशों की संख्या बढ़ने तक सीमित नहीं है। यह समूह अब वैश्विक अर्थव्यवस्था के उस हिस्से को एक मंच पर लाने की कोशिश कर रहा है, जो लंबे समय तक पश्चिमी आर्थिक व्यवस्था से अलग-अलग तरीके से जुड़ा रहा।
व्यापार प्रतिबंधों पर पुतिन का हमला, पश्चिमी नीतियों पर उठाए सवाल
पुतिन ने वैश्विक व्यापार में बढ़ते प्रतिबंधों और आर्थिक दबाव को लेकर भी पश्चिमी देशों पर निशाना साधा। उन्होंने कहा कि आज व्यापारिक प्रतिबंधों का बड़े पैमाने पर इस्तेमाल किया जा रहा है और दूसरे देशों पर आर्थिक दबाव बनाया जा रहा है। उनके मुताबिक इससे वैश्विक सप्लाई चेन प्रभावित हो रही है और अंतरराष्ट्रीय व्यापार का माहौल जटिल बन रहा है।
रूस लंबे समय से पश्चिमी प्रतिबंधों का सामना कर रहा है। ऐसे में पुतिन का यह बयान BRICS के मंच से और अधिक राजनीतिक महत्व रखता है। रूस का तर्क है कि आर्थिक प्रतिस्पर्धा के नाम पर किसी देश की व्यापारिक और आर्थिक क्षमता को प्रतिबंधों के जरिए कमजोर करना वैश्विक मुक्त व्यापार की भावना के खिलाफ है।
BRICS के कई सदस्य देश भी पश्चिमी आर्थिक प्रतिबंधों और डॉलर आधारित वित्तीय व्यवस्था के प्रभाव को कम करने के विकल्प तलाशते रहे हैं। ऐसे में दिल्ली सम्मेलन इस बहस को और धार देता दिखाई दे रहा है।
मोदी ने भी दिखाई BRICS की ताकत, उभरती अर्थव्यवस्थाओं का बड़ा मंच
भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी BRICS की बढ़ती भूमिका को रेखांकित किया। नई दिल्ली में आयोजित यह सम्मेलन ऐसे समय हो रहा है जब वैश्विक अर्थव्यवस्था कई चुनौतियों से गुजर रही है। भू-राजनीतिक तनाव, युद्ध, व्यापारिक प्रतिबंध, सप्लाई चेन में व्यवधान और आर्थिक अस्थिरता ने दुनिया के सामने नए सवाल खड़े किए हैं।
भारत की कोशिश BRICS को केवल पश्चिम विरोधी मंच के रूप में पेश करने की बजाय वैश्विक दक्षिण और उभरती अर्थव्यवस्थाओं के लिए सहयोग के मंच के तौर पर मजबूत करने की है। हालांकि, BRICS की बढ़ती आर्थिक और राजनीतिक ताकत का असर स्वाभाविक रूप से पश्चिमी देशों की रणनीति पर भी पड़ रहा है।
BRICS बनाम G7: सवाल सिर्फ देशों की संख्या का नहीं, प्रभाव का है
अगर वैश्विक प्रभाव के आंकड़ों पर नजर डालें तो तस्वीर बेहद दिलचस्प नजर आती है। G7 में सात विकसित अर्थव्यवस्थाएं हैं, जबकि BRICS का सदस्य आधार अब पहले की तुलना में काफी बड़ा हो चुका है और साझीदार देशों की भागीदारी से इसका दायरा और विस्तृत हुआ है।
वैश्विक आबादी की हिस्सेदारी की बात करें तो BRICS का पलड़ा काफी भारी है। वहीं आर्थिक उत्पादन, ऊर्जा संसाधन, कच्चे माल, बाजार और व्यापार के लिहाज से भी BRICS देशों की सामूहिक ताकत महत्वपूर्ण है।
यही वह बिंदु है जहां BRICS की चुनौती केवल आर्थिक नहीं रह जाती। जब आर्थिक ताकत के साथ ऊर्जा, व्यापार, भुगतान प्रणाली और रणनीतिक संसाधन जुड़ते हैं, तो वह ताकत भू-राजनीतिक प्रभाव में बदलने लगती है।
ईरान ने भी जताई चिंता, सप्लाई चेन को बनाया बड़ा मुद्दा
BRICS सम्मेलन में ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेश्कियान ने भी वैश्विक आर्थिक व्यवस्था के सामने मौजूद चुनौतियों को रेखांकित किया। उन्होंने कहा कि दुनिया बेहद जटिल दौर से गुजर रही है। भू-राजनीतिक अनिश्चितता, सप्लाई चेन में व्यवधान और राजनीतिक दबाव के लिए आर्थिक हथियारों के बढ़ते इस्तेमाल ने वैश्विक आर्थिक माहौल को और कठिन बना दिया है।
ईरान के बयान को उसके व्यापक भू-राजनीतिक संदर्भ में भी देखा जा रहा है। पश्चिमी प्रतिबंधों का सामना कर रहे ईरान के लिए वैकल्पिक व्यापार व्यवस्था, स्थानीय मुद्राओं में कारोबार और वैकल्पिक भुगतान प्रणाली महत्वपूर्ण मुद्दे हैं।
यानी BRICS के भीतर अलग-अलग देशों की अपनी-अपनी प्राथमिकताएं जरूर हैं, लेकिन आर्थिक संप्रभुता और पश्चिमी वित्तीय व्यवस्था पर निर्भरता घटाने का विचार कई सदस्यों को एक साझा मंच देता है।
डॉलर के दबदबे को चुनौती देने की तैयारी, लोकल करेंसी पर जोर
BRICS की सबसे बड़ी बहसों में से एक डॉलर पर निर्भरता कम करने की है। दशकों से अंतरराष्ट्रीय व्यापार और वित्तीय व्यवस्था में अमेरिकी डॉलर का दबदबा रहा है। तेल से लेकर अंतरराष्ट्रीय व्यापार और वित्तीय लेन-देन तक डॉलर की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण रही है।
लेकिन BRICS के भीतर अब स्थानीय मुद्राओं में कारोबार बढ़ाने, वैकल्पिक भुगतान प्रणालियों को मजबूत करने और सदस्य देशों के बीच सीधे वित्तीय लेन-देन को बढ़ावा देने पर जोर दिया जा रहा है।
यह डॉलर को तुरंत खत्म करने की योजना नहीं है, लेकिन यह जरूर संकेत देता है कि BRICS देश भविष्य में ऐसी व्यवस्था चाहते हैं जिसमें अंतरराष्ट्रीय कारोबार के लिए हर बार पश्चिमी वित्तीय ढांचे पर निर्भर रहना जरूरी न हो।
अगर यह प्रक्रिया आगे बढ़ती है तो वैश्विक वित्तीय व्यवस्था में बड़ा बदलाव आ सकता है।
UPI बना भारत की ताकत, 11 देशों तक पहुंची डिजिटल पेमेंट की तस्वीर
इस पूरी बहस में भारत का डिजिटल भुगतान मॉडल खास महत्व रखता है। केंद्रीय वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री पीयूष गोयल ने BRICS देशों और साझीदार देशों के बीच भुगतान प्रणालियों को जोड़ने की जरूरत पर जोर दिया।
उन्होंने कहा कि भारत का UPI सिस्टम 11 देशों में चल रहा है और BRICS के सदस्य तथा साझीदार देशों को अपनी भुगतान प्रणालियों को आपस में जोड़ना चाहिए। साथ ही स्थानीय मुद्राओं में व्यापार और डिजिटल कारोबार को बढ़ावा देने की दिशा में काम किया जाना चाहिए।
भारत के लिए यह सिर्फ तकनीकी उपलब्धि नहीं है। अगर अलग-अलग देशों की डिजिटल भुगतान प्रणालियां आपस में जुड़ती हैं और स्थानीय मुद्राओं में लेन-देन बढ़ता है, तो अंतरराष्ट्रीय व्यापार की लागत और डॉलर पर निर्भरता दोनों को कम किया जा सकता है।
यही वजह है कि भारत का UPI मॉडल BRICS की आर्थिक रणनीति में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।
BRICS का अगला लक्ष्य: वैकल्पिक आर्थिक ढांचा?
BRICS के भीतर स्थानीय मुद्राओं में कारोबार बढ़ाने, वैकल्पिक भुगतान प्रणाली तैयार करने और सदस्य देशों के बीच आर्थिक संपर्क मजबूत करने की चर्चा कोई नई बात नहीं है। लेकिन अब इन चर्चाओं को पहले से ज्यादा गंभीरता से देखा जा रहा है।
क्योंकि BRICS का आर्थिक आधार लगातार बड़ा हुआ है। इसके सदस्य देशों के पास विशाल बाजार, ऊर्जा संसाधन, खनिज संपदा, उत्पादन क्षमता और बड़ी आबादी है।
यदि इन देशों के बीच व्यापार और भुगतान व्यवस्था अधिक एकीकृत होती है, तो वैश्विक आर्थिक व्यवस्था में इसका असर निश्चित रूप से दिखाई देगा।
हालांकि, इसके सामने कई चुनौतियां भी हैं। अलग-अलग देशों की अर्थव्यवस्थाओं, मुद्राओं, वित्तीय नीतियों और राजनीतिक हितों में काफी अंतर है। इसलिए डॉलर के समान एक साझा वैश्विक मुद्रा या पूर्ण वैकल्पिक वित्तीय व्यवस्था तैयार करना आसान नहीं होगा।
लेकिन BRICS का उद्देश्य फिलहाल शायद डॉलर को एक झटके में हटाना नहीं, बल्कि विकल्पों की संख्या बढ़ाना है।
पश्चिम के लिए क्यों बढ़ रही चिंता?
पश्चिमी देशों के लिए सबसे बड़ी चिंता यह नहीं है कि BRICS आज ही डॉलर की जगह कोई नई मुद्रा लेकर आ गया है। असली चिंता यह है कि दुनिया के कई बड़े देश धीरे-धीरे अपने व्यापार और वित्तीय विकल्पों का दायरा बढ़ाना चाहते हैं।
एक ऐसा समूह जिसमें चीन जैसी बड़ी अर्थव्यवस्था, रूस जैसे ऊर्जा संसाधन वाला देश, भारत जैसा विशाल बाजार, ईरान जैसे रणनीतिक ऊर्जा क्षेत्र के खिलाड़ी और अन्य उभरती अर्थव्यवस्थाएं शामिल हों, उसकी सामूहिक क्षमता को नजरअंदाज करना आसान नहीं है।
अगर BRICS व्यापार, ऊर्जा, भुगतान और निवेश के क्षेत्रों में अपने सहयोग को संस्थागत रूप देता है, तो G7 और पश्चिमी आर्थिक संस्थाओं के सामने एक अधिक प्रतिस्पर्धी वैश्विक ढांचा उभर सकता है।
दुनिया की नई चौधराहट का सवाल
दशकों तक वैश्विक फैसलों में अमेरिका और उसके पश्चिमी सहयोगियों का प्रभाव सबसे ज्यादा रहा। अंतरराष्ट्रीय वित्तीय संस्थाओं से लेकर व्यापारिक नियमों और वैश्विक सुरक्षा व्यवस्था तक पश्चिम का असर दिखाई देता रहा।
लेकिन अब तस्वीर बदल रही है।
एशिया, अफ्रीका, मध्य पूर्व और लैटिन अमेरिका की उभरती अर्थव्यवस्थाएं वैश्विक निर्णय प्रक्रिया में ज्यादा हिस्सेदारी चाहती हैं। BRICS इसी बदलाव का एक बड़ा प्रतीक बनकर सामने आया है।
दिल्ली में हो रही बैठक इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यहां सिर्फ राष्ट्राध्यक्ष एक-दूसरे से मुलाकात नहीं कर रहे। यहां भविष्य की वैश्विक आर्थिक व्यवस्था को लेकर एक वैकल्पिक सोच भी आकार ले रही है।
BRICS का संदेश साफ: दुनिया अब एक ध्रुवीय नहीं
नई दिल्ली से निकलता सबसे बड़ा संदेश यही है कि दुनिया अब एक ही शक्ति केंद्र के इर्द-गिर्द नहीं घूमना चाहती। BRICS की आर्थिक ताकत, बड़ी आबादी, ऊर्जा क्षमता और विशाल बाजार इसे वैश्विक व्यवस्था में प्रभावशाली खिलाड़ी बनाते हैं।
पुतिन का G7 पर हमला, मोदी का BRICS की ताकत पर जोर, पेजेश्कियान की सप्लाई चेन को लेकर चिंता और पीयूष गोयल का UPI तथा स्थानीय मुद्राओं में कारोबार का प्रस्ताव—ये सभी बयान अलग-अलग दिख सकते हैं, लेकिन इनके पीछे एक साझा तस्वीर नजर आती है।
वह तस्वीर है—एक ऐसी दुनिया की, जहां आर्थिक शक्ति कई केंद्रों में बंटी हो, व्यापार के लिए विकल्प ज्यादा हों और वैश्विक फैसलों में पश्चिम के अलावा उभरती अर्थव्यवस्थाओं की आवाज भी निर्णायक हो।
दिल्ली में सजा BRICS का मंच इसलिए सिर्फ एक सम्मेलन नहीं है। यह उस बदलाव की झलक है जिसमें 21वीं सदी की वैश्विक चौधराहट का पुराना हिसाब-किताब धीरे-धीरे नए सिरे से लिखा जा रहा है।














