नोएडा: अमेरिका और कनाडा में रहने वाले लोगों को तकनीकी सहायता उपलब्ध कराने के नाम पर ठगी करने वाले एक फर्जी कॉल सेंटर का नोएडा पुलिस ने भंडाफोड़ किया है। पुलिस के अनुसार, सेक्टर-3 की एक इमारत में चल रहे इस कथित फर्जी कॉल सेंटर से विदेशी नागरिकों को फोन कर तकनीकी समस्या दूर करने का झांसा दिया जाता था और बाद में उनसे रकम ऐंठी जाती थी। फेस-वन थाना पुलिस ने कार्रवाई करते हुए सात आरोपियों को गिरफ्तार किया है। पुलिस का दावा है कि अब तक करीब 300 लोगों को ठगने की बात सामने आई है।
नोऐडा के फेस वन थाना प्रभारी की पड़ताल में सामने आई जानकारी के मुताबिक, यह पूरा खेल तकनीकी सहायता के नाम पर विश्वास कायम करने से शुरू होता था। कॉल सेंटर में बैठे आरोपी अमेरिका और कनाडा में रहने वाले लोगों को फोन करते थे। बातचीत के दौरान खुद को किसी प्रतिष्ठित तकनीकी कंपनी का कर्मचारी बताया जाता था। इसके बाद ग्राहक के कंप्यूटर या सिस्टम में तकनीकी समस्या होने की बात कहकर उसे ठीक करने के नाम पर आगे की प्रक्रिया शुरू की जाती थी।
जियो चैट और रिंग सेंट्रल डायलर से संपर्क
पुलिस की जांच में सामने आया कि गिरफ्तार आरोपी अमेरिका में रहने वाले ग्राहकों से जियो चैट और रिंग सेंट्रल डायलर के माध्यम से संपर्क करते थे। आरोपी खुद को किसी कंपनी का कर्मचारी बताकर ग्राहक की तकनीकी समस्या दूर करने की बात करते थे। इस दौरान ग्राहक के कंप्यूटर में एलएसएमआई एप के माध्यम से रिमोट एक्सेस लेकर सिस्टम को ठीक करने का बहाना बनाया जाता था।
रिमोट एक्सेस हासिल करने के बाद ग्राहक के कंप्यूटर पर मौजूद जानकारी और उसकी तकनीकी स्थिति को आधार बनाकर उसे भरोसे में लिया जाता था। इसके बाद ग्राहक के क्रेडिट कार्ड की जानकारी हासिल करने का आरोप है। पुलिस के मुताबिक, इस प्रक्रिया के बाद ग्राहकों से 30 से 50 डॉलर तक की रकम अलग-अलग गिफ्ट कंपनियों में चार्ज की जाती थी।
पुलिस के अनुसार, ठगी से हासिल रकम को सीधे अपने पास रखने के बजाय पहले गिरोह से जुड़े खातों में ट्रांसफर किया जाता था। इसके बाद आरोपी अपने और अपने परिचितों के खातों में रकम भेजकर उसे निकाल लेते थे। इस तरह कथित तौर पर ठगी की रकम को कई स्तरों पर घुमाया जाता था, जिससे उसके वास्तविक स्रोत तक पहुंचना मुश्किल हो सके।
ई-मेल से मिली सूचना, चौथी मंजिल पर छापा
फेज-वन थाना प्रभारी ने बताया कि साइबर क्राइम थाने को ई-मेल के माध्यम से फर्जी कॉल सेंटर के संबंध में सूचना मिली थी। सूचना को गंभीरता से लेते हुए पुलिस टीम ने मामले की जांच शुरू की। जानकारी के आधार पर पुलिस टीम ने सेक्टर-3 स्थित संबंधित इमारत में पहुंचकर चौथी मंजिल पर छापा मारा।
छापेमारी के दौरान वहां मौजूद लोगों से पूछताछ की गई और कॉल सेंटर में इस्तेमाल किए जा रहे इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों की जांच की गई। पुलिस ने मौके से दो कंप्यूटर सिस्टम, मॉनिटर, की-बोर्ड, माउस, हेडफोन, लैपटॉप और अन्य इलेक्ट्रॉनिक उपकरण बरामद किए हैं।
पुलिस की कार्रवाई के बाद कॉल सेंटर में चल रहे कथित ठगी के नेटवर्क का खुलासा हुआ। पूछताछ और जांच के आधार पर सात लोगों को गिरफ्तार किया गया।
सात आरोपियों पर पुलिस की कार्रवाई
गिरफ्तार आरोपियों में 31 वर्षीय मोहम्मद याह्या, 28 वर्षीय सुमित सिंह बिष्ट, 34 वर्षीय रियासत, 21 वर्षीय मोहन, 28 वर्षीय आकाश, 21 वर्षीय मोहम्मद साहेब अकरम और सददमुद्दीन शामिल हैं। पुलिस के अनुसार, सभी आरोपी दिल्ली में रहते हैं।
जांच एजेंसियां अब इस बात की पड़ताल कर रही हैं कि फर्जी कॉल सेंटर का संचालन कब से किया जा रहा था और इसके माध्यम से कुल कितने विदेशी नागरिकों को निशाना बनाया गया। पुलिस का दावा है कि प्रारंभिक जांच में करीब 300 लोगों को ठगने की बात सामने आई है। हालांकि मामले में सामने आने वाले वास्तविक पीड़ितों और ठगी की कुल रकम का आंकड़ा विस्तृत जांच के बाद ही स्पष्ट हो सकेगा।
विदेशों में बैठे लोगों को बनाया निशाना
इस मामले में सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह है कि कथित कॉल सेंटर का निशाना भारत में रहने वाले ग्राहक नहीं, बल्कि अमेरिका और कनाडा में रहने वाले लोग थे। आरोपियों द्वारा तकनीकी सहायता के नाम पर फोन किए जाने से सामने वाले व्यक्ति को शुरुआत में यह महसूस होता था कि कॉल किसी वैध कंपनी की ओर से की गई है।
तकनीकी समस्या के नाम पर बातचीत आगे बढ़ाने के बाद ग्राहक को अपने कंप्यूटर में रिमोट एक्सेस देने के लिए तैयार किया जाता था। एक बार सिस्टम तक पहुंच मिलने के बाद कथित तौर पर ग्राहक को यह विश्वास दिलाया जाता था कि उसके कंप्यूटर में समस्या है और उसे ठीक करने के लिए कुछ प्रक्रिया पूरी करनी जरूरी है। इसके बाद क्रेडिट कार्ड से जुड़ी जानकारी हासिल कर रकम चार्ज करने का आरोप है।
यानी ठगी का पूरा मॉडल फोन कॉल, तकनीकी सहायता, रिमोट एक्सेस और भुगतान की कड़ी पर आधारित था। पुलिस अब इस नेटवर्क के तकनीकी और वित्तीय पहलुओं की भी जांच कर रही है।
परिचितों के खातों में पहुंचती थी रकम
पुलिस के मुताबिक, ठगी से प्राप्त रकम को पहले गिरोह से जुड़े खातों में ट्रांसफर किया जाता था। इसके बाद रकम को आरोपियों तथा उनके परिचितों के खातों में भेजकर निकाला जाता था। जांच का एक अहम हिस्सा अब इन्हीं बैंक खातों और लेन-देन से जुड़ा हुआ है।
पुलिस यह भी पता लगाने का प्रयास कर रही है कि कॉल सेंटर में काम करने वाले सभी लोग केवल कॉल करने तक सीमित थे या फिर इस नेटवर्क के पीछे कोई अन्य व्यक्ति अथवा समूह भी सक्रिय था। गिरफ्तार आरोपियों से पूछताछ के आधार पर पुलिस को गिरोह के संचालन, संपर्क और वित्तीय लेन-देन से जुड़े और सुराग मिलने की उम्मीद है।
साइबर ठगी के बढ़ते तरीके पर फिर सवाल
फर्जी कॉल सेंटर का यह मामला एक बार फिर बताता है कि साइबर अपराधी किस तरह तकनीकी सहायता के नाम पर लोगों का भरोसा जीतने की कोशिश करते हैं। पहले समस्या बताई जाती है, फिर समाधान के नाम पर कंप्यूटर तक पहुंच मांगी जाती है और अंततः आर्थिक जानकारी हासिल कर रकम निकालने का प्रयास किया जाता है।
विदेशी नागरिकों को निशाना बनाए जाने से यह भी संकेत मिलता है कि साइबर ठगी का नेटवर्क अब स्थानीय सीमाओं तक सीमित नहीं है। इंटरनेट, ऑनलाइन कॉलिंग और डिजिटल भुगतान के माध्यम से अपराधी दूसरे देशों में बैठे लोगों तक भी पहुंच बना रहे हैं।
फिलहाल फेस-वन थाना पुलिस ने सात आरोपियों को गिरफ्तार कर उनके कब्जे से कंप्यूटर सिस्टम और अन्य इलेक्ट्रॉनिक उपकरण बरामद किए हैं। पुलिस आगे की जांच में कॉल सेंटर से जुड़े डिजिटल रिकॉर्ड, बैंक खातों और कथित ठगी के शिकार लोगों की संख्या का पता लगाने में जुटी है।
यह मामला सिर्फ सात गिरफ्तारियों की खबर नहीं, बल्कि उस डिजिटल ठगी के तरीके का खुलासा भी है, जिसमें तकनीकी मदद का भरोसा देकर विदेशी नागरिकों की आर्थिक जानकारी तक पहुंच बनाने का आरोप है। अब जांच का असली सवाल यही है कि इस नेटवर्क की जड़ें कितनी गहरी हैं और 300 बताए जा रहे पीड़ितों के पीछे आखिर कितनी बड़ी रकम का खेल छिपा है।














