प्रयागराज: कोडीन युक्त कफ सिरप की कथित अवैध बिक्री, भंडारण और तस्करी के मामले में उत्तर प्रदेश सरकार ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के सामने अपना रुख पूरी तरह स्पष्ट कर दिया है। सरकार ने अदालत से कहा है कि आरोपियों के पास भले ही ड्रग एंड कॉस्मेटिक एक्ट के तहत कफ सिरप बेचने का वैध लाइसेंस था, लेकिन उस लाइसेंस का इस्तेमाल निर्धारित चिकित्सीय उद्देश्य से हटकर कथित तौर पर नशीले पदार्थ के कारोबार में किया गया। सरकार के मुताबिक, लाइसेंस होना अपने आप में एनडीपीएस एक्ट के तहत कार्रवाई से छूट नहीं देता, यदि लाइसेंस की शर्तों का उल्लंघन कर प्रतिबंधित तरीके से पदार्थ का इस्तेमाल या कारोबार किया गया हो।
मामले में मुख्य आरोपी भोला प्रसाद की जमानत अर्जी पर गुरुवार को सुनवाई पूरी हो गई। न्यायमूर्ति अरुण कुमार सिंह देशवाल की पीठ के सामने इस प्रकरण से जुड़े 80 से अधिक आरोपियों की जमानत अर्जियों पर सुनवाई चल रही है। अदालत अब प्रत्येक आरोपी की भूमिका, उपलब्ध साक्ष्यों और मामले की परिस्थितियों के आधार पर उसकी जमानत अर्जी पर अलग-अलग विचार कर रही है।
सरकार की ओर से अपर महाधिवक्ता अनूप त्रिवेदी और एजीए प्रथम परितोष कुमार मालवीय ने अदालत के समक्ष दलील दी कि आरोपियों को कफ सिरप के कारोबार के लिए लाइसेंस चिकित्सीय उपयोग के उद्देश्य से दिया गया था। आरोप है कि इसी वैध लाइसेंस की आड़ लेकर कफ सिरप का अवैध भंडारण और बिक्री की गई और उसे कथित तौर पर नशीले पदार्थ के कारोबार में इस्तेमाल किया गया।
सरकार का दावा—मेडिकल लाइसेंस बना नशे के कारोबार की ढाल
सरकार की दलील का सबसे अहम पहलू यही है कि किसी दवा को बेचने का लाइसेंस हासिल कर लेना उस दवा के हर प्रकार के इस्तेमाल और कारोबार को वैध नहीं बना देता। सरकार का कहना है कि लाइसेंस में निर्धारित शर्तों और उसके उद्देश्य का पालन करना जरूरी है।
अदालत में सरकारी पक्ष ने आरोप लगाया कि कोडीन युक्त कफ सिरप को मेडिकल जरूरतों की पूर्ति तक सीमित रखने के बजाय कथित तौर पर ऐसे लोगों तक पहुंचाया गया, जहां इसका इस्तेमाल नशीले प्रभाव के लिए किया जाता था। सरकार ने इसी कथित गतिविधि को एनडीपीएस एक्ट के तहत अपराध का आधार बताया है।
सरकार की ओर से यह भी तर्क दिया गया कि मामले को केवल सामान्य दवा कानून के उल्लंघन तक सीमित करके नहीं देखा जा सकता। यदि जांच में यह सामने आता है कि किसी लाइसेंस प्राप्त दवा का इस्तेमाल जानबूझकर नशीले पदार्थ के रूप में किया गया या उसकी तस्करी की गई, तो परिस्थितियों के अनुसार एनडीपीएस कानून के प्रावधान लागू हो सकते हैं।
कई राज्यों तक फैले नेटवर्क का दावा
सरकार ने हाईकोर्ट में मामले की गंभीरता को रेखांकित करते हुए दावा किया कि कोडीन युक्त कफ सिरप की कथित तस्करी का नेटवर्क केवल उत्तर प्रदेश तक सीमित नहीं था। सरकारी पक्ष के मुताबिक, इसकी सप्लाई का नेटवर्क कई राज्यों तक फैला हुआ था और पड़ोसी देश बांग्लादेश तक कथित आपूर्ति किए जाने के आरोप सामने आए हैं।
यदि सरकारी आरोप जांच और मुकदमे के दौरान साक्ष्यों से साबित होते हैं, तो यह मामला महज अवैध दवा बिक्री का नहीं, बल्कि एक बड़े संगठित नेटवर्क से जुड़ा गंभीर मामला बन सकता है। हालांकि, इन आरोपों पर अंतिम निर्णय अदालत द्वारा उपलब्ध साक्ष्यों और कानून के आधार पर ही किया जाएगा।
आरोपियों का पलटवार—जब लाइसेंस वैध था तो एनडीपीएस क्यों?
सरकारी दलीलों के विपरीत आरोपियों की ओर से पेश अधिवक्ताओं ने एनडीपीएस एक्ट के तहत दर्ज मुकदमों की वैधता पर सवाल उठाए हैं। बचाव पक्ष का कहना है कि आरोपियों के पास कफ सिरप की बिक्री और कारोबार के लिए वैध लाइसेंस मौजूद था। ऐसे में केवल इस आधार पर कि कफ सिरप में कोडीन मौजूद है, आरोपियों पर एनडीपीएस एक्ट की धाराएं लगाना उचित नहीं माना जा सकता।
बचाव पक्ष ने यह तर्क भी रखा कि लाइसेंस प्राप्त दवा का कारोबार करने वाले व्यक्ति को केवल आरोपों के आधार पर नशीले पदार्थों का कारोबारी नहीं माना जा सकता। अदालत के सामने अब मुख्य सवाल यही है कि संबंधित आरोपियों ने लाइसेंस की शर्तों का वास्तव में उल्लंघन किया या नहीं और उनके खिलाफ एनडीपीएस एक्ट लगाने के लिए पर्याप्त प्रथमदृष्टया आधार मौजूद है या नहीं।
अदालत ने सभी पक्षों की दलीलें सुनने के बाद अब जमानत अर्जियों को अलग-अलग मेरिट के आधार पर देखने की प्रक्रिया शुरू कर दी है।
80 से ज्यादा जमानत अर्जियां, हर आरोपी की भूमिका पर अलग फैसला
इस मामले की सुनवाई अपने आप में इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि इसमें 80 से अधिक आरोपियों की जमानत अर्जियां अदालत के सामने हैं। ऐसे में सभी आरोपियों को एक ही नजरिए से देखने के बजाय उनकी व्यक्तिगत भूमिका, कथित बरामदगी, जांच में सामने आए साक्ष्य और अन्य परिस्थितियों का मूल्यांकन किया जाएगा।
मुख्य आरोपी भोला प्रसाद की जमानत अर्जी पर गुरुवार को बहस पूरी हो चुकी है। अन्य आरोपियों की जमानत अर्जियों पर सोमवार को सुनवाई प्रस्तावित है।
इसका मतलब यह है कि आने वाले दिनों में अदालत को एक-एक कर यह तय करना होगा कि किन आरोपियों को राहत दी जा सकती है और किनके खिलाफ प्रथमदृष्टया मामला इतना गंभीर है कि उन्हें फिलहाल जमानत न दी जाए।
मामले की सुनवाई में आया बड़ा मोड़
इस मुकदमे की सुनवाई पहले न्यायमूर्ति कृष्ण पहल की पीठ कर रही थी। हालांकि, कुछ याचियों द्वारा निजी तौर पर न्यायमूर्ति से संपर्क करने की कथित कोशिश के बाद उन्होंने खुद को इस मामले की सुनवाई से अलग कर लिया था।
इसके बाद मामले में महत्वपूर्ण प्रशासनिक बदलाव हुआ। मुख्य न्यायाधीश के निर्देश पर सभी संबंधित जमानत अर्जियां न्यायमूर्ति अरुण कुमार सिंह देशवाल की पीठ को नामित कर दी गईं। अब इसी पीठ के समक्ष आरोपियों की जमानत अर्जियों पर सुनवाई जारी है।
सुनवाई का यह चरण इसलिए अहम है क्योंकि अदालत को न केवल आरोपों की गंभीरता बल्कि प्रत्येक आरोपी की व्यक्तिगत भूमिका और उसके खिलाफ उपलब्ध सामग्री को भी ध्यान में रखना होगा।
लाइसेंस बनाम एनडीपीएस: अदालत के सामने असली कानूनी सवाल
पूरे मामले का सबसे महत्वपूर्ण कानूनी पहलू लाइसेंस प्राप्त दवा के कथित दुरुपयोग और एनडीपीएस एक्ट की धाराओं के इस्तेमाल के बीच का संबंध है।
आरोपियों का कहना है कि जब उनके पास दवा बेचने का वैध लाइसेंस था, तब उनके खिलाफ एनडीपीएस एक्ट की धाराएं लगाने के लिए अतिरिक्त और ठोस आधार जरूरी है। वहीं सरकार का कहना है कि लाइसेंस केवल निर्धारित मेडिकल उपयोग के लिए था और उसका उल्लंघन करके कफ सिरप को कथित तौर पर नशे के कारोबार में इस्तेमाल किया गया।
यानी विवाद सिर्फ इस बात पर नहीं है कि कफ सिरप बेचने का लाइसेंस था या नहीं, बल्कि असली सवाल यह है कि उस लाइसेंस के तहत किस उद्देश्य से और किन शर्तों के साथ कफ सिरप की बिक्री की जा रही थी।
अदालत के सामने आने वाले साक्ष्य इस बहस की दिशा तय कर सकते हैं।
कफ सिरप का कारोबार या नशे का नेटवर्क?
कोडीन युक्त कफ सिरप को लेकर देश के विभिन्न हिस्सों में समय-समय पर दुरुपयोग और अवैध आपूर्ति के आरोप सामने आते रहे हैं। ऐसे मामलों में सबसे बड़ी चुनौती यही रहती है कि वैध दवा कारोबार और अवैध नशीले पदार्थों के कारोबार के बीच की सीमा स्पष्ट रूप से निर्धारित की जाए।
एक ओर मेडिकल जरूरतों के लिए ऐसी दवाओं की वैध आपूर्ति जरूरी है, वहीं दूसरी ओर इनका दुरुपयोग रोकना भी कानून-व्यवस्था और सार्वजनिक स्वास्थ्य की बड़ी जिम्मेदारी है।
उत्तर प्रदेश सरकार ने हाईकोर्ट में जिस तरह इस मामले को पेश किया है, उससे स्पष्ट है कि वह इसे सामान्य दवा कानून के उल्लंघन के बजाय कथित संगठित नशीले पदार्थों के कारोबार के रूप में देख रही है।
लेकिन आरोप और आरोपों का अदालत में साबित होना दो अलग-अलग बातें हैं। अंतिम कानूनी निष्कर्ष उपलब्ध साक्ष्यों और न्यायिक परीक्षण के बाद ही सामने आएगा।
अब जमानत पर टिकी निगाहें
फिलहाल अदालत के सामने सबसे तत्काल मुद्दा 80 से अधिक आरोपियों की जमानत अर्जियों का है। भोला प्रसाद की अर्जी पर सुनवाई पूरी हो चुकी है, जबकि अन्य आरोपियों की अर्जियों पर सोमवार को सुनवाई आगे बढ़ेगी।
अदालत को यह तय करना होगा कि किन आरोपियों के खिलाफ उपलब्ध सामग्री प्रथमदृष्टया गंभीर है और किन्हें जमानत की राहत दी जा सकती है। साथ ही यह भी महत्वपूर्ण होगा कि अदालत लाइसेंस होने के बचाव और लाइसेंस की कथित शर्तों के उल्लंघन से जुड़े सरकारी तर्क को किस कानूनी कसौटी पर परखती है।
इस पूरे मामले में हाईकोर्ट का रुख इसलिए भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि फैसला न केवल इन आरोपियों की जमानत का रास्ता तय करेगा, बल्कि वैध दवा लाइसेंस की आड़ में कथित नशीले कारोबार पर एनडीपीएस एक्ट के इस्तेमाल से जुड़े कानूनी सवालों पर भी महत्वपूर्ण संकेत दे सकता है।
फिलहाल सरकार का दावा है कि लाइसेंस का इस्तेमाल मेडिकल जरूरत के बजाय कथित नशे के कारोबार के लिए किया गया, जबकि आरोपी पक्ष इसे वैध लाइसेंस के आधार पर आपराधिक कार्रवाई के खिलाफ अपना प्रमुख बचाव बता रहा है। अब इस कानूनी टकराव का अगला पड़ाव इलाहाबाद हाईकोर्ट की सुनवाई और उसके बाद आने वाले न्यायिक आदेश होंगे।














