“छात्रों पर कथित बर्बरता के खिलाफ लेटर पिटीशन दाखिल; संविधान के अनुच्छेद 14, 19 और 21 के उल्लंघन का आरोप, इलेक्ट्रॉनिक सबूत सुरक्षित रखने और दोषियों पर कार्रवाई की मांग”
नई दिल्ली। दिल्ली के जंतर-मंतर पर छात्रों और अन्य प्रदर्शनकारियों के खिलाफ हुई कथित पुलिस कार्रवाई अब देश की सर्वोच्च अदालत की चौखट तक पहुंच गई है। इस मामले में सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) के समक्ष एक लेटर पिटीशन (Letter Petition) दाखिल की गई है, जिसमें अदालत से स्वतः संज्ञान (सुओ मोटू) लेने, स्वतंत्र न्यायिक जांच कराने और दोषी पाए जाने वाले सभी लोगों के खिलाफ एफआईआर दर्ज कर आपराधिक कार्रवाई शुरू करने का निर्देश देने की मांग की गई है।
याचिका में दावा किया गया है कि शांतिपूर्ण प्रदर्शन के दौरान पुलिस ने अत्यधिक बल प्रयोग किया, जिससे प्रदर्शनकारियों के मौलिक अधिकारों का उल्लंघन हुआ। याचिकाकर्ता ने पूरे घटनाक्रम की निष्पक्ष जांच के लिए सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में जांच कराने की अपील की है।
वकील नरेंद्र मिश्रा ने सीजेआई को भेजी लेटर पिटीशन
सुप्रीम कोर्ट में प्रैक्टिस करने वाले अधिवक्ता नरेंद्र मिश्रा ने मुख्य न्यायाधीश के समक्ष यह लेटर पिटीशन दाखिल की है। उन्होंने कहा है कि वह इस मामले को सीजेआई की पीठ के समक्ष उठाएंगे ताकि अदालत इस गंभीर मुद्दे पर तत्काल हस्तक्षेप कर सके।
भारतीय न्याय व्यवस्था में लेटर पिटीशन एक ऐसी प्रक्रिया है, जिसके तहत कोई भी नागरिक या संस्था सीधे अदालत को पत्र लिखकर जनहित से जुड़े किसी गंभीर मुद्दे पर न्याय की गुहार लगा सकती है। यदि अदालत को मामला महत्वपूर्ण और सार्वजनिक हित से जुड़ा प्रतीत होता है, तो वह इसे जनहित याचिका (PIL) के रूप में स्वीकार कर सुनवाई कर सकती है।
संविधान के तीन महत्वपूर्ण अनुच्छेदों के उल्लंघन का आरोप
याचिका में कहा गया है कि जंतर-मंतर पर प्रदर्शन कर रहे लोगों के साथ हुई कथित कार्रवाई से संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार), अनुच्छेद 19 (अभिव्यक्ति और शांतिपूर्ण विरोध का अधिकार) तथा अनुच्छेद 21 (जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार) का उल्लंघन हुआ है।
याचिकाकर्ता का कहना है कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में शांतिपूर्ण प्रदर्शन नागरिकों का संवैधानिक अधिकार है और यदि राज्य द्वारा उस अधिकार के प्रयोग के दौरान अनावश्यक बल प्रयोग किया गया है, तो इसकी निष्पक्ष जांच होना आवश्यक है।
दिल्ली पुलिस से मांगी गई पूरी कार्रवाई की रिपोर्ट
याचिका में सुप्रीम कोर्ट से आग्रह किया गया है कि वह दिल्ली पुलिस आयुक्त को निर्देश दे कि वे अदालत के समक्ष पूरे घटनाक्रम का विस्तृत ब्यौरा प्रस्तुत करें।
इसमें विशेष रूप से निम्नलिखित जानकारियां मांगी गई हैं—
- प्रदर्शन स्थल पर पुलिस बल की तैनाती का पूरा विवरण।
- किस अधिकारी ने कौन-कौन से आदेश जारी किए।
- बल प्रयोग की परिस्थितियां और उसका आधार।
- सीसीटीवी फुटेज।
- ड्रोन कैमरे की रिकॉर्डिंग।
- बॉडी कैमरा फुटेज (जहां उपलब्ध हो)।
- वायरलेस संचार रिकॉर्ड।
- प्रदर्शन से जुड़े सभी आधिकारिक दस्तावेज और घटनाक्रम का रिकॉर्ड।
याचिका में कहा गया है कि इन दस्तावेजों से यह स्पष्ट हो सकेगा कि पुलिस की कार्रवाई कानून के दायरे में थी या नहीं।
100 वीडियो रिकॉर्डिंग सहित इलेक्ट्रॉनिक सबूतों को सुरक्षित रखने की मांग
याचिका के साथ करीब 100 वीडियो रिकॉर्डिंग वाली एक पेन ड्राइव भी अदालत को सौंपी गई है। इन वीडियो में कथित रूप से प्रदर्शन के दौरान हुई घटनाओं के दृश्य होने का दावा किया गया है।
याचिकाकर्ता ने अदालत से अनुरोध किया है कि सभी इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्यों को सुरक्षित रखने का निर्देश दिया जाए ताकि भविष्य में किसी भी प्रकार की छेड़छाड़, नष्ट करने या दबाने की संभावना समाप्त हो सके।
याचिका में जिन इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्यों को संरक्षित करने की मांग की गई है, उनमें शामिल हैं—
- सीसीटीवी फुटेज।
- मोबाइल फोन से बनाई गई वीडियो रिकॉर्डिंग।
- ड्रोन फुटेज।
- सोशल मीडिया पर उपलब्ध वीडियो।
- पुलिस के वायरलेस और संचार रिकॉर्ड।
- बॉडी कैमरा रिकॉर्डिंग।
- अन्य सभी डिजिटल एवं दस्तावेजी साक्ष्य।
स्वतंत्र न्यायिक जांच या निष्पक्ष एजेंसी से जांच कराने की मांग
याचिका का सबसे महत्वपूर्ण पक्ष यह है कि पूरे मामले की जांच केवल पुलिस पर नहीं छोड़ी जाए।
याचिकाकर्ता ने मांग की है कि या तो सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में स्वतंत्र न्यायिक जांच आयोग गठित किया जाए अथवा किसी स्वतंत्र जांच एजेंसी को पूरे मामले की जांच सौंपी जाए, ताकि निष्पक्षता पर कोई सवाल न उठे।
याचिका में कहा गया है कि यदि आरोप सही पाए जाते हैं, तो जिम्मेदार अधिकारियों और अन्य संबंधित व्यक्तियों के खिलाफ कानून के अनुसार कार्रवाई सुनिश्चित की जाए।
सादे कपड़ों में मौजूद लोगों की पहचान कराने की भी अपील
याचिका में एक अन्य महत्वपूर्ण मांग यह भी की गई है कि उन लोगों की पहचान कराई जाए जो कथित तौर पर सादे कपड़ों में प्रदर्शन स्थल पर मौजूद थे और जिन पर प्रदर्शनकारियों के साथ मारपीट करने के आरोप लगाए गए हैं।
अदालत से अनुरोध किया गया है कि जांच में यह भी स्पष्ट किया जाए कि—
- वे लोग कौन थे?
- क्या वे किसी सरकारी एजेंसी से जुड़े थे?
- क्या उन्हें किसी अधिकारी के निर्देश पर वहां भेजा गया था?
- क्या उन्हें किसी प्रकार का आधिकारिक संरक्षण प्राप्त था?
इन सवालों के जवाब सामने आने के बाद ही पूरे घटनाक्रम की वास्तविक तस्वीर स्पष्ट हो सकेगी।
दोषी कोई भी हो, एफआईआर दर्ज करने और आपराधिक कार्रवाई की मांग
लेटर पिटीशन में स्पष्ट कहा गया है कि यदि जांच के दौरान कोई भी व्यक्ति—चाहे वह किसी भी पद पर क्यों न हो—अपराध का दोषी पाया जाता है, तो उसके खिलाफ उचित एफआईआर दर्ज की जाए और कानून के अनुसार आपराधिक मुकदमा चलाया जाए।
याचिकाकर्ता ने अदालत से यह भी आग्रह किया है कि जांच किसी भी प्रकार के राजनीतिक या प्रशासनिक दबाव से मुक्त होनी चाहिए और कानून सबके लिए समान रूप से लागू होना चाहिए।
घायलों को मुआवजा और चिकित्सा सुविधा देने की भी मांग
याचिका में यह भी कहा गया है कि यदि जांच में यह स्थापित होता है कि अत्यधिक बल प्रयोग के कारण किसी प्रदर्शनकारी को चोट पहुंची है, तो उसे उचित मुआवजा दिया जाए।
साथ ही ऐसे सभी लोगों को आवश्यक चिकित्सा सहायता उपलब्ध कराने के निर्देश भी संबंधित प्रशासन को दिए जाएं, ताकि किसी भी घायल व्यक्ति का उपचार प्रभावित न हो।
देशभर में बढ़ रहा है विरोध, नागपुर में भी छात्रों का प्रदर्शन
इस घटनाक्रम का असर अब दिल्ली से बाहर भी दिखाई देने लगा है। सोमवार को नागपुर में भी सैकड़ों छात्रों, युवाओं और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने जंतर-मंतर की घटना के विरोध में प्रदर्शन किया।
यह प्रदर्शन सामाजिक कार्यकर्ता सोनम वांगचुक और कॉकरोच जनता पार्टी के समर्थन में आयोजित किया गया। प्रदर्शनकारियों ने केंद्र सरकार की शिक्षा नीति और हालिया घटनाक्रम को लेकर शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग उठाई।
प्रदर्शन में शामिल लोगों ने घोषणा की कि जब तक उनकी मांगें पूरी नहीं होतीं, तब तक आंदोलन जारी रहेगा।
अब सुप्रीम कोर्ट के रुख पर टिकी देश की नजर
जंतर-मंतर की घटना को लेकर दायर यह लेटर पिटीशन केवल एक प्रदर्शन तक सीमित नहीं मानी जा रही, बल्कि यह नागरिकों के शांतिपूर्ण विरोध के अधिकार, पुलिस की जवाबदेही और कानून के शासन से जुड़े व्यापक संवैधानिक सवाल भी खड़े करती है।
अब सबकी निगाहें सुप्रीम कोर्ट पर टिकी हैं कि वह इस मामले में स्वतः संज्ञान लेता है या नहीं, स्वतंत्र जांच के आदेश देता है या पहले केंद्र और दिल्ली पुलिस से जवाब तलब करता है। अदालत का अगला कदम न केवल इस मामले की दिशा तय करेगा, बल्कि भविष्य में शांतिपूर्ण प्रदर्शनों और पुलिस कार्रवाई से जुड़े मामलों के लिए भी महत्वपूर्ण न्यायिक दृष्टांत साबित हो सकता है।














