नई दिल्ली: म्यांमार के राष्ट्रपति यू मिन आंग ह्लाइंग की हालिया भारत यात्रा सिर्फ एक औपचारिक कूटनीतिक मुलाकात नहीं थी। यह दौरा भारत की राष्ट्रीय सुरक्षा, नॉर्थ-ईस्ट कनेक्टिविटी और एक्ट ईस्ट नीति के लिहाज से बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
करीब छह साल बाद दोनों देशों के शीर्ष नेतृत्व के बीच हुई इस मुलाकात ने उन रणनीतिक परियोजनाओं को नई गति दी है, जो भारत को दक्षिण-पूर्व एशिया से जोड़ने और पूर्वी सीमा को सुरक्षित बनाने में अहम भूमिका निभाएंगी।
भारत के लिए सबसे बड़ी चिंता: 1,643 किमी लंबी सीमा
भारत और म्यांमार के बीच 1,643 किलोमीटर लंबी सीमा है, जो अरुणाचल प्रदेश, नागालैंड, मणिपुर और मिजोरम से होकर गुजरती है। पिछले कुछ वर्षों में मणिपुर हिंसा, ड्रग्स तस्करी, हथियारों की तस्करी और उग्रवादी गतिविधियों ने इस सीमा को सुरक्षा एजेंसियों के लिए बड़ी चुनौती बना दिया है।
ऐसे में राष्ट्रपति मिन आंग ह्लाइंग का यह आश्वासन कि म्यांमार की धरती का इस्तेमाल भारत विरोधी गतिविधियों के लिए नहीं होने दिया जाएगा, नई दिल्ली के लिए बड़ी कूटनीतिक सफलता माना जा रहा है।
सीमा से समुद्र तक बढ़ा सुरक्षा सहयोग
यात्रा के दौरान दोनों देशों ने रक्षा, सीमा प्रबंधन और समुद्री सुरक्षा को लेकर सहयोग बढ़ाने पर सहमति जताई। खास बात यह रही कि बंगाल की खाड़ी में निगरानी बढ़ाने और समुद्री सूचनाओं के आदान-प्रदान को लेकर भी समझौता हुआ।
विशेषज्ञों का मानना है कि इससे भारत को पूर्वी समुद्री क्षेत्र में अपनी रणनीतिक स्थिति और मजबूत करने में मदद मिलेगी।
नॉर्थ-ईस्ट की तस्वीर बदल सकता है कालादान प्रोजेक्ट
भारत लंबे समय से कालादान मल्टी-मॉडल ट्रांजिट ट्रांसपोर्ट प्रोजेक्ट पर काम कर रहा है। यह परियोजना कोलकाता को म्यांमार के सितवे बंदरगाह से जोड़ते हुए मिजोरम तक सीधी पहुंच उपलब्ध कराएगी।
परियोजना पूरी होने के बाद नॉर्थ-ईस्ट राज्यों को समुद्री मार्ग का सीधा फायदा मिलेगा। इससे माल ढुलाई की लागत और समय दोनों में भारी कमी आएगी।
सबसे अहम बात यह है कि भारत की निर्भरता ‘चिकन नेक’ कहे जाने वाले सिलीगुड़ी कॉरिडोर पर कम होगी, जिसे रणनीतिक रूप से बेहद संवेदनशील माना जाता है।
एक्ट ईस्ट नीति को मिलेगा नया इंजन
भारत-म्यांमार-थाईलैंड त्रिपक्षीय राजमार्ग भी इस यात्रा का प्रमुख एजेंडा रहा। लगभग 1,360 किलोमीटर लंबा यह कॉरिडोर मणिपुर को सीधे थाईलैंड से जोड़ेगा।
भविष्य में इसके लाओस, कंबोडिया और वियतनाम तक विस्तार की योजना है। यह प्रोजेक्ट भारत के लिए दक्षिण-पूर्व एशिया के बाजारों तक पहुंच का नया रास्ता खोल सकता है।
चीन को भी जाएगा रणनीतिक संदेश
विश्लेषकों का मानना है कि म्यांमार के साथ बढ़ती साझेदारी केवल आर्थिक या सुरक्षा सहयोग तक सीमित नहीं है। यह चीन के बढ़ते प्रभाव के बीच भारत की क्षेत्रीय मौजूदगी मजबूत करने की रणनीति का भी हिस्सा है।
म्यांमार भारत और दक्षिण-पूर्व एशिया के बीच एक रणनीतिक पुल की भूमिका निभाता है। इसलिए नई दिल्ली के लिए ने-पी-ता के साथ मजबूत रिश्ते बनाए रखना बेहद जरूरी है।
भारत को क्या मिलेगा?
पूर्वोत्तर सीमा पर बेहतर सुरक्षा
उग्रवाद और तस्करी पर नियंत्रण में मदद
नॉर्थ-ईस्ट को समुद्र तक सीधी पहुंच
दक्षिण-पूर्व एशिया से व्यापार में बढ़ोतरी
एक्ट ईस्ट नीति को मजबूती
क्षेत्र में चीन के प्रभाव को संतुलित करने का अवसर
म्यांमार राष्ट्रपति की भारत यात्रा ने साफ कर दिया है कि नई दिल्ली अब सिर्फ पड़ोसी देशों के साथ रिश्ते निभाने की नीति नहीं, बल्कि सुरक्षा, व्यापार और कनेक्टिविटी को जोड़कर दीर्घकालिक रणनीतिक साझेदारी बनाने पर जोर दे रही है। अगर घोषित परियोजनाएं समय पर पूरी होती हैं, तो इसका सबसे बड़ा फायदा भारत के नॉर्थ-ईस्ट और पूरे क्षेत्रीय व्यापार नेटवर्क को मिल सकता है।














