विशेष रिपोर्ट: जब भी किसी सुरंग (Tunnel) परियोजना की बात होती है, आम धारणा यही होती है कि जितनी लंबी सुरंग होगी, उसकी लागत उतनी अधिक होगी। लेकिन टनल इंजीनियरिंग की दुनिया में यह नियम हमेशा सही साबित नहीं होता। कई बार केवल 2 किलोमीटर लंबी सुरंग का निर्माण 9 किलोमीटर लंबी सुरंग की तुलना में कहीं अधिक महंगा, जटिल और समय लेने वाला हो सकता है।
विशेषज्ञों के अनुसार, सुरंग निर्माण की वास्तविक लागत केवल उसकी लंबाई से निर्धारित नहीं होती, बल्कि उसके मार्ग में मौजूद भूगर्भीय एवं भू-तकनीकी परिस्थितियां सबसे महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। यही कारण है कि दुनिया भर में कई छोटी सुरंग परियोजनाएं अत्यधिक खर्चीली साबित हुई हैं, जबकि अपेक्षाकृत लंबी सुरंगें कम लागत और कम जोखिम के साथ पूरी की गई हैं।
निर्माण से पहले शुरू होता है विज्ञान का बड़ा अध्ययन
सुरंग निर्माण का कार्य मशीनों की खुदाई से बहुत पहले शुरू हो जाता है। किसी भी परियोजना की प्रारंभिक अवस्था में इंजीनियर और भूवैज्ञानिक विस्तृत भू-तकनीकी जांच (Geotechnical Investigation) करते हैं।
इस प्रक्रिया के दौरान चट्टानों की मजबूती, मिट्टी की प्रकृति, भूमिगत जल का दबाव, फॉल्ट ज़ोन की स्थिति, दरारों का नेटवर्क, भूकंपीय गतिविधियां तथा भूमि की स्थिरता का गहन अध्ययन किया जाता है। इन आंकड़ों के आधार पर यह तय किया जाता है कि सुरंग का डिज़ाइन कैसा होगा, कौन-सी निर्माण तकनीक अपनाई जाएगी और किन सुरक्षा उपायों की आवश्यकता होगी।
विशेषज्ञों का कहना है कि यदि प्रारंभिक जांच में किसी क्षेत्र की भूगर्भीय जटिलताओं का सही आकलन नहीं किया गया, तो परियोजना की लागत और समयसीमा दोनों पर गंभीर प्रभाव पड़ सकता है।
कमजोर चट्टानें और पानी बढ़ा देते हैं लागत
टनल इंजीनियरिंग में सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक कमजोर या अस्थिर भू-संरचना होती है।
यदि सुरंग का मार्ग ऐसी चट्टानों से होकर गुजरता है जिनमें दरारें अधिक हों, संरचना कमजोर हो या वे लगातार टूटने की स्थिति में हों, तो खुदाई के साथ-साथ अतिरिक्त सुरक्षा उपाय अपनाने पड़ते हैं। कई बार भूमिगत जल का अत्यधिक दबाव भी निर्माण कार्य को जटिल बना देता है।
ऐसी परिस्थितियों में इंजीनियरों को ग्राउटिंग, रॉक बोल्टिंग, शॉटक्रीट, स्टील रिब्स, वाटरप्रूफिंग मेम्ब्रेन तथा विशेष ड्रेनेज सिस्टम स्थापित करने पड़ते हैं। इन अतिरिक्त उपायों के कारण लागत कई गुना बढ़ जाती है।
यही कारण है कि केवल 2 किलोमीटर लंबी सुरंग, यदि कमजोर चट्टानों और भारी जल प्रवाह वाले क्षेत्र से गुजर रही हो, तो उसकी लागत 9 किलोमीटर लंबी स्थिर चट्टानों वाली सुरंग से अधिक हो सकती है।
स्थिर भूगर्भीय परिस्थितियां बनाती हैं निर्माण को आसान
इसके विपरीत यदि सुरंग मजबूत और स्थिर चट्टानों वाले क्षेत्र में बनाई जा रही हो, तो निर्माण प्रक्रिया अपेक्षाकृत सरल होती है।
ऐसी परिस्थितियों में खुदाई की गति तेज रहती है, सुरक्षा संबंधी अतिरिक्त हस्तक्षेप कम करने पड़ते हैं और मशीनों की उत्पादकता भी अधिक रहती है। परिणामस्वरूप लंबी सुरंग होने के बावजूद परियोजना कम लागत और कम समय में पूरी हो सकती है।
विशेषज्ञ बताते हैं कि कई सफल अंतरराष्ट्रीय परियोजनाओं में लंबी दूरी की सुरंगें इसलिए अपेक्षाकृत किफायती रहीं क्योंकि उनके मार्ग में भूगर्भीय जोखिम सीमित थे।
भूगर्भीय स्थिति के अनुसार चुनी जाती है निर्माण तकनीक
टनल निर्माण में एक ही तकनीक हर परियोजना पर लागू नहीं की जा सकती। भूगर्भीय परिस्थितियों के अनुसार निर्माण पद्धति का चयन किया जाता है।
NATM (New Austrian Tunnelling Method)
यह तकनीक उन क्षेत्रों में उपयोग की जाती है जहां चट्टानों की प्रकृति लगातार बदलती रहती है या भूगर्भीय परिस्थितियां जटिल होती हैं। इसमें खुदाई के दौरान प्राप्त वास्तविक आंकड़ों के आधार पर सपोर्ट सिस्टम को लगातार समायोजित किया जाता है।
TBM (Tunnel Boring Machine)
लंबी दूरी और अपेक्षाकृत स्थिर भूगर्भीय परिस्थितियों वाली परियोजनाओं में विशाल टनल बोरिंग मशीनों का उपयोग किया जाता है। यह तकनीक तेज, सुरक्षित और सटीक मानी जाती है, हालांकि इसकी प्रारंभिक लागत काफी अधिक होती है।
Cut and Cover Method
शहरी क्षेत्रों में जहां सुरंग अपेक्षाकृत कम गहराई पर बनाई जाती है, वहां कट एंड कवर तकनीक अपनाई जाती है। इसमें पहले ऊपर से खुदाई की जाती है, फिर संरचना बनाकर उसे पुनः ढक दिया जाता है।
आधुनिक सुरंगों में सुरक्षा बन चुकी है सबसे बड़ा निवेश
आज की सुरंग परियोजनाएं केवल खुदाई तक सीमित नहीं हैं। आधुनिक सुरक्षा मानकों के कारण कई अत्याधुनिक प्रणालियों को शामिल करना अनिवार्य हो गया है।
इनमें उन्नत वेंटिलेशन सिस्टम, धुआं निकासी व्यवस्था, अग्नि सुरक्षा नेटवर्क, आपातकालीन निकास मार्ग, निगरानी कैमरे, सेंसर आधारित मॉनिटरिंग सिस्टम और रियल-टाइम डेटा विश्लेषण प्लेटफॉर्म शामिल हैं।
इसके अलावा भूकंप प्रतिरोधी डिज़ाइन, भूमिगत जल नियंत्रण प्रणाली, पर्यावरण संरक्षण उपाय तथा प्रभावित क्षेत्रों के पुनर्वास कार्यक्रम भी परियोजना लागत का महत्वपूर्ण हिस्सा बन चुके हैं।
शहरी क्षेत्रों में बढ़ जाती हैं चुनौतियां
महानगरों में सुरंग निर्माण एक अलग प्रकार की चुनौती प्रस्तुत करता है।
घनी आबादी, भूमिगत पाइपलाइनें, बिजली के नेटवर्क, मेट्रो कॉरिडोर, सीवर लाइनें और निरंतर यातायात के बीच निर्माण कार्य करना अत्यंत जटिल होता है। ऐसे क्षेत्रों में इंजीनियरों को निर्माण के साथ-साथ सार्वजनिक जीवन को न्यूनतम प्रभावित रखने की जिम्मेदारी भी निभानी पड़ती है।
यही कारण है कि कई बार शहरी क्षेत्र में बनने वाली छोटी सुरंगें ग्रामीण या पर्वतीय क्षेत्रों की लंबी सुरंगों से अधिक महंगी सिद्ध होती हैं।
भारत की प्रमुख परियोजनाएं देती हैं उदाहरण
भारत में कई सुरंग परियोजनाएं इस सिद्धांत को स्पष्ट रूप से दर्शाती हैं।
Atal Tunnel का निर्माण हिमालयी क्षेत्र की कठिन भूगर्भीय परिस्थितियों में किया गया, जहां अत्यधिक बर्फबारी, कमजोर चट्टानें और जल प्रवाह जैसी चुनौतियां मौजूद थीं।
वहीं Mumbai Coastal Road Tunnel के निर्माण में समुद्री भूगर्भीय परिस्थितियों, जल नियंत्रण और शहरी अवसंरचना से जुड़ी जटिलताओं का सामना करना पड़ा।
इसी प्रकार Delhi Metro तथा Mumbai Metro की विभिन्न भूमिगत परियोजनाओं में अलग-अलग भूगर्भीय और शहरी परिस्थितियों के अनुसार विशिष्ट निर्माण रणनीतियां अपनाई गईं।
भूविज्ञान ही तय करता है सुरंग का भविष्य
टनल इंजीनियरिंग के विशेषज्ञों का मानना है कि सुरंग का डिज़ाइन, मशीनरी और तकनीक इंजीनियर तैयार करते हैं, लेकिन परियोजना की सफलता अंततः उस भूमि की प्रकृति पर निर्भर करती है जिसके भीतर सुरंग बनाई जा रही है।
इसी संदर्भ में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर एक प्रसिद्ध कथन अक्सर दोहराया जाता है—
“Engineering Designs the Tunnel, But Geology Decides Its Fate.”
अर्थात, इंजीनियर सुरंग का निर्माण करते हैं, लेकिन उसकी सफलता, सुरक्षा, लागत और चुनौतियों का अंतिम निर्णय भूगर्भीय परिस्थितियां करती हैं।
इसलिए टनल इंजीनियरिंग की दुनिया में एक सिद्धांत सदैव प्रासंगिक माना जाता है—














