“मनोरंजन की जानकारी भरपूर, लेकिन जनप्रतिनिधियों की जवाबदेही पर खामोशी क्यों?”
नई दिल्ली: सोशल मीडिया पर इन दिनों एक संदेश तेजी से चर्चा में है, जिसमें कहा गया है कि भारत की सबसे बड़ी समस्या किसी राजनीतिक दल विशेष से नहीं, बल्कि उस मानसिकता से जुड़ी है जिसमें लोग फिल्मी सितारों, क्रिकेट खिलाड़ियों और सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर्स के बारे में विस्तृत जानकारी रखते हैं, लेकिन अपने क्षेत्र के विधायक (MLA), सांसद (MP) और उनके कार्यों के बारे में बहुत कम जानते हैं।
यह संदेश भले ही एक सामान्य टिप्पणी प्रतीत हो, लेकिन इसके पीछे लोकतंत्र की मजबूती से जुड़ा एक अत्यंत गंभीर प्रश्न छिपा हुआ है—क्या भारत का नागरिक वर्ग अपने लोकतांत्रिक अधिकारों और कर्तव्यों के प्रति उतना ही जागरूक है जितना उसे होना चाहिए?
क्या हमारी प्राथमिकताएं संतुलित हैं?
आज बड़ी संख्या में लोगों को यह जानकारी होती है कि किसी क्रिकेट खिलाड़ी का औसत क्या है, किसी फिल्म अभिनेता की संपत्ति कितनी है, किस सेलिब्रिटी का निजी जीवन चर्चा में है या सोशल मीडिया पर कौन-सा विवाद चल रहा है।
लेकिन जब बात अपने क्षेत्र के विकास, सरकारी योजनाओं, जनप्रतिनिधियों की जवाबदेही और सार्वजनिक धन के उपयोग की आती है, तो अधिकांश नागरिकों के पास पर्याप्त जानकारी नहीं होती।
विशेषज्ञों का मानना है कि मनोरंजन और खेलों में रुचि रखना गलत नहीं है, लेकिन यदि समाज का एक बड़ा वर्ग शासन व्यवस्था और लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं से पूरी तरह अनभिज्ञ हो जाए, तो यह लोकतंत्र के लिए चिंता का विषय बन सकता है।
क्या हमें अपने जनप्रतिनिधियों की जानकारी है?
लोकतंत्र में जनता सर्वोच्च होती है। जनता ही अपने प्रतिनिधियों को चुनती है और उन्हें विकास कार्यों की जिम्मेदारी सौंपती है। लेकिन कई बार यह देखा जाता है कि मतदान के बाद नागरिक अपने प्रतिनिधियों से संवाद और जवाबदेही की प्रक्रिया से दूर हो जाते हैं।
हर नागरिक को यह जानना चाहिए—
उसके क्षेत्र का विधायक और सांसद कौन है।
उन्होंने अपने कार्यकाल में कौन-कौन से विकास कार्य कराए हैं।
सांसद एवं विधायक निधि का उपयोग किन योजनाओं में हुआ है।
शिक्षा, स्वास्थ्य, सड़क, पेयजल और रोजगार के क्षेत्र में क्या प्रगति हुई है।
चुनाव के दौरान किए गए वादों की स्थिति क्या है।
जनप्रतिनिधियों तक अपनी समस्याएं और सुझाव किस प्रकार पहुंचाए जा सकते हैं।
लोकतंत्र केवल वोट देने तक सीमित नहीं
विशेषज्ञों के अनुसार लोकतंत्र की असली शक्ति मतदान के दिन नहीं, बल्कि मतदान के बाद दिखाई देती है।
एक जिम्मेदार नागरिक केवल वोट नहीं देता, बल्कि—
सरकारी नीतियों पर नजर रखता है।
विकास कार्यों की समीक्षा करता है।
जनहित के मुद्दों पर आवाज उठाता है।
सूचना के अधिकार (RTI) जैसे संवैधानिक साधनों का उपयोग करता है।
स्थानीय प्रशासन और जनप्रतिनिधियों से संवाद बनाए रखता है।
सार्वजनिक धन के उपयोग पर निगरानी रखता है।
जब नागरिक प्रश्न पूछते हैं, तभी लोकतांत्रिक संस्थाएं अधिक जवाबदेह बनती हैं।
करदाता का अधिकार: सार्वजनिक धन का हिसाब
देश का प्रत्येक नागरिक प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से कर (Tax) देता है। यही धन सड़कों, अस्पतालों, स्कूलों, बिजली, पानी और अन्य सार्वजनिक सुविधाओं पर खर्च किया जाता है।
ऐसे में नागरिकों का यह अधिकार है कि वे जानें—
उनके क्षेत्र में कितना बजट आवंटित हुआ।
कौन-कौन सी परियोजनाएं चल रही हैं।
योजनाओं की वास्तविक स्थिति क्या है।
कहीं धन का दुरुपयोग तो नहीं हो रहा।
जागरूक नागरिक ही सुशासन की सबसे बड़ी गारंटी होते हैं।
युवाओं की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण
भारत विश्व के सबसे युवा देशों में शामिल है। इसलिए लोकतंत्र के भविष्य की दिशा काफी हद तक युवाओं की जागरूकता पर निर्भर करती है।
यदि युवा केवल सोशल मीडिया ट्रेंड्स तक सीमित रहने के बजाय संविधान, शासन व्यवस्था, सार्वजनिक नीतियों, रोजगार, शिक्षा, पर्यावरण और सामाजिक मुद्दों पर भी ध्यान दें, तो देश की लोकतांत्रिक व्यवस्था और अधिक मजबूत हो सकती है।
जागरूकता ही लोकतंत्र की सुरक्षा कवच
इतिहास गवाह है कि जहां नागरिक जागरूक रहे हैं, वहां शासन अधिक पारदर्शी, उत्तरदायी और जनहितकारी बना है। वहीं जहां जनता उदासीन रही, वहां भ्रष्टाचार, कुप्रबंधन और जवाबदेही की कमी बढ़ी है।
इसलिए लोकतंत्र की सबसे बड़ी आवश्यकता केवल अच्छे नेताओं का चयन नहीं, बल्कि ऐसे नागरिकों का निर्माण है जो अपने अधिकारों के साथ-साथ अपने कर्तव्यों को भी समझते हों।
भारत की लोकतांत्रिक शक्ति संसद, विधानसभाओं और सरकारी संस्थाओं से अवश्य बढ़ती है, लेकिन उसकी वास्तविक नींव जागरूक नागरिकों पर टिकी होती है।
यदि हम खेल, मनोरंजन और सोशल मीडिया की जानकारी रखने के साथ-साथ अपने क्षेत्र के विकास, जनप्रतिनिधियों के कार्यों, सरकारी योजनाओं और लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं के प्रति भी समान रुचि दिखाएं, तो न केवल लोकतंत्र मजबूत होगा बल्कि सुशासन और राष्ट्र निर्माण की प्रक्रिया भी अधिक प्रभावी बनेगी।
एक जागरूक मतदाता केवल चुनाव में भाग लेने वाला नागरिक नहीं होता, बल्कि वह लोकतंत्र का प्रहरी, जनहित का संरक्षक और राष्ट्र निर्माण का सक्रिय सहभागी होता है।
जागरूक नागरिक — सशक्त लोकतंत्र की सबसे बड़ी ताकत।














